कल प्रधानमंत्री संग्रहालय देखने गए। तीन मूर्ति भवन। लोक कल्याण मार्ग मेट्रो स्टेशन से तीन मूर्ति भवन की तरफ़ पैदल जाते हुए तमाम सांसदों, मंत्रियों के बड़े-बड़े बंगले दिखे। प्रवेश द्वार के पास बंदूक लिए सुरक्षा पर तैनात जवान। बंगलों की सुरक्षा के लिए लगाए गए तार अलबत्ता कई जगह टूटे दिखे।
तीन मूर्ति भवन से पहले 1 , सफदरजंग दिखा। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी का निवास स्थान। उसको देखने चले गए अंदर। सुरक्षा के लिए तैनात लोगों ने बैग ले जाने दिया लेकिन पानी की बोतल बाहर धरवा ली।
इस घर में इंदिरा जी अपने पिता जवाहर लाल नेहरू जी के निधन के बाद रहने आयीं थीं और बाद में प्रधानमंत्री बनने से लेकर मृत्यु पर्यंत रहीं। उनके निधन के बाद इस घर को उनकी स्मृति के रूप में संरक्षित किया। इंदिरा जी और उनके परिवार के लोगों से जुड़ी अनेक यादें यहाँ मौजूद हैं। उनका ड्राइंग रूम, पढ़ने का कमरा और उनके जीवन से जुड़ी अनेक यादें यहाँ संरक्षित हैं।
राजीव गांधी जी भी इस घर में रहे। उनसे जुड़ी अनेक यादें भी यहाँ संरक्षित हैं। राजीव जी जो कम्प्यूटर प्रयोग करते थे (T5200) यहाँ रखा हुआ है। राजीव गांधी की हत्या के बाद बने जाँच आयोग (वर्मा कमीशन) की रिपोर्ट का अंश भी वहाँ लगा हुआ है। उसके अनुसार :
" प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी नवंबर, 1984 से नवंबर 1989 तक देश के ऐसे व्यक्ति थे जिनकी जान को सर्वाधिक खतरा था और उनकी जान को यह खतरा उनकी हत्या तक कम नहीं हुआ । यह स्पष्ट है कि उनके सुरक्षा प्रबंधों के लिए एस.पी. जी. कवर अथवा समान प्रभावकारी उपयुक्त विकल्प की आवश्यकता थी। मंत्रिमंडल सचिवालय के दिनांक 30/01/1990 के नोट में निहित केंद्रीय सरकार के निर्णय के परिणाम स्वरूप फ़रवरी, 1990 में एस.पी. जी. कवर हटाने के बाद उनमें से कोई सी भी सुरक्षा व्यवस्था उनके लिए उपलब्ध नहीं थी।"
यह जानकर दुख हुआ कि देश के एक महत्वपूर्ण नेता के लिए कोई भी सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी।
वहीं पर राजीव गांधी जी का पायलट के रूप में त्यागपत्र की प्रति भी दिखी।
इंदिरा गांधी जी की जिस जगह हत्या हुई थी वह जगह काँच की छड़ों से ढँकी हुई है। दूर से ही उसे देखा जा सकता है। इंदिरा जी के बनाए स्केच और दूसरी ड्राइंग भी दिखीं।
इंदिरा गांधी स्मृति स्थल के बाद तीन मूर्ति संग्रहालय देखने गए। 50 रुपये का प्रवेश शुल्क है यहाँ। इसके अलावा प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी और कई दीगर गतिविधियों के लिए अलग से फ़ीस है। हमने केवल संग्रहालय देखने के लिए टिकट लिया। अंदर जाने के पहले हमारा बैग एक लाकर में रखकर उसकी चाबी हमको थमा दी गई।
तीन मूर्ति भवन पहले केवल जवाहर लाल नेहरू जी से सबंधित चीजों का संग्रहालय था। बाद में इसमें उनके बाद के प्रधानमंत्रियों से जुड़ी स्मृतियाँ भी संजोयी गई हैं। मुझे पता नहीं क्या बदलाव किए गए इस प्रक्रिया में लेकिन अधिकतर यादें डिजिटल मोड में संग्रहित हैं। इससे उससे जुड़ाव में यान्त्रिकता का पुट तो रहता है। जवाहर लाल जी का शयन कक्ष, उनका ड्राइंग रूम और उनकी लाइब्रेरी देखकर बहुत अच्छा लगा। आजादी के मौके पर उनके उनके प्रख्यात संबोधन को उनकी हस्तलिपि में देखकर अच्छा लगा। उनके उस भाषण की वीडियो क्लिप भी कई सुनी।
कुछ दिन पहले Kanak Tiwari जी ने संविधान पर अनूठी बातचीत में नेहरू जी को याद करते हुए कहा था -" बिना किसी पूर्व तैयारी के दुनिया के किसी भी विषय पर जवाहरलाल नेहरू जैसा बेहतरीन वक्ता कोई नहीं था।" नेहरूजी का भाषण सुनकर कनक तिवारी जी की बात याद आ गई।
गैलरी में तमाम किताबें रखी थीं। पता नहीं क्यों? क्या पहले भी वे इसी तरह रखीं थीं या बाद में यह व्यवस्था की गई।
नेहरू जी से संबंधित संग्रहालय देखने के बाद अन्य प्रधानमंत्रियों से संबंधित संग्रहालय देखने गए। देश के सभी प्रधानमंत्रियों से जुड़ी प्रमुख घटनाओं का डिजिटल प्रदर्शन वहाँ किया गया था। उनका प्रदर्शन देखकर एहसास हुआ कि उसमें घटनाओं के प्रस्तुति करण में वर्तमान सरकार के रूख का भी ख्याल रखा गया है। नेहरू जी के प्रधानमंत्री बनते समय पटेल जी के पक्ष में लोगों का बहुमत था इस घटना को तफ़सील से बताया गया है, आपातकाल से जुड़ी घटनाओं और संविधान में धर्मनिपेक्षता जोड़ने की घटना का विस्तार से विवरण दिया है।
अन्य प्रधानांत्रियों से जुड़ी जानकारियाँ भी वहाँ मौजद हैं। नरेंद्र मोदी जी के हिस्से में उस स्टेशन का फ़ोटो भी मौजूद है जहाँ वे जवानों को चाय पिलाते थे (चाय बेंचने का जिक्र नहीं है वहाँ) ।
मोरारजी देसाई जी से जुड़े विवरण से पता चलता है कि उनके मुख्यमंत्री रहते हुए बंबई में 109 लोग पुलिस की गोली से मारे गए थे। इसके बावजूद वे मुख्यमंत्री बने रहे। आज ऐसी कोई घटना हो जाये तो बवाल हो जाये। (वैसे अपवाद आज भी हैं, सैकड़ों लोग कई राज्यों में प्रशासनिक लापरवाही के कारण मारे गए, मारे जा रहे हैं लेकिन देश/प्रदेश के कर्णधारों को कोई फर्क नहीं पड़ता)।
देश के कर्णधारों द्वारा एक-दूसरे को लिखे पत्र भी मौजद हैं वहाँ। लाल बहादुर शास्त्री द्वारा जय प्रकाश नारायण जी को लिखे पत्र, चरण सिंह जी द्वारा आपातकाल हटाने को लेकर लिखा पत्र और भी कई पत्र। इंदिरा जी और नेहरू जी के आपसी पत्र भी मौजुद हैं वहाँ।
प्रधानमंत्री दीर्घा से नीचे आते हुए गैलरी में एक तरफ़ अलग-अलग प्रधानमंत्रियों से जुड़ी घटनायें और दूसरी तरफ़ वर्ष वार देश से जुड़ी उल्लेखनीय घटनाओं का जिक्र करते हुए फोटो लगे हैं। इनमें देश में टीवी कब आया , केरल का जिला पूर्ण साक्षर कब हुआ, विश्वसुंदरी कब बनी, आधार कार्ड कब शुरू हुआ, अभिनव बिंद्रा ने कब स्वर्ण पदक जीता, मिल्खा सिंह के रोम ओलंपिक , राकेश शर्मा का अंतरिक्ष में जाना आदि घटनाओं के वर्षवार विवरण और सबंधित फोटो हैं।
वर्षवार इन उल्लेखनीय घटनाओं के जिक्र में मैं खोज रहा था कि कहीं नोटबंदी से जुड़ी खबर का भी जिक्र होगा। लेकिन हाल के समय की इस सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में एक का कहीं कोई जिक्र नहीं दिखा।
स्मारक देखने के बाद वहीं मौजूद कैंटीन में खाना खाया। 75 रुपए की थाली में दो रोटी, दाल, सब्जी, चावल और पापड़ भी था। पापड़ आधा खाया, आधा थाली में रखे-रखें तेज हवा में उड़ गया। बगल की मेज़ पर बच्चे हुए खाने को तल्लीनता से खाते हुए चिड़िया का वीडियो बनाने का विचार उसकी निजता के उल्लंघन की बात सोचकर छोड़ दिया।
प्रधानमंत्री संग्रहालय से निकलकर गेट के बाहर बनी पहले विश्वयुद्ध में मारे गए और लापता शहीदों के नाम का जिक्र करते हुए बने स्मारक को देखा।
जाते समय मेट्रो में एक बच्चा मेरी घड़ी से खेलने लगा। हमने घड़ी उतारकर उसे दे दी, क़ायदे से खेलने के लिए। उसने कुछ देर खेलने के बाद घड़ी फेंक दी। संयोग से हमने उसे कैच कर लिया। इसके बाद उसको अपने हाथ में ही बाँधे-बाँधे खेलने दिया, उसको दी नहीं घड़ी।
मेट्रो स्टेशन के सुलभ शौचालय के बाहर बैठी महिला ने सुलभ शौचालय की सुविधा के लिए दो रुपए फुटकर मांगे। हमारे पास दस का नोट था। उसके पास पाँच रुपए का ही नोट था। तीन रुपए की चपत लगी। महिला वहीं बैठे-बैठे अख़बार के लिफ़ाफ़े बनाती जा रही थी। बताया कि इस तरह सौ पचास रुपए बच जाते हैं।
हमने बताया कि बचपन में हम भी खूब लिफ़ाफ़े बनाते थे। इस पर उसने कहा -"मायके में यह सब नहीं करते नहीं थे, ससुराल में आकर करने लगे। करना पड़ता है।"
अचानक उसको याद आया कि वह शौचालय की देखभाल कर रही है। उसने अपनी तरफ़ से ही कहा -" हम बनिया हैं, सफ़ाई कर्मी नहीं हैं । पहले दूसरा काम करते थे, अब होता नहीं तो यहाँ करते हैं काम। बैठे-बैठे।"
उसकी बात सुनकर हमको हँसी आ गई। उसको मन में यह डर था कि कहीं हम उसको सफ़ाई कर्मी न समझ लें। उसका फ़ोटो लेने के लिए पूछा तो उसने मना कर दिया। हम बाहर आ गए। तीन मूर्ति भवन की तरफ़ चल दिए। उसके बाद का किस्सा तो आप पढ़ ही चुके हैं।
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