Friday, December 13, 2019

सुबह हो रही है भाई

 


सुबह अभी हुई ही थी। सड़क के दोनों तरफ पेड़ कोहरे को कम्बल की तरह ओढ़े ऊंघ रहे थे। गाड़ी पेड़ों को गुस्से से देखती हुई बड़बड़ाती जा रही थी -' इन आलसियों को सोने से ही फुर्सत नहीं। ये नहीं कि उठकर जरा हिलें-डुलें। हवा बहाएं। '

गाड़ी के नथुनों से गुस्से का धुंआ निकल रहा था। जिस तरह राजनीतिक पार्टिंयां जेल से छूटे किसी बाहुबली को लपक कर अपनी पार्टी में शामिल करके जनता की सेवा के लिए चुनाव का टिकट दे देतीं हैं उसी तरह आसपास की हवा ने गाड़ी से निकले धुंए को लपककर अपने में मिला लिया।धुंआ ठंडा हो गया। हवा गरम हो गयी। दोनों को सुकून मिला।
सड़क के किनारे के ढाबे बन्द थे। शायद देर से खुलेंगे। अमेरिका के ढाबों की तरह। केवल ढाबों के खुलने के समय की तुलना करके अमेरिका के बराबर हो जाना कित्त्ता आसान और कम खर्चीला है। कुछ ऐसा ही है यह जैसे बहुत लोग महापुरुषों की केवल खराब आदतों की फूहड़ नकल करके उन जैसा होने का एहसास पालते हैं।
चाय पीने की मंशा पूरी हुई सड़क किनारे एक खुले रेस्टोरेंट में। रेस्टोरेंट का नाम 3 K फेमिली रेस्टोरेंट। 3 K के बारे में जिज्ञासा हुई। यह क्या। पता चला कि 3 के का मतलब है - 'कूल कृपाल कार्नर।' हो सकता है कुल कृपालु कॉटेज हो। हमको ढाबे वाले न कूल कृपाल ही बताया। एक ट्रस्ट चलाता है यह रेस्टोरेंट। ट्रस्ट में गुरु जी हैं, ढेर जमीन है, 8 ब्लॉक वाले 1600 कमरों में ठहरने की व्यवस्था है। शायद स्कूल कालेज भी। मतलब जलवेदार ट्रस्ट है।
रेस्टोरेंट पर चाय बन रही थी। पूछकर तुलसी की पत्ती भी डाल दी बालक ने। चाय खौलने लगी। कुल्हड़ खत्म हो गए तो कागज में ग्लास में थमा दी चाय। ऊपर तक भरी ग्लास को पकड़ना मुश्किल। हमने पानी मांगा। कागज के बड़े ग्लास में पानी पीकर चाय उसी में उलट ली। ग्लास में काफी जगह बची थी अभी। उसमें और चाय डलवा ली। दस रुपए के ख़र्च में 18 रुपये की चाय हथिया ली। जुगाड़ बुध्दि से 8 रुपये का फायदा लूट लिया।
चाय पीते हुए ढाबे वाले से बातचीत में पता चला कि रेस्टोरेंट बहुत चलता था। लाइन लगती थी अंदर आने के लिए। गुरु जी के न रहने के बाद व्यवस्था चौपट हो गयी। अब अधिकार और नियंत्रण के झगड़े निपट गए हैं। व्यवस्था फिर सुधर रही है।
भट्टी के पास ही एक लड़का गीले आलू काट रहा है। छोटे-छोटे चौकोर टुकड़े। समोसे के लिए। हमने पूछा -'ये छिलके सहित क्यों काट रहे आलू?' हमको लगा कि शायद वह कहे कि छिलके में विटामिन होता है। लेकिन उसने हमको निराश किया। बोला -' समोसे के आलू ऐसे ही कटते हैं।' उसका आत्मविश्वास देखकर लगा कि अगर उससे कोई पूछता -'आजकल राजनीति में अपराधी क्यों आते हैं ?' तो उसका तुरंता जबाब होता -'राजनीति में ऐसे ही चलती हैं।'
राजनीति की बात से हमको रामेंद्र त्रिपाठी जी के गीत की पंक्तियां याद आ गईं:
'राजनीति की मंडी बड़ी नशीली है
इस मंडी ने सारी मदिरा पी ली है।'
समय बिताने के लिए करना है कुछ काम की तर्ज पर हमने ढाबे वाले से पूछा -'संडीले के लड्डू किसलिए प्रसिद्ध हैं? '
'अलग तरह से बनते हैं लड्डू यहां। गोंद और तमाम चीजें डालकर। ' --ढाबे वाले ने अपनी पूरी जानकारी हमारे सामने उड़ेल दी।
उसकी दी हुई जानकारी गूंगे के गुड़ समान थी। हम उसी को समेटकर आगे बढ़ गए। नखलऊ पहुंचे। जहाज पकड़ा। कोलकता आ गए।
अभी कलकत्ता सुबह की नींद ले रहा है। कोई हलचल नहीं। कोई कुनमुनाहट नहीं। सड़क अलबत्ता जग गयी है। उस पर इक्का-दुक्का गाड़ियां आती-जाती दिख रही हैं। इमारतों के ऊपर से सूरज भाई झांक रहे हैं। लेकिन इमारतें उनसे बेखबर निठल्ली नींद में सोई हई हैं। सूरज भाई भी बेचारे बने उनके जगने का इंतजार कर रहे हैं।
अब उठ ही लिया जाए। सुबह हो रही है भाई।


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Wednesday, December 11, 2019

हिन्दुस्तान अमेरिका बन जाये तो क्या होगा



हाल में अमेरिका के किस्से लिखते हुये 12 साल पुरानी पोस्ट याद आई। तब बिना अमेरिका गये हमने अमेरिका के जीवन की कल्पना की थी। लिखा था - हिन्दुस्तान अमेरिका बन जाये तो क्या होगा! अमेरिका घूमने के बाद आज लिखते तो मामला कुछ अलग होता। क्या होता वह फ़िर कभी। फ़िलहाल तो बांचिये कि 12 साल पहले हम क्या सोचते थे इस मामले में।
1. जैसे ही भारत अमेरिका बना, अमेरिका में भब्भड़ मच जायेगा। तब न ग्रीन कार्ड होगा न फ़्रीन कार्ड। सारे भारत के लोग भाग-भाग के झोला-झंडा लिये अमेरिका पहुंच जायेंगे। सारे बिहारी बच्चे दिल्ली की लड़कियों के बजाय न्यूयार्क की लड़कियां देखते हुये आई.ए.एस. का इम्तहान देंगे। अमेरिका का अमेरिकापन तभी तक है जब तक हिंदमहासागर और अटलांटिक सागर के बीच की दूरी बरकरार है। दूरी मिटते ही वो बेचारा कौड़ी का तीन हो जायेगा। अभी तो वहां हमारे देश के लोग कम संख्या में हैं इसलिये थोड़ा अमेरिकी टाइप बनने की कोशिश करते हैं। जहां यहां से रेले के रेले पहुंचे वहां वैसे ही हर तरफ़ भारतीयों के मेले लगे दिखेंगे। सब तरफ़ आनंद की बयार बहेगी।
2. बाहर से आये लोग हमेशा से अंदर के लोगों के मुकाबले मेहनती होते हैं। जो भारतीय वहां जायेंगे वे अपना परिवार साथ लेकर नहीं जायेंगे। कोई और काम न होने की वजह से कुछ दिन में ही मार मेहनत करके वे अमेरिकियों के छक्के क्या अट्ठे छुड़ा देंगे। तमाम काम अपनी तरह से करेंगे। कोई अमेरिकी अंग्रेजी में पिनपिनायेगा – व्हाट आर यू डूइंग मैन इट्स अगेन्स्ट ला। आई एम गोइन्ग टु सू यू। जवाब शायद छोटे पहलवान वाली स्टाइल में दिया जाये- अबे चिमिरखी दास, ज्यादा सू-सू न करो नहीं तो पड़ेगा एक कन्टाप तो सारी फ़ंटूसी पिल्ल से निकल पड़ेगी। हम गंजहें हैं जहां रहते हैं वहां अपना कानून चलाते हैं। जब तक हम हैं यही चलेगा। तफ़रीह करने आये हैं कोई खूंटा गाड़ने नहीं। जितने दिन हैं अपना कानून धो-पोंछकर तहाकर रखो। जब चले जायें तब आराम से फ़हराना। और हां, ये सींकिया बदन लिये घूमते हो,मर्द के नाम पर कलंक है। शाम को अखाड़े आना सेहत सुधर जायेगी।
3. अमेरिका के जितने हाई वे हैं वे सब के सब साल भर में कई बार लो-वे में बदल जायेंगे। जहां बरसात खतम हुई सारे चौड़े रास्तों पर गड्डे खोदकर बल्ली गाड़कर रामलीला का तम्बू तन जायेगा। इधर से 150 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से आती गाड़ी सड़क पर अवरोध देखकर चीं-चीं करके ब्रेक मारेगी। खिड़की से सर बाहर निकालने पर उसे जनक विलाप सुनाई देगा- लिखा न विधि वैदेहि विवाहू/तजहु आस निज-निज ग्रह जाहू। वो हार्न दे-देकर हलकान हो जायेगा उसके पीछे गाड़ियों की मीलों लंबी कतार लग जायेगी और उसे परशुराम की आवाज सुनाई देगी -रे सठ सुनेसि सुभाव न मोरा। दूसरी तरफ़ लगी गाड़ियों की कतार वाला कोई मोबाइल वाला ट्रैफ़िक वाले को बुलायेगा। वह बेचारा आने से मना कर देगा क्योंकि उसने पहले ही लक्ष्मण का रोष वीडियो कैमरे पर देख सुन लिया है- जौ राउर अनुशासन पाऊं/कंदुक इव ब्रह्मांड उठाऊं/ कांचे घट जिमि डारौं फ़ोरी। वो बेचारा इसकी कल्पना मात्र से सिहर जायेगा । आने से साफ़ मना कर देगा। सारा जाम सियावर रामचंद्र के जय के साथ ही समाप्त होगा।
4. अब चूंकि भारत के सारे प्रांतों के लोग अमेरिका जायेंगे तो कुछ हाईवे माता के भक्त भी घेरेंगे। कुछ गणपति बप्पा मोरिया वाले भाई। तमाम जगह बात-बात पर ईंट बजा देने वाले आंदोलनकारी। बची-खुची जमीन पर बाबा लोग अपने तम्बू तानकर अमेरिकनों का परलोक सुधार देंगे। वैसे भी जब भारतीय वहां पहुंचेंगे बहुतायत में तो उनका परलोक ही सुधरने लायक बचेगा। उनके लोक का तो टोटल हो जायेगा। कुछ जगह हनुमान भक्तों और ढाबे वालों को तो चाहिये ही हो्गी।
5. जो लोग इस खामख्याली में हैं कि अमेरिका का कानून बहुत सख्त है सबको जेल में भर देगा। उनका ख्याल भारतीयों के वहां पहुंचते ही ट्विन टावर के तरह ढह जायेगा। अमेरिका का कानून चाहे जितना सख्त हो भारतीय उसे वहां पहुंचते ही या तो मुलायम और मानवीय बना देंगे या फिर छेनी-हथौड़ी से चकनाचूर कर देंगे। तब शायद नाजुक मिजाज अमेरिकी अनुरोध करें- हमारी सुरक्षा के लिये हमें जेल दो। हम इन भारतीयों का मुकाबला नहीं कर सकते।
6. जब देश के लोग जायेंगे तो देश की संस्कृति के रक्षक भी तो जायेंगे कि नहीं। सुना है वहां बहुत चूमा-चाटी है। खुले आम चिपका-चपकौवल चलती है। जहां यहां के मेरठ , हरियाणा के जाट वहां पहुंचे और उधर से सैनिक लोग उनकी सारी मस्ती हवा हो जायेगी। जगह-जगह गोरे लोगों को कान-पकड़वा कर मुर्गा बनवाते हुये बहादुर लोग दिखेंगे। फ़्रेंडशिप बैंड की जगह राखी बैंड बंधवा देंगे। तमाम अमेरिकन लोग आई लव यू माई डार्लिंग भूल-भाल के बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बांधा हैं। सारे अमेरिका में भारतीय संस्कृति की बयार बहने लगेगी।
7.तमाम अमेरिकी जमीन पर भारतीय भू माफ़िया कब्जा कर लेंगे। जब कोई अमेरिकन इस पर अपना एतराज जतायेगा कि यह उसकी जमीन है तो भारतीय बिल्डर उस जमीन पर बनी इमारत की तराई करते हुये परमहंस वाले अंदाज में प्रवचनियायेगा- अयं निज: परोवेति, गणना लघु चेत शाम/ उदार चरितांनाम वसुधैव च कुटुम्बकम।यह मेरा है वह पराया है यह छोटों का दर्शन है। उदार चरित वालों के लिये वसुधा ही कुटुम्ब के समान है। यह सब हमारा है। हमने मेहनत करके इधर नींव खोद ली ईंटे जमा लीं। तुम बगल में अपना तंबू लगा लो। कुछ ईंटे बचीं हैं हमसे ले लो, खरीद दाम पर दे देंगे।
इसकी वैचारिक व्याख्या करते हुये कोई समझदार मासूम अमेरिकी लोगों को समझायेगा। बन्धुओं वस्तुत: यह तुम्हारे ही विश्व को सुधारने के दर्शन का विस्तार है। तुम वियतनाम गये उसे नेस्तनाबूद करने, अफ़गानिस्तान गये दुश्मनों का संहार करने, ईराक गये उसको लोकतांत्रिक बनाने। हर जगह असफ़ल से रहे। मजा नहीं आया न तुमको न उन लोगों को। बहुत पैसा बरबाद कर दिया। तमाम जाने चलीं गयीं। इसीलिये हम तुम्हारा बौद्धिक करने आये हैं कि यह सारा क्रियाकर्म कम खर्चे में कैसे किया जा सकता है घर बैठे। जैसे ही सिखा देंगे वैसे ही चले जायेंगे जैसे तुम चले थे दूसरे देशों में अपना काम करके।
8.. भारतीय व्यक्ति स्वभाव से ही अतीतजीवी होता है। जब भारतीय जन वहां छा जायेंगे तो सारे अमेरिकियों का अतीत तलाशा जायेगा। यहां से कुछ मौलवी जी और पंडितजी लोग भी जायेंगे। वे अपने इलाके के सारे बिछड़े हुये लोगों को मिलायेंगे। इलाहाबाद और गया के पंडे राबर्ट और जूलिया को जमशेदपुर, दरभंगा के रामदयाल, बरसातीराम का वंसज साबित कर देंगे। वे अगली फ़्लाइट से भारत अपनी जड़ों की तलाश में सरपट भागते चले आयेंगे। इंडियन एअर लाइंस के बल्ले-बल्ले होंगे। जमशेदपुर, दरभंगा पहुंचते -पहुंचते उनकी इतनी जड़ खुद जायेगी कि वे जड़ीभूत होकर यहीं कहीं टिककर शायद हिंदी में ब्लाग लिखते हुये दो संस्कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन करने लगें।
9. पंडितजी लोग तीसरी पत्नी के चौथे पति के पांचवे बच्चों की परंपरा की ऐसी कम तैसी ज्यादा कर देंगे। ऐसे सारे कर्मों को कुकर्म बताकर धर्म की स्थापना में जुट जायेंगे। तलाक की मैगी नूडल टाइप दुईमिन्टिया अवधारणा की जगह तलाक का बीरबल की खिचड़ी वाला पैकेज चलाया जायेगा। मतलब कि अमेरिका के लोगों को दुनिया की सारी नेमतें मिल जायेंगी लेकिन तलाक नहीं मिल पायेगा। बिना शादी के साथ रहने वालों के कान गरम करने के लिये हमारे वीर बालक हैं ही। साल भर में सारे अमेरिका गायन्ति देवा किलकीत कानि वाले माहौल में सांस लेने लगेंगे। एक बीबी का एक पति।इस संस्कार की स्थापना होते ही अमेरिका जाने वाले भारतीयों की संख्या में महती गिरावट होगी। हर जाने वाला यही सोचेगा /गी जब एक ही के के साथ रहना है तो भारत ही क्या बुरा है।
10. अभी अमेरिकी बहुत डरपोंक हैं। एक ठो इमारत गिरी पूरी दुनिया में पटाखे बाजी करने लगे। जरा सा पाउडर मिला कुछ लिफ़ाफ़ों में सारे देश के आफ़िस बंद कर दिये। भारत से जो लोग जायेंगे वे उनको बहादुरी का पाठ पढ़ायेंगे। कैसे दंगों के बीच जिया जाता है, कैसे हजारों लोगों के मरने के बावजूद संयम से पेश आया जाता है। कैसे अपने दुश्मन को माफ़ किया जाता है। यह सारे पाठ पढ़ाये जायेंगे। हो सकता है कि इस पर झमाझम बहसें हों और वहां के लोग यह साबित करते हुये बताने की कोशिश करें अपने दु्श्मनों को माफ़ करना कमजोरी है। लेकिन जब बहस की बात हो और भारतीयों से कोई जीत जाये- असम्भव। इम्पासिबल। हमारा एक बच्चा तक उनको समझा देगा- देखो भाई अमेरिकाजी, अभी आप बच्चे हैं। कुल जमा पांच सौ साल की उमर है तुम्हारी। भारत के सामने लौंडे हो अभी। अभी हर जगह असफ़ल रहने के बावजूद तुम्हारे भेजे में यह बात नहीं घुसती कि ताकत से सब कुछ नहीं हासिल होता। हमारे देश में तमाम लोग तुमसे ज्यादा ताकतवर रहे लेकिन अंतत: विश्वबंधुत्व के दर्शन का पैकेज ही सबसे अच्छा साबित हुआ। अपने तर्क की पुष्टि के लिये वह सम्राट अशोक, चंद्र्गुप्त, चाणक्य ,हर्षवर्धन और न जाने किस-किस शासक के कौन-कौन से उदाहरण पटक देगा सामने। इस रहस्योद्घाटन से बेचारे अमेरिकी की आंखे ऐसी फ़टी की फ़टी रह जायेंगी कि दुबारा किसी भी तरह सिली न जा सकेंग। फिर शायद उनका इलाज डाक्टर टंडन के होम्योपैथिक इलाज से ही किया जा सके।
11. जो भी भारत को अमेरिका बनाने की सोच रहा है वह पछतायेगा जब यह देखेगा कि भारत तो अमेरिका नहीं बन पाया अलबत्ता अमेरिका जरूर भारत बन रहा है। देश और समाज के संबंध सरल रेखीय नहीं होते। वहां न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का संबंध भी लगता है तो शिवपालगंज के गंजहों के नियम भी। चुंबकत्व के नियम लगते हैं तो जड़त्व का सार्वभौमिक सिद्धांत भी।
भारत के अमेरिका बनते ही हो सकता है तमाम लोग किसी ट्रांसपोर्टर की तलाश मे निकल पड़ें कि यार ये दो सौ वर्ग गज का प्लाट ले जाना है। बताओ कै पैसे लोगो। लौटते समय अमेरिका से भारत की ढुलाई मिल जायेगी।
और भी न जाने कित्ते धांसू च फ़ांसू आइडिया दिमाग में हैं लेकिन समय के आगे सब बेकार। समय हमारे काबू में नहीं है। सच तो यह है कि वह किसी के काबू में नहीं है। न भारतीय के हाथ में न अमेरिकी के हाथ में कहा भी है -
पुरुष बली नहिं होत है समय होत बलवान
भीलन लूटी गोपिक वहि अर्जुन वहि बान।
लिखने को तो हम पोथा लिख मारें। पांच बातें कही बताने को हमने दस तो बिना सोचे गिना दीं। आगे कभी लिखेंगे सोचकर तो पचास क्या पचहत्तर ,सौ तक गिना देंगे। और लिखंगे भी आगे कभी। लेकिन मालिक हमको अमेरिका बनने में कौनो दिलचस्पी नहीं है। अपन तो यहीं इंडिया दैट इज भारत में ही चुर्रैट हैं।
और यह भी बता दें कि हम अकेले नहीं हैं। हमारे साथ तमाम लोग हैं, शायद आप भी। अच्छा सच्ची बताओ है कि नहीं।

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Tuesday, December 10, 2019

पहला हफ्ता शाहजहाँपुर में

 


शाहजहांपुर आने के बाद तमाम पुराने लोगों से मुलाकात हुई। इतवार को अख्तर साहब आये। अस्सी की उम्र में चुस्त, दुरुस्त। साइकिल चलाते हुए आये। वृंदावनलाल वर्मा जी की किताब साथ लाये। उसमें गढ़ कुंडार उपन्यास भी है। साथ में मिठाई का डब्बा भी।

अख्तर शाहजहापुरी इस बीच 11 किताबें निकाल चुके हैं। देश से ज्यादा विदेश में प्रसिद्ध। खूब किस्से सुनाए शायरों के। कैसे बड़े-बड़े शायरों को 100-100 रुपये में पढ़वाया। मेराज फैजाबादी केवल शाहजहापुर में संचालन करते थे -अख्तर शाहजहाँपुरी के चलते। इनके रिटायर होने के बाद उन्होंने यहां आना छोड़ दिया।
मेराज साहब के शेर याद आये:
मुझे थकने नहीं देता ये जरूरत का पहाड़
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते।
यह भी :
पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना
फिर जलते हुए शहरों में पानी बेंचना।
कृष्णआधार मिश्र जी तमाम पुरानी यादों के साथ मिले। यादों से जितना पीछा छुटाना चाहते हैं , उतनी ही तेजी से जकड़ती हैं। साथ में शर्मा जी भी थे।
शाहिद रजा , राजेश्वर पाठक, अब्दुल लतीफ , रजनीश और तमाम पुराने लोगों से मिलना हुआ। हफ्ते भर में ही लगता है कि कहीं और गए ही नहीं थे। इतवार को नबी साहब के यहां जाना हुआ। भरे-पूरे परिवार , लगभग पूरे खानदान से मुलाकात हुई। लगा अपने ही परिवार में बरसों बाद आये हैं।
सरोज मिश्र की दी हुई कलम का उपयोग कर सकूं तो अच्छा लगेगा।
कल मजहर मसूद जी से मुलाकात हुई। 14 साल बाद वो फैक्ट्री आये। बताया दस रुपये पड़ते हैं ई रिक्शे के। आज बीस मांगे। हमने कहा -चल यार।
बीस रुपये में शहर से फैक्ट्री आ जाना। मतलब शहर मंहगा नहीं हुआ। आगे और मुलाकातें होंगीं।
एक पुराने साथी सड़क पर मिले। बोले -'मिलना है।' हमने कहा -'मिल तो लिए। काम बताओ।'
बोले -'काम कोई नहीं। बस मिलना है।'
कल आये। बच्चे के साथ। मिठाई, नमकीन और न जाने क्या-क्या दे गए। खाने पर बुलाया है।
और भी तमाम लोगों से मिलना हुआ। घर छूट गया कानपुर में। लेकिन लगता है यहां भी अपनों के बीच आया हूँ।
इतवार को शहर निकले। शहर पूरी तरह तसल्ली में जी रहा है। उतनी ही कम चौड़ी सड़क। उतने ही खुले दिल। मोंगा की दुकान गए। 1992 में उनकी दुकान से खरीदे स्वेटर अभी उतने ही गर्म जितना उनका व्यवहार। बगल की मिठाई की दुकान चांदना जी की। बच्चे ने 20 साल बाद पहचान लिया। अच्छा लगा।
लौटते में गुड़ खरीदा। भेली का गुड़। 40 रुपये किलो। सलीम के दो लड़के हैं। पहले की उम्र 11 साल । दूसरे की दस महीने। इतना अंतर उम्र में? बोले -'जब बड़ा बड़ा हो गया तब दूसरा किया।' और बच्चे के सवाल पर बोले -' मंहगाई में बच्चे पालना मुश्किल। यही पल जाएं , बहुत हैं।'
कमाई की बात पर बोले -' गुजारा हो जाता है। अभी जाड़े में गुड़ बेंच रहे। फिर कुछ और बेचेंगे।'
काम बहुत है यहां। जिम्मेदारी और ज्यादा। देखते हैं कैसे पूरी करते हैं। होंगी । पक्का होंगी। करेंगे तो झक मार के होंगीं।

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Monday, December 09, 2019

क्रिस्टोफर कोलंबस के साथ कनपुरिया कोलम्बस

 


न्यूयार्क में अभिषेक के साथ टहलते हुये कई जगहें देखीं। हर इमारत की अलग कहानी। राकफ़ेलर सेंटर के पास ही सेंट पैट्रिक कैथेड्रल चर्च देखा। खूबसूरत, विशालकाय नई गोथिक शैली में निर्मित यह चर्च 1858 में बनना शुरु हुआ। निर्माण का काम सिविल वार के चलते रुक गया। 1865 में लड़ाई निपटने के बाद फ़िर शुरु हुआ। 1878 में बनकर तैयार हुआ यह चर्च 19 मई 1879 को शुरु हुआ।

डेढ सौ साल पहले इतना विशालकाय, खूबसूरत चर्च बनाने में कितनी मेहनत लगी होगी। कैसे इतनी खूबसूरत नक्कासी हुई होगी, देखकर ताज्जुब हुआ। चर्च में लगभग 3000 लोग एक साथ प्रार्थना कर सकते हैं। लोग वहां आ रहे थे। पूजा कर रहे थे। कुछ बैठे थे। हमारे जैसे लोग शायद बहुतायत में थे जो केवल चलते-फ़िरते देखने आये थे।
चर्च से निकलकर हम फ़िर सड़क पर आ गये। एप्पल फ़ोन के शापिंग सेंटर में गये। अपने तरह का अनूठा शापिंग सेंटर। सब कुछ खुले में। काउंटर पर तमाम तरह के गजेट, फ़ोन रखे थे। देखिये, पसंद कीजिये, भुगतान कीजिये ले जाइये। हमने एक नोटबुक पर अपना फ़ुरसतिया ब्लाग खोलकर देखा। फ़ोटो खिंचाया और कम्प्यूटर वहीं धर दिया। एप्पल के लोग वहां मौजूद लोगों को अपने उत्पाद के बारे में बता भी रहे थे।
एप्पल सेंटर के पास ही न्यूयार्क का सेंट्रल पार्क है। दुनिया के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले पार्कों में एक है सेंट्रल पार्क। साल भर में 4 करोड़ करीब लोग देखने आते हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा फ़िल्माया जाने वाला पार्क है सेंट्रल पार्क। बीच शहर में पार्क बचा हुआ है यह हिन्दुस्तानी लिहाज से अजूबा ही है। अपने यहां होता तो कोई पम्प हाउस बन गया होता यहां। शादी-बारात के लिये तम्बू-कनात लगने लगते। नेताओं की रैली के लिये तो पक्का प्रयोग होने लगता। बहुत ललचाती जगह है उपयोग के लिहाज से।
पार्क में घुसते ही घोड़ा गाडियां दिखीं। लम्बे-चौड़े , स्वस्थ, सुन्दर घोड़े। इतने आकर्षक, हैंडसम घोड़े कि देखते ही किसी भी घोड़ी के मन में घंटियां बचने लगें।
घोड़ा गाड़ी पर बैठकर सैर का किराया इतना ज्यादा था कि अपन उनको देखकर ही तृप्त हो गये। सफ़ाई के लिहाज से घोड़ों के पिछवाड़े कपड़ा इस तरह बंधा था कि अगर वो लीद करें तो सीधे पीछे लीददान में गिरे। एकदम फ़िसलपट्टी की तरह इंतजाम। लीद निकलते ही झूला झूलती हुई अपने गन्तव्य तक पहुंचे।
हमारे वहां टहलते हुये अभिषेक के कुछ हिन्दुस्तानी दोस्त मिले। एकाध कनपुरिया भी। कुछ देर उनसे बतियाये। फ़िर पार्क दर्शन करने लगे।
बेहद खूबसूरत पार्क में तरह-तरह के पेड़, तालाब, ब्यूटी प्वाइंट, लव प्वाइंट और अनेक फ़ोटुआने लायक जगहें थीं। लोग जगह-जगह खड़े होकर फ़ोटू खिंचा रहे थे। हमने भी बेदर्दी से कैमरे का उपयोग किया।
अब कैमरों का कोई ’कैमरा अधिकार आयोग’ तो होता नहीं जो वहां जाकर हमारी शिकायत करता –’देखिये ये नमूने जैसे शक्ल लिये बार-बार खूबसूरत जगहों पर खड़े होकर हमसे फ़ोटू खिंचा रहे हैं। जगहों की खूबसूरती बिगाड़ रहे हैं फ़ोटुओं में। हमारी बदनामी हो रही है।’
पार्क में घुसते ही बर्फ़ का स्केटिंग सेंटर भी दिखा। पता चला वह ट्रम्प का है। ट्रम्प साहब के अमेरिका में तमाम तरह के रोजगार हैं। इमारतें, होटल, कैसीनों, व्यापारिक सेंटर मतलब हर रोजगार में दखल। हालात यह कि लोग मजाक में कहते हैं कि ट्रम्प मूलत: तो व्यापारी ही हैं , अमेरिका के राष्ट्रपति का काम तो उनका साइड बिजनेस है। हाल ही में वासिंगटन डीसी में पुराने पोस्ट आफ़िस को खरीद कर ट्रम्प साहब ने होटल में बदल दिया। दुनिया भर के देशों के आये राष्ट्राध्यक्ष इसी होटल में ठहरते हैं।
पार्क में एक चौड़े रास्ते के दोनों के तरफ़ मशहूर साहित्यकारों की मूर्तियां हैं। परिचय के साथ आकर्षक मूर्तियां। इस रास्ते से गुजरकर फ़ोटो खिंचाते हुये अपन ने उनका सानिध्य महसूस किया।
वहां की खूबसूरती का उपयोग लोग अपने-अपने तरह से कर रहे थे। फ़ोटोग्राफ़ी तो हर मोबाइल धारी का सहज अधिकार है। इसके अतिरिक्त तमाम खूबसूरत लोग माडलिंग के अंदाज में फ़ोटो/वीडियो बाजी भी कर रहे थे। अंगड़ाईयां लेते हुये, अदायें दिखाते हुये। हाल यह कि यह सब देखने में ही लगे रहते अगर आगे का नजारे और आकर्षक न होते।
कछुआ तालाब और आर्नामेंटल पुल पर खड़े होकर तमाम लोग फ़ोटोबाजी कर रहे थे। ऑर्नामेंटल पुल अंगूठी के आकार का बना हुआ है।
एक जगह एक आदमी साबुन के बबल बनाते हुये उड़ा रहा था। हमारे बगल से , ऊपर से भी कुछ साबुन के बादल गुजरे। कुछ से हमने बचने की कोशिश की। बच भी गये। जिनसे नहीं बच पाये वो हमसे भिड़कर हवा में मिल गये। मन में – ’जो हमसे टकरायेगा, चूर-चूर हो जायेगा’ वाले घराने के भाव आयें इसके पहले ही हम आगे बढ गये।
आगे कुछ लोग करतब दिखा रहे। तीन लोगों को सर झुकाकर खड़े करके एक आदमी दूर से दौड़ता आया और तीनों को ऊपर से फ़ांदता चला गया। तालियां बचाकर लोगों ने स्वागत किया। कुछ ने पैसे भी दिये। हमने तालियां बचाकर काम चलाया।
एक ड्रमर वहां ड्रम बजाते हुये रियाज कर रहा था। आगे बेथोडा टेरेस और फ़व्वारे पर तमाम लोग मौजूद थे। लोगों की चहल-पहल और चेहरे जगह को खूबसूरत बना रहे थे। पार्क से टहलकर बाहर आये। बाहर कोलम्बस की बड़ी मूर्ति बनी थी।
कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की। दुनिया के साहसी लोगों में शामिल इस नाविक ने यहां के मूल निवासियों को बेदखल करने किया, जनसंहार भी किया। इस अत्याचार को देखते हुये कुछ लोगों यह मांग भी कर रहे हैं कि कोलम्बस को महिमामंडित करने की बजाय उसकी मूर्तियां हटनी चाहिये। आगे क्या होता है यह समय बतायेगा। लेकिन फ़िलहाल तो कोलम्बस अकड़े हुये खड़े हैं तमाम जगह।
चूंकि यहां फोटो खिंचाने के पैसे नहीं पड़ने थे इसलिए हमने कोलम्बस की मूर्ति के पास खड़े होकर फोटो खिंचाया। फोटो का टाइटल - क्रिस्टोफर कोलम्बस के साथ कनपुरिया कोलम्बस।
सेंट्रल पार्क में घूमते हुये अभिषेक ने आसपास की इमारतों की जानकारी भी दी। एक इमारत ऐसी भी जो इतनी पतली थी कि उसका बनना असम्भव बताया गया था। लेकिन असम्भव को सम्भव बनाया उसके बनाने वालों ने।
घूमते-घूमते शाम हो गयी थी। इतना घूमे उस दिन कि पैर के अंगूठे में छाले पड़ गये। हम लौट चले। पास के ही अंडरग्राउंड मेट्रो से न्यूयार्क पेन स्टेशन आये। इसी बहाने न्यूयार्क की मेट्रो भी देख ली। बैठ भी लिये।
चलते समय अभिषेक ने जेब से निकालकर एक ठो शाल भेंट किया कहते हुये- ’लेखक के लिये यही सबसे ठीक लगा मुझे।’ हड़बड़ी में फ़ोटो भी नहीं खिंचा पाये। खिंचाते तो सालों तक लोगों को दिखाते हुये कहते –’यह शाल हमको न्यूयार्क में भेंट की गयी थी।’
लौटकर घर आये तो रात हो गयी थी। अंधेरा हो गया था। लेकिन न्यूयार्क की यादें जगमग कर रहीं थीं। अभी भी यही महसूस हो रहा है।
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Friday, December 06, 2019

हमको हल्के में न लेना



 हमने अमेरिका जाने का प्रोगाम झटके में बनाया था। इधर वीजा हुआ , उधर टिकट खरीद लिया। २० दिन बाद का। कोई तैयारी नहीं। अनुमति वगैरह के लफ़ड़े तो थे ही इसके अलावा भी तमाम तैयारी करनी थी। दिन कम। सबसे बड़ा काम जो बचा था वह लोगों को बताने का था –’अमेरिका जा रहे हैं। हल्के में मत लेना।’

लोगों को बताने का काम शुरु किया तो एक दिन में ही सबको पता चल गया। कोई और बचा ही नहीं बताने को। लेकिन हमको लगे कि अभी सबको बताया नहीं। इस चक्कर में कुछ लोगों को कई-कई बार बताया। लोग झेल गये। इसके बाद लोगों ने भी कायदे से बदला चुकाया। हम किसी को काम बताते अगला पूछता –’साहब, अमेरिका कब जा रहे हैं?’ किसी को पूछते –’काम कब तक हो जायेगा?’ अगला कहता –’आपके अमेरिका जाने/लौटने से पहले हो जायेगा।’ हाल यह कि हमारी अमेरिका यात्रा ग्रीन विच मीन टाइम हो गयी। कोई काम या तो हमारे अमेरिका जाने के पहले पूरा हो जायेगा या वहां से वापस लौटने पर।
बात यहीं तक रहती तो ठीक था। बाद में हाल यह हुआ कि हम किसी की गलती पर उसको हड़काने की सोचते तो अगला बिना हड़के हमसे पूछ लेता –’साहब, अमेरिका कब जा रहे हैं?’ हमारे गुस्से की मिसाइल पर को अपने सवाल की एंटी निसाइल से ध्वस्त कर देता। हाल यह हुआ कि हर आने-जाने को देखते ही हम डर लगता कि कहीं यह पूछ न ले –’साहब, अमेरिका कब जा रहे हैं।’
अमेरिका यात्रा हमारे लिये बवाल हो गयी।
बहरहाल, जब प्लान बन गया तो तैयारी भी हो ही गयी। लेकिन इस बीच लोगों ने डराया बहुत- ’बहुत सर्दी पड़ेगी इस मौसम में वहां। यह ठीक मौसम नहीं है।’ लेकिन डेढ लाख की टिकट खरीद कर बैठा इन्सान इन बातों से चाहने के बावजूद भी विचलित होने की विलासिता नहीं कर सकता।
लेकिन मेहरबानी रही सूरज भाई कि हम जहां-जहां रहे वहां-वहां रोशनी और गर्मी का पक्का जुगाड़ करते रहे। हवाओं ने ठंड फ़ैलाने की कोशिश की तो हडका दिया –’औकात में रहो।’ कुल मिलाकर मौसम आशिकाना ही रहा।’ जलवे का हिसाब यह समझा जाये कि हमारे न्यूयार्क छोड़ते ही मौसम ठंडा हो गया। बर्फ़ गिरने लगी।
हां तो बात फ़िर न्यूयार्क की। दो दिन देखने के बाद भी बहुत कुछ बचा था देखने को। हम निकल लिये। घरैतिन आराम के मूड में थीं उस दिन। हमको अकेले जाने की अनुमति मिल गयी। जाओ देख लो जी भर के। कोई अरमान बाकी न रहें। हम भी निकल्लिये। पहुंच गये न्यूयार्क।
स्टेशन से ही हमने फ़ोनियाया अभिषेक ओझा को। बोले –’बस अभी पहुंचते न्यूयार्क। मिलते हैं।’ बलियाटिक अभिषेक के गणित के किस्से और पटनिहा प्यार के किस्सों के हम मुरीद हैं। कानपुर आई.आई.टी. से बीटेक करने के बाद कुछ दिन एक बड़ी कम्पनी में काम किया। इसके बाद अपने दोस्तों के साथ खुद का काम शुरु किया।
अभिषेक के आने तक अपन ने बाकी बचा हुआ न्यूयार्क देख डाला। फ़ोटो खैंच डालीं। बुलन्द इमारतों निहार डाला। एकाध से कहा भी – ’कानपुर में होती तो तुम्हारी दीवारों पर पीक-श्रंगार भी हुआ होता। यहां तुम खड़ी हो अकेली खूबसूरती समेटे।’ इमारतों की दीवारें कुछ बोलीं नहीं। लगता है यहां की दीवारों के कान नहीं होते या वे कुछ ऊंचा सुनती हैं।
कुछ देर पैदल टहलने के बाद अपन ने बस पकड़ी। पैसा दिये थे तो वसूल भी लें वाली गरज भी हावी थी। राकफ़ेलर सेंटर पर उतर गये ।
राकफ़ेलर सेंटर में न्यूयार्क की 48 वीं गली से 51 वीं गली के बीच बने कई कामर्शियल इमारते हैं। सन 1950 से 1961 के मंदी के दौर में बनी ये इमारतें अपने समय की सबसे बड़ी परियोजना थी। इमारतें अपनी कला, मजबूत नींव और क्रिसमस ट्री के लिये प्रसिद्ध हैं।
राकफ़ेलर सेंटर पर पहुंचे तो देखा कि खूब ऊंचा ढांचा बन रहा था जैसे कोई शादी का बड़ा सा मंडप बन रहा हो। लेकिन उंचाई देखकर लगा कि शादी का मंडप इत्ता ऊंचा नहीं होता। यह तो किसी बिजलीघर का व्यायलर हाउस जैसा बन रहा। खुटुर-खुटुर जारी थी। क्रेन भी लगी थी। पता चला कि ऊंचा क्रिसमस ट्री बन रहा है।
वहीं सेंटर पर ही बर्फ़ का स्केटिंग रिंग बना था। लोग स्केटिंग कर रहे थे। काश हम भी कर पाते। स्केटिंग भी साइकिल सीखने जैसा ही जटिल काम है। शुरु में सीख ले तो ठीक वर्ना फ़िर न हो पाता। हमारे दोस्त सुरेन्द्र सिंह सावन्त माउथ आर्गन बजाते हुये स्केटिंग करते थे। उनका चेहरा और याद बिना वीजा, पासपोर्ट और टिकट के सामने आकर खड़ी हो गयी। देरतक खड़ी रही फ़िर अभिषेक आ गये तो याद वापस चली गयी।
राकेफ़ेलर सेंटर पर काफ़ी देर खड़े रहने के बतियाने के बाद हम सड़क पर टहलने निकले। एक आदमी स्टील कलर की कपड़ों और पेंट में मूर्ति की तरह खड़ा था। पैसे लेकर साथ में फ़ोटो खिंचाने की अनुमति दे रहा था। हमने भी खिंचाई। सोचा भी कि अमेरिका में मांगने वालों के भी जलवे हैं।
एक बड़ी इमारत के पास कुछ पुलिस के सिपाही खड़े थे। स्मार्ट, हीरो टाइप। उनके पास अपनी पुलिस की तरह डंडा नहीं था लिहाजा चेहरे से रुआब और आतंक वाला भाव भी नदारत। डंडा अपनी पुलिस की ताकत है। उसके पास फ़टकते हुये भी आम आदमी डरता है। डंडा-विहीन अमेरिका पुलिस का सिपाही माई डियर टाइप लग रहा था। उसका ’माईडियरपना’ तब और बढ गया जब उसने साथ खड़े होकर मुस्कराते हुये फ़ोटो खिंचाई।
पास ही ट्रम्प टावर है। उसे भी देखने गये। ट्रम्प टावर का ऊपरी मंजिल पर ट्रम्प का एक घर है। बाकी में होटल, रेस्तरां। अन्दर जाने का कोई टिकट नहीं सो हम घुस गये। नीचे काउंटर पर ही ट्रम्प और उनसे जुड़ी चीजें बिक रही थीं। कैप, टी-शर्ट, बैज आदि। अमेरिका के लोग बेंचना अच्छी तरह से जानते हैं।
ऊपर पहुंचकर अपन ने लाटे टी पी। कुछ देर आते-जाते लोगों को ताका। कुछ को नहीं ताक पाये तो बाकी लोगों के लिये छोड़ दिया। रेस्टरूम का उपयोग किया। कोई कहे तो बातचीत में शेखी मार सकते हैं-’ हमको हल्के में न लेना, ट्रम्प टावर में निपट के आये हैं।’
ट्रम्प टावर पर ट्रम्प का घर होने के बावजूद पुलिस बहुत कम थी। दस-बारह लोग। टावर के बाहर ही एक आदमी ट्रम्प की शक्ल बनाये टहल रहा था। उनकी ही तरह हरकतें करता। उंगली उठाता, मुंह बनाता। लोग उसको देखते मजे ले रहे थे जैसे दुनिया ट्रम्प की अदाओं के मजे लेती है। ट्रम्प का हमशक्ल भी लोगों की प्रतिक्रियाओं से बेखबर अपनी अदायें जारी रखे था –ट्रम्प की तरह। ’आई डोंट केयर’ के भाव का झंडा अपने चेहरे पर फ़हराते हुये।
ट्रम्प टावर को देखने के बाद हम बाकी बचा हुआ न्यूयार्क देखने के लिये बढ गये।

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Thursday, December 05, 2019

हम जहां हैं , वहीं से आगे बढ़ेंगे

 


मैंने मांगी दुआएं दुआएं मिली
अब दुआओं पे उनका असर चाहिए।
जबसे कानपुर से शाहजहांपुर आकर यहां आयुध निर्माणी, शाहजहाँपुर के महाप्रबन्धक का कार्यभार संभाला है नन्दन जी की यह कविता लगातार याद आ रही है। अनगिनत लोगों की शुभकामनाओं और प्यार के कारण यह जिम्मेदारी निभाने का अवसर मिला। मुझसे जुड़े लोगों की दुआएं मेरे साथ हैं। उनका असर भी जरूर होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
शाहजहांपुर में तैनाती मेरे लिए घर वापसी जैसी है। अपने लोगों के बीच लौटना है। पहले भी यहां रह चुका हूँ। यहां की अनगिनत खुशनुमा यादें है। उम्मीद है कि और भी तमाम अच्छी यादें जुड़ेंगी।
इसके पहले कानपुर रहा साढ़े तीन साल। वहां से तमाम अच्छी यादों के साथ विदा हुआ। बहुत कुछ सीखा। साथियों का अद्भुत सहयोग , आदर, स्नेह मिला। उसके प्रति आभार व्यक्त करके किसी को नाराज करना ठीक नहीं होगा। उनके स्नेह, आदर का पात्र बने रह सकने लायक काम कर सकूं यही प्रयास रहेगा।
कानपुर से विदा होते समय तमाम मित्रों को उपहार में मैंने किताबें दीं (अपनी कोई नहीं)। जिसको जो पसंद हो , ले ले वाली अंदाज में। इस इस्कीम के साथ कि जो अपने किसी दोस्त से एक्सचेंज करके दो किताबें पढ़कर उसके बारे में बताएगा उसको एक किताब और मिलेगी। अभी तक किसी ने किताब पढ़े जाने की सूचना नहीं दी है।
कुछ लोगों ने अपनापे भरी गुंडागर्दी दिखाते हुए दो-तीन किताबें जबरियन हासिल की। बाकयदा हमसे दस्तखत कराकर। यह अपनापा अपन के जीवन की नियमित संजीवनी है।
एक साथी ने दो किताबें लेते हुए पूरी मासूमियत से सवाल किया -'आपको ये किताबें कहीं से मिलीं थी क्या जो इस तरह सबको बांट रहे हैं।' सवाल सुनकर हमारे खर्च हुए हज्ज़ारो रुपये मुंह छिपाकर हंसने लगे। मुझको अपने तमाम डॉक्टर दोस्त याद आये जो मेडिकल रिप्रेसेंटेव से नमूने के तौर पर मुफ्त में मिली दवाइयां परिचितों को बांटते हैं।
वैसे किताबें भी दवाइयां ही हैं। तमाम अलाय-बलाय से बचाती हैं किताबें।
शाहजहाँपुर बलिदानी शहर है। गर्रा और खन्नौत नदियों की बाहों के घेरे में बसा शहर क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल,अशफाक उल्ला खां और रोशनसिंह की जन्मभूमि है। वीर रस के कवि स्व. राजबहादुर विकल कहते थे :
पांव के बल मत चलो अपमान होगा,
सर शहीदों के यहां बोए हुए हैं।
निर्माणी के साथियों की आत्मीयता से अविभूत हूँ। तमाम लोगों ने अलग-अलग तरह यादे संजोई हैं। कल एक बुजुर्ग टेलर ने हमारे पुराने साथी मरहूम साथी अब्दुल नवी की याद दिलाते हुए बताया -'हमको याद है कि नबी साहब की मय्यत में आप गए थे तो सबसे आखिर में वापस लौटे थे।'
अब्दुल नबी साहब मेरे अब तक के जीवन में मिले सबसे बेहतरीन इंसानों ने सबसे अव्वल लोगों में थे। जितना मुझे उनकी असमय मौत का अफसोस है उतना किसी और की मौत का नही हुआ। उनको जब भी याद करता हूँ रोना आता है। अभी भी आंसू आ गए उनको याद करते हुए।
वापस लौटने पर अरविंद मिश्र के न होने का भी बेइंतहा अफसोस है। पूरे शहर के साहित्यिक-सांस्कृतिक हलचल की धुरी थे अरविंद मिश्र। उनके न रहने से शहर की साहित्यिक रौनक कम हो गयी। सबसे मिलकर रहना। आगे बढ़कर जिम्मेदारी से काम करना। बिंदास , बेलौस अंदाज में कविता, व्यंग्य औऱ संचालन। बहुत याद आएंगे , हर आयोजन में।
और तमाम लोग हैं यहां अभी भी। सबसे फिर से मिलना होगा। नई यादें जुड़ेंगी।
चुनौतियां बहुत हैं। कठिनाइयों भरी जिम्मेदारी। पूरा भरोसा है कि जो जिम्मेदारी मिली है उसे अपनी मेहनत और सबके सहयोग से निभा सकूंगा। अपने दोस्त राजेश की कविता के संकल्प के साथ:
हम जहां हैं,
वहीं से, आगे बढ़ेंगे।
है अगर यदि भीड़ में भी हम खड़े तो,
है यकीं कि, हम नहीं,
पीछे हटेंगे।
देश के बंजर समय के बांझपन में,
या कि अपनी लालसाओं के
अंधेरे सघन वन में,
पंथ, खुद अपना चुनेंगे।
या अगर है हम
परिस्थितियां की तलहटी में,
तो
वहीं से,
बादलों के रूप में, ऊपर उठेंगे।

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Wednesday, December 04, 2019

ब्रुकलिन ब्रिज पर टहलते हुए

 



न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज के सांड को देखते हुए शाम हो गयी थी। सूरज भाई अपना शटर गिराकर निकल लिए थे। बत्तियां जल गयीं थी। हम आगे बढ़े। हमारी अगली मंजिल 'ब्रुकलिन ब्रिज' थी।
'ब्रुकलिन ब्रिज' न्यूयार्क के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शामिल है। कहते हैं जिन्होंने 'ब्रुकलिन ब्रिज' नहीं देखा उन्होंने न्यूयार्क नहीं देखा। मैनहट्टन और ब्रुकलिन के बीच ईस्ट रिवर बना यह पुल दुनिया के सबसे प्रसिद्द पुलों में शामिल है। दुनिया का पहला लटकता ब्रिज था। 1869 में बनना शुरू होकर 1883 में पूरा हो गया।
पुल बनने के पहले ब्रुकलिन और न्यूयार्क में आवाजाही फेरी से होती थी। पुल बनने की बात सन 1800 से सोची जा रही थी। सोच को अमल में लाने में 83 साल लग गए।
ब्रुकलिन पुल को बनाने की संकल्पना 1852 में जर्मनी से अमेरिका आये इंजीनियर जान अगस्त रोबलिंग ने की थी। पुल बनने के दौरान एक जंग लगी पिन चुभ जाने से पैदा टिटनेस से 1869 में जान अगस्त रोबलिंग की मौत हो गयी। उनके निधन के बाद उनके बेटे वासिंगटन रोबलिंग ने काम संभाला। वासिंगटन को भी पैरालिसिस हो गया। उनका चलना-फिरना दूभर हो गया। इसके बाद कमान संभाली उसकी पत्नी एमली वारेन रोबलिंग ने। वासिंगटन घर में काम करते, एमली उसको इंजीनियरों तक पहुंचाती।
11 साल तक यह सिलसिला चला। पुल बनकर तैयार हुआ तो 24 अगस्त, 1883 को । एमली वारेन रोबलिंग ने सबसे पहले चलकर पुल पार किया। चलने-फिरने में असमर्थ वासिंगटन रोबलिंग ने घर में गुलदस्ता ग्रहण करके पुल की शुरुआत का उत्सव मनाया। ब्रुकलिन पुल के निर्माण में रोबलिंग परिवार का अहम योगदान था। पहले दिन 1800 गाड़ियां और 150,300 लोग गुजरे पुल से।
जब बना था पुल तब इस पर घोडेगाड़ियाँ और ट्रेन चलती थीं। आज के दिन गाड़ियां, साइकिल और पैदल यात्रियों के लिए है यह पुल।
'ब्रुकलिन ब्रिज' हम टैक्सी से गये। उसका भी मजेदार किस्सा। पहले हमने टैक्सी बुक करने में होशियारी दिखाई। पैसे कम लगेंगे यह सोचकर साझे की टैक्सी की। सूचना आई कि 4 मिनट में टैक्सी फलानी जगह पहुंचेगी। हम वह जगह तलाशते रहे। लेकिन जगह जिंदगी में सुकून की तरह दिखी नहीं।इस बीच सूचना भी आ गयी कि टैक्सी का समय हो गया। वह चली गयी। 5 डॉलर जुर्माना ठोंक कर। होशियारी की हवा निकल गयी।
होशियारी की हवा निकलने के बाद अपन ने समझदारी का दामन थामा। जिस जगह खड़े थे वहां आने के लिए पूरी टैक्सी की। टैक्सी आई । बैठने के बाद याद आया कि अपन को ब्रुकलिन ब्रिज के पार तक जाने की टैक्सी करनी थी ताकि उधर से इधर आने के दौरान खूबसूरत रोशनी का दीदार कर सकें। सोचा कि टैक्सी वाले को कहेंगे कि भईया उधर उतार देव। जो पैसा लगेंगे देंगे। लेकिन सोच को अमल में लाने के लिए जब तक अंग्रेजी बनाएं तब तक ड्रॉइवर न गाड़ी 'ब्रुकलिन ब्रिज' के सामने गाड़ी खड़ी कर दी।
मन की बात को हिंदी से अंग्रेजी में करने में हुई देरी की सजा हमको पुल पर देर तक पैदल चलने के रूप में मिली। हिंदी से अंग्रेजी के चक्कर पूरा देश न जाने कब से सजा भुगत रहा है। ऐसे में अपना रोना रोना ठीक नहीं।
पुल पर पहुंचते ही तेज ठंडी हवाओं ने कंटाप मारते हुए हमको देरी से आने की सजा सुनाई। हमने कनटोप लगाकर सजा का प्रभाव कम करने की कोशिश की। लेकिन ठंड पूर्ण बहुमत की सरकार की तरह मनमानी पर उतारू थी।
जैसे बिना ड्राइविंग लाइसेंस गाड़ी चलाते बपकड़े जाने पर बच्चे पुलिस और ट्रांसपोर्ट के अपने अंकल का हवाला देकर जुर्माने से बचने की कोशिश करते हैं उसी तर्ज पर सोचा कि बता दें कि सूरज जी हमारे भाई हैं। लेकिन यह सोच जितनी तेजी से हमारे दिमाग में आई , उससे दूनी तेजी से हमने उसे दबा दिया। डर था कि ठंड कहीं विरोधी पार्टी से सम्बन्ध सोचकर और प्रताड़ित न करने लगे।
ब्रुकलिज ब्रिज की शुरुआत में जमीन पर कई तरह का सामान बेंचते लोग देखकर लगा कि हमारा कानपुर बिना पासपोर्ट, वीसा, टिकट खाली अंग्रेजी बोलने का अभ्यास करके न्यूयार्क आ गया है।
बीहड़ ठंड और तेज हवाओं के बावजूद सैलानी पुल पर आ रहे थे। तरह-तरह से फोटो खिंचाने में लगे थे। जगमगाती यादों को कैमरे में कैद कर रहे थे। हमने भी खूब फोटो खींची। अकेले खींची, सेल्फ़ियाये और वहां गुजरते लोगों से भी खिंचाए।
लोगों से फोटो खिंचाने के बाद मोबाइल वापस लेने से पहले ही जोर से 'थैंक्यू वेरी मच' भी बोला। इसमें हमने कब्भी कोई कंजूसी नहीं की। बिना शार्टकट के पूरा 'थैंक्यू वेरी मच' बोला। यह नहीं कि काम निकल जाने के बाद अद्धे-गुममें की तरह , मुंह फेरते हुए, थैंक्स बोलकर फूट लें। विश्वास न होय तो किसी भी अमेरिकी को रोक के पूछ लो।
हमारे जोर से 'थैंक्यू वेरी मच' को हवाओं न अपने लिए भी समझ लिया। उनकी ठंडक कम सी हो गयी। लेकिन जहां हम देर तक सर खोलते, हाथ बाहर करते हवाएं टोंक देतीं-'सर ढंक लो, हाथ अंदर करो। '
पुल पर चलते हुए बीच तक गए हम। नदी में नावें , छोटे जहाज तैर रहे थे। नीचे गाड़ियां धड़ाधड़ गुजर रहीं थीं। सबको घर वापस जाने की जल्दी। हमको याद आई अपनी कविता पंक्तियां :
घर से बाहर जाता आदमी
घर वापस लौटने के बारे में सोचता है।
यहां लोग सोच ही नहीं रहे थे, घर वापस जा भी रहे थे। दूर दिखती सड़क पर ट्रैफिक किसी जगमगाती नदी सा बह रहा था। अंगड़ाई लेते हुए , इठलाता , इतराता मोटरों का काफिला शायद मुस्कराता हुआ भी गुजर रहा हो।
न्यूयार्क की इमारतें रोशनी में चमचमा रहीं थी। हमको देखकर शायद और जगमगाने लगी होंगी। मन किया कि कह दें कि भाई हम ऐसे ही प्रभावित हैं काहे को वाटेज फूंक रहे हो। लेकिन मन की बात कहने में फिर अंग्रेजी का अनुवाद आड़े आ गया। नहीं कह पाए। मन तो यह भी किया कि न्यूयार्क की तमाम जगर-मगर का कुछ हिस्सा चुराकर कानपुर लें आएं और उन इलाकों में फैला दें जहां अभी भी अंधेरा है। लेकिन इम्मीग्रेशन में पकड़े जाने के डर से हमने इरादा फौरन मुल्तवी कर दिया।
पुल से गुजरते हुए हर अगला मोड़ पिछले से ज्यादा क्यूट, स्वीट और खूबसूरत तथा आकर्षक लगता। इतना कि पुल को 'लव यू' बोलने का मन किया। लेकिन फिर सोचा कि बवाल होगा। रोशनी बोलेगी हमको क्यों नहीं बोला, हवाएं बोलेंगे -क्या हम इत्ते बुरे हैं,नदी अलग भन्नायेगी। इसके अलावा न जाने कौन बुरा मान जाए। मुंह फुला ले। अबोला हो जाये। पता ही न चले। पता चलने पर तो मना भी सकते हैं लेकिन कोई मौन हो जाये तो कैसे मनाया जाए।
लेकिन अब लग रहा कि सबको बोल देना चाहिए। जिसका नाम याद आये उसको नाम लेकर, जो न याद आये उसको बिना नाम लिए। अब तो लौट आये। यही कह सकते हैं जो नहीं कहा वह कहा हुआ समझना। खूब खुश रहना।
ब्रुकलिन पुल से गुजरते हुए हमको नरेश सक्सेना जी याद आये:
पुल पार करने से
पुल पार होता है
पुल पार करने से नदी नहीं पार होती।
नदी तो नहीं पार हुई लेकिन ब्रुकलिन ब्रिज से गुजरते हुए 1800 से लेकर 2019 के बीच के 219 साल कल्पनाओं में गुजर गए। जबसे पुल की कल्पना हुई तब से बनने और आज तक के बीच का समय इंसान की कल्पना को अमल में लाने की कहानी है।
लौटते हुए रात हो गयी थी। पुल से उतरते हुए टैक्सी करने के पहले ही एक बस दिख गयी। उसी में बैठकर लौट लिए। उसकी कहानी पहले ही बता चुके हैं।
स्टेशन लौटकर ट्रेन पकड़ी। घर आये। न्यूयार्क में घुमाई का यह हमारा दूसरा दिन था।

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Monday, December 02, 2019

वाल स्ट्रीट पर नथुने फड़काता सांड




वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को निपटाकर हम आगे बढ़े। पेड़ों पर पीली पत्तियां माहौल को खूबसूरत बना रहीं थीं। गली-गली होते हुए हम मुख्य सड़क पर आए। हमारी अगली मंजिल वाल स्ट्रीट पर स्थित मशहूर सांड था।
सड़क पर भीड़ थी। फुटपाथ पर भी चहल-पहल थी। हमको लगा कि वो सांड न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज पर होगा। पूछते हुए वहां पहुंचे तो दूर तक सांड दिखा नहीं। पता किया तो एक न बताया कि उधर है 'उधर है चार्जिंग बुल।'
फुटपाथ पर चलते हुए हम 'उधर' की तरफ बढ़े। बढ़ते हुए हमें एक बार फिर लगा कि अमेरिका में फुटपाथ पर उनके मूल मालिकों -'पैदल यात्रियों' का ही कब्जा है। कोनों पर कहीं कुछ छुटपुट अस्थाई दुकानें भले दिखीं लेकिन फुटपाथ पैदल यात्रियों के लिए ही सुरक्षित है।
एक बात और जो हमें दिखी वहां वह यह कि हर फुटपाथ के कोने सड़क से इस तरह जुड़े थे कि कोई दिव्यांग व्हील चेयर से सड़क से फुटपाथ पर आ जा सके। ऐसा पूरे अमेरिका की फुटपाथों पर होगा शायद। अपने प्रवास के दौरान मैंने एक भी फुटपाथ ऐसा नहीं देखा जिसके कोने व्हीलचेयर की आवाजाही की सुविधा से युक्त न हों। फुटपाथ पर उखड़ी ईंट और बहती पाइपलाइन देखने को भी तरस गए अपन अमेरिका में।
'चार्जिंग बुल' के चारों तरफ लोगों की भीड़ थी। लोग उसको देखते हुए उसके साथ फोटो खिंचाने में लगे थे। जयमाल के बाद जैसे लोग दूल्हे-दुल्हन के साथ, आगे-पीछे अगल-बगल खड़े होकर, ताकि सनद रहे वाली मंशा से फोटो खिंचा रहे थे ।
'चार्जिंग बुल' मतलब नथुने फड़काता , बलबलाता सांड। कांसे की करीब साढ़े तीन टन की इस मूर्ति का निर्माण प्रसिद्द मूर्तिकार द मोदिका ने किया था। द मोदिका 1970 में न्यूयार्क आये थे तो उनके पास एक चवन्नी तक नहीं थी। खाली जेब थे वो। बाद में इस शहर ने उनको पहचान दी। वे प्रसिध्द हुए। पैसे भी कमाए होंगे। इससे न्यूयार्क के प्रति उनके मन में 'आभार भाव' रहा होगा।
1987 में काले सोमवार को स्टॉक मार्केट धड़ाम हो गया था। लोगों के वैसे और हौसले डूब गए थे। इससे निराश हुए लोगों की हौसला अफजाई के लिए मोदिका ने इस सांड की मूर्ति की परिकल्पना की। बेदी मक्की आर्ट फाउंडेशन ब्रूकलिन ने उनकी कल्पना को मूर्ति में ढाला। मूर्ति बनने के बाद एक ट्रक में लादकर 14 दिसम्बर , 1989 को अवैध रूप से मैनहट्टन की फुटपाथ पर छोड़ गए जैसे रात के अंधेरे लोग अपने घर का कूड़ा दूसरे के दरवज्जे छोड़ जाते हैं।
3.6 लाख डॉलर की कीमत के सांड को फ्री फंड में छोड़ दिया अगले ने। ऐसे जैसे सांता क्लॉज गरीबों के घरों की खिड़कियों से उपहार गिरा जाता है। यह शहर के प्रति प्रेम के साथ-साथ अपनी कला के प्रदर्शन की ललक भी रही होगी। लोगों की भीड़ जुट गई इसे देखने के लिए। लेकिन इस तरह जमीन पर मूर्ति छोड़ देना अवैध है वहां भी लिहाजा सांड की मूर्ति हटा दी गयी। लेकिन फिर लोगों की इच्छा के चलते इसको दुबारा लगाया गया। लोग इसे देखने के लिए आने लगे। यह एक चर्चित स्थल बन गया।
खुल्ले में खड़ा नथुने फड़काता सांड खराब से खराब समय में भी हौसला बनाये रखने की भावना का संचार करता है। एक इंटरव्यू में शिल्पकार मोदिका न बताया- 'मैं लोगों को बताना चाहता था कि अगर आप अपने सबसे खराब समय में भी कुछ करना चाहते हैं तो उसे कर सकते हैं। आप उसे खुद कर सकते हैं। मेरे कहने का मतलब है कि आपको मजबूत होना चाहिए।'
स्टॉक मार्केट की ऊर्जा, ताकत और अनिश्चितता का प्रतीक है यह नथुने फड़काता खड़ा सांड।
बाद में मूर्ति में कुछ टूट-फूट हुई तो उसको भी आकर ठीक किया मूर्तिकार ने। मालिकाना हक भी लफड़े वाला है मूर्तिकार का। पहले तो चुपके से धर गया मूर्तिकार। बाद में इसके चित्रों के उपयोग पर पाबंदी लगा दी अगले ने। इस सांड की नीलामी भी करने की बात की मूर्तिकार ने इस शर्त के साथ कि मूर्ति वहीं रहेगी जहां है।
पूंजीवाद के विरोध के प्रतीक के रूप में भी इस मूर्ति का प्रयोग 'ऑक्युपाई वाल स्ट्रीट' आंदोलन में हुआ।
लोग सांड की मूर्ति के पास खड़े होकर, उसको छूकर, कुछ लोग तो उस पर चढ़कर फोटो खिंचा रहे थे। नथुने फड़काता यह सांड अगर जीवित सांड होता तो लोग इसके पास तक नहीं फटकते। छिटककर दूर भागते। लेकिन मूर्ति बन जाने पर लोग इसके ऊपर सवारी करते हुए फोटोबाजी कर रहे थे।
महापुरुषों के मूर्तियों में बदल जाने पर भी उनके साथ यही सुलूक होता है।
कोई चीज प्रसिद्ध हो जाने पर उसके साथ मिथक भी जुड़ते हैं। कांसे के इस चार्जिंग बुल के साथ भी यह मान्यता जुड़ गयी कि इसके नथुने, सींग और अंडकोष छूना भाग्यशाली होता है।
लोग मूर्ति के साथ खड़े होकर फोटो खिंचा रहे थे। कुछ उसकी पीठ पर चढ़कर सींग पकड़े हुए थे। कोई नथुने छू रहा था। झुकझुककर सांड के अंडकोष छूते,सहलाते दिखे लोग।
एक बुजुर्ग अपनी जीवन संगिनी को व्हील चेयर पर साथ लाकर फोटो खिंचा रहे थे। एक स्कूली बच्चा बहुत आहिस्ते से सांड की पीठ सहलाते हुए खड़ा था। बाद में पता चला कि बच्चा दृष्टिबाधित था। बिना आंख की रोशनी के वह विश्व की सर्वाधिक प्रसिद्द मूर्तियों में से एक को देख रहा था।
पास में ही न्यूयार्क फ़िल्म सिटी का आफिस था। अपन को शूटिंग में तो भाग नहीं लेना था इसलिए मूर्ति को देख-दाख कर निकल लिए।

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