Sunday, December 30, 2018

’सूरज की मिस्ड कॉल’ पर सम्मान

1. हर ऐसी मुहिम पर शक करो, फ़जीहत भरी जानो जिसके लिये नये कपड़े पहनने पड़ें। -मुश्ताक अहमद यूसुफ़ी

         2.बेइज्जती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो तो आधी इज्जत बच जाती है। - परसाई

’लखनऊ मुहिम’ के लिये तैयार होते हुये युसुफ़ी साहब की बात याद आ गयी। ’लखनऊ मुहिम’ मतलब अपन की किताब ’सूरज की मिस्ड कॉल’ पर उप्र हिन्दी संस्थान द्वारा दिये जा रहे सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ’अज्ञेय’ सम्मान के लिये लखनऊ यात्रा। यह इनाम मुझे रेखाचित्र, संस्मरण और यात्रा विवरण श्रेणी में मिलने की घोषणा हुई है।

युसुफ़ी साहब की बात याद आते ही अपन ने कपड़ों को किसी न किसी बहाने बहाने दायें-बायें कम कर दिया। कोई बड़ा है, कोई आरामदायक नहीं, किसी में प्रेस ठीक नहीं , कोई कसा लगता है आदि-घरानों के बहानों से नये कपड़ों को ठिकाने लगा दिया गया। फ़जीहत की मात्रा कम हो गयी।

नये कपड़े भले न पहनें लेकिन फ़जीहत का शक का एक बार हो गया तो हो गया। इसलिये परसाई जी की बात मानकर घरवालों को तैयार किया गया ’लखनऊ मुहिम’ के लिये। घरैतिन और बड़े साहबजादे इस मुहिम में साथ जाने के लिये तैयार हुये। फ़जीहत का एहसास एक-तिहाई हो गया। फ़िर भी बना तो हुआ ही है।

लखनऊ के मित्रों से गुजारिश है कि बचे रह गये फ़जीहत के एहसास को कम कराने के लिये वे भी हिन्दी संस्थान पहुंचे। सुबह 0230 बजे हिन्दी संस्थान , हजरजगंज, लखनऊ में नामित पुस्तकों पर हिन्दी संस्थान द्वारा घोषित पुरस्कार द्वारा प्रदान किये जायेंगे। किताब के लिये 75000/- रुपये मिलेंगे इनाम में। पुरस्कार की सूचना अपन नामराशि अनूप मणि त्रिपाठी से ३१ अगस्त को मिली थी। संबंधित पोस्ट का लिंक इस लिये लगा रहे हैं ताकि उस पर आई बधाईयों का शुक्रिया अदा कर सकें (https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10215097804211963)

सूरज की मिस्ड कॉल’ अपने सूरज भाई के विविध बिम्बों पर आधारित लिखे लेखों का संकलन है। किताब गये साल आई लेकिन इस किताब का शीर्षक ११ जुलाई, २०१२ को ही तय हो गया था जब अपन ने यह लेख लिखा था।

किताब रुझान पब्लिकेशन से आई। लिंक यह रहा http://rujhaanpublications.com/product/suraj-ki-missed-call/
इस किताब की भूमिका हमारे प्रीतिकर भाई प्रियंकर पालीवाल ने लिखी थी यह कहते हुये - "इस संकलन ‘सूरज का मिस्ड कॉल’ में सूरज के इतने मूड, इतनी क्रियाएं, इतनी मुद्राएं और भंगिमाएं हैं कि आप मुग्ध हो जाएंगे . यहां नदी और ताल पर चमकता सूरज है, ट्रेन और हवाई जहाज में साथ चलता और बतियाता सूरज है, कोहरे की रजाई में दुबका सूरज है, अंधेरे के खिलाफ सर्च वारंट लेकर आता मुस्तैद सूरज है, ड्यूटी कम्प्लीट करने के बाद थका-हारा सूरज है और अपनी बच्चियों यानी किरणों पर वात्सल्य छलकाता पिता सूरज है।

इस सूर्य-संवाद की भाषा शास्त्रीय नहीं, समकालीन है. बहती हुई, बोलती हुई हिंदी . वैसी ही हिंदी ,जैसी आज-कल सूरज के तमाम ‘क्लाइंट्स’ की है . यह कहना बड़ा मुश्किल है कि इस संकलन में सूरज अनूप शुक्ल की आंख से दुनिया देख रहा है या अनूप शुक्ल सूरज की आंख से। यह सूरज दरअसल लेखक का आत्मरूप है।"

इस मौके पर मैं अपने सभी पाठक मित्रों का आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने इस किताब में शामिल लेखों को पढते हुये हमारी हौसला आफ़जाई की। कहने को तो बहुत कुछ है लेकिन अब निकलना भी है लखनऊ के लिये इसलिये इतना ही। आप भी पहुंचिये हिन्दी संस्थान, लखनऊ। फ़ोटूबाजी और चायचर्चा के लिये।

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