Sunday, June 03, 2007

फुरसतिया खाली भये छाप दिहिन अखबार…

http://web.archive.org/web/20140419215759/http://hindini.com/fursatiya/archives/284

फुरसतिया खाली भये छाप दिहिन अखबार…

जनता जनार्दन की जय हो।
अपने प्रेमी पाठक समुदाय की इच्छा के अनुसार ‘फुरसतिया टाइम्स’ का दूसरा अंक आपके सामने है। हम खाली हुये और अखबार निकाल दिये-
फ़ुरसतिया खाली भये छाप दिहिन अखबार,
खुद तो बैठे मौज से दुखिया सब संसार।
दुखिया सब संसार कि हंसने से डरते लोग
हंसने केवल मात्र से, भाग जायें सब रोग।
हंसत-हंसत रहिये सदा, दुख को न डालो घास
घोड़े, खच्चर खा जायेंगे, फ़िर होगे और उदास।
छोड़ उदासी संगत को, मस्त रहो मेरे भइया,
पढो इसे ,पढ़कर बतलाओ, कैसाहै’फुरसतिया’।
यह घोषणा पत्र हम समीरलालजी से लिखवाना चाहते थे। मुंडलिया में। या फिर रवि रतलामी के व्यंजल। लेकिन दोनों आनलाइन न दिखे सो ऐसे ही ‘रफ़ू कविता’ से काम चलाना पड़ा।
एकाध चिप्पियां तो अखबार स्कैन कराते-कराते नत्थी कर दीं। ब्लाग जगत के अधिकाश लोगों के लिये यह है-
लिखत,पढ़त,विहंसत फिरत, इधर-उधर टिपियात,
ब्लाग जगत में सबसे करत मौज-मजे की बात।
कुछ विघ्न संतोषी जीव भी हैं। बंदऊं संत-असज्जन चरना की नियम के अनुसार उनका भी स्मरण करना आवश्यक है-
लड़त,भिड़त,ऐंठत फिरत, जहां-तहां भिरि बात,
ऐसेउ सनकी जीव हैं, जो राह चलत लड़ि जात।
इस अंक प्रकाशित करते हुये हमने और कुछ नयी बातें सीखीं। पहले तो नेट से रंगीन फोटो लेकर ‘माइक्रोसाफ़्ट वर्ड’ में की टेबल में लगाना सीखा। इसके साथ ही सागर ने आनलाइन कार्टून बनाना सिखाया। हिंदी में अलबत्ता अभी डायलाग लिखना नहीं सीख पाये। लिहाजा पाठक को इस बार भी हमारा ही हस्तलेख झेलना पड़ेगा। वैसे यह भी एक तरह से ठीक ही है।क्योंकि हम कार्टून बनाकर अगर उसे छोटा करके छापेंगे तो शायद दिखायी न दे। जबकि फोटॊ छोटा करके उसमें डायलाग पूरा लिखा जा सकता है।
तमाम दोस्तों ने इसके प्रकाशन में सहयोग देने के लिये लिखा था लेकिन इस बारे में कोई बातचीत न हो सकी। लिहाजा सामग्री जैसी है वैसी प्रस्तुत है। आगे के अंक शायद और बेहतर निकल सकें।
बहरहाल, ज्यादा कुछ और न लिखते हुये फुरसतिया टाइम्स का दूसरा अंक आपके सामने है। इसमें लिंक आदि आजकल में लगाये जायेंगे। तब तक आप बतायें आपको यह अंक कैसा लगा! आलोचना करने में संकोच न करें !:)

भूल सुधार: १.पहले पेज में पहले कालम में देबाशीष बनर्जी की जगह देबाशीष चक्रबर्ती पढ़ें। देबाशीष बनर्जी असल में मेरे बहुत पुराने दोस्त हैं। तब के जब दुनिया में ब्लागिंग शुरू भी न हुयी थी। वे भी पूना में हैं आजकल। दोस्त चाहे जितने पुराने हों जायें कहीं न कहीं से याद आ ही जाते हैं किसी न किसी बहाने।
२. पहले पेज के तीसरे कालम में मरहूम(स्वर्गीय) की जगह महरूम (वंचित) पढ़ें। इसके लिये ध्यान दिलाने के लिये राजीव टंडनजी का आभार। पहली गलती की तरफ़ भी देबू ने इशारा किया जो कि शुक्रवार को अमेरिका पहुंच चुके हैं। :)

25 responses to “फुरसतिया खाली भये छाप दिहिन अखबार…”

  1. आशीष
    :)
    फुरसतिया टाइम्स के संपादक को हमारी कुछ मांगे
    १.इस्टूडेंट कमीटी की मांगो पर तुरंत ध्यान दिया जाये…..
    २.शादी की प्रतिक्षा कर रहे कंवारो के लिये टिप्स दिये जाये
    ३.कंवारे ब्लागरो (निरज दिवान, अमित गुप्ता…) जैसे लोगो के वैवाहिक विज्ञापन निशुल्क प्रकाशित किये जायें..
    ४.पुछे फुरसतिया स्तंभ की कमी खल रही है
    ५. अब पांच मांगो के बारे मे सोचा था इसलिये लिख रहे है
    :-D
  2. RC Mishra
    शुक्ला जी ये एक और धमाकेदार अंक निकाला आपने, हर आर्टिकिल और विज्ञापन पर मुंह खोल के :D हंसाने वाला।
    इस बार तो हमारे काम का भी विज्ञापन मिल गया :)।
    अगले अंक की प्रतीक्षा रहेगी।
  3. समीर लाल
    सच में-आपने बहुत अच्छा लिखा है.अद्भुत बिंब हैं. लिखते रहें.-समीर लाल !! हा हा!! यह आप अखबार छपने के पहले की टिप्पणी है.
    वैसे सच में फिर से बहुत मजा है और सृजन जी को हमारी भी शुभकामनायें.
    यह समाचार पत्र बड़ा जानकारीपूर्ण होता जा रहा है-देबु दा की अमरीका यात्रा की खबर यहाँ की हवाओं में बिखरी है. अब उनका पता ठिकाना लिया जायेगा. :)
    प्रकाशन जारी रखा जाये, शुभकामना! हँसते हँसाते रहें.
  4. Jagdish Bhatia
    हा हा हा हा।
    क्या अखबार निकालते हैं साहब वाह।
  5. हिंदी ब्लॉगर
    पहले ही अंक से चल पड़ा था आपका अख़बार. दूसरा अंक आते-आते इसने रफ़्तार भी पकड़नी शुरू कर दी है. बधाई!
    इस अंक में वर्गीकृत विज्ञापन और छपते-छपते स्तंभ ज़्यादा मज़ेदार लगे.
  6. manya
    simply great… स्वस्थ,सरल एवम सहज हास्य रस…
  7. ratna
    बहुत बढ़िया। प्रकाशन दैनिक होना चाहिए।
  8. Sanjeet Tripathi
    खुशकित्तई!!
    आभार!
  9. जीतू
    ह्म्म! ये तो बहुत सफ़ल आइटम बन गया है, इसे जारी रखा जाए, भाड़े पर लेखक जुगाड़े जाएं। वर्गीकृत विज्ञापन बढाए जाएं, फुरसतिया हमेशा की तरह दूसरों को लपेटे रहे है, इस बार इनको भी लपेटा जाए। इसके लिए ठलुआ नरेश की सेवाएं ली जाए।
  10. ज्ञान दत्त पाण्डेय
    मानहानि का दावा कौन से कोर्ट में करना है? यह अगले अंक में साफ कर दीजियेगा. हमारे मुंह में शब्द ड़ाले जा रहे हैं जो हमने कहे ही नहीं! यह तो सटायरियत (सटायर लिखने की जबरी चाह) की पराकाष्ठा है. कोई प्रेस काउंसिल है यह देखने को?
    (वैसे हम समझौता कर सकते हैं अगर हमें फुरसतिया टाइम्स के सम्पादक मण्डल में बिना शर्त रख लिया जाये.)
  11. अनुराग मिश्र
    बढ़िया अखबार है, मज़ा आया। आशीष जी की माँगे तुरंत पूरी करें।
  12. नीरज रोहिल्ला
    गोरिल्ला(रोहिल्ला) खाली रहिन बाँच दिहिन अखबार,
    ईका पढिकर आ गयिन बचपन के दिन याद ।
    समाचारपत्र के सम्पादक छात्रों की समस्याओं को उठाने के लिये साधुवाद के पात्र हैं । लेकिन अभी तक दुनिया रंगबिरंगी वाला सेक्शन नदारद है । भाई बिना राखी सावंत के कैसे नईया पार लगेगी ।
    बहुत ही अनूठा प्रयोग है अनूपजी, साधुवाद स्वीकार करें ।
  13. काकेश्
    बढ़िया रहा ये अंक भी…
  14. अरुण
    जे कही नकली जीतू की तरह से नकली फ़ुरसतिया टाईम्स तो नही निकाल दिया किसी ने
    जल्दी बाजी मे पेज भी खा गया और आधे आधे मे न. डाल दिये
    हमे इसकी पूरी जांच रिपोर्ट चाहिये
  15. उन्मुक्त
    हमेशा की तरह :-)
  16. pankaj bengani
    आदरणीय सम्पादक महोदय,
    आपके वर्त(मान सम्मान)पत्र अब हम लोगों की आवाज और दाद खाज बन गया है. इसे जारी रखें..
    अखबार में हो रही गलतीयों को रोकने के लिए सृजन जी के नेतृत्व में एक जाँच कमेटी बिठाई जाए, जो तीन महिने के तीन सो कार्यकाल के बाद अपनी अंतरिम रिपोर्ट आपके समक्ष रखे. रिपोर्ट यथा सम्भव मोटी रखी जाए ताकि टीवी कैमरा में अच्छी दिखे. कवरेज के लिए नीरज भाई से कहकर टोना मंतर मंडली के खबरी को बुलाया जाए.
    मोटी रिपोर्ट को खारीज करने के बाद उसे रद्दी में बेचकर होने वाली कमाई से रंगीन पृष्ठ लगाए जाएँ, तथा मसाला खबरों के लिए रिचा की गरम गरम गोसीप छाप ब्लॉग से खबरे चुराई जाए तथा पुजारी को उप सम्पादक बनाया जाए.
    शेष शुभ, :)
    भवदीय,
    पंकज बेंगाणी
  17. संजय बेंगाणी
    हमने अपने यहाँ आने वाले अखबार को बन्द करवा दिया है.
    अब आपका अखबार पढ़ने से खिज नहीं होगी, बल्कि सुबह-सुबह हँसने से स्वास्थ्य बनेगा.
    एक सफल प्रयोग है. मजेदार.
  18. abhay tiwari
    मज़ेदार है ये अंक भी..साथ में वो दो दोहे भी जिन्हे अख्बार के भीतर जगह न मिल सकी.. मुझे लगता है कि किसी तक्नीकी ज्ञान वाले साथी को आप की सहायता करनी चाहिये.. इसका लेआउट और सज्जा कहीं बेहतर हो सकती है..
  19. श्रीश शर्मा
    सम्पादक महोदय, आपका अखबार दिनोंदिन तरक्की कर रहा है। उज्जवल भविष्य हेतु शुभकामनाएं!
    काश हमारे पास स्कैनर होता तो एकाध कार्टून बनाकर हम भी भेजते। :)
  20. मैथिली
    सम्पादक जी; हमने पिछले दिनों काम के लिये दरखास दी थी, उसका क्या हुआ? तुरन्त फुरन्त हमारे हक्क मे फैसला किया जाय.
  21. आशीष
    हमारी पांचबी मांग को इस नयी मांग से बदल लिया जाये
    ५. साईकिल मे जंग लग रही है,उस पर पोंछा लगाकर आगे बढाया जाये
  22. राजीव
    आपका फुरसतिया टाइम्स अच्छा है, चिट्ठा-जगत की हास्य-परक रिपोर्ट है। अरे भूल-सुधार में काहे को नाम छाप दिया?
    @श्रीश जी,
    स्कैनर की फिक्र छोड़ो, सीधे-सीधे कागज़ पर बना कर सम्पादक के पते पर कार्टून भेज दो ना। बाकी तो फुरसतिया जी करेंगे उसको भी स्कैन।
  23. eswami
    ये वाला अंक भी बहुत मजेदार लगा.
    आपकी हस्तलिपी इतनी अच्छी है उस में लिखे हिस्सों का प्रतिशत कृपया कुछ बढाईये! :)
  24. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] फुरसतिया खाली भये छाप दिहिन अखबार… [...]
  25. देखिये जरा हाथ से लिखे हैं आज
    [...] में इंकब्लॉगिंग कहलाती है। इसमें हम अखबार भी निकाल चुके हैं। देखिये जरा आप [...]

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