Saturday, July 16, 2005

बदरा-बदरी के पिछउलेस


लू के थपेड़ों से आहत ,बिजली के वियोग में विरहाकुल ,सूखा-राहत घोटाले की खबर वाले अखबार को अंपायर डेविड शेफर्ड के ‘चउआ’ वाले अंदाज में लहराकर पसीना सुखाते हुये कविवर चकाचक बनारसीकी नज़र अचानक आसमान की तरफ गई तथा उनका मन-मयूर नृत्य करने लगा। लुगाई पूछिस – का हो रउआ ! केकरा के देखके चमकत बाटी? चकाचक बनारसी बोले-
बदरा-बदरी के पिछउलेस,
सावन आयल का!
खटिया चौथी टांग उठइलेस,
सावन आयल का!
(बादल ने बदली का पीछा किया ,खटिया ने अपना चौथा पैर उठा लिया लगता है सावन आ गया)बादल और बदली चूंकि दोनों काले थे अत: इस बात का कोई खतरानहीं रह गया था कि बदली चिट्ठा लिखेगी ये मुआकलुआ मुझे छेड़ रहा था। वो छेड़ने लगा ,ये छिड़ने लगी। गर्मी बिछड़ने लगी।झमाझम बारिश होने लगी।बादल जब बरसते-बरसते हांफने लगा तो काम पर लगा दिया बरखा रानी को:-
बरखा रानी जरा जम के बरसो!
पानी बहुत देर तक सुकूनदेह विदेशी पूंजी सा खुशनुमा अहसासदेता रहा। फिर उसने छत पर व्यवस्था की दरारें टटोल लीं। उनके माध्यम से घर में दाखिल हो गया। सारा देशी ताम-झाम अस्तव्यस्त कर दिया। अपने घर में ही हम अपने रहने की जगह तलाशने लगे। उधर सन्नी देओल कह रहे थे-बनना है तो बनो अंदर से स्ट्रांग, पहनो लक्स कोजी बनियान । पता नहीं कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देश अपनी-अपनी अर्थव्यवस्था को लक्स-कोजी बनियान क्यों नहीं पहना देते।
शहर में जब भी पानी बरसता है सड़कें भर जातीं हैं। मिट्टी पहले ही मौजूद रहती है। दोनों के संयोग से जो दिव्य पदार्थ बनता है वह कीचड़ के नाम से जाना जाता है। पहले सड़कों के किनारे नालियां पायीं जाती थीं। अब वे सारी नालियां हड़प्पा संस्कृति का अंग हो गयीं हैं। फुटपाथ तथा सड़क का सीधा संबंध स्थापित हो गया है। कुछ वैसे ही जैसे ‘एमवे’ पदार्थ की बिक्री में उत्पादनकर्ता तथा उपभोक्ता की हाटलाइन जुड़ी होती है। लगभग सारी सड़कें बरसात के ऐन पहले अपना मेकअप बजरी -तारकोल से करती हैं। बरसात बीतते -बीतते यह मेकअप भी पुछ जाता है। नेताजी वैसे भी कहते हैं कि सड़के हेमामालिनी के गाल जैसी बनवायेंगे।ये बारिश का मौसम कुछ शूटिंग टाइप का होता है जिसमें सड़कें हीरोइनों की तरह मेकअप करती हैं। शूटिंग खतम-मेकअप हजम।असल में सड़कें भी स्वाभाविक रहना चाहती हैं। बारिश का आगमन उनके लिये अतिथि का आगमन होता है। तब दिखाने के लिये बजरी का मेकअप करती हैं। बरसात गयी, बजरी की बात गयी। मेहनतकश सड़क के चेहरे पर गढ्ढे उभर आते हैं।
सड़क तथा गढ्ढों का बहुत पुराना याराना लगता है। अटलबिहारीजी कहा करते हैं-यहां पता नहीं चल पाता कि सड़क पर गड्डा है या गढ्ढे में सड़क है।कुछ इलाकों में तो पानी इतना भर जाता है कि थोड़ा प्रयास करके साल भर की जरूरत भर का पानी इकट्ठा किया जा सकता है। तरणताल बनाने की सोची जा सकती है। अब सरकार से कोई उम्मीद करना तो ठीक नहीं लिहाजा जनता जागरूक हो रही है। जागरूक जनता प्रयास करती है कि शहर को जो पानी वरूण देवता ने इनायत किया वह कहीं गलती से बच गयी नालियों में न चला जाये। इसके लिये लोग यथा संभव प्रयास करते हैं कि नालों तक पानी को ले जाने वाली नालियों का समय रहते संहार कर दिया जाये। इस सद्प्रयास के चलते ऐन नालियों के ऊपर निर्माण कराना पड़ता है उन्हें। पहचान बनी रहे इसलिये निर्माण में नालियों की ईंटोका प्रयोग करने के बाद ही ईंट के भट्टे का पता पूछते हैं। नालिंयों के संहार के बावजूद कुछ राणा सांगा टाइप नालियां बची रहती हैं जो सैकड़ों झटके खाने के बावजूद आजादी का झण्डा फहराती रहती हैं। ऐसी सिरफिरी नालियों का मुंह बंद करने के लिये मलबे तथा मोमियां (पालीथीन) की खुराक उनको नियमित दी जाती है। मोमिया चूंकि सड़क पर घूमती गाय भी खाती हैं आनन्दातिरेक से ,लिहाजा नालियां भी संकोच नहीं करतीं इस प्रसाद को ग्रहण करने में। जैसे ही वे इसे ग्रहण करती हैं उनका मुंह बंद हो जाता है।
ऐसा नहीं कि बारिश में सबकुछ बंद ही हो जाता है। कुछ जगहें हैं जो हर मौसम में बाहें खोले आपको अपने पहलू में समा लेने को आतुर होती हैं।जब सड़क के किनारे की नालियां पानी तक को अपने दिल में जगह देने से इंकार कर रही होती हैं तो इन्ही निष्ठुर नालियों से चंद कदम दूर कुछ जगहें अपना दिल हाथियों तक के लिये खोल के रखती हैं। इन दरिया दिल जगहों को लोग मेनहोल के नाम से जानते हैं। पहले इनके मुंह बंद रहा करते थे। अब अर्थव्यवस्था की देखादेखी ये भी मुक्त हो गये हैं। लोहे के गोल ढक्कनों से इन मेनहोलों की मुक्ति दिलाने वालों में ,दम मारो दम का नारा लगाने वाले बेदम टाइप ,हिप्पी समुदाय के लोगों का खासा योगदान है। बंधन के प्रतीक इन लोहे के ढक्कनों को ये लोग कौड़ियों के भाव बेच देते हैं तथा पायी गयी कौड़ियों को पाप का धन समझकर तुरंत ठिकाने लगाने के लिये जिस कालकूट का सेवन करती है उसे दुनिया स्मैक के नाम से जानती है। भारत की पुलिस अगर किसी चीज से डरती है तो इन क्रान्तिकारी स्मैकियों से। ये ऐसे मेहमान हैं जिनका रखरखाव करने में पुलिस बेहद बिखर जाती है।
यह बारिश का मौसम ही कुछ ऐसा है लोगों को बेईमान बना देता है। ‘आने वाला फिर कोई तूफान है’ सुनकर ऐसा लगता है कि तूफान शायद विश्व बैंक की कोईसहायता राशि है जिसके आगमन पर स्वागत गीत गाया जा रहा है। मन की बेईमानी की इंतहा हो जाती है जब लोग पत्नी में माशूका की देखने लगते हैं। सारे पेड़ कट जाने के बावजूद बालिकायें झूला-गीत गुनगुनाने लगती हैं। हमारे एक मित्र जो बोलने तक में शरमाते हैं अपने को वर्षा की बूंदों से सुरक्षित करके बच्चों को समेट के(खुद के कान बंद करके ) गुनगुनाने लगते हैं:-
“…मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज की कस्ती ,बारिश का पानी।”
हम बोले -काहे भइया अंदर बैठ के रो रहे हो। वैसे ही पानी घर में घुस रहा है तुम नयननीर से बाढ़ की आशंका काहे बढ़ा रहे हो ? बाहर बारिश में भीगते हुये गाओ। वे बोले -यार ,मन तो बहुत कर रहा है पर सबेरे आफिस जाना है।छुट्टियां खतम हो चुकी हैं। कहीं ज्यादा भीग गया तो कल आफिस जाने में लफड़ा होगा।
पर लफड़ा कहां नहीं है? गंगा बैराज जो बना था पानी की उपलब्धता तथा बाढ़ को रोकने के लिये वह ढहने का मूड बना रहा है। पतित पावनी गंगा लगता है अब भरोसे लायक नहीं रहीं। पांच करोड़ रुपये का घपला नहीं सह पायीं। थोड़ी मिट्टी कम पड़ी तो इसका मतलब यह थोड़ी कि अपनी धारा ‘ रिवर्स स्वीप ‘ की तरह मोड़ दो और सारे घाटों तथा कटरी के गांव डुबो दो। जब गारन्टी पीरियड में यह हाल है मैया तो आगे क्या गुल खिलाओगी? बाढ़ में बहा दिया ,गर्मी में सुखा दोगी। आपको यह व्यवहार शोभा नहीं देता । करना न पड़ गया सस्पेंड बिचारे मुख्य अभियंता को महजपांच करोड़ रुपये के लिये।इतना जरा सा घपला नहीं हजम कर पायीं। बहुत कमजोर है आपका हाजमा। आपको तो स्ट्रांग बनना पड़ेगा।अगर आपको भी बनना है तो अंदर से बनो स्ट्रांग,पहनो लक्स कोजी अंडरवियर -बनियान।

3 responses to “बदरा-बदरी के पिछउलेस”

  1. sanjay vidrohi
    फ़ुरसत से आपको पढा… मजा आ गया..
    -सँजय विद्रोहि
  2. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] बाल गिरते क्यों हैं? [...]
  3. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] बाल गिरते क्यों हैं? [...]

Post Comment

Post Comment

No comments:

Post a Comment

Google Analytics Alternative