Tuesday, June 19, 2007

देख रहे हैं जो भी, किसी से मत कहिए

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देख रहे हैं जो भी, किसी से मत कहिए

गरीबों और दुखियों के नाम पर न जाने कितने महान बनते रहे किंतु आज तक दुनिया से गरीबी नहीं गयी।- श्रीप्रेम
राष्ट्रीय सहारा के एक कोने में छपे इस वाक्य को दिखाते हुये हमसे इष्ट देव सांकृत्यायन बोले -इसे ब्लागिया दीजिये। फिर हम दिल्ली पहुंच कर इस पर लिखेंगे।
अब आप कहोगे कौन इष्ट देव? सांकृत्यायन जी से इनका क्या रिश्ता? आप और कुछ पूछें इसके पहले ही हम बताये देते हैं।
आज दोपहर हम खा के सोये ही थे कि हमारा मोबाइल घनघनाया। विनोद श्रीवास्तवजी थे लाइन पर। बोले आइये आपको अपने मित्र से मिलवाते हैं। वे भी ब्लाग लिखते हैं। हम चौंके कि ऐसा कौन ब्लागर पैदा हो गया जो हमसे मिलने आये अउर हमारे पास आने की बजाय विनोद जी के पास चला गया। वैसे हम कुछ डरने का भी मन बनाये कि कोई हमारी तानाशाही का हिसाब चुकाने न आ गया हो लेकिन आलस के कारण डरने का मन ठीक से बना नहीं।
हमने कहा जरा बात कराओ भाई। पता चला इष्टदेवजी हैं। हमने पूछा-अरे ब्लाग का नाम बताओ भाई। ऐसे कौन पहचानता है नाम से? ब्लाग का नाम पता चला इयत्ता। हमने इयत्ता पर टिप्पणियां की थीं लेकिन सोचा कि जरा फ़िर से देख लें। शायद फोटू-वोटू लगी हो। पहचानने में आसानी रहेगी। लेकिन नखरे लेते लेता रहा। पर जाने से पहले हम ब्लाग लो सरसराते हुये देखने में सफ़ल रहे।
इयत्ता माने अस्तित्व । यह एक समूह ब्लाग है जिससे फिलहाल ग्यारह साथी लेखक जुड़े हैं। दो महीने में कुल जमा ३७ पोस्टें हुयी हैं। अगर अपना नहीं लिख पाये जो अच्छा लगा उसे साट दिया। ब्लाग पर मुल्ला नसीरुद्दीन की मौजूदगी देखकर हमने पूछा भी कि क्या भाई आप मुल्ला जी के फ़ैन हैं? (हम फिर डरे कि कहीं कोई इस मासूम सवाल को अल्पसंख्यक वर्ग के प्रति विद्वेष भावना न ठहरा दे :) ।
इस पर इष्टदेव ने बताया – आजकल हास्य के नाम पर लोग फूहड़ता का प्रसार कर रहे हैं इसलिये मुझे जो अच्छा लगता है स्थापित साहित्य में उसे पोस्ट करता रहता हूं। इसीलिये मुल्ला नसीरुद्दीन यहां विराजमान हैं!
जागरण समूह के लक्ष्मी देवी ललित कला अकादमी के गेट पर एक मोटरसाइकिल अजदकी मुद्रा में अधलेटी थी। उस पर बिना टिप्पणी किये हम दूसरी मंजिल पर चढ़ते चले गये जहां विनोदजी बैठते हैं। पता चला वे नीचे हमारा इंतजार कर रहे हैं। आने को तो हम तुरंत नीचे आ गये लेकिन हर जीने पर पांव रखते हुये हम चिंतित होते सोचे जा रहे थे कि कोई ब्लागर हमें देख ले। वर्ना क्या भरोसा कल को कोई कहे- अरे जो अपना स्टैंड नहीं तय कर पाता कि ऊपर जाना है या नीचे उसकी बात का क्या भरोसा करें। या यह भी कि अरे हमने उनको देखा है जागरण समूह (सत्ता) की सीढि़यों पर जूता फ़टकारते। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। हम बाइज्जत नीचे आ गये। वहीं हमारे इष्टदेव महारज विराजमान थे।
इष्टदेव के बारे में जब हमने सवालियाया तो पता लगा कि दुनिया में अपवादों की कमी नहीं हैं। अभी तक मसिजीवी ही ऐसे आइटम माने जाते थे जिन्होंने इंजीनियरिंग करने के बाद पटरी बदली। अब यहां हम दूसरे से मिल रहे थे। इष्टदेव ने इलाहाबाद (IERT) से मेकेनिकल इंजीनियरिंग (86-89)करने के बाद पहले बी.ए. फिर एम.ए. फिर एम.फिल किया। इसके बाद पत्रकारिता के अखाड़े में कूद पड़े। आजकल जागरण समूह से जुड़े हैं। नोयडा आफ़िस से जागरण समूह की पत्रिका पुनर्नवा का काम देखते हैं।
हमने पूछा इंजीनियरिंग के बाद बी.ए.,एम.ए..एम.फिल -यह बहादुरी किस अर्थ अहो!
पता चला रुचि नहीं थी। पता यह भी चला कि पिताजी एअर फोर्स में थे। सन ६२ की लड़ाई में घायल होने के बाद रेलवे में रहे और वहां की अनुशासन हीनता को ताजिन्दगी गरियाते रहे। (शतकवीर पांडेयजी नोट करें)
हम देख चुके थे कि कुल जमा दो महीने के ब्लागर हैं इष्टदेव। इसलिये इम्प्रेशन मारने के लिये बात उसी तरफ़ घुमा दी। कान साफ़ कर लिये तारीफ़ सुनने के लिये कि आप बहुत अच्छा लिखते हैं। लेकिन हमारे कान यह क्या सुन रहे थे। इष्टदेव बतियाते हुये बोले- पाण्डेयजी बहुत अच्छा लिखते हैं। विविध विषयों पर उनका लेखन बेजोड़ है। हमने अनमने मन से अपनी तरफ़ से भी पाण्डेय जी की तारीफ़ कर दी। यह भी बता दिया कि आज ही उन्होंने सैकड़ा ठोंका है।
हमने पाण्डेय जी से बात सरका कर बात अनामदास की तरफ़ मोड़ दी। अनामदास के ब्लाग का लिंक इयत्ता पर सबसे ऊपर है। उन्होंने हमें अनामदास का सारा कच्चा चिट्ठा बताया। नाम, नौकरी पता-ठिकाना सब कुछ। लेकिन हम नहीं बतायेंगे लेकिन कभी भी बता सकते हैं। अनामदासजी यह नोट करें और तदनुरूप व्यवहार करते रहें हमारे ब्लाग पर छपी पोस्टों से। वर्ना …अब क्या कहें! वे समझ दार भी हैं ऐसा मुझे इष्टदेवजी ने बताया।
दूसरा जिक्र चंद्रभूषणजी का आया। उनसे ही उन्हें हालिया हलचल का पता चला। हम इसी पर काफ़ी देर बतियाते रहे। इष्टदेव ने अपनी सोच बताते हुये कहा- ब्लाग वास्तव में अभिव्यक्ति का सही माध्यम बन सकता है लेकिन कुछ्लोग इसे सनसनी फ़ैलाने के लिये इस्तेमाल करते हैं। कुछ लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर घटिया सामग्री डाल देते हैं। उससे मुकाबला करने के लिये हमें स्तरीय सामग्री डालते रहना चाहिये। खोटे को बाहर करने के लिये खरे को अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी।
हम हां-हूं कहते हुये और एकाध डायलाग अपनी तरफ़ से छोड़ते हुये उनको सुनते रहे। कुछ ब्लाग जिन पर, उनको लगता है कि सनसनी ही है, उनको वे देखते ही नहीं। महीने में एकाध बार सिर्फ़ यह देखने के लिये देख लेते हैं कि कहीं कोई सार्थक सामग्री तो नहीं है। उनका मानना है कि मैं इसलिये भी ऐसे ब्लाग नहीं देखता क्योंकि ऐसे लोग हमारे ‘पाथ’ को ट्रेस करके आंकड़ों के माध्यम से यह बताने का प्रयास कर सकते हैं कि उनका ब्लाग बहुत पापुलर है।
अन्य लेखकों के अलाव राहुल सांकृत्यायन के मुरीद इष्टदेव, राहुल जी की वोल्गा से गंगा , से बहुत प्रभावित हैं और उसके बारे में लिखने के विचार हैं उनके। एक कविता संग्रह ,जिसकी प्रति भी उनके पास नहीं है इस समय, के अलावा उन्होंने डा.होमी जहांगीर भाभा के बारे में लिखी एक किताब का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया है। आजकल हिंदी में कैकेयी पर लिखी एक किताब का अंग्रेजी में अनुवाद कर रहे हैं।
अब आप समझ सकते हैं इतनी बातचीत के दौरान हमारे ब्लाग का जिक्र नहीं हुआ सिवाय एक बार के। अब बताओ भला ऐसी ब्लागर मीट में किसी का मन लगता है। हम सोचते रहे कि हमारी कोई तो पोस्ट इष्टदेव ने ऐसी पढ़ी होगी जिसका वो जिक्र कर सकें। लेकिन उन्होंने जैसे समीरलाल बिना पोस्ट पढ़े तारीफ़ करते हैं वैसे ही हमारे ब्लाग के बारे में केवल यह कहा- अच्छा लिखते हैं। हालांकि हम ए.सी. में बैठे थे लेकिन हमें ज्ञानजी की तारीफ़ और अपनी कमजिक्री से लग रहा है मौसम बहुत गरम है।
कुछ देर बाद हमारे साथ विनोद जी और राव जी भी जुड़ गये। बात गीतों के माधुर्य पर और पूर्वांचल में गीतों की प्रचुरता पर होने लगी। यह बताया गया कि पूर्वांचल की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि वहां के गीतों में माधुर्य है। हम कामना करने लगे कि तमाम पूर्वांचल के लोग गीत भी लिखने लगें। माधुर्य का श्रजन हो। होते करते इष्टदेव तुलसीदास को भी पूर्वांचल घसीट के ले जा रहे थे। लेकिन रावजी ने अवधी का कांटा फ़ंसा के तुलसीदासजी को पूर्वांचल जाने से रोक लिया।
बात विचारधारात्मक लेखन पर भी हुयी। मेरा मानना था कि दूसरे की विचारधारा पर उंगली उठाने की बजाय जिस विचार धारा को आप मानते हैं उसकी अच्छाइयां सामने लायें तो बेहतर होगा। जब आप दूसरे के सोच और विचार धारा में छेद दिखाते हैं तो दूसरा भी दूसबीन लगाकर आपकी बुराइयां दिखाने लगता है। अंतत: सब तरफ़ छेद ही छेद दिखते हैं। इसके विपरीत अगर अपनी विचारधारा से जुड़ी अच्छाइयों और आदर्श पुरुषों के बारे में लोगों को बतायें तो संभव है दूसरे भी इससे प्रेरणा ग्रहण करें।
इससे सहमत होते हुये इष्ट्देव ने कहा- हर विचारधारा की एक सेल्फ़ लाइफ़ होती है। उसके बाद वह विचारधारा अप्रासंगिक हो जाती है। जब व्यक्ति ही शाश्वत नहीं है तो व्यक्ति से जुड़ी विचार धारायें कैसे शाश्वत हो सकती हैं। अपनी बात पर वजन डालने के लिये उन्होंने एक किताब द ट्रैक्ट्राटस का नाम बता दिया। हमने कहा ऐसे नहीं लिख के बताओ। फिर उन्होंने लिखा हमारे कागज में जिसे हमने अभी तक फ़ाड़ा नहीं है क्योंकि उसमें इष्ट्देव का मोबाइल नंबर और मेल पता भी है।
इयत्ता हालांकि दो माह पहले शुरु हुआ लेकिन उनके ब्लाग पर टिप्पणियां कम हैं। हमने कहा ऐसे कैसे चलेगा भाई! या तो आप कुछ सनसनीखेज लिखिये, हमें गरियाइये, नारद को गरियाइये या फ़िर मेहनत करिये और दूसरे के यहां कमेंट करिये ताकि वे आपके यहां आयें।
अब जो आदमी इंजीनियरिंग के बाद साहित्य में टहलते हुये पत्रकारिता में आकर बैठा है उसे और कुछ माना जाये या न माना जाये मेहनती तो मानना ही पड़ेगा।
इसलिये इष्टदेव जी ने मेहनत की कमाई ही खाने का रास्ता अपनाने का विचार बनाया और माना कि दूसरों के ब्लाग पर टिपियाना कारगर उपाय है अपने यहां लोगों को बुलाने का।
कुछ तकनीकी समस्या भी बतायी हमने कहा भाई ये अपनी लाइन के आदमी मसिजीवी से पूछियेगा। अब मसिजीवी खुश हो जायें कि उनको अमित नहीं कुछ समझ रहे हैं न समझे लेकिन हम इतना काबिल मानते हैं कि पता दे रहे हैं। आखिर हम हम हैं कोई मजाक नहीं भाई!
और तमाम बाते हुयीं लेकिन हम बतायेंगे नहीं। हमारी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी कोई वकत है कि नहीं भाई!
इसे आप क्या मानोगे? एक मित्र से मुलाकात? अपने रकीब से मुलाकात जो कि हमारी तरह ही ज्ञानदत्त और अनामदास के लेखन का प्रशंसक है या फिर एक और ब्लागर मीट?
वैसे ब्लागर मीट के सारे सबूत हमने मिटा दिये हैं। न फोटो है न जूठी प्लेट। यहां तक कि कुर्सी सोफ़े के फोटो भी नहीं लगाये। न कंधे पर हाथ न कोलगेटिया मुस्कराहट। अब इसके बाद भी अगर ज्ञानदत्तजी इसे मीट मानने पर तुले हैं तो तुले रहें। हम क्या कर सकते हैं?
मेरी पसंद
आज की मेरी पसंद में स्व. रमानाथ अवस्थी की एक कविता जो मैंने पहली बार इयत्ता की एक पोस्ट में पढ़ी।
देख रहे हैं जो भी, किसी से मत कहिए,
मौसम ठीक नहीं है, आजकल चुप रहिए।
फुलवारी में फूलों से भी ज्यादा साँपों के पहरे हैं,
रंगों के शौक़ीन आजकल जलते जंगल में ठहरे हैं।
जिनके लिए समंदर छोड़ा वे बदल भी काम न आए,
नई सुबह का वादा करके लोग अंधेरों तक ले आए।
भूलो यह भी दर्द चलो कुछ और जिएँ,
जाने कब रूक जाएँ जिंदगी के पहिए।

स्व. रमानाथ अवस्थी

10 responses to “देख रहे हैं जो भी, किसी से मत कहिए”

  1. Sanjeet Tripathi
    बढ़िया विवरण!!
    इष्टदेव के बारे में जानकारी देने का शुक्रिया!
    कविता शानदार , इयत्ता मे झांकना ही पड़ेगा अब रेगुलर!
  2. समीर लाल
    बहुत रोचक विवरण लगा आपकी और ईष्टदेव जी मुलाकात का. शार्ट एंड स्वीट. :)
    स्व. रमानाथ अवस्थी जी की कविता बहुत आनन्द दे गई. कट एंड पेस्ट करके रख ली गई है. धन्यवाद इसे पेश करने का.
  3. anamdas
    सुना है जो कुछ किसी से न कहिए
    ब्लागिंग में बवाल है, चुप रहिए
    परदे में रहने दो परदा न उठाओ
    ऐसे बातें लिखके हमें न डराओ
    जो आनंद गुप्त दान में है
    उसका पुण्य मत छीनिए
    आपके हर पोस्ट की तारीफ़ करूँगा
    आप चाहे जितनी ग़लती बीनिए
    मुँह बंद रखने का अगर कोई देसी तरीक़ा है तो उस पर स्वदेश आते ही अमल किया जाएगा. आप मेरा ध्यान रखिए,हम आपका रखेंगे…हें हें हें
    अनामदास
  4. श्रीश शर्मा
    इष्ट देव जी की नारद उवाच पर टिप्पणी से उनके साहित्य के क्षेत्र से जुड़े होने का पता चल गया था। उनके बारे में जिज्ञासा हुई थी जो आपने शांत की। सच है बहुत से अच्छे ब्लॉगरों को वो नोटिस नहीं मिलता जो अपेक्षाकृत दूसरों को मिलता है।
    ब्लॉगर मीट के सबूत काहे मिटाए, फोटो वगैरा दिखाते न, मीट के फोटू वगैरह देखना अच्छा लगता है। :)
  5. संजय बेंगाणी
    एक और ब्लोगर मीट. अच्छा है. फोटो होती तो और अच्छा होता :)
  6. masijeevi
    बहुत से अच्छे ब्लॉगरों को वो नोटिस नहीं मिलता जो अपेक्षाकृत दूसरों को मिलता है।
    भई श्रीश कुछ हम जैसे भी हैं- जो अच्‍छे ब्‍लॉगर नहीं हैं फिर भी नोटिस नहीं मिलता।
    अच्‍छा लगा ये विवरण- आपके पता देने की सच्‍चाई तभी मानी जाएगी जब हमारे पते पर पता लेवक की पाती लगेगी।
  7. sujata
    श्रीश शर्मा says====मीट के फोटू वगैरह देखना अच्छा लगता है।
    खाली फोटू देखकर काहे खुस होते है भइ ,खा ही लिया कीजिये :)
    फुरसतिया जी , अच्छा विवरण दिये है ।
  8. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    आपके ये इष्ट मेरी वाली केटेगरी के हैं. ये इंजीनियरिंग पढ़ कर बी.ए.,एम.ए..एम.फिल का प्रपंच रचे हैं और हमने इलेक्ट्रॉनिक्स में 5 साला घास खोद वैगन और कोच की कपलिंग कटवाई-जुड़वाई है.
    महान लोग ऐसी बहादुरी ही करते हैं!
  9. राकेश खंडेलवाल
    जिनके लिए समंदर छोड़ा वे बदल भी काम न आए,
    नई सुबह का वादा करके लोग अंधेरों तक ले आए।
    इससे आगे कुछ भी कहना नहीं
    बहती हुई हवा के संग संग अब बहिये
  10. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] देख रहे हैं जो भी, किसी से मत कहिए [...]

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