Wednesday, May 27, 2026

पोस्ट ऑफिस में कुछ घंटे

कल पोस्ट ऑफ़िस जाना हुआ। एक चिट्ठी भेजनी थी कानपुर। घर के पास कई कोरियर की दुकानें हैं लेकिन सोचा कि देखें यहाँ का पोस्ट ऑफिस कैसा है।

पोस्ट ऑफ़िस की बात सोचते ही पोस्टमैन की याद आती है। देश के बड़ी आबादी हाईस्कूल में पोस्टमैन का निबंध लिखकर पास हुई है। आज अगर पोस्टमैन पर निबंध लिखकर इम्तहान पास करने वाले मिलकर पार्टी बना लें तो आराम से देश में न सही तो किसी प्रदेश में आराम से अपनी सरकार बना सकते हैं।

आशियाना पोस्ट ऑफिस छुटकी सड़क पर था। नुक्कड़ पर एक छुटके से कमरे में बना पोस्ट ऑफिस देश के अतीत का गौरव गान करता सा था लगा। तसल्ली से चलता पंखा। उससे भी तसल्ली से चलता कंप्ट्यूर। पोस्ट ऑफिस हालाँकि आनलाइन है। सारा काम कम्प्यूटर पर होता है। लेकिन बुजुर्ग कम्यूटर धीरे बहुत आहिस्ते चलते दिखे। जरा सा चलते हाँफ जाते। हमारे आगे चार लोग लगे थे। काफ़ी देर वे आगे ही लगे रहे। स्पीड पोस्ट की इंट्री कछुआ चाल से हो रही थी। लाइन में खड़े-खड़े सोचा कि जितनी देर में चार लोगों की इंट्री होती है उतनी देर में तो कानपुर में ख़ुद जाकर चिट्ठी थमा आते। काउंटर पर एक महिला और एक पुरुष थे। महिला युवा,पुरुष बुज़ुर्गियत की तरफ़ कदम बढ़ाता। गोल गले का कुर्ता पहने महिला के कान में छोटा सा कुंडल देखकर मन किया पूछें कि यह प्रधानमंत्री के आह्वान के बाद तो नहीं खरीदा। लेकिन फिर नहीं पूछा। न पूछने का कारण महिला का मुस्कराता चेहरा और उसके बाक़ी गहने ग़ैर सोने के बने होना था। हम कोई सोने के बारे में सवाल पूछते तो क्या पता वह असहज हो जाती। उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो जाती।

बुज़ुर्गियत की तरफ़ बढ़ता पुरुष हाथ में मोबाइल लिए कुछ करने में मशगूल था। एक ग्राहक ने पैसा जमा करने की बात कही तो उसने कहाँ -'अभी डाक बाटने गए हैं पोस्टमैन साहब। वे आयेंगे तब जमा करेंगे पैसा।' पोस्टऑफिस में बिकने वाले सामान के दाम की लिस्ट लगी थी। मेघदूत पोस्टकार्ड के दाम 25 पैसे लिखे थे। 25 पैसे के सिक्के (चवन्नी) को देखें जमाना हो गया। 30 जून 2011 से इसे वैध मुद्रा के रूप में बंद कर दिया गया है। जो मुद्रा वैध नहीं उसमें खरीदारी कैसे होगी? बिना आनलाइन ख़रीद के ऐसा शायद संभव न हो। पोस्टकार्ड इसीलिए शायद चलन से बाहर हो गए हैं। हमने खरीद के लिहाज से पूछा तो पता चला कि पोस्टकार्ड अब सिर्फ़ मुख्य डाकघर में मिलते हैं। सामान्य पोस्टकार्ड पचास पैसे का है। वह भी मुख्य डाकघर में ही मिलता है।

हमारे आगे लाइन में लगे भाई साहब को भी स्पीड पोस्ट करनी थी। उनकी इंट्री आधी हुई थी कि बिजली चली गई। साथ ही कंप्यूटर भी बिजली के साथ ही चला गया। बिजली से कम्प्यूटर का बड़ा याराना है। बिजली भले कम्प्यूटर की परवाह न करे लेकिन कंप्यूटर बिना बिजली के नहीं चलता। एकतरफा याराना है कम्प्यूटर का बिजली से। केवल कम्प्यूटर ही नहीं पंखा, बत्ती और कई चीजें बिजली से एकतरफा प्रेम करते हैं। बिजली जाने के बाद कंप्यूटर बंद हो जाने पर ग्राहक लोग ज्ञान वर्षा करने लगे। यूपीएस होना चाहिए, कम्यूटर नया होना चाहिए जैसी ग्राहकोचित बयान जारी करने लगे। महिला और पुरुष इन बयानबाजी से निर्लिप्त बिजली आने का इंतजार करते रहे। काउंटर के बाहर रखी बैटरी और दीगर सामान इस बात का इशारा कर रहे थे कि कभी वहाँ यूपीएस भी रहा होगा। अब वह मार्गदर्शक मंडल में शामिल होकर आपने बिकने का इंतज़ार कर रहा था।

मुख्यमंत्री जी ने शहरों में चौबीस घंटे और गांवों में 18 घंटे बिजली उपलब्ध कराने का आदेश दिया है। लेकिन उनके आदेश स्थल से कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही बिजली बिना बताये ग़ायब हो गई। बिजली को अदृश्य होने का फ़ायदा मिला। दृश्यमान होती तो इस हरकत पर उस पर बुलडोजर चल गया होता। बिजली को शायद मुस्लिम न होने का फ़ायदा भी मिला। वैसे भी बुलडोजर चलाना और बिजली बजाना अलग तरह के काम हैं। निर्माण और ध्वंस में हमेशा अंतर होता है।

बिजली जिस तरह बिना बताये गई थी उसी तरह बिना बताये आ भी गई। हमें लगा काम बिजली की गति से आगे बढ़ेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। काउंटर पर बैठी महिला ने बताया -'पंद्रह मिनट लगेंगे कम्प्यूटर को शुरू होने में। इसके बाद ही इंट्री होगी।'

बिजली आने के पंद्रह मिनट बाद कम्यूटर की साँसे वापस लौटीं। इंट्री शुरू हुई। इंट्री होने के बाद स्पीड पोस्ट की पर्ची निकली। चार इंच लंबी, दो इंच से कम चौड़ी पर्ची प्रिंट करते लाइन प्रिंटर लगातार किरकिराता रहा। शायद अपने काम का हल्ला मचा रहा था। उसके हल्ले का अनुवाद कर सकते तो शायद सुनाई देता -'देखो हमने यह पर्ची छापी है। हमसे पहले के किसी प्रिंटर ने यह काम नहीं किया होगा।' प्रिंटर चार इंच लंबी पर्ची छापने के लिए 12 इंच से ज़्यादा इधर-उधर टहलता रहा।

इस बीच लाइन में लफड़ा हो गया। बिजली जाने और वापस आने के बीच एक बुजुर्ग हमारे पीछे लाइन के बीच में शामिल हो गया। पहले से खड़े आदमी ने उसको टोंका तो उसने कहा -'मैं तुमसे पहले लाइन में लगा हूँ।' दोनों में पहले मैं, पहले मैं होने लगा। पहले से खड़े आदमी ने उदारवादी अंदाज़ में कहा -'आप मुझसे कहते कि जल्दी है तो मैं मना थोड़ी करता आपको आगे लगने से। लेकिन आप झूठ बोलकर आगे लग रहे हैं यह ग़लत बात है।'

हमें उसकी बात सुनकर ताज्जुब हुआ। आज जब देश-दुनिया के बड़े-बड़े लोग, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति बिना रुके लगातार पूरी बेशर्मी से झूठ बोलकर अपनी राजनीति चमकाते हुए सत्ता में बने हुए हैं तब लखनऊ के एक मोहल्ले में एक आदमी दूसरे आदमी के झूठ बोलने का बुरा मान रहा है। इस बात की कहीं किसी ने शिकायत ने कर दी तो मुझे डर है उसके यहाँ ईडी, सीबीआई न भेज दी जाये।उसके घर पर मिसाइल से हमला न कर दिया जाये। कोई एंकर पाकिस्तानी बताते हुए उसके देशनिकाले का आह्वान न कर दे।

लाइन में झूठ बोलकर आगे लगने की बजाय पूछकर आगे लगने की बात से मुझे गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में मोहसिना (हुमा कुरैशी) और फैजल खान (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) के बीच का रोमाटिंक सीन याद आ गया जिसमें मोहसिना फैजल ख़ान को बिना पूछे उसके हाथ पर अपना हाथ रखने पर कहती है -" बिना पूछे आप हाथ कैसे रख दिए मेरे हाथ पर। पूछ के रखिए हाथ, कोई मना थोड़ी है। लेकिन परमिशन लेनी चाहिए न।" बाद में कुछ लोगों ने बुजुर्ग के लाइन में अनिधकृत प्रवेश की पुष्टि की तो वह नाराज होकर लाइन से त्यागपत्र देकर कहीं और चला गया। किसी ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। काउंटर पर इंट्री करती हुई महिला यह सब वार्तालाप मुस्कराते हुए सुनती रही। हम उसे मुस्कराते हुए देखते रहे। वह बिना मुस्कराते हुए कुछ अधिक ख़ूबसूरत लग रही थी।

मुस्कराते हुए लोग हमेशा ख़ूबसूरत लगते हैं। आप भी लगेंगे। हमारी बात पर भरोसा करिए। पक्का लगेंगे। खूबसूरत।

मुस्करा तो काउंटर पर बैठा बुज़ुर्गियत की तरफ़ बढ़ता पुरुष भी रहा था। लेकिन उसकी मुस्कान उतनी खिलकर दिख नहीं रही थी। क्योंकि एक तो वह सर झुकाकर मुस्करा रहा था। उसका ध्यान मोबाइल पर था। उसका आधा ध्यान मोबाइल में था इसलिए वह पूरा मुस्करा भी नहीं रहा था। उसकी आधी मुस्कान का बड़ा हिस्सा भी मोबाइल में चला जा रहा था। बची हुई मुस्कान का बड़ा हिस्सा उसकी बढ़ी हुई खिचड़ी दाढ़ी में उलझ जा रहा था। मुस्कान दाढ़ी से बाहर आते हुए सहम सी रही थी जैसे कोई बालिका किसी कँटीली झाड़ियों के बीच से गुजरते हुए अपने कपड़े काँटों में उलझने से बचाते हुए निकलती होगी उसी तरह उसके चेहरे से मुस्कान सहमती सी निकल रही थी। इसीलिए कम खूबसूरत लग रही थी।

बिजली आने के बाद कंप्यूटर ऑन होने की प्रक्रिया में लगे समय के बीच हमने महिला से अनुरोध किया कि वह स्पीड पोस्ट का पैसा ले ले। लेकिन उसने लिया नहीं। बोली -'इंट्री हो जाये तब लेंगे। पता नहीं इंट्री हो या न हो।'

इस बीच बिजली और कम्प्यूटर की धीमी गति पर अपनी राय हाजिर करते हुए एक ग्राहक ने कहा -'सरकार बीएसएनएल और पोस्ट ऑफिस दोनों को बर्बाद किये है। पोस्ट ऑफिस में बाबा आदम जमाने का कंप्यूटर रखें है। इतना धीमा सर्वर। हद्द है।'

उस ग्राहक द्वारा सरकार का विरोध सुनकर हम सहम गए। हमें लगा कहीं सरकार ने सुन लिया तो ग़ज़ब हो जाएगा। हमारे ऊपर भी कहीं कार्रवाई न हो जाए यह कहते हुए -'तुमने सरकार की बुराई की भले न हो लेकिन सुनी तो।' सरकार की निंदा के अपराध में भागेदारी तो बनती है।

हमने सरकार की बुराई करने वाले ग्राहक की तरफ़ वाला अपना कान कसकर बंद कर लिया और पूरे ध्यान से अपना काम करती महिला को देखते रहे। वह काम में जुटी रही। बिजली जाने, कम्प्यूटर पुराना होने, यूपीएस न होने के भड़काऊ बयानों से बिना प्रभावित हुए। शायद इसी को स्थितिप्रज्ञ स्थिति कहते हैं।

आख़िर वह शुभ मुहूर्त भी आया जब लाइन प्रिंटर ने मेरा स्पीड पोस्ट का रसीद किरकिराते हुए छापकर दे दिया। महिला ने मेरा मोबाइल अपने हाथ में लेकर अपने पास सुरक्षित रखें स्कैनर को स्कैन करके 55 रुपए भुगतान करने को कहा। हमने बिना मोलभाव किए भुगतान कर दिया। उसने हमें रसीद थमा थी। हमने रसीद ध्यान से देखी। इसके बाद काउंटर पर बैठे बुज़ुर्गियत की तरफ़ कदम बढ़ाते मोबाइल में डूबे पुरुष को देखा और अंतत: महिला को देखते हुए पोस्ट ऑफिस के छटके कमरे से बाहर आ गए।

बाहर आकर एक बार फिर पोस्टमैन का निबंध मन ही मन दोहराया :

"पोस्टमैन एक सरकारी कर्मचारी होता है। वह खाकी यूनिफॉर्म पहनता है। साइकिल पर चलता है। वह दरवाज़े-दरवाज़े जाता है।" पूरा निबंध मन में दोहराते हुए सोच रहे हैं कि क्या अब भी पोस्टमैन का निबंध स्कूलों में याद कराया जाता है? आपको याद है पोस्ट मैन पर निबंध?

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