Thursday, April 06, 2006

ईश्वर की आंख

http://web.archive.org/web/20140419161327/http://hindini.com/fursatiya/archives/118

ईश्वर की आंख

छत पर चहलकदमी करके नीचे आये तो देखा कि टीवी पर हल्ला मचा था। मुंबई में किसी माडल का ‘बिल्ली भ्रमण’ करते हुये कोई कपड़ा चू गया होगा। माडल ने,जैसा कि होता है,पूरे आत्म विश्वास से अपना कैट-वाक पूरा किया। इसके बाद फिर जैसा होता है वही हुआ-कुछ भारतीय संस्कृति की चिंता करने वालों की मांग पर सारे मामले की जांच कराई गयी।जांच में भी जैसा होता है कुछ निकला नहीं। इसके बाद फिर वही हुआ जैसा कि होता है-दुबारा जांच के आदेश हुये हैं। पहली जांच के विवरण पता नहीं चले कि कैसे जांच हुई लेकिन सहज मन से अनुमान लगा सकता हूं कि सजग जांच अधिकारी की तरह शायद माडल के कपड़े फिर से गिरवा के देखे जायें।
जो भी हो लेकिन लग यही रहा है कि अब तो सारी जांच होकर ही रहेगी।
जिस चैनेल पर माडल -वस्त्र-पतन-पुराण चल रहा है उसी के नीचे खबर आ रही है
मेधा पाटकर के अनशन का आठवां दिन है तथा उनकी हालत गंभीर हो रही है।
मेधा पाटकर सरदार सरोवर परियोजना के विस्थापितों के पुनर्वास के लिये संघर्षरत हैं। उनके बारे में चैनेल लगातार केवल फुटेज देकर काम चला रहा है। माडल के गिरे हुये कपड़े को दौपद्री के चीर की तरह खींच रहा है।

बीस साल के जनसंघर्ष पर बीस सेकेंड का माडल वस्त्र पतन हावी है।
हे भगवान ,क्या हो रहा है इस देश में!
जहां हमने हे भगवान, कहा भगवान का कोई भक्त हमारे  मेल बाक्स में भगवान से जुड़ी एक मेल धम्म से गिरा गया।
मेल भेजने वाले ने तमाम तरफ से भटक कर आयी मेल को हमारे पास भटकने के लिये भेजा था। बताया था कि सात मेल भेजो दूसरों के पास ताकि लोक-परलोक सुधर जाय।
 ईश्वर की आंख
मेल में बताया गया था कि नासा वालों ने भगवान की आंखे देखीं। ३००० सालों में यह नजारा पहली बार दिखता है।नासा वालों ने हबल दूरबीन से देखा तथा कहा भगवान की आंखे देख लो तथा कम से कम सात दूसरे लोगों को दिखाओ।
हम सोच ही रहे थे कि किन सात लोगों को मेल भेजी जाये कि हमें याद आया रमनकौल का लेख -चेन मेल की चेन खींचें। सो हमने सोचा मेल नहीं लिखना चाहिये।लेख लिखना चाहिये।सोचने में तो कुछ खर्च होता नहीं लेकिन लिखने में मेहनत लगती है लिहाजा फिर हम सोच रहे हैं क्या लिखें।
अब बात जब भगवान की आई तो हमने सोच में श्रद्धा की मिलावट भी कर ली। तथा हम भगवान के बारे में जुट गये पूरी मेहनत से सोचने में।
भारत की आबादी अगर सौ करोड़ के अल्ले-पल्ले मान लें तथा देवताओं की पुराने जनसंख्या रिकार्ड के अनुसार आबादी तैंतीस करोड़ मान लें (गजब का परिवार नियोजन है देव समुदाय का। गली-गली रोज नये-नये भगवान पैदा हो रहे हैं लेकिन रिकार्ड में सदियों से वही तैंतीस करोड़ हैं।)इस लिहाज से हिंदू धर्म के अनुसार हर भारतीय के हिल्ले एक तिहाई देवता आता है। या फिर एक देवता पर तीन आदमी।मतलब आम देवता को बाहुबली विधायक-मंत्री को मिलने वाली जेड कैटेगरी की सुरक्षा भी मुहैय्या नहीं।
अब यह समझ में नहीं आ रहा है कि देवता ने नासा में आंख क्यों दिखाई!दिखाई भी तो केवल एक आंख ही किसलिये दिखाई? क्या भगवान कानून  की तरह काना है(लोग कहते हैं कानून अंधा होता है लेकिन वह अंधा नहीं काना होता है-एक ही तरफ देखता है- हरिशंकर परसाई)।
हो सकता है वह नासा के माध्यम से अमेरिका को आंखे दिखा रहा हो -बस बहुत हो चुका।अब लोगों को तबाह करना बंद कर दो वर्ना शंकर भगवान की तीसरी आंख की सेवायें लेने पड़ेगीं।
संभव तो यह भी है कि अमेरिका (नासा) वाले भगवान से नैन-मटक्का कर रहे हों। दोनों प्रोटोकाल के लिहाज से बराबरी पर बैठते हैं। भगवान की लीला भी अपरम्पार है ,अमेरिका की भी।भगवान हनुमान को संजीवनी नहीं मिली तो पहाड़ उठा लाये । इधर अमेरिका भगवान से ईराक में पसीना बहाने के बाद जब दुनिया ने पूछा कि महाराज आप खोज क्या रहे हैं तो अमेरिकाजी ने महीनों बमबारी करते हुये बताया कि हम ये खोज रहे थे। जासूसों ने बताया था लेकिन जगह नहीं खोज पाये सो हमें अपने बम बरबाद करने पड़े।
लेकिन भगवान की आंखे तिरछी हैं। तिरछी हैं तो क्या भगवान नाराज हैं?
नाराज आंख से तो लाल चिंगारियां निकलती हैं। लेकिन भगवान की आंखें तो नीली हैं।ई कउन सा नया फैशन का गुस्सा है?
लगता तो यह भी है कि भगवान की आंखे फटी-फटी सी हैं। वे लगता है बहुत दुखी हैं इस बात से कि एक तरफ एक महिला अपनी सारी जिंदगी दूसरों के पुनर्वास में लगाने के बावजूद हासिये पर है वहीं चंद कपड़े गिराकर एक माडल की खबरें से सारे चैनेल उफना रहे हैं।
लग तो यह भी रहा है कि भगवान भी कम रागिया नहीं हैं। हो सकता है कि भगवान एक आंख से इधर अपनी लीला कर रहे हों तथा उधर दूसरी आंख से लोगों के ब्लाग पढ़ रहे हों।
आपको क्या लगता है?
मेरी पसंद

मेरी पसंद में तमाम कालजयी रचनायें दिमाग की लाइन में शराफत से शामिल होने को खड़ीं थीं लेकिन उन सबको धकियाकर  तुकबंदियों का  रेला की बोर्ड पर पसर गया है। बड़ी आफत है। खैर, पढ़ें- अगर मन करे:-
1.इधर
महिला माडल के कपड़े गिरे
उधर
मोबाइल का विज्ञापन करता माडल बोला
-ऐसी आजादी और कहां?
2.इधर
 ब्लागर बता रहे हैं-
 हमारा धर्म कैसा है
 उधर
 वो बाजार में चीख रहे हैं
 सड़े टमाटर !
 क्या हराम का पैसा है?

3.आशीष के
 पैर की चोट पर बंधी पट्टी ने
 अंदर लगे मरहम से पूछा
 कैसा लग रहा है
 कैसा तुमने सोचा था?
 मरहम कांखते हुये बोला
 हां, तुम बिल्कुल वैसी हो
 जैसा मैंने सोचा था।

4.ब्लागर की शानदार पोस्ट पर जानदार
 टिप्पणी लिखने के लिये
 की बोर्ड पर हाथ चलाते हुये
 निगाह ब्लाग के उपरी हिस्से पर पड़ी
 मच गई जवाब देने की हड़बड़ी
 मुहावरा लिखने में कुछ हो गयी गड़बड़ी
लिख गया-
कूड़ा तो नहीं लेकिन कूड़े की कसम
जो लिखा है आपने
वो कूड़े से कुछ कम नहीं।

5.प्रियतम निकला अकड़कर ,पुलिस ले गयी थाने
रंग चुराकर लोगों का ,बनते हो बहुत सयाने ।
होली भी अब बीत गयी है,वापस कर दो रंग,
मार पडे़गी वरना इतनी ,चेहरा हो जायेगा बदरंग
प्रियतम ने तब घबरा करके, किया था टेलीफून
जल्दी मुझको छुड़वा लो तुम,खिसक रही पतलून
रंग रखा था मैंने घर में बस अप्रैल फूल बनाया था
बच गये बच्चू कहकर मुच्छड़ ठुल्ला मुस्काया था।

8 responses to “ईश्वर की आंख”

  1. Raman Kaul
    जैसे हर चेन का तोड़ होता है, आप की चेन का तोड़ यह रहा
  2. Amit
    अब यह समझ में नहीं आ रहा है कि देवता ने नासा में आंख क्यों दिखाई!दिखाई भी तो केवल एक आंख ही किसलिये दिखाई? क्या भगवान कानून की तरह काना है
    आम धारणा के विपरीत, हिन्दु पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवता लोग भगवान नहीं होते। ईश्वर एक है, देवता कई हैं। देवता तो महज़ एक समुदाय है, मालिक तो कोई और है। जिस तरह कर्मचारी कई होते हैं, आफ़िसर कई होते हैं, पर टॉप बॉस एक ही होता है, ठीक उसी तरह!! ;)
  3. आशीष
    भैया ,
    यहां हमे लडकिया सैंडले मार रही है और आप हमारे जख्मो पर मरहम की बजाये कविता रूपी नमक छिडक रहे हो :-(
    हे तैंतीस करोड देवताओ मेसे मेरे हिस्से के एक तिहाई भगवान कहां हो तुम ?
    वैसे ताजा खबर ये है, कि आज मेरी कंपनी मे एक कार्यक्रम है जिसमे एक विज्ञापन प्रतियोगीता है. और् हम विज्ञापन कर रहे है divorce.com (Let’s make the life better)का.
    एक बेचारा क्वांरा
  4. रवि
    भाई, जिसे हिन्दी देखना हो, और आप उसे जबरिया अंग्रेज़ी दिखाओगे तो वो तो कूड़ा ही हुआ ना?
    वैसे, कुल मिलाकर ब्लॉग पोस्टें कूड़ा ही हुआ करती हैं , और उसमें मेरे लिखे पोस्ट भी शामिल हैं …:)
  5. प्रतीक पाण्डे
    अन्तरिक्ष की अथाह गहराई में अकेली लटकी भगवान् की एक आँख क्या करेगी, जब मीडिया वालों की दोनों आँखें भी यह नहीं देख सकतीं कि क्या दिखाने लायक है और क्या नहीं? वैसे भी क्या मालूम ये भगवान् की आँख है या फ़ोटोशॉप की?
  6. समीर लाल
    “बीस साल के जनसंघर्ष पर बीस सेकेंड का माडल वस्त्र पतन हावी है।”..क्या बात कही है, वाकई कितनी बडी विडंबना है.
    समीर लाल
  7. फ़ुरसतिया » जरूरत क्या थी?
    [...] बहरहाल अनूप भार्गव ने चलते-चलते कहा कि ई-कविता के स्तर को थोड़ा नीचे लाने के लिये एकाध चलताऊ तुकबंदी मैं भेजूं। मैं सोच रहा था कि मैं तो अच्छे लेखक का भ्रम पाले हूं। घटिया रचना कहां से लाऊं? लेकिन तब तक रवि रतलामी जी ने हमारी दुविधा दूर कर दी ,यह बताकर कि कुल मिलाकर ब्लॉग पोस्टें कूड़ा ही हुआ करती हैं। लिहाजा यह कूडा़/कविता अनूप भार्गव की मांग पर तथा हुल्लड़ मुरादाबादी की ‘अहा! जिंदगी’ पत्रिका के  होली अंक में छपी कविता जरूरत क्या थी से प्रेरणा लेकर लिखी जा रही है:- सच है कि ब्लाग में कूड़ा ही लिखते हैं अधिकतर लोग लेकिन यह सच सबको बताने की जरूरत क्या थी? [...]
  8. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.ईश्वर की आंख 2.जरूरत क्या थी? 3.मेरे जीवन में धर्म का महत्व 4.वीर रस में प्रेम पचीसी 5.मिस़रा उठाओ यार… 6.कुछ इधर भी यार देखो 7.भैंस बियानी गढ़ महुबे में 8.अरे ! हम भँडौ़वा लिखते रहे …. [...]

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