Monday, April 28, 2025

मेरी निगाह में कश्मीर

 कश्मीर पहली बार हम गए थे जुलाई, 2022 में। इसके बाद अगस्त, 2023 में। इसके पहले कश्मीर के बारे में सिर्फ़ सुना था। जो सुना था उससे कश्मीर के जो छवि बनी थी वह मिली, जुली थी। वहाँ की ख़ूबसूरती, डल झील, गुलमर्ग, पहलगाम, सोनमर्ग की ख़ूबसूरती के किस्से सुने थे। वहाँ घटी आतंकवादी घटनाओं की डरावनी कहानियाँ भी सुनी थी। कश्मीरी पंडितों के कश्मीर से पलायन के किस्से भी सुने थे।

पहली बार अकेले गए थे। ठहरने की जगह डल झील से थोड़ी ही दूर थी। उस समय वहाँ पर्यटकों की भीड़ थी। श्रीनगर के चप्पे-चप्पे पर सेना के जवान थे। मुख्य बाज़ार के लगभग हर चौराहे पर सेना के जवान दिखे। कहीं टैंक भी साथ थे। हमारी आयुध निर्माणियों के बने टैंक। उनमें देश के अलग-अलग हिस्से के रहने वाले सैनिक तैनात थे। बड़े चौराहों पर टैंक के साथ लगता कि कोई मिनी छावनी है।
सैनिक लोग मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी देते दिखे। वे स्थानीय लोगों से बातचीत नहीं करते थे। न ही स्थानीय लोग उनसे बात करते। आम स्थानीय लोगों ने बताया कि सेना के लोगों से उनको कोई तकलीफ़ नहीं है। सेना के लोग भले लोग हैं। अलबत्ता स्थानीय पुलिस से शिकायतें थीं उनको। हमारे ड्राइवर ने बताया कि पुलिस वालों ने आतंकवादी गतिविधियों के समय तमाम निर्दोष लोगों को बंद कर दिया। कुछ लोग बड़ी रक़म देकर छूट गए, बहुत लोग बंद रहे। बहुत से नौजवानों की ज़िंदगी तबाह हो गई। स्थानीय पुलिस/प्रशासन के प्रति उनमें ग़ुस्से को भुनाते हुए कट्टर लोगों को अपने साथ मिला लिए। बदले की आग में उनमें से कुछ आतंकवादी गतिविधियों में भी शामिल हो गये।
स्थानीय खानदानी नेताओं के प्रति लोगों के मन में यह धारणा थी कि उन्होंने अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए भारी सम्पत्ति बनाई है। कश्मीर की बेहतरी के लिए काम नहीं किया है। पूरे देश के नेताओं के बारे में आम जनता में यही आम धारणा है।
जब मैं पहली बार गया था उसके कुछ दिन पहले ही कोविड का हल्ला ख़त्म हुआ था। कोविड के दौरान पर्यटक आए नहीं थे कश्मीर। पर्यटन पर निर्भर लोगों की आमदनी ठप्प थी। हमारे ड्राइवर ने बताया कि उन्होंने अपनी खुद की कार ख़रीदी थी। कोविड के दौरान किस्त न चुका पाने के कारण और अपने पिता की बीमारी के चलते उनका इलाज करवाने के लिए उनको अपनी कार बेचनी पड़ी।
जितने भी लोगों से मैं मिला वे सब बहुत मिलनसार। अच्छे व्यवहार वाले। ख़ुशनुमा और सहायक लोग। भाई चारा और भलमनसाहत की मिशाल वाले। मैं कश्मीर के उन इलाक़ों में भी गया जहाँ कभी नियमित आतंकवादी घटनाओं के किस्से सुने जाते थे। लालचौक और पुराना श्रीनगर का इलाक़ा जहाँ जाना कभी ख़तरनाक समझा जाता था। लालचौक का इलाक़ा चहल-पहल भरा दिखा। एक जगह वहाँ सड़क पर कैरम खेलते लोग दिखे।
पुराने श्रीनगर के इलाके में सुबह के समय स्कूल जाते बच्चे, उनको बस में बैठाने के लिए आए घर के लोग दिखे। एक जगह स्कूल जाती बच्ची ने बातचीत के दौरान मेरा चश्मा छीनकर अपनी आँख में लगा लिया। मेरे पेट पर तबला सा बजाते हुए पूछा -'ये क्या है?' उसकी माँ ने बच्ची की हरकत को हंसते हुए देखा और मेरा चश्मा वापस दिलवाया।
उसी जगह स्कूल जाती बड़ी उमर की बच्चियाँ भी दिखीं। उनसे बातचीत के बाद उनके फ़ोटो खींचे। उनसे नाम पूछने पर उन्होंने बताया। हमने दुबारा पूछा तो उनमें से एक बच्ची ने मेरे हाथ से मोबाइल से झटककर अपना नाम लिखा और मोबाइल वापस कर दिया। स्कूल जाती लगभग सारी बच्चियाँ हिजाब में दिखीं। उनको डर था कि कोई हिजाब न पहनने पर कोई अनहोनी हो सकती है। पहलगाम की बेताब वैली में कई स्कूली लड़कियों ने हमारे परिवार के साथ फ़ोटो खिंचवाया। अपना इंस्टाग्राम खाता साझा किया।
लाल चौक के पास ही एक मंदिर दिखा। जिस परिवार का मंदिर था वे लोग कश्मीरी पंडित हैं। वे 1990 में कश्मीर छोड़कर चले गए। उनके मंदिर की देखभाल उनके एक मुस्लिम दोस्त करते हैं जिनकी दुकान मंदिर के पास ही है। हमारे कहने पर उन्होंने मंदिर खुलवाकर मुझे दिखाया भी।
जगह-जगह उत्तर प्रदेश, बिहार के लोग फल, चाय, आइसक्रीम, चाट, भेलपूरी बेचते मिले। ये लोग पूरे कश्मीर में हैं। हर महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल पर हैं। श्रीनगर में हैं, गुलमर्ग में हैं, पहलगाम में हैं। पहलगाम के आगे भी हैं। इनमें से कई लोगों से मैंने बातचीत भी की। ये वहाँ रोज़ी-रोटी की तलाश में आए लोग हैं। कुछ लोग तो सालों से हैं। घर जाते हैं लेकिन कमाई के लिए वापस लौट आते हैं।
पुराने कश्मीर में मधुबनी का एक आदमी मोटरसाइकिल पर चार-पाँच लोगों को बैठाकर सिगरेट फूंकता मस्ती करता दिखा। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वहाँ कोई बंदिश है। कोई तनाव है।
पहली बार पहलगाम में दो दिन रहा। लिड्डर नदी के किनारे बसा पहलगाम बहुत ख़ूबसूरत है। पहले दिन सूरज ढलने की समय की इतना खूबसूरत नजारा कम ही देखने में आता है। ऐसा लगा सूरज विदा होते समय अपना सारा सोना पहाड़ों के पास जमा करके जा रहा है।
उन दिनों अमरनाथ यात्रा के कारण सुरक्षा व्यवस्था ज़बरदस्त थी। थोड़ी-थोड़ी दूर पर सेना के जवान। जगह-जगह अमरनाथ यात्रा के यात्रियों के कैम्प। सुबह-सुबह समूहों में लोग अपने कैम्प से निकलते। यात्रा के लिए बढ़ जाते। लौटते हुए भी लोग वहीं से होते हुए वापस आते। देश के हर हिस्से के लोग वहाँ दिखे। इस बारे में कई किस्से मैंने अपनी पोस्ट्स में लिखे थे।
पहलगाम में आप अपनी गाड़ी/टैक्सी से जा तो सकते हैं। लेकिन वहाँ के पर्यटन स्थलों पर जाने के लिए स्थानीय ट्रांसपोर्ट पर ही जा सकते हैं। सबके रेट तय हैं। टैक्सी स्टैंड से गाड़ी लेकर आना-जाना कर सकते हैं। अपनी गाड़ी से आप पहलगाम का बाज़ार और स्थानीय जगहों पर जा सकते हैं लेकिन पर्यटक स्थल पर जाने के लिए पहलगाम से ही टैक्सी लेनी होती थी। श्रीनगर से आया मेरा ड्राइवर दो दिन तक पहलगाम में आराम ही करता रहा।
बैसरन घाटी, जहाँ आतंकवादी घटना हुई पहलगाम से कुछ दूर ऊँचाई पर स्थित है। वहाँ पैदल या खच्चर पर ही ज़ाया जा सकता है। बैसरन घाटी की ख़ूबसूरती के चलते इसे भारत का स्विटज़रलैंड भी कहते हैं। घाटी लगभग साल भर खुली रहती है। जिन ड्राइवर के साथ मैं गया था बैसरन घाटी उन्होंने फिर इस बात की पुष्टि की कि बैसरन घाटी साल भर खुली रहती है। उन्होंने यह भी बताया कि आतंकवादी घटना वाले दिन वे भी पहलगाम में थे।
बरसात या जाड़े में रास्ता दुर्गम हो जाने के कारण वहाँ जाना मुश्किल हो जाने पर लोगों का जाना बंद हो जाए वह बात अलग। पहलगाम के मुख्य बाजार से कुछ दूर से ही बैसरन घाटी की चढ़ाई शुरू होती है। पहलगाम का अस्पताल घाटी की चढ़ाई शुरू होने वाली जगह से थोड़ी ही दूर है। घाटी जाने के रास्ते की शुरुआत तक तो सुरक्षा के लिए सैनिक तैनात रहते हैं। लेकिन चढ़ाई शुरू होने के बाद और बैसरन घाटी तक कोई सुरक्षा नहीं रहती।
आतंकवादी घटना वाले दिन सेना/पुलिस के लोगों के वहाँ पहुँचने में देरी का कारण यह भी रहा होगा क्योंकि कोई सड़क या आसान रास्ता बैसरन घाटी तक पहुंचने का। बैसरन घाटी पर सुरक्षा सैनिक नहीं थे। शायद इसका कारण यह भी रहा हो क्योंकि रास्तों में इतनी सघन सुरक्षा जाँच है कि लोगों ने कल्पना नहीं की होगी कि वहाँ भी कोई आतंकवादी घटना हो सकती है। पहलगाम आने-जाने में सुरक्षा इतनी कड़ी है कि शाम को निश्चित समय के बाद पर्यटकों को श्रीनगर से पहलगाम आने -जाने की अनुमति नहीं होती।
आतंकवादियों ने वहाँ आए पर्यटकों की क्रूरता पूर्ण हत्या की। धर्म पूछ-पूछकर पर्यटकों को मारा। मारे जाने वाले लोगों में अधिकतर हिंदू थे। मारे जाने वाले लोगों में से कुछ नवविवाहित थे। ज़्यादातर नई उमर के लोग। एक घोड़े वाले ने आतंकवादी की राइफ़ल छीनने की कोशिश की तो उसे भी मार दिया।
आतंकवादियों के चले जाने के बाद या उस दरम्यान भी स्थानीय लोगों ने पर्यटकों को सुरक्षित नीचे पहुँचाया। कई लोगों ने इसकी भी कहानियाँ साझा की हैं। नज़ाकत भाई के बारे में छत्तीसगढ़ के एक परिवार ने लिखा किस तरह उन्होंने उनके बच्चों की हिफ़ाज़त की। परिवार के लोगों नज़ाकत भाई का शुक्रिया अदा करते हुए लिखा -"नज़ाकत भाई, हम आपका यह एहसान कभी नहीं भूलेंगे।"
जिन लोगों के परिवार के लोग मारे गए उनमें से कुछ लोगों ने स्थानीय मुस्लिम समाज लोगों के सहयोग की जानकारी दी। कुछ लोगों ने यह भी बताया कि उनके परिवार के लोगों को ग़ैर मुस्लिम बताकर मार दिया। कलमा पढ़कर बच जाने का क़िस्सा भी एक प्रोफ़ेसर ने बताया।
सारी वारदात का जो मक़सद समझ में आया वह कश्मीर में आतंकी हिंसा के ज़रिए कश्मीर को हिंदुस्तान से अलग-थलग करना और हिंदू-मुस्लिम नैरेटिव बनाकर समाज में विभाजन करना था। लोगों की सहज प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि आतंकवादी शायद अपने उद्धेश्य में सफल रहे।
आतंकवादियों द्वारा बहुतायत में हिंदू पर्यटकों की हत्या होने पर देश की बहुसंख्यक आबादी में आक्रोश है। आतंकवादियों द्वारा की गयी हत्याओं को हिंदू-मुस्लिम रंग देने के लिए तमाम लोग लग गए हैं। इस तरह के नैरेटिव चलाए जा रहे हैं कि स्थानीय लोगों की आतंकवादी लोगों से मिली भगत थी। बिना स्थानीय लोगों के सहयोग के आतंकवादी घटना हो ही नहीं सकती।
मेरी समझ में कुछ स्थानीय लोगों का सहयोग ज़रूर रहा होगा लेकिन कश्मीर के सभी लोग आतंकवादी लोगों से मिले हुए हैं यह मानना सही नहीं है। देश के लोगों में इतना ग़ुस्सा है कि जिन लोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर पर्यटकों को बचाया, अपने घर में रखा, हिफ़ाज़त की, खाना खिलाया, एयरपोर्ट छोड़ा उसकी अनदेखी करते हुए कह रहे हैं कि यह सब दिखावा है।
इंसानियत का कोई पहलू हिंदू-मुस्लिम नैरेटिव वाले लोगों को स्वीकार नहीं है। किसी ने कोई साम्प्रदायिक सद्भाव से जुड़ी घटना या जानकारी साझा की लोग उस पर हमलावर हो रहे हैं कि इनसानियत की बात करते हुए शर्म नहीं आती।
पढ़े-लिखे समझदार समझे जाने वाले लोग इतनी क्रूर, डरावनी, भद्दी, आक्रामक भाषा में हमलावर हैं मानों भाषा की मिसाइल से ही इंसानियत की बात करने वालों का संहार देंगे।
ज्ञानी लोग अपने ख़ज़ाने से इस्लाम के कट्टर उद्धरण निकालकर पेश कर रहे हैं कि यह तो इस धर्म के लोगों की बुनियादी फ़ितरत है। काफिरों के ख़िलाफ़ उद्धरण पेश करके जनता को जागरूक कर रहे हैं कि इस्लाम मूलतः आतंककारी धर्म है। आतंकवादी घटना जो देश में अस्थिरता फैलाने के मूल उद्धेश्य अंजाम दी गयी, उसको विशुद्द हिंदू-मुस्लिम रंग देकर साबित करने में लगे हैं कि आतंकवादी केवल मुस्लिम ही होते हैं। ऐसे लोग देश के बाकी हिस्सों की आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हिंदू और दूसरे समुदायों के योगदान को बिसरा देते हैं। भूल जाते हैं कि देश में जब सिख विरोधी दंगे हुए, पंजाब में आतंकवाद का हमला हुआ, गुजरात में दंगे हुए तो हत्याओं में शामिल अधिकतर लोग ग़ैर मुस्लिम थे। ज्ञानी लोगों का एक आतंकवादी घटना को सिर्फ़ हिंदू-मुस्लिम रंग देना साम्प्रदायिक कट्टरता के यज्ञ में आहुति देना है।
'धर्म पूछकर मारा', 'प्लान A, प्लान B' जैसे संदेश कट-पेस्ट होकर पूरे सोशल मीडिया में पसरे हैं। जिस खच्चर वाले को आतंकवादियों ने मार दिया उसको भी उनके साथ शामिल बताकर उसको मौत को भी साज़िश बता रहे हैं। 'प्लान A, प्लान B' जैसे संदेश एक आम इंसान के दिमाग़ की उपज नहीं है। इस तरह के संदेश ख़ास लोग अपने नैरेटिव के हिसाब से गढ़कर आम लोगों को सौंप देते हैं। ऐसे लोग संदेश कुली की तरह उनको आगे फैलाते रहते हैं। कुछ लोगों को पैसे भी मिलते होंगे इस मेहनत के।
'धर्म पूछकर मारा' के जबाब में कुछ लोगों ने 'जो जाति पूछकर लोगों को मारते रहे हैं वे धर्म पूछकर मारने की बात कर रहे हैं' ' आतंकवादियो ने धर्म पूछकर मारा लेकिन कश्मीरियों ने बिना धर्म पूछे बचाया ' जैसे संदेश बनाए। 'हवाई कंपनियो ने किराया बढ़ा दिया, कश्मीर के लोगों में मुफ़्त सहायता की' इस पर भी संदेश चल रहे हैं।
कुछ लोगों ने कश्मीर की समस्या पर विस्तार से चर्चा की। यह भी बताया कि कश्मीरी लोग आतंकवादी घटनाओं की निंदा में मजबूरी में सामने आए हैं। इसका कारण उनकी रोज़ी-रोटी पर असर पड़ना है। ऐसे लोगों ने कश्मीर के लोगों के पुराने पाप भी गिनाए हैं उस समय विरोध क्यों नहीं किया? कुछ लोगों ने कश्मीर बायकाट का नारा बुलंद किया है।
कश्मीर बायकाट का नारा लगाने वालों को शायद अन्दाज़ नहीं होगा कि कश्मीर में उत्तर प्रदेश, बिहार और दीगर जगहों के अनगिनत लोग भी रोज़गार के लिए आये हैं। वे यहाँ आए ही इसीलिए हैं क्योंकि उनके प्रदेश में उनके लिए काम नहीं था। इसके अलावा कश्मीर के पर्यटन से जुड़े काम-धंधो से देश के तमाम दूसरे इलाक़ों के लोग जुड़े हुए हैं। उनका काम-धंधे पर भी असर होगा। इसके अलावा और भी नुक़सान होंगे जिनका मुझे अन्दाज़ नहीं है।
कश्मीर बायकाट का नारा लगाने कश्मीरी लोगों के सुधर जाने की इच्छा रखने वाले कश्मीर के लोगों को देश के बाक़ी हिस्सों से काट देना चाहते हैं। यही तो आतंकवादी चाहते हैं। कश्मीर बायकाट के ज़रिए आतंकवादियों की मंशा ही पूरी होगी।
धरती का स्वर्ग कहलाने वाला कश्मीर बाक़ी देश से क्यों कटा रहा। कश्मीर के लोग देश के बाक़ी हिस्सों से आने वाले लोगों के बारे में 'इंडिया से आए हैं' क्यों कहते रहे और बाक़ी देश के लोग कश्मीर को अलग क्यों समझते रहे इस बारे में कोई जानकार ही बेहतर बता सकता है।
दो बार के दौरान मैं कुल मिलाकार क़रीब 15 दिन रहा कश्मीर में। जितने भी लोगों से में मिला उनमें से अधिकतर युवा लोगों का सवाल था -"कश्मीर आपको कैसा लगा?" हमारे "बहुत अच्छा लगा। यहाँ के लोग बहुत अच्छे हैं" कहने पर उन लोगों का अगला सवाल रहता था -"फिर कश्मीर को लोग बुरा क्यों कहते हैं?" यह सवाल पूछने वाले में मेडिकल की तैयारी करती बच्ची थी जिसकी अम्मी को शिकायत थी कि वो ठीक से खाना नहीं खाती, एक आटो चलता युवा था जिसकी शादी होने वाली थी, झरने के पास मिला एक नौजवान था जिसने घर चलकर खाने का न्योता दिया और भी तमाम लोग थे। कश्मीर से बहुत दूर पांडीचेरी में भी एक युवा ने भी सवाल किया था -"कश्मीर को लोग बुरा क्यों कहते हैं?"
बुजुर्गों के मन में इस बात की टीस है कि उनको अलग-थलग कर दिया गया। वह उदासीन सा है। लेकिन युवा लोगों की कसक है कि लोग कश्मीर को बुरा क्यों समझते हैं? कश्मीर के युवा की सोच पुराने जमाने के लोगों जैसी नहीं है। वे देख रहे हैं कि देश के बाक़ी हिस्सों के युवाओं को क्या अवसर मिल रहे हैं। वह देश से जुड़ना चाहता है। पाकिस्तान के युवाओं की बातचीत में भी यह कसक ज़ाहिर होती है कि उनका देश हिंदुस्तान जैसा क्यों नहीं है?
आतंकवादी घटना के देश के पर्यटकों से कश्मीर के लोगों अपने रहने, खाने और निश्चिंत रहने की बात कही। उनको सुरक्षित वापस पहुँचा। लेकिन देश के कुछ हिस्सों में कश्मीरी लोगों से उनकी सुरक्षा के लिहाज़ से कश्मीर वापस जाने की सलाह दी गयी। पश्चिम बंगाल में एक डाक्टर ने एक कश्मीरी गर्भवती महिला का इलाज करने से मना कर दिया। डाक्टर के व्यवहार की कई लोगों ने निंदा की लेकिन तमाम ऐसे लोग भी थे जिन्होंने डाक्टर के व्यवहार को 'जैसे को तैसा' बताते हुए सही बताया।
आज के कश्मीर की हालत के कारण कई होंगे। मुख्य कारण राजनीति ही रही होगी। जितनी मेरी समझ है उसके हिसाब से कश्मीर के हुक्मरान और देश के नेताओं की कश्मीर का अपने-अपने हिसाब से फ़ायदा उठाया। स्थानीय हुक्मरान शायद कश्मीर के ज़रिए अपना अलग फ़ायदा उठाते रहे। केंद्र के नेताओं के लिए कश्मीर एक दूर की समस्या की तरह रहा। अपने-अपने हिसाब से इसे हल करने की कोशिश और क़वायद करते रहे केंद्र के नेता लोग। कश्मीर के दौरे होते रहे, पैकेज जारी होते रहे। सबकी यह मंशा बनी रही कि कैसे भी कश्मीर पर क़ब्ज़ा बना रहे। हमारे क़ब्ज़े वाली सरकार बनी रहे। वहाँ से जुड़कर, वहाँ ठहरकर, वहाँ के लोगों का विश्वास जीतकर कश्मीर समस्या हल करने जैसी समझ, माद्दा और हिम्मत नहीं रही। शायद इतनी बड़ी समस्या को हल करने के लिए बड़े दिल, दिमाग़ और समझ वाले नेताओं की ज़रूरत होती होगी उतने अपने यहाँ हो नहीं पाए। औसत समझ के प्रचार मीडिया के सहारे बड़े बने नायकों के हल भी प्रचार वाले ही होंगे।
कश्मीर के बारे ये बातें मैंने अपने अनुभव और समझ से लिखीं। जो मैंने देखा कश्मीर में, वहाँ के लोगों से मिला उससे जो निष्कर्ष निकाले वो मेरी अपनी सोच के अनुसार है जो अभी तक की पढ़ाई-लिखाई और दुनियावी अनुभव से बनी। ज़रूरी नहीं कि आप इससे सहमत हों। आपकी भी समझ अपने अनुभव और सोच से बनी होगी। वह मेरी समझ के अलग हो सकती है। हो सकता है वही सच के ज़्यादा क़रीब हो।
हालाँकि सच भी तो आजकल बहुरूपिया हो गया है। अलग-अलग जगह अलग-अलग रंग के कपड़े पहनकर जाता है। कहीं-कहीं तो सच परेशान होकर झूठ को ही अपने कपड़े पहनाकर भेज देता है। लोग उसको ही असली सच समझकर खुश हो जाते हैं। बाद में जब कभी सच उनके बीच जाता है तो लोग उसको दौड़ा लेते हैं। सच की सही में बड़ी आफ़त है आजकल।
(कश्मीर से जुड़ी कुछ पोस्ट्स टिप्पणी में)

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/pfbid0H4KNJSbtdPTxWiMLcNRoCZB51YTsn9m2b5bVSVDaBJJWuGVkeDdL4C5kgBj4yZVrl

Saturday, April 26, 2025

टी. एस. इलियट कौन है?


 [मैं आजकल अमेरिकी लेखक जोसेफ हेलर का व्यंग्यपूर्ण युद्ध उपन्यास कैच-22 पढ़ रहा हूँ। है। 1961 में प्रकाशित यह उपन्यास बीसवीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण उपन्यासों में से एक के रूप में उद्धृत किया जाता है। इस पर फ़िल्म भी बन चुकी है। पता नहीं इसका हिंदी अनुवाद हुआ है कि नहीं। उपन्यास में एक प्रसंग में बात चलती है कि किसी एक कवि का नाम बताओ जो कमाई भी करता हो? जवाब में टी. एस. इलियट का नाम बताए जाने पर खोज होती है कि टी. एस. इलियट कौन है? फ़ौजी अन्दाज़ में खोज। अंश का अनुवाद करने यहाँ पेश है। पढ़िए और बताइए कि अनुवाद कैसा है? ]

वह जुआँ खेलकर भी कभी पैसे नहीं कमा पाया। यहाँ तक कि वह बेइमानी करके भी नहीं जीत पाया क्योंकि जिनके ख़िलाफ़ वह बेइमानी करता था वे उससे बड़े बेईमान थे। उसको दो अफ़सोस थे जिनके आगे वह हार मान चुका था- वह कभी भी निशानेबाज़ नहीं बन पाएगा और वह कभी पैसा नहीं कमा पाएगा।
'कमाई न करने के लिए दिमाग़ लगता है' कर्नल कारगिल ने एक अपने ज्ञापन में लिखा जो कि वह जनरल पेकरिन के हस्ताक्षर में नियमित रूप से जारी करता था। 'आजकल कोई बेवकूफ भी कमाई कर सकता है और लोग कर भी रहे हैं। लेकिन उन लोगों का क्या जो प्रतिभाशाली भी हैं और विद्वान भी? उदाहरण के लिए किसी एक कवि का नाम बताओ जो कमाई भी करता हो।'
'टीएसइलियट' , सत्ताइसवीं एयरफ़ोर्स के हेडक्वार्टर के एक चेम्बर में बैठकर मेल छाँट रहे भूतपूर्व पीएफसी विंटरग्रीन ने (फ़ोन पर) कहा और बिना अपना परिचय दिए फ़ोन पटक दिया।
रोम में मौजूद कर्नल कारगिल अचरज में पड़ गया।
'वह कौन था?' जनरल पेकमेन ने पूछा।
'मुझे नहीं पता' कर्नल कारगिल ने जवाब दिया।
'वह क्या चाहता है?'
'मुझे नहीं पता।'
'अच्छा, उसने क्या कहा?'
'टीएसइलियट' कर्नल कारगिल ने उसे बताया।
'वह क्या है?'
'टीएसइलियट' कर्नल कारगिल ने दोहराया।
केवल "टीएस--"
हाँ सर उसने यही कहा। केवल "टीएसएलियट।"
मुझे ताज्जुब है कि इसका क्या मतलब है? जनरल पेकमेन ने कहा।
कर्नल कारगिल को भी ताज्जुब हुआ।
'टी.एस.इलियट' जनरल पेकमेन सोच में पड़ गया।
'टी.एस.इलियट' कर्नल कारगिल ने उसी तरह उसी तरह के मुर्दनी भरे ताज्जुब के साथ दोहराया।
जनरल पेकमेन ने एक क्षण बाद एक स्निग्ध और सौम्य मुस्कान के साथ खुद को जगाया। उसकी भाव भंगिमा कुटिल और जटिल थी। उसकी आँखे शातिर ढंग से चमक रही थीं। ' मुझे जनरल ड्रीडल से बात कराओ ' उसने कर्नल कारगिल से कहा , 'उसको यह मत बताना कि कौन बात कर रहा है।'
कर्नल कारगिल ने उसको फ़ोन पकड़ा दिया।
'टी.एस.एलियट' जनरल पेकमेन ने कहा और रुक गया ।
'वह कौन था?' कर्नल मूड्स ने पूछा।
जनरल ड्रीडल, जो कि कोर्सिया में था , ने जवाब नहीं दिया। कर्नल मूड्स जनरल ड्रीडल का दामाद था और जनरल ड्रीडल ने अपनी पत्नी के आग्रह और अपनी समझ से उसको सैन्य व्यापार में घुसा दिया था। जनरल ड्रीडल ने कर्नल मूड्स को नफ़रत से घूरकर देखा। वह अपने दामाद , जो कि उनका सहायक था और इसलिए लगातार उनके सम्पर्क में रहता थे, को देखना तक पसंद नहीं करते थे। वे अपनी बेटी की शादी कर्नल मूड्स से कराने के ख़िलाफ़ थे क्योंकि उनको शादियों में शामिल होना नापसंद था। चेहरे पर एक ख़तरनाक और चिंतित भाव धारण किए हुए जनरल अपने आफिस के आदमकद शीशे के सामने खड़े होकर अपने गठीले प्रतिबिम्ब को देखने लगे। उनका सिर भूरा, चौड़ी भौंहों वाला था, उनकी आँखों के ऊपर लोहे के भूरे रंग के गुच्छे थे और उसका जबड़ा कुंद और उग्र था। वे अभी-अभी प्राप्त हुए रहस्यमय संदेशों पर गहन चिंतन में डूबे हुए थे। आहिस्ते-आहिस्ते उनका चेहरा एक विचार से नरम हो गया और उनके होंठ एक शातिर ख़ुशी के साथ गोल हो गए।
' पेकमेन से बात कराओ' उन्होंने कर्नल मूड्स से कहा ' और उस हरामी को यह मत पता लगने देना कि कौन बात कर रहा है।'
'वह कौन था'? रोम में मौजूद कर्नल कारगिल ने पूछा।
'वही आदमी' जनरल पेकमेन ने चिंता के साथ उत्तर दिया 'और अब वह मेरे पीछे पड़ा है।'
'वह क्या चाहता है?'
'मुझे पता नहीं।'
'उसने क्या कहा?'
'वही बात।'
'टी.एस. एलियट?'
हाँ, "टी.एस. एलियट" उसने केवल यही कहा। जनरल पेकमेन ने उम्मीद के साथ सोचा। शायद यह कोई नया कोड है दिनों के रंगों की तरह। तुम प्राप्त हुए संदेशों को जाँचों और देखो कि यह कोई नया कोड या कुछ और या दिनों के रंग का कोई कोड है।
संदेशों की जाँच से पता चला कि टी. एस. एलियट कोई नया कोड नहीं था न ही किसी दिन का कोई रंग।
कर्नल कारगिल को अगला विचार सूझा। शायद हमको सत्ताईस एयर फ़ोर्स हेडक्वार्टर्स को फ़ोन करना चाहिए पता करना चाहिए कि वे इस बारे में कुछ जानते हैं? वहाँ विंटरग्रीन नाम का एक क्लर्क है जिससे मेरी अच्छी जानपहचान है। उसने मुझे बताया था कि जिसने मुझे बताया कि हमारा गद्य (संदेश) बहुत लम्बा है।
भूतपूर्व पीएफसी विंटरग्रीन ने कारगिल को बताया कि सत्ताईस एयर फ़ोर्स हेडक्वार्टर्स में टी. एस. एलियट के बारे में कोई रिकार्ड नहीं है।
'हमारे आजकल के गद्य (संदेश) कैसे है? ' कर्नल कारगिल ने पीएफसी विंटरग्रीन फ़ोन पर बात करते समय पूछा -' यह पहले से बेहतर है, है न? '
'ये अभी भी बहुत लम्बे हैं' पीएफसी विंटरग्रीन ने जवाब दिया।
'मुझे ताज्जुब नहीं होगा अगर जनरल इन सब के पीछे जनरल ड्रीड़ल का हाथ हो।' जनरल पेकमेन ने अंत में स्वीकार किया। 'याद करो उसने निशानेबाज़ी वाली रेंज के लिए क्या किया था ?'
जनरल ड्रीड़ल ने कर्नल कैथकार्ट की निजी निशानेबाज़ी रेंज को सभी अधिकारियों और युद्ध ड्यूटी पर तैनात समूह में भर्ती सभी लोगों के लिए खोल दिया था। जनरल ड्रीड़ल चाहते थे कि उनके उनके जवान निशानेबाज़ी रेंज में अधिक से अधिक समय, जितना उनकी सुविधाएँ और उड़ान का समय अनुमति दे, बिताएँ। महीने में आठ घंटे शूटिंग करना उनके लिए बेहतरीन प्रशिक्षण था। इससे उनको निशानेबाज़ी की ट्रेनिंग मिली।
डनबर को स्कीट शूटिंग (निशानेबाज़ी) पसंद थी क्योंकि वह इससे हर क्षण इसे घृणा करता था और समय बहुत धीरे गुजरता था। उसने हिसाब लगाया था कि स्कीट शूटिंग रेंज में हैवरमेयर और अप्पलबी जैसे लोगों के साथ बिताया एक घंटे का समय ग्यारह बार सत्रह साल के समय के बराबर है।
'मुझे लगता है तुम पागल हो' कलेविंजर ने डनबर की खोज के बारे में सुनकर कहा।
'कौन जानना चाहता है'? डनबर ने जवाब दिया।
'मैं सही कह रहा हूँ,' कलेविंजर ने अपनी बात पर ज़ोर दिया।
'किसे पड़ी है?' डनबर ने जवाब दिया।
'मुझे चिंता है।मैं तो यहां तक ​​मानूंगा कि जिंदगी लंबी लगती है मुझे __'
'लम्बी है'
'लम्बी है, लम्बी है ? ठीक है। लम्बी है अगर यह बोरियत और परेशानियों से भरी हुई है।'
'अंदाज़ा लगाओ कितनी तेजी से?' डनबर ने अचानक कहा।
'हुह'
वे जा रहे हैं,' डनबर ने समझाया।
'कौन?'
'साल।'
'साल।'
'साल।' डनबर ने कहा -'साल, साल, साल।'
'कलेविंजर तुम डनबर को अकेले क्यों नहीं छोड़ देते?' योसरीयन अंदर आया। 'क्या तुमको इसका अंदाजा नहीं है कि इससे कितना नुकसान हो रहा है।'
कोई बात नहीं। डनबर ने उदारता पूर्वक कहा। मुझे कुछ दशक बिताने हैं। क्या तुमको पता है कि एक साल बीतने में कितना समय लगता है जब यह बीत रहा होता है?
'और तुम भी चुप रहो।' योसरीयन ने ओर से कहा जिसने मुंह दबाकर हंसना शुरू कर दिया था।
'मैं केवल उस लड़की के बारे में सोच रहा था।' ओर ने कहा 'सिसली की गंजे सर वाली लड़की के बारे में।'
'बेहतर है तुम चुप रहो।' योसरीयन ने उसको चेतावनी दी।
'यह तुम्हारी गलती है' डनबर ने योसरीयन से कहा-'अगर वह हँसना चाहता है तो तुम उसको हंसने क्यों नहीं देते?' यह उससे बात करने के मुक़ाबले बेहतर है।'
'ठीक है। हँसो अगर हँसना चाहते हो ।'
'क्या तुमको पता है कि एक साल बीतने में कितना समय लगता है जब यह गुजर रहा होता है?' डनबर ने कलेविंजर से दोबारा पूछा। 'इतना लम्बा' उसने अपनी उँगली चटकाते हुए कहा। 'एक सेकेंड पहले तुम खुली हवा से भरे फेफड़ों के साथ कालेज में प्रेवश ले रहे थे। आज तुम एक बुजुर्ग इंसान हो।'
'बुजुर्ग?' कलेविंजर ने आश्चर्य के साथ पूछा-'तुम किस बारे में पूछ रहे हो?'
'बुजुर्ग के बारे में।'
'मैं बुजुर्ग नहीं हूँ।'
तुम जब भी किसी मिशन पर जाते तो उस समय अपनी मौत से कुछ इंच की दूरी पर होते हो। अपने उमर में तुम कितने बुजुर्ग हो सकते हो ? आधे मिनट पहले तुम हाई स्कूल में दाखिल हो रहे थे और एक बिना हुक वाली ब्रा तुम्हारे इतने नज़दीक थी जितनी तुमने कभी स्वर्गिक सुख की उम्मीद की होगी। एक सेकेंड के पाँचवे हिस्से तुम एक छोटे बच्चे थे जिसको दस हफ़्ते की गर्मी की छुट्टियाँ मिली थीं और जो सैकड़ों, हज़ारों साल तक बनी रहीं तब भी इतनी जल्दी ख़त्म हो गयीं। रोको ! दिन इतनी तेजी से रॉकेट की तरह आगे बढ़ते हैं। तुम समय को और कैसे धीमा कर पाओगे ?
हो सकता है यह सब सच हो। कलेविंजर ने अनिच्छा से धीमे स्वर में स्वीकार कर लिया। हो सकता है कि लंबे जीवन को यदि बहुत लंबा दिखाना है तो उसमें कई अप्रिय परिस्थितियां भी होनी चाहिए। लेकिन ऐसा जीवन कौन चाहता है?
'मैं चाहता हूँ।' -डनबर ने कहा।
'क्यों?' कलेविंजर ने पूछा।
'अब और बचा ही क्या है? '
- जोसेफ हेलर रचित उपन्यास कैच -22 के एक अंश का हिंदी अनुवाद!

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Tuesday, April 22, 2025

अक्ल होती तो समझती

 इतवार को ऑक्सफोर्ड बुक सेंटर में प्रोग्राम था। जाने के लिए निकले तो पहले सोचा कैब या आटो से जाएँ। किराया देखा चार सौ पार। चार सौ पार देखकर हम सहम गए। जनता सवारी (मेट्रो ) में आ गए। मेट्रो स्टेशन से पास बनवाया। पाँच सौ रुपए में चार सौ पचास की यात्रा का पास। कितना भी बचने की कोशिश की खर्च चार सौ पार हो ही गया।

मेट्रो में भीड़ तो नहीं थीं लेकिन कोई सीट ख़ाली नहीं थी। दरवाज़े के पास की वरिष्ठ और दिव्यांग के लिए आरक्षित सीट पर एक युवा सा बुजुर्ग और एक बालिका बैठी थी। बालिका के पास खड़ा एक बालक उसपर छाते की तरह झुका इससे फुसफुसाते हुए बतिया रहा था। बालिका भी जैसे को तैसा कर रही थी। बालिका मुंडी मोबाइल में घुसाए बालक से भी बतियाती जा रही थी।
मन किया बालिका से पूंछे कि वो बुजुर्ग है या दिव्यांग जो उस सीट पर बैठी खिलखिला रही है। लेकिन फिर चुप मार गए। मोबाइल में आई जन्मदिन की बधाइयों का जवाब देते रहे। दफ़्तरी लिहाज से उस दिन 61 साल के हो गए थे लेकिन अपने लिए आरक्षित सीट पर बैठने से वंचित थे।
दुनिया के तमाम लोग इसी तरह अपने हक से चुपचाप शरीफों की तरह वंचित होते रहते हैं।
दो स्टेशन आगे युवा सा बुजुर्ग उतर गया। उतरने के पहले उसने मुझे इशारा करके सीट हमको हैंडओवर कर दी। हम लपक कर बैठ गए। हमारे बगल में बालिका और उस पर छाते की तरह तना बालक।
बात-बात में लड़के ने अपने मोबाइल से बालिका को कुछ दिखाया। बालिका ने बालक का मोबाइल लेकर देखा और फिर उसका व्हाटसएप देखने लगी। एक संदेश को देखकर बालक से पूछा -‘ये किसको फ़ोटो भेजी?’
बालक ने कहा -‘ऐसे ही है।’
बालिका ने भेजी हुई फ़ोटो देखते हुए पूछा -ऐसे ही इतनी फ़ोटो भेजी जाती हैं?’
बालक ने कुछ कहा। बालिका भेजी हुई फ़ोटो डिलीट करते हुए अगले किसी संदेश पर पहुँची। वहाँ भी फ़ोटो भेजी थीं। बालिका ने फिर वही पूछा , बालक ने फिर वही जवाब दिया।
लड़की ने इस बार फोटो डिलीट करते हुए कुछ हड़काया टाइप। बालक ने उसकी समझ पर सवाल उठाते हुए कहा -‘तुम समझती नहीं हो। अक्ल नहीं है। अक्ल होती तो समझती।’
बालिका ने कहा -‘इतना समझ है मुझको। सबको ऐसे ही भेजी जाती हैं फ़ोटो।’ कहते हुए बालक के मोबाइल से फ़ोटो डिलीट करती रही।
बालक ने उसके फ़ोटो डिलीट के काम को रोकने की कोशिश करने के लिहाज़ से कहा -‘अरे तू ब्लॉक मार दे इसको। क्यों इतना मेहनत कर रही है?’ लेकिन बालिका ने मेहनत से जी नहीं चुराया। फोटो डिलीट करती रही। कुछ-कुछ बोलती रही। बालक भी उसको कुछ-कुछ कहते हुए उसको कमसमझ, कमअक्ल बताता रहा। अलबत्ता बालक की आवाज धीमी होती गई।
आगे फिर कुछ देखा बालिका ने। कुछ कहा बालक से। बालक ने कुछ जवाब दिया। बालिका ने मोबाइल बालक के हाथ में पटक सा दिया और मुँह फेरकर बैठ गई।
बालिका के मुँह फेरकर बैठने से बालक की सिट्टी और पिटटी दोनों गुम हो गईं। उसने अपना मोबाइल बालिका के हाथों में प्रसाद की तरह अर्पित कर दिया। लेकिन बालिका ने मोबाइल हाथ से परे धकेल दिया।
बालक ने अब मिन्नतमोड में आकर अपना मोबाइल बालिका के सामने हथियार की तरह डाल दिया। बालिका फिर भी नहीं पसीजी। बालक के मोबाइल को देखने से इंकार कर दिया।
अब बालक ने मेट्रो के फर्श पर प्रपोज मुद्रा में बालिका को अंगूठी की तरह भेंट किया। बालिका ने उसे हाथ में ले तो लिया लेकिन खोलकर नहीं देखा। बालक ने चैन की साँस ली और कोई बेवकूफ़ी की बात कहीं। बालिका बहुत हल्का सा मुस्कुराई। किसी बड़ी डील के साइनिंग अमाउंट की तरह छुटकी मुस्कान। बालक चहकने लगा। मुझे फिर बेवक़ूफ़ी के जलवे का एहसास हुआ। देश-दुनिया के तमाम मसले आज बेवक़ूफ़ी से हल किए जा रहे हैं। बेवक़ूफ़ी की ताक़त बेमिसाल है।
बालिका शुरू में दुपट्टे से मुँह ढके थी। बाद में मुँह खोलकर बतियाने लगी। बालक कई माला-ताबीज टाइप धारण लिए था।
अचानक बालिका में खड़े होकर बगल वाले भाईसाहब से पूछा -‘इंडिया गेट के लिए कहाँ उतरना होगा?’
भाई साहब ने समझाया। बताया। बालिका ने समझने का इशारा किया। लेकिन भाई साहब को तसल्ली नहीं हुई। उन्होंने दुबारा तफ़सील से समझाया। बालिका इस बार समझ ही गई ऐसा उसके चेहरे के भाव से लगा।
हमारा स्टेशन आने वाला था। हमने सामने खड़ी एक महिला को आँखो के इशारे से सीट सौंपने का प्रस्ताव दिया। महिला ने आँखो ही आँखों में प्रस्ताव स्वीकार किया और लपक कर सीट के पास आ गई। हमने फ़ौरन उसके लिए सीट छोड़ दी। महिला फ़ौरन उस पर बैठ गई। हमने फौरन खड़े होकर उसकी तरफ़ इस आशा से देखा कि शायद आँखों ही आँखों में धन्यवाद टाइप कुछ देगी। लेकिन वह महिला अपनी आँखें मूँदे मोबाइल की लीड कानों में घुसाए कुछ सुनने ने तल्लीन हो गई थी ।
हम कुछ और सोचें तब तक हमारा स्टेशन आ गया था। हम चुपचाप उतर गए।

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Monday, April 21, 2025

गाली की बात

 अनुराग कश्यप द्वारा ब्राह्मणों को गाली देने का मुद्दा बहुत गरम है आजकल। गाली की बात से श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास 'राग दरबारी' का यह प्रसंग याद आ गया:

"कड़कते हुए वे (वैद्य जी) बोले ,"और यह रुप्पन ! यह मूर्ख है ! पशु है ! पतित है ! विश्वासघाती है!
वे इसी तरह बोलते रहे और इस प्रसंग में साबित करते रहे कि गालियों के मामले में संस्कृत भी कोई कमजोर भाषा नहीं है।"
अगर अनुराग कश्यप अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर करने के लिए संस्कृत का उपयोग करते तो शायद उनकी इतनी निंदा न होती। सम्भव है उनको कुछ लोग सम्मानित भी करते यह कहकर कि देवभाषा के प्रसार के लिए कितना अच्छा काम किया है।
लेकिन अनुराग कश्यप का हाथ संस्कृत में तंग होगा। उनको यह भी लगा होगा कि ऐसी भाषा में से क्या फ़ायदा जिसको कहने वाला और सुनने वाला न समझे। संस्कृत तो पूजा करने की और इसकी प्राचीनता और वैज्ञानिकता पर गर्व करने की भाषा बन कर रह गयी है।
शायद अनुराग कश्यप का बयान मुस्ताक अहमद युसुफ़ी साहब के इस डायलाग से प्रेरित होगा :
"गाली, गिन्ती, सरगोशी (कानाफूसी, चुगली या बुराई) और गंदा लतीफ़ा तो सिर्फ़ अपनी मादरी ज़बान में ही मज़ा देता है।"
अनुराग कश्यप ने अपना गुस्सा मादरी ज़बान में व्यक्त कर दिया। अगर कोई बात फँसती है तो अपना दोष युसुफ़ी साहब पर डाल सकते हैं। पैदाइसी हिंदुस्तानी होने के नाते युसुफ़ी साहब हमारे भी बुजुर्ग हैं। इतना तोहमत तो उन पर डाली ही जा सकती है।
कुछ लोगों ने अनुराग कश्यप को जैसे का तैसा की तर्ज़ पर अपना गालियों का पूरा स्टाक ख़ाली कर दिया है। किसी ने तो अनुराग कश्यप का मुँह काला करने वाले के एक लाख रुपए का इनाम तक घोषित किया है। उस समूह ने यह नहीं बताया है कि कालिख का खर्च कौन देगा?
मुँह काला करने पर इनाम वाली घोषणा को लपक कर सरकार दावा कर सकती है कि उसके कार्यकाल में लोगों की सम्पन्नता में इतनी बढ़ोत्तरी हुई है कि "बामन को धन केवल भिक्षा" वाले समुदाय के लोग तक लखटकिया इनाम घोषित करने की स्थित में पहुँच गए हैं।
किसी भी सभ्य समाज में गाली देना ख़राब बात है लेकिन अपने देश के तमाम इलाक़ों में गाँव-घरों में गाली-गलौज बड़ी आम बात है। तमाम लोग अपनी माँ-बहन-बेटियों के सामने मां-बहन की गालियाँ देते रहते हैं। अनुराग कश्यप के किसी क्षोभ के कारण की गयी प्रतिक्रिया को देखकर उनको धमकी देना, उनके घर वालों को कोसना, उनका मुँह काला करने का आह्वान करना बताता है कि हमारे अंदर ग़ुस्सा कितना बढ़ता जा रहा है। हम कितनी जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं।
अनुराग कश्यप के बयान पर उनके घर वालों को धमकी देना तो इसी तरह है मानों किसी माफिया को सजा देने के लिए उसके घर वालों का मकान ज़मींदोज़ कर दिया जाए।
सोशल मीडिया में इस खबर का दो दिन तक छाए रहना यह भी बताता है कि हम कितने खलिहर समाज के लोग हैं। अनुराग कश्यप की ग़लत बात पर अनुराग कश्यप की तरह हरकत करना उचित नहीं है।
अनुराग कश्यप से यही कहना है कि उनको गर्मी के मौसम में पानी खूब पीना चाहिए। पानी पीने से मन शांत रहता है।
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/pfbid027hsQSZw9z1M8kp8cNfiovSWQDCUUv6MFiATLRbWYM5Ewdpn94GELjj8oDPg3gRhQl