Can't See Hindi? Looking at total Garbage?

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फ़ुरसतिया

Thursday, January 06, 2005

अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है

ठेलुहा नरेश ठेलुहों के बारे में कहते हैं:-

एक ढूढ़ो हजार मिलते हैं,
बच के निकलो टकरा के मिलते है.

ऐसे ही अतुल टकरा गये एक पागल आदमी से(वो खुद कहता है यह- हम नहीं).पूछा-तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं?अब वह बता ही नहीं रहा कि अतुल क्या करें.बहुत नाइंसाफी है.

अतुल ने अपनी बात रखी तुरंत कि कहीं फिर देरी का इल्जाम न लगा दे कोई.चौपाल पर रखी ताकि सब सुन सकें. रोजनामचा में इसे देख कर कितने दोस्त दुश्मन बनेगे कह नहीं सकता-यह पढ़कर लगा कि अतुल का मुंहफटपन कितना समझदार है.पत्नी की सलाहों का असर है लगता है.

ब्लागमेला मैंने जब देखा था तो मैंने भी काफी सोचा था.मुझे याद आयी थी अतुल की मेल जिसमें हिंदी के छा जाने का जिक्र था.फिर कुछ दिन हम श्रद्घापूर्वक सारे हिंदी के चिट्ठों का नामांकन करते रहे.अतुल ने अगर कुछ लिखा तो जरूर नामांकन कराया-सबसे पहले .जीतेन्द्र भी ज्यादा पीछे नहीं रहते रहे.मैं लगभग अंत में जितने बचे ब्लाग होते थे उनका नामांकन कर देता था.

ब्लागमेला का फायदा यह मिला कि हमें शायद कुछ पाठक मिले.कुछ कलियां फूटीं.मेरा ख्याल है स्वामीजी जैसे साथी भी वहीं से हिंदी के चिट्ठे देखकर लिखने लगे.जो टिप्पणियां हैं वे खिन्न करने वाली हैं.इस लिहाज से अतुल का गुस्सा जायज है.पर गुस्से का अंदाज बता रहा है कि जैसे मिर्ची अतुल के ही लगी है और वही पूंछ रहे हैं-तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं.

भाई अतुल,यह पहली घटना नहीं है.इसके पहले भी एक शहजादी के नखरे हम देख चुके हैं.कुछ सूत्रवाक्य मेरा हमेशा साथ देते हैं.उनमें से एक है-जिसके जितनी अकल होती है वो उतनी बात करता है.तो जितनी अकल इनकी थी वैसी ही बात की इन्होंने.इसमें अपना खून काहे जलाते हो?फिर एक-दो लोग अगर बेवकूफी की बात करें तो सारी बिरादरी थोड़ी बेवकूफ हो जाती है.आगे किसी का कमेंट भी है-यह जानकारी दिलचस्प है कि हिंदी एक क्षेत्रीय भाषा है.लगता है कि कुछ ज्यादा ही आशा हम लगाये रहे ब्लागमेला से.तभी यह बात झटके की तरह लगी.

बहरहाल अतुलभाई,यह मानते हुये भी कि सारे अंग्रेजी ब्लागर सिरफिरे नहीं हैं,मैं तुम्हारी बात का समर्थन करता हूं और ब्लागमेला मेला में नामांकन बंद.किसी अंग्रेजी ब्लाग पर टिप्पणी न करना -यह बात ठीक नहीं लगती. इतना गुस्सा ठीक नहीं.थूक दो पिच्च से.बायीं तरफ.गुस्सा कमजोर आदमी का काम है.गांधीजी भी तो कहे हैं-पाप से घृणा करो,पापी से नहीं.बापूजी की बात मान लो. गुस्सा कमजोर आदमी का काम है .फिर अपने देवाशीष,पंकज,रवि,जीतेन्द्र,शैल,रमन,काली,स्वामी वगैरह के अग्रेजी ब्लाग भी तो हैं.मान जाओ.न हो तो श्रीमतीजी से सलाह ले लो.वे जरूर बतायेंगी कि हम ठीक कह रहे हैं.उनकी सहज बुद्धि पर हमें भरोसा है.

यहां तक तो बात मिर्ची लगने तक थी.अब जो यह मिर्ची लगी उसका किया क्या जाये?

भारतीयब्लागमेला(वर्तमान) का उपयोग तो सूचनात्मक/प्रचारात्मक होता है.किसी चीज को पटरा करने के दो ही तरीके होते हैं:-

1.उसको चीज को टपका दो(जो कि संभव नहीं है यहां)

2.बेहतर विकल्प पेश करो ताकि उस चीज के कदरदान कम हो जायें.

चूंकि हिंदी में ब्लाग कम लिखे जाते हैं अत:केवल हिंदी के लिये ब्लागमेला आयोजित करना फिजूल होगा.हां यह किया जा सकता है कि सभी भाषाओं के ब्लाग की साप्ताहिक समीक्षा की जाये.जो नामांकन करे उसकी तो करो ही जो न करे पर अगर अच्छा लिखा हो तो खुद जिक्र करो उसका और उसे सूचित करो ताकि वो हमसे जुड़ाव महसूस करे.तारीफ ,सच्ची हो तो,बहुत टनाटन फेवीकोल का काम करती है.है कि नहीं बाबू जीतेन्दर.तो शुरु करो तुरंत ब्लागमेला.

दूसरी बात ब्लागमैगजीन शुरु करने की है.इसे अविलंब शुरु किया जाये.तकनीकी जानकारी हमें नही है पर लगता है कि ज्ञानी लोग लगे हैं.जितनी जल्द यह हो सके उतना अच्छा.शुभस्य शीघ्रम.तारीख तय करो.26जनवरी या बसंतपचमी(निराला जयंती)तक हो पायेगा?कुछ बोलो यार अतुल,पंकज,देबू,जीतू तथा देवाधिदेव महाराज इंद्रकुमारजीअवस्थी.ब्लागजीन में भी चिट्ठाचर्चा हो सकती है.

झटकों में ऊर्जा होती है.उसका सदुपयोग किया जाना चाहिये.बात बोलेगी हम नहीं.ऐसे अवसर बार-बार नहीं आते.पता नहीं अगली मिर्ची कब लगाये कोई.

पंकज ने मेरा नामांकन भी किया.इस मुरव्वत के लिये हम धन्यवाद भी न दे पाये.हम वह कैटेगरी खोजते रहे जिसके लिये नामांकन किया गया.बहरहाल अब हम शुक्रिया अदा करते हैं पंकजजी का.ज्यादा देर तो नहीं हुयी पंकज भाई!

हिंदी चिट्ठाजगत अभी शुरुआती दौर में है.आगे फले-फूलेगा.मैं सोचता हूं कि हिंदी का जितना साहित्य नेट पर लाया जा सकता है वह ले आया जाये. सूर,कबीर,तुलसी से शुरु करके.कैसे कर सकते हैं -बतायें ज्ञानीजन.

अतुल की देखादेखी मुझे भीसंस्मरन लिखास हो रही है.इंजीनियरिंग कालेज में थे तो हम तीन लोग साइकिल से भारतदर्शन करने गये थे.तीन महीने सड़क नापी.डायरी खोज के हम भी लिखना शुरु करते हैं-जिज्ञासु यायावर के संस्मरण.

मेरी पसंद

अंगारे को तुमने छुआ
और हाथ में फफोला नहीं हुआ
इतनी सी बात पर
अंगारे पर तोहमत मत लगाओ.

जरा तह तक जाओ
आग भी कभी-कभी
आपद्धर्म निभाती है
और जलने वाले की क्षमता देखकर जलाती है.

--कन्हैयालालनंदन


3 Comments:

  • At 9:03 AM, Anonymous Anonymous said…

    भलाई, बधाई, और शुक्रिया हर समय अच्छी लगती है। लो हम फूल के कुप्पा हुए जाते हैं।

     
  • At 12:54 AM, Blogger Jitendra Chaudhary said…

    कविता तो बहुत जोरदार है,
    चिट्ठा दो बार पढ चुका हूँ, अभी पूरा मतलब निकालने की चेष्टा कर रहा हूँ.
    सफलता मिलने पर दोबारा टिप्पणी करूंगा.

     
  • At 10:34 PM, Blogger Jitendra Chaudhary said…

    अब करना क्या चाहिये, वो सिलसिलेवार मै गाँव की चौपाल मे बोल चुका हूँ.
    क्रान्तिकारी कदम उठाने के लिये गांव के बुजुर्गो ने मना कर दिया है, इसलिये चन्द्रशेखर आजाद वाला काम बन्द. अब बचा सिर्फ कूटनीति का रास्ता. तो भइया मीठी छुरी से ही काम चलाना पड़ेगा. लेकिन अगर यही गाना गाते रहोगे कि "तेरी गलियो मे रखेंगे कदम..आज के बाद" , तो भइया आगे कैसे निभाओगे.

    अब रास्ता बचे है, अपना पाठक गण बढाओ, तो भइया, हम तो लगे हुए है अपनी तरफ है, कुवैत की जनता को पकड़ पकड़ ब्लाग पढवाते है. अब थोड़ा आप लोग भी मेहनत करो, अपने अच्छे से आकर्षक बैनर बना कर दो, जिससे हम अपने सभी पन्नो पर चिपकायें ताकि जनता इधर से उधर भी आये जाये.

    बाकी अतुल का गुस्सा तो उतर गया है, अब तो चाय नाश्ते का इन्तजाम मे लगा है, ना मानो तो गाँव की चौपाल पर देख लो.

     

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