Monday, June 18, 2007

वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये

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वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये

फुरसतिया टेढ़ी-मेढ़ी तान के सो रहे थे।
वैसे सोये तो वो लम्बी तान के थे। लेकिन रात को कूलर देर तक चल गया। बिजली भी कुछ ज्यादा ही लटपटा गयी। गयी ही नहीं। इससे झुरझुरी कुछ और बढी़। फुरसतिया ने अम्पायर के चउवा देने वाले अंदाज में चादर की खोज में हाथ हिलाया लेकिन चादर भारतीय टीम के कोच की तरह नदारद था। उन्होंने धुरविरोधी के ब्लाग हेडर की तरह नींद और ठंढ का जोर लगाकर जिस्म को दोहरा किया और न हो कमीज तो पावों से पेट ढंक लेगे दोहराते हुये टेढ़ी-मेढ़ी तान के सो गये।
जैसे ही वे सोये तो देखते क्या हैं कि एक आफिस के बाहर तमाम भीड़ जमा है। लोग तरह-तरह के नारे लगा रहे हैं। कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद कर रहा है तो कोई हाय-हाय। कोई शाबास दे रहा है तो कोई लानत भेज रहा है। कोई वाऊ कह रहा है तो कोई हाऊ।
चारो तरफ़ भीड़ जमा है। वे एक शरीफ़ से दिखने वाले आदमी से सट के बतियाने लगे।
पता लगा जिसे वो शरीफ़ समझ रहे थे वो नारदजी थे। जनता उन्हीं के समर्थन और खिलाफ़ में नारे लगा रही थी। समर्थन में भीड़ ज्यादा थी लेकिन विरोध करने वालों की आवाज ज्यादा जोर से सुनाई दे रही थी। उनको विरोध करने का लंबा अनुभव था। एक विरोधी तो बार-बार अपने चेहरे पर नये-नये चेहरे लगाकर उचकते हुये विरोध कर रहा था।
नारद जी जब पूछा गया कि ये क्या तमाशा है? लोग क्यों आपके आफिस के बाहर जमें हैं?
पता नहीं अंदर जायें तो कुछ पता लगे। वहीं कान्फ़ीडेंसियल फ़ाइलें रहती हैं। उसी में सब विवरण होंगे। वैसे लगता है कि दो दिन पहले एक ब्लाग को अपनी सूची से हटा दिया हमने इसी का बवाल है।
हमने कहा -तो आप कुछ करते काहे नहीं? जाइये जो करना हो करिये ताकि ये भीड़ छंटे।
नारदजी बोले- ये छंटना नहीं चाहते। सब छंटे हुये लोग हैं। हम भी कहां फंस गये आकर! ये जीतेंन्द्र भैया के चक्कर में। अच्छे खासे भगवान की सेवा में लगे थे। दाल-रोटी खा रहे थे लेकिन हमें हाइटेक अवतार का लालच देकर बुला लिया। पता नौकरी वही दो टकिया। खबर इधर से उधर करो।
हमने पूछा- जीतेंन्द्र कहां हैं? उनसे बात करो न!
अरे वो पता नहीं कौन लोक में विवरण कर रहे हैं। हमको ससुरा यहां धूप में तपा रहे हैं। खुद न जाने किसी हवाई सुन्दरी को हिंदी ब्लागिंग के गुर सिखा रहे होंगे।
बहरहाल हमने चारो तरफ़ देखा तो हिंदी ब्लागरों के ठट्ठ के ठ्ट्ठ जमा थी। लोग अलग-अलग गुटों खड़े बतिया रहे थे। कुछ लोग हंसी ठ्ट्ठा कर रहे थे। कुछ झोले जैसा मुंह लटकाये थे। जो मुंह लटकाये थे उनमें से कुछ अपनी आंखों में आंसू लाने के लिये आंखें मल-मिचमिचा रहे थे। कुछ लोग उनको टोंक भी रहे थे -अरे ई बुढौती में ज्यादा पहलवानी न करो। अभी रामलीला वालों से वैसलीन मंगाई है उसे लगाकर काम हो जायेगा। पूछने पर पता चला कि वे किसी ब्लाग की असमय मौत का मातम मनाने आये थे। इसके बाद वे कहीं विरोध प्रकट करने जाने वाले थे।
क्या बात है बड़ा चहक रहे हो? हमने शशि सिंह के धौल जमाते हुये कहा।
हेंहेंहें भाई साहब आज ही श्रीमती जी को मायके भेजा है इसीलिये खुशी स्वाभाविक है।
और क्या हो रहा है?
बस इस आजादी का उपयोग करते हुये नयी पोडकास्ट करने की सोच रहा हूं। इतने ब्लागर एक साथ और कहां मिलेंगे? शशि सिंह के चहकते हुये माथे से आराम के श्रम सीकर महक रहे थे।
हमने उनके माइक को साथ में लिया और जिस-तिस से सवाल जवाब करने लगे।
एक पेड़ के नीचे खड़े ज्ञानदत्त जी से जब हमने पूछा -आप कैसे हैं? इस हल्ले-गुल्ले को आप किस नजर से देखते हैं?
कोई भी सवाल पूछने से पहले मेरे लिये बर्नाल लाओ। पांच ग्राम वाली नहीं किलो-दो किलो वाली शीशी लाना- ज्ञानदत्तजी की आंखें सुलग रहीं थीं।
हमने गालिब के शेर जो आंख से ही न टपका तो लहू क्या! को याद करते हुये पूछा क्या जल गये कहीं? सन बर्न में तो सनक्रीम लगाते हैं।
आप क्या बर्नाल इस्तेमाल करते हैं?
अरे हमारा पूरा बदन जल रहा है। ज्ञानदत्त जी की आवाज में पीड़ा थी।
हमारे क्यों पूछने से पहले ही वे शुरू हो गये- अरे हमें इस बात से जलन हो रही है कि जितना हल्ला हाय-हाय हमें एक कर्मचारी को बीस साल की नौकरी से निकालने के बाद भी नसीब नहीं होता उससे कई गुना ज्यादा अटेंशन ये नारद को मिल गया एक ब्लाग को निलंबित करने पर जिसने इतना भी नहीं लिखा गया अभी तक जितने में दो मेमों लिखे जा सकें।
पेड़ के नीचे उनके खड़े होने से लग रहा था कि शायद ग्लोबल वार्मिंग इसी को कहते हैं। हमने एक लड़के को पास के मेडिकल स्टोर दौड़ा दिया और एक मुर्दाबादी से बच्चे से बतियाने लगे।
कहां से आये हो बालक तुम? हमने उसके कंधे पर हाथ रखते हुये पूछा।
दिल्ली से। अनूप शुक्ल हाय-हाय कहते हुये उसके मुंह से निकला।
कौन भेजिस तुमका इहां? हमने पुचकारते हुये पूछा।
अविनाश भैया । -जीतेंन्द्र चौधरी मुर्दाबाद कहते हुये बच्चा बोला।
अविनाश भैया नहीं आये। – हमने घरेलू बनने का प्रयास किया।
नहीं वे आगरा तक ही आयेंगे। उनका काम वहीं होगा।- सम्प्रदायवाद मुर्दाबाद बोलते हुये वह हांफ़ने लगा था।
उसकी हंफ़नी देखकर हमें रुकना पड़ा। इस रुकने के दर्मियान हमने दिमाग के सारे घोड़े दौड़ाते हुये इस बात के कारण सोचे कि अविनाश आगरा तक ही क्यों आयेंगे? क्या वहीं रहेंगे? क्या उनका काम सिर्फ़ वहीं हो पायेगा? क्या वहीं के हो कर रह जायेंगे? ऐसी क्या बात हो गयी जो वहां आये यहां तक न आये? इसी तरह की खुराफ़ाती बातें सोचते हुये हम उधर की तरफ़ बढ़ लिये जिधर से विरोध के स्वर ज्यादा उभर रहे थे।
ई अफ़लू अभी तक नहीं दिखे! -तहमद समेटते हुये अभयजी जैसे सुदर्शन चेहरे (बढ़ी हुयी दाढ़ी के बावजूद) वाले ने कहा।
कहीं पपलू खेलने बैठ गये होंगे- प्रमोद सिंह जी ने सिगरेट पैर से मसलते हुये कहा। नारद समर्थक एक नारेबाज को अपनी तरफ़ देखते पाकर उन्होंने बुझी हुयी सिगरेट को दुबारा मसला। दुबारा मसलने के बाद फिर उसे खड़े होकर कुचला।
सिगरेट कुचलकर जैसे ही वे बैठने को हुये देखा उनकी जगह पर रवीशकुमार बैठ चुके थे। उन्होंने सोचा कि इसका विरोध किया जाये लेकिन तब तक रवीशकुमार जी अपनी एक कालजयी कविता के तुक बोल-बोल के मिलाने लगे थे-
जगह उसी की जो बैठा है,
नारद बेमतलब ऐंठा है।
रवीशजी को कविता के तुक मिलाने की बेतुकी घटना से अपने अलग करने के लिये प्रमोदजी अपनी छिनी हुयी जगह का मोह त्याग कर अपने चेहरे पर निर्लिप्तता
आंखों में शरीर के हिस्से को टिकने भर की जगह की तलाश नत्थी करके इधर-उधर टहलने लगे। शशिसिंह ने उनके इधर-उधर टहलन को देखते हुये अपने उपमा देनी चाही- चलत दशानन डोलत अवनि लेकिन यह उपमा जब तक वे बाहर निकाल कर किसी को सुनायें तक उनके दिमाग की बैटरी चालू हो गयी थी और दिमाग ने उपमा सोचने वाले ‘ड्राफ़्ट दिमाग’ को हड़काते हुये कहा- उलटा लटका दूंगा अगर इस तरह की हरकत सोची भी भाई साहब के बारे में। अपने आप को अफलातून भाई साहब के बराबर समझता है। वे जो चाहें कहें। संघर्षशील हैं। लाठी खाये हैं। सर पर भी पड़ी होंगी। असर होगा। वे बत्तीस साल पहले की खौफ़नाक घटना से आज की चिरकुट सी घटना से तुलना करें लेकिन अपने रहते मैं इस तरह की अनुमति तुम्हें नहीं दे सकता कि तुम प्रमोद भाई साहब के बारे में इस तरह की बात कहो। खबरदार!
इतने में प्रमोदजी ने बोर होने की गर्ज से अफ़लातूनजी के घर फोन मिलाया। पता चला वे अस्सी की पप्पू चाय वाले की दुकान पर इकट्ठा लोगों को नारद पर राहुल के ब्लाग पर लगे बैन के बारे में इकट्ठा करने गये हैं।
उन्होंने उनका मोबाइल नंबर पूछा। मिलाया तो हेलो-हेलो के बाद बंद।
लगता है ससुरे नारद वाले मोबाइल पर भी बैन लगाये हैं। प्रमोद जी झल्लाते हुये बोलते तब तक अफ़लातूनजी की हुलुये की तरह मीठी महकदार आवाज सुनायी दी-हेलो, गुरुदेव। मेरे मोबाइल की बैटरी आफ़ हो गयी थी। इसलिये दूसरे के मोबाइल से फोनिया रहा हूं। फोकट की चीज पर कब्जा करके उसे उपयोग करने का दिव्य आनंद प्रमोदजी को सुलगाने लगा और वे सोचने लगे कि ज्ञानदत्त जी की बर्नाल की शीशी जल्दी आये तो काम बने।
अउर का कर रहे हो? प्रमोदजी हिसाबी बन गये थे।
कुच्छ नहीं बस यहां से निकल कर बगल की लाइब्रेरी जायेंगे। वहां से नारद विरोध की कवितायें छांट के उसे अपने ब्लाग पर सांटकर पहुंचते हैं धरना स्थल पर।
जल्दी आओ यहां सब लोग इंतजार कर रहे हैं। प्रमोदजी ने दूसरी सिगरेट सुलगा ली। इस बड़ी सुलगन से पहले की छोटी सुलगन कुछ कम हुयी।
प्रमोदजी को देखकर अहसास हो रहा था कि सफ़ल संगठन कर्ता कैसे होते हैं। वे हर फिक्र को धुयें में उड़ा रहे थे। जब फिक्र उड़ जातीं थीं तो नयी फिक्रें पैदा कर ले रहे थे। जब फिक्रों का कामर्शियल ब्रेक होता वे विरहिन जोड़े के प्रेम पत्र क मजनून सोचने लगते। उस समय उनके चेहरे पर भुवन मोहिनी मुस्कान कैम्प आफिस लगा के विराजमान होकर बैठ जाती।
एक तरफ़ कोने में मसिजीवी अपनी श्रीमतीजी नीलिमाजी और श्रीमतीजी की बहनजी सुजाताजी के साथ बैठे कुछ गपिया रहे थे। सृजनशिल्पी भी साथ में थे। पहले मसिजीवी सृजन के साथ आने में हिचक रहे थे लेकिन जब उन्होंने यह वायदा किया कि वे अपनी गदा साथ में नहीं ले चलेंगे तब वे उनके साथ आने को तैयार हुये। वैसे भी साथ आना मजबूरी थी क्योंकि ज्ञानदत्तजी ने जो पास उनके लिये भेजा था वह सम्मिलित पास था। पास ने धुरविरोधियों को पास ला दिया।
‘धुरविरोधी चला गया लेकिन वो दिखेगा। आसमान में छा जायेगा।’ हवा में तैरते इस वाक्य में ‘अफलातूनजी पधार रहे हैं’ का बैकग्राउंड म्यूजिक बज रहा था।
“क्या अब धुरविरोधी आसमान नाम से ब्लाग लिखेंगे?” सृजन के चेहरे से जिज्ञासा टपक रही थी।
मसिजीवी के चेहरे पर सुकून था। पहली बार इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बनने के रोमांच से वे अविभूत थे जब किसी सूचना के जवाब में सृजन ने यह नहीं कहा कि ,”मैंने पहली ही कहा था। ऐसा होगा इस तरह होगा।”
लेकिन अफ़लातूनजी जब तक धुरविरोधी के बारे में अपने पत्ते खोलें तब तक मिसिरजी बोले- धुरविरोधी अभी मरा कहां है? वो तो मात्र छिपा है। उसके मरने की पुष्टि के लिये उसकी लाश दिखाऒ। उसका मौत का जिम्मेदार नारद है यह कैसे तय होगा? इसके बाद वे न जाने कौन-कौन से तकनीकी ताम-छाम दिखाने लगे। जो न उनको समझ में आ रहे थे न देखने वाले को।
तब तक किसी ब्लागर ने मसिजीवी को घेर लिया कि वे भावुकता की तिजारत करते हैं। धुरविरोधी की चर्चा के बहाने भावुकता की नदी चिट्ठाचर्चा में बहाते हैं।
अपने ब्लाग का उपयोग करने की जगह सार्वजनिक मंच का दुरुपयोग करते हैं।
मसिजीवी ने पहले तो अकड़ते हुये कहने का प्रयास किया कि सार्वजनिक सम्पत्ति होती ही मनमाने उपयोग के लिये है लेकिन ज्ञानजी को अपनी तरफ़ देखते हुये मिमियाकर अपने बदन को धुरविरोधी की याद में दोहराकर बोले- मैं क्या लिखता हूं ,क्यों लिखता हूं ,अक्सर मैं खुद समझ नहीं पाता। आज खाना बनाने के लिये जब किचन में गया तो वहीं यह विचार पका। मैं अधबना राजमा छोड़कर चर्चा परसने आ गया। इसी हड़बड़ी में गड़बड़ी हो गयी। इसीलिये मैं भी मानता हूं कि घर से किचन हटा देना चाहिये। सबको अपनी तरफ़ देखते पाकर उन्होंने चेहरे पर धुरविरोधी वाली पोस्ट के अनुरूप दुख चिपकाया। फोटॊ खिंचती देखकर भविष्य में बनने वाली यू ट्यूब के बारे में सोचते हुये उन्होंने अपनी आंखों में आंसू लाने का प्रयास भी किया।लेकिन नीलिमा जी उनके इस उपक्रम को देखकर सहम गयीं और बोली- घड़ियाली आंसू मत बहाइये। वर्ना किसी वन सुरक्षा वाले ने देख लिया तो किसी घड़ियाल को मारने के जुर्म में पकड़े जायेंगे आप। अभी तो आप जमानत के भी पैसे नहीं हैं। जितने थे सब हिल स्टेशन में उड़ा दिये। जरा समझदारी से काम लीजिये।
मसिजीवी की चिट्ठाचर्चा वाली पोस्ट का जिक्र सुनकर एक ब्लागर दांत किटकिटाने की सोचकर मेहनत करने लगा लेकिन किटकिटाने से दांत घिस जायेंगे यह सोचकर और चारो तरफ़ फ़्लैश की चमकदेखकर वह मुन्ना भी एमबीबीएस के प्रिंसिपल साहब की तरह हंसने लगा। लेकिन जब बाद में उसने देखा कि किसी ने उसकी हंसी को त्वज्जो नहीं दी तो एक काउंटर के पास खड़े होकर अपने दांत खोदने लगा। दांत खोदते-खोदते उसने देखा कि एक लड़का सा लगने वाले आदमी गेट से भागते हुये अंदर आया और सामने की पानी की टंकी के जीने की ओर भागता चला गया।
हल्ला मचने पर जब एक फुरसतिये ब्लागर तक यह खबर पहुंची तो वह आंख मूंदे-मूंदे बोला -अरे आओ,आओ सागर भाई! बड़ी देर कर दी आनें में।
तमाम लोग चकित से हुये कि कैसे यह आदमी सा दिखने वाला जीव बिना देखे किसी को पहचान ले रहा है। वह आगे कुछ सोचता तब तक सागर भाई के नाम से संबोधित व्यक्ति उस फ़ुरसतिये के पास आ गया था।
हमें पता था कि तुम आते ही फिर टंकी पर चढ़ने की कोशिश करोगे। इसीलिये जीना बंद करा दिया है। आओ इधर आराम से बैठो। देखो तुम्हारे लिये खास इंतजाम करा दिया है। तुम्हारी कुर्सी इस टपकती टंकी के नीचे लगवा दी है। इससे इस गर्मी में आराम मिलेगा। तुम बैठो इधर हम अभी आते हैं।
सागर से दूर जाने के पहले फुरसतिये से ब्लागर ने एक नारद जिंदाबाद- शाबास नारद की चिल्लाहट लगाते हुये एक चेले को पास बुलाकर कहा -देखो ये सागर भाई हैं। हैदराबाद से आये हैं। जरा-जरा सी बात पर टीन टप्पर की तरह गरमा जाते हैं। जैसी ही गर्मायें वैसे ही पानी चालू कर देना। गर्माने में ज्यादा आत्मविश्वास दिखे तो धीरे से कान में पूछ लेना भाई साहब, आप ग्रेजुएशन का इम्तहान कब देंगे। बस उतने में ही ये शान्त हो जायेंगे और पढा़ई की सोचने लगेंगें।
उधर कुछ लोग नारद पर लगे किसी बैन के बारे में बतिया रहे थे। लोग आपस में बतिया रहे थे। लोगों के डायलाग एक दूसरे को धकिया रहे थे। जितने सुनाई दिये उतने यहां बता रहे हैं-
*नारद पर ब्लाग का बैन अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन है।
*अरे हनन क्यों भाई, हमारा नारद हम चाहे जो करें।
* हम नारद की ईंट से ईंट बजा देंगे।
*नारद कोई मकान नहीं है जिसकी ईंटे बजा सके कोई। नारद संकलक नहीं विचार है।
*विचार नहीं तो अचार है। डाल के खा लेना चार महीने बाद।
*अरे यह विरोध तो प्रतीकात्मक है।
*अरे नाम तो कायदे से लो भाई। प्रतीकात्मक यहा कोई नहीं है।केवल प्रतीक पांडेय हैं। खूबसूरत, नौजवान। कुछ दिन बाद वधू चाहिये वाले कालम में फोटो दिखेगी। जितने लोग यहां जमा हैं हाय-हाय और शाबास बहुत खूब वाले सब ठुमका लगायेंगे -आज मेरे इयार की शादी है।
*अरे वो प्रतीकात्मक नहीं भाई। प्रतीकात्मक बोले तो सिम्बालिक। नमूने के लिये।
* अच्छा तो लड़ाई नहीं नमूनागिरी हो रही है। करो। जो मन आये करो।
*अरे ये तो अब मुद्दे की नहीं मूछों की लड़ाई है।
*लेकिन नारद के तो मूंछे हैं नहीं, न अविनाश की न रवीशजी की न ही प्रमोद सिंहजी की। अफ़लातूनजी की देख नहीं पाये काहे से कुर्ते में ही अटके रहे उस दिन।
*अरे अफ़लातून जी की सफ़ेद मूछे हैं। और उधर संजय बेंगाणी, जीतेंन्द्र चौधरी , रामचन्द्र मिश्र ,अनूप शुक्ला सबके मूंछे हैं।
*अरे तब तो मामला एक तरफ़ा हो जायेगा। एक तरफ़ इत्ती मूंछे दूसरी तरफ़ एक ही और वो भी सफ़ेद।
*जिनके मुंह में नहीं हैं उनके तेवर में हैं। अरे देखना एक अभयजी की अकेली की दाढ़ी मूंछें सब पर भारी पड़ेंगी।
*अच्छा ये तो वैकल्पिक मूंछ वाले हैं। किसी ने रखीं किसी ने नहीं। इस बैन के बारे में उनके क्या विचार हैं जिनके मूंछे उगती ही नहीं। मेरा मतलब महिला चिट्ठाकारों से है।
*अभी तक मामला एक-एक से बराबर चल रहा है। प्रत्यक्षाजी ने इसे गलत बताया है जबकि बेजी जी ने सही।
*प्रत्यक्षाजी ने पोस्ट लिखी लेकिन बेजी जी ने कमेंट लिखा तो मामला टाई कैसे होगा भाई। पोस्ट और कमेंट बराबर कब से होने लगे?
*अरे उन्होंने एक पोस्ट लिखी तो इन्होंने कई जगह कमेंट लिखे। नीलिमाजी भी गोल-मोल ही सही बेजीजी के साथ हैं।
*लेकिन महिलायें इस अहम मुद्दे पर बोलती क्यों नहीं?
*महिलायें समझदार होती हैं। वे फ़ालतू बातों में समय नहीं गंवातीं।
*महिलायें समझदार होती हैं? फिर प्रत्यक्षा और बेजीजी ने क्यों किया?
*अरे ताकि कोई ये न समझे कि महिलायें राय रख ही नहीं पातीं। उन्होंने राय रखी मैच बराबरी पर खत्म।
इसी तरह के सवालों-जबाबों के बीच लोग एक बाईस साल के नौजवान को घरे उससे बतिया रहे थे। तमाम चैनेलों के पत्रकार उसके चेहरे पर फ़्लैश मार रहे थे। माइक को तो कुछ लोग उसके मुंह में चाकलेट की तरह जबरियन ठूंसने का प्रयास कर रहे थे। नौजवान के चेहरे पर लगभग गुमनामी से उठकर राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनी प्रतिभा पाटिल के चेहरे की चमक जैसी चमक देदीप्यमान थी। वह कुछ शरमाना सा चाह रहा था लेकिन उसके चारो तरफ़ इकट्ठा लोग उससे चेहरे पर आक्रोश लाने की गुजारिश कर रहे थे। एक ने उसकी मुठ्ठी भींचने में सहयोग करने के बहाने उसके हाथ की मसाले की पुडि़या पार कर दी थी। उसने जेब में हाथ डालकर दूसरी पुड़िया खोजी लेकिन वह भी नदारद थी। उसने अफलातून जी की तरफ़ इशारे में हाथ फ़ैलाकर पान की पुड़िया मांगी। अफलातूनजी ने सोचा शायद पहली बार कैमरे के सामने आने से बालक घबरा रहा है और क्या कहे क्या न कहे समझ नहीं पा रहा है। यह सोचकर उन्होंने उसके सामने एक लिखा हुआ बयान धर दिया। वह नौजवान सन सत्तर का अमिताभ बच्चन बनने ही वाला था तब तक कामर्शियक ब्रेक हो गया।
कामर्शियल ब्रेक के बाद सीन वहीं से शुरू हुआ था जहां खत्म हुआ था। इस बीच सारी जरूरी चीजें उदरस्थ कर चुकने के कारण नौजवान की जवानी वापस आ गयी गयी थी और सवाल जवाब शुरू हुये-
सवाल: आपको अपना चिट्ठा नारद से हटने पर कैसा लगा?
जवाब: बहुत खराब लगा। यह अभिव्यक्ति के नाम कलंक है। तानाशाही है। अलोकतांत्रिक है। जारशाही है। धूर्तता है। और और और दुर दुर … (ये का लिखो अफलू भैया जरा साफ राइटिंग मां लिखा करो। आपने कम्प्यूटर पर लिखने के चक्कर में पड़्कर अपनी राइटिंग खराब कर ली। )
अरे दुर्भावनापूर्ण, बर्बरता पूर्ण, गैरबराबरी की जनक है। अफलातूनजी ने चश्मा नाक पर टिकाते हुये पढ़ा। इस बीच उन्होंने कैमरे वालों और माइक वालों से इस सीन को दुबारा लेने के लिये कहा जिसे उन्होंने झुंझलाते हुये मान लिया और उससे कहीं ज्यादा झुंझलाते हुये नौजवान ने दोहरा दिया। तीन बार में शाट पूरा हुआ। इसके बाद उसने कागज मरोड़कर अफ़लातूनजी की जेब में डाल दिया था। अब सवाल-जवाब बिना कागज के होने लगे।
सवाल: आपको ब्लाग लिखना कैसा लगता है? ब्लाग लेखन को आप कैसा मानते हैं? क्या आज के जीवन में इसकी कोई सार्थकत है?
जवाब: ब्लाग लेखन की क्या सार्थकता है। कुछ नहीं। जिनको कोई काम नहीं होता वही ये लिखते हैं। ज्यादातर असामाजिक जीव। हमने पहले ही लिखा था कि इसका कोई बहुत महत्व नहीं है। लेकिन अक्सर इसका उपयोग अभिव्यक्ति की आजादी का परचम लहराने के लिये किया जा सकता है। जैसे अभी हो रहा है। इस पर बैन लगने से हमारी तानाशाही विरोधी मुहिम को घर बैठे मुद्दा मिल गया है। प्रमोद भाई देखो कितना उत्कृष्ट पतनशील साहित्य रच रहे हैं। अफलातून भाई ने जितना अपनी पढ़ाई के दौरान कवितायें नहीं पढ़ीं उतनी आजकल पढ़ रहे हैं। आजकल तो वे नमस्कार तक के जवाब में एक ठो तानाशाही का विरोध करने वाली कविता सुना देते हैं।
सवाल: और आपके इस बैन का क्या असर आपके जीवन में पड़ा?
जवाब: हमारे जीवन पर क्या असर भाई! मस्त हैं। टिचन्न हैं। ठाठ से हैं।
सवाल: जिस तरह आपका ब्लाग बंद हुआ उसके बारे में कुछ कहना है आपको?
जवाब: हां कहन काहे नहीं है। ये ब्लाग बंद होना बहुत दुखद है। मुझे यही दुख है कि मुझे समय बहुत दिया गया लेकिन कुछ और दिया जाना चाहिये था। एकाध दिन और मिलते तो अच्छा रहता।
सवाल: आपको और कुछ कहना है इस बारे में?
जवाब: ब्लाग हटा ,शोहरत मिली यह गौरव की बात
पर चोरी, चुपके हटा यही बड़ा व्याघात।
कैमरे वाले नौजवान ब्लागर के सामने से कैमरा हटाकर सोच ही रहे थे कि किसके चेहरे पर टिकायें कि एक उनींदी सी आंखों वाला चेहरा खुद कैमरे के सामने टिक गया और देखते-देखते खर्राटे मारने लगा। लोगों ये कौन है, आप कौन है, बताते क्यों नहीं की आवाजें उठने लगीं।
इसीलिये हम कहते थे कि सब लोग अपना प्रोफ़ाइल लगाकर चला करें। दस साल और मौज कर लो फ़िर एक-एक की खटिया खड़ी करेंगे- कोने में खड़े बर्नाल के उपयोग से कुछ सुकून महसूस करते हुये ज्ञानदत्त जी बोले। इस बीच वे अपनी बची हुयी बर्नाल प्रमोद जी को थमा चुके थे और इसके बदले में उनसे एक दूसरे के ब्लाग पर आने-जाने और टिपियाने का करार (MOU) आंखियों ही अंखियों से कर चुके थे। फुरसतिया यह सब देखकर भी अनजान थे। उनको कुछ न बोलते देखकर गिरिराज बोले- आपको जब बोलना चाहिये तब आप बोलते नहीं। इस पर जब हम बोलते हैं तो आप बोलते हो कि बोलता है।
बहरहाल उन अधमुंदी आंखों वाले से जब पूछताछ हुयी तो उसने बताया कि उसे नींद की बीमारी हो गयी है। वह जहां देखो वहां सो जाता है। इसका इलाज खोजते-खोजते उमर बीत रही है लेकिन इलाज न मिला। लगता है हम सोते-सोते ही हमेशा के लिये सो जायेंगे।
बहरों को जगाने के लिये बम की आवश्यकता होती है- उसकी बातें सुनते ही एक मुर्दाबाद-मुर्दाबाद का नारा लगाता हुआ व्यक्ति बोला।
अबे चुप। ये नारद के लोग नहीं हैं। आम जनता हैं। हम इन्हीं के पक्षधर हैं। इन्हीं के लिये लड़ रहे हैं। इस तरह जहां मन आया जो मन आया बोल देते हो। कितनी भद्द पिटती है पता है। – एक अनुभव वृद्ध, झुर्री समृद्ध व्यक्ति बोला।
और ये प्रमोद भैया जो मन आता है वो कहते रहते हैं उनको नहीं टोंकते हौ। हम जरा सा नारा क्या लगा दिया हमको दबा रहे हैं आप लोग। बेइज्जती खराब करते हैं। इतने लोगों के बीच में हमको ऐसे कहते हैं तो हम नाराबाजी कैसे करेंगे।
वह आगे कुछ बोले तब तक समीरलाल टाइप लेकिन समझदार से व्यक्ति ने उसके इस बिसूरते डायलाग को उसकी पोस्ट मानते हुये “वाह क्या खूब कहा है कहकर” उसके गाल पुचकारते हुये बगल वाले की जेब से दस का नोट निकालकर उसके हाथों में थमा दिया और उससे कहा- जाओ बेटा अपने लिये एक चाकलेट
ले लेना और हमारी लिये पान मसाला की पुड़िया। लड़का उसी तरह नौ दो ग्यारह हो गया जिस तरह जीतेंन्द्र नारद पर राहुल का ब्लाग प्रतिबंधित करके खिसक लिये।
जैसे ही लड़का आंखों के सामने से ओझल हुआ वैसे ही लोग फिर उस उनीदे से चेहरे पर झुक गये। उसको हिलाया-डुलाया गया तो वह जगा। उसको बहुनिद्रा की शिकायत थी। वह चाह रहा था उसका ऐसा इलाज किया जाये जिससे कि वह मरने के पहले करवटें बदलते रहे रात भर हम गाने को जी सके। वह अपनी आंखों की पलकों शाश्वत चिपका-चिपकी से ऊब चुका था। उसकी आंखे किसी उसकी पलकों का ही पहरा था। वह चाहता था कि उसकी पलकों में विवाद हो। वे एक दूसरे से दूर जायें, फड़फड़ायें ताकि वह अपनी आंखों से दुनिया की खूबसूरती देख सके।
नसीरुद्दीन जी ने उस बच्चे की बीमारी पकड़ ली। तखलिया कहा। सब ब्लागर बाहर चले गये। उन्होंने उसको पुचकारते हुये कहा- बेटा मैं तेरी हालत समझ सकता हूं। क्योंकि दो दिन पहले मैं ऐसी ही हालत से गुजर चुका हूं। तू ऐसा कर कि अपना एक ब्लाग बना। उसे नारद पर रजिस्टर कर। फिर कुछ पोस्टें उस पर लिख। इसके बाद आंख मूंदकर कल्पना कर कि तेरे ब्लाग पर नारद का बैन लगेगा। जैसे ही तू यह सोचेगा तेरे चेहरे से नींद ऐसे दूर भागेगी जैसे नारद से जुड़े लोगों से अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करने की भावना। जा खुदा तुझे खुश रखे।
नौजवान को जाने के लिये लिये कह कर नसीरुद्दीन जी तीर की तेजी से बाहर निकल गये। इस बीच वह नौजवान दो कदम चल कर फिर वहीं लुढ़क गया। नींद ने उसके चेहरे पर कब्जा कर लिया था।
इस बीच फोटोग्राफ़रों को भूख लग आयी थी। उन्होंने तमाम लोगों से पूछा -भाई यहां खाने का क्या इंतजाम है लेकिन सबने जवाब दिया कि भाई हम खुद आमंत्रित हैं। ये देखो हमारा कार्ड।
उन्होंने एक आदमी को बिना काम-काज के इधर-उधर भागते देखा। वह कभी अभय जी के पास जाकर उनकी मिजाज पुरसी कर रहा था कि भाई आपके जैसे निर्मल मन का आदमी हमने नहीं देखा। एक कनपुरिया पंडित ही है ऐसा हो सकता है। इस सारे प्रकरण से उपजे आपके दुख को देख कर मेरे दिल के जितने टुकड़े हुये हैं उतने तो नक्सलियों के भारत में दल (५६) भी नहीं हैं। गर्मी में आपकी दाढ़ी चुभ रही होगी। आइये आपकी दाढ़ी बनवा दें। शशि सिंह से भी ज्यादा स्मार्ट लगेंगे।
लेकिन अभयजी ने उसे यह कहकर कि मूछों की लडा़ई के पहले मैं एक बाल भी नहीं कटवाऊंगा कहकर उस आदमी को टरका दिया। बाद में कुछ लोगों ने बताया कि अभय जी कह रहे थे-चले हैं बड़े कहीं के हमारी दाढ़ी बनवाने वाले। खुद भीष्म पितामह की तरह असहाय बने फिरते हैं। पितामह की दाढ़ी तो हजारों सालो पुरानी होगी। लगाओ तो जरा हिसाब सृजन शिल्पी। तुमने नोट किया होगा जब तुमने भी इनको भीष्म पितामह कहा था। तुम तो सब कुछ नोट करके रखते हो।
हां काहे नहीं ये तो सब कुछ नोट करते रहते हैं। मैं तो भाई साहब से कहना चाहता हूं कि ये सुजाता से बातचीत करके उनके ब्लाग का नाम अपने लिये कर लें और फिर अपना ब्लाग रख लें- सृजन शिल्पी की नोटपैड। -एक कुंवारा ब्लागर बोला।
सृजन शिल्पी मुस्करा रहे थे। मुस्कराने का अभ्यास न होने के कारण कष्ट हो रहा था। लेकिन जुटे पड़े थे। उनके प्रयास को देखकर कोई रनिंग कमेंट्री करता हुआ बोला- नारद पर ब्लागरों के दो दलों की तरह उनके उनके होंठ एक दूसरे दूर होते जा रहे हैं। दांत बिनाका स्माइल की तरह चमक रहे हैं। चेहरा कह रहा है तुम मुझे मुस्कान दो मैं तुम्हे चमक दूंगा। उनको मुस्कराने-हंसने का अभ्यास नहीं हैं। अभी दो दिन पहले हीउन्होंने अपना जन्म दिन मनाया है कि उनको यह हंसने का कठिन काम सौंप दिय गया है। उनके चेहरे पर खिंचाव बढ़ रहा है। दर्द भी हो रहा है लेकिन वे लगातार मुस्कराते जा रहे हैं। सच है कष्टों में भी मुस्कराते रहना कोई इनसे सीखे।
इस बीच कैमरे और माइक को अपनी तरफ़ मुखातिब देखकर सुजाताजी मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी की तर्ज पर ललकार कर बोलीं- मैं अपनी नोटपैड नहीं दूंगी।
इस हल्ले-गुल्ले के बीच वह फुरसतिया सा आदमी प्रमोद सिंह के में जाकर फुसफुसाने लगा- आप इतना अच्छा लिखते हैं कि आपको भी नहीं पता। जिसे आप पतन शील साहित्य कहते हैं उसे पढ़ने के लिये तमाम लोग पतन के गर्त से उचक-उचककर ऊपर आ रहे हैं। वे उद्दात्ती करण के लिये अर्जी दे रहे हैं। ऊपर उठ रहे हैं। सिर्फ़ इस लालच में कि आपका लिखा पढ़ सकें। आपके साहित्य को पढ़ने के लिये उद्दातीकरण की अर्जी जितने लोगों ने दी है नारद से अपना ब्लाग हटाने के लिये दी गयी अर्जियों की संख्या उसके सामने कुच्छ नहीं हैं। एक तो वे सारी अर्जियां फर्जी हैं। और दूसरे वे संख्या में इतनी कम हैं कि अगर उन सबको फाड़कर चिंदी -चिंदी करके पुर्जियां बनायी जायें तब भी आपका लिखा पढ़ने के लिये जितने लोगों ने उदात्ती करण की अर्जी दी उसकी संख्या के सामने वे पुर्जियां कहीं नहीं ठहरतीं। ये लीजिये एक ठो सिगरेट और फूंकिये। दिल मत जलाइये।
प्रमोद सिंह झांसे में नहीं आये बोले- हमसे काम की बात करिये। ये बताइये आप राहुल का ब्लाग बहाल करते हैं कि धांस दें अर्जी नारद से अपना ब्लाग हटाने की?
फुरसतिया पहले तो सोचा कि हेंहेंहें कहकर इनको फुसलाया जाये फिर एक ठो कैम्पाकोला पिला दिया जाये जिसे ये ठंडे बनें रहें। लेकिन उनकी सोच पर पोंछा लगाते हुये किसी ने पीछे से ‘प्राम्पटिंग’ आप अच्छे इंसान नहीं प्रशासक बनिये। इस आवाज से घबड़ाकर फुरसतिया ने फिर से कमर कसने का प्रयास किया। लेकिन कमर किसी समझौते की बात पर तैयार ही नहीं थी। वह पसरी रही। इस पसर की पसड़ को अपने चेहरे से झट्ककर फुरसतिया ने प्रमोदजी के ‘धांस दें’ को खूंटे की तरह इस्तेमाल किया और कहना जारी रखा।
हां वही तो मैं कह रहा था कि आप इतना धांसू लिखते हैं, इतना धांसू लिखते हैं जितना कि वे भी नहीं लिखते जो लिखना बंद कर चुके हैं और वे तो आपके पास तक नहीं फटकते जिन्होंने अभी लिखना शुरू तक नहीं किया। आप का लेखन न भूतो न भविष्यत वाली श्रेणी में आता है। आप शब्दों से ऐसे खेलते हैं जैसे पेले फुटबाल से खेलते थे। आपकी शब्द ड्रिबलिंग लाजवाब है, वाऊ टाइप की है, अमेजिंग तो हइऐ है और जब आप प्रेमपत्र वाले कोने में पहुंच जाते हैं ड्रिबलिंग करते हुये तो हाऊ स्वीट कहने से कोई माई का लाल मना ही नहीं कर सकता।
हमको चापलूसी पसंद नहीं है। लेकिन सच बोलने वाले की बात हम हमेशा से सुनते आये हैं। तुम जरा न भूतो न भविष्यत वाली बात फिर से बताओ। इसका क्या मतलब है। जबसे हम राउरकेला से निकलकर इधर-उधर भटकते हुये इहां पटकनी खाये हैं तबसे लेकर आज तक इस तरह के बात हमारे लिये किसी ने नहीं कही। इससे तुम्हारा मतलब क्या है हम साफ़ कर लेना चाहते हैं। बताओ- कहते हुये प्रमोद सिंह जी ने सिगरेट फिर सुलगा ली। उनके चारो तरफ़ लगा जमावड़ा देखकर ज्ञानदत्त जी नये-नये करार(MOU) के लिहाज कुछ बोले तो कुछ नहीं लेकिन प्रमोद सिंहजी से बोले -आपका काम हो गया तो बर्नाल जरा इधर फेंकिये। साथ में एक चेले को देखकर बोले -बेटा जरा भागकर रवीशकुमार वाले फ्रिज से एक बोतल पानी ले आओ।
प्रमोदजी की न भूतो न भविष्यत जिज्ञासा में फंसे फुरसतिया जल तू जलाल तू आई बला को टाल तू बुदबुदाते हुये न भूतो न भविष्यत के झूले में झूल रहे थे। अपने हाईस्कूल के दिनों में संस्कृत के पीरियड में गुल्ली डंडा के खेल को कोस रहे थे। वे यह भी सोच रहे थे कि काश ये भूतो न भविष्यत वाल सवाल कोई ब्लाग होता तो इसे अब तक बैन करा दिया होता। लेकिन खुदा गंजों को नाखून नहीं देता दोहराते हुये अपने नाखून चबाने लगे।
करीब आधे घंटे बाद जब फुरसतिया ने लांग शाट में धीरे-धीर आखें ऊपर उठाईं तो देखा कि अपने चेहरे के हर नैनो वर्ग मीटर में न भूतो न भविष्यत की व्याख्या का प्रश्न चिन्ह सामने विराजमान थे। दर्जनों सिगरेट के बुझे हुये टोंटे उनके चरणों को पखार रहे थे। हर एक पर लिखा था ‘सिगरेट स्मोकिंग इस इन्जूरियस टु हेल्थ’। पहले तो सोचा कि इसी को ले उड़ें और आंखों में आंसू भरकर समझायें कि प्रमोद जी आप ऐसा क्यों करते हैं? आखिर आप पर हमारा भी कुछ अधिकार है। आप जब राउरकेला से मुंबई गये होंगे तब कानपुर से भी गुजरें होंगे। यहां समोसा चटनी का नमक खाया होगा। उसी नमक की याद दिलाते हुये मैं कहता हूं कि आप प्लीज ये सिगरेट पीना छोड़ दीजिये। मैं आपके ब्लाग पर रोज दो कमेंट करूंगा। एक बिना पढ़े और दूसरा पढ़कर। अगर आप कहेंगे तो तीसरा कमेंट समझकर भी करूंगा लेकिन आप प्लीज ये सिगरेट पीनी छोड़ दीजिये।
लेकिन प्रमोद जी तने हुये चेहरे ने फ़ुरसतियाजी की सिट्टी गुम कर दी। कुछ देर में पिट्टी भी। वे सटपटा कर समरथ को नहिं दोस गुसाईं का पाठ करने लगे। इस मानस पाठ से अप्रभावित प्रमोद जी पूछने लगे- हमारे लेखन में न भूतो न भविष्यत से आपका क्या आशय है?
तुम से आप पर उतरते देख फुरसतिया का आत्मविश्वास थोड़ा सा बढ़ा और फिर से आकाश से बतियाने लगा। और वे बोले-आपके लेखन के बारे में न भूतो न भविष्यत से मेरा मतलब यह था कि न पहले इस तरह का लिखा गया न बाद में लिखा जायेगा। न पहले का कोई ब्लागर इस तरह की चीजें लिख पाया है न बाद में लिख पायेगा।
इसको जरा खुलकर बताओ भाई, हम जानना चाहते हैं। घबराओ नहीं। हमें अपना ही समझो। किस तरह से हमारा लेखन दूसरों से अलग है। अभूतपूर्व है। न भूतो न भविष्यत है? -ये लो एक सुट्टा मार लो फिर बताओ।
नहीं नहीं मैं लेता नहीं।आप भी इसे मत पिया करें। आपकी एक सिगरेट आपकी एक पोस्ट कम करती है।-फुरसतिया समझाइश देते हुये बोले।
अच्छा कम कर देंगे तुम बताओ। -प्रमोदजी बोले।
आपका लेखन इसी मामले में दूसरों से अलग है, न भूतो न भविष्यत है कि न उसे पहले कोई समझ सका न बाद में कोई समझ सकेगा। -फुरसतिया के अंदर पता नहीं कहां से युधिष्ठिर की आत्मा फड़फड़ाने लगी।
प्रमोद सिंहजी के चेहरे पर फुरसतिया ने देखा तो राम की शक्ति पूजा का भूधर ज्यों जलती मशाल का अर्थ समझ आया। प्रमोद जी आगे कुछ पूछें तब तक उनको पत्रकारों ने घेर लिया था। अपने चेहरे पर कैमरों की चकाचौंध के बावजूद ज्ञानदत्त की के द्वारा फेंकी गयी बर्नाल की शीशी को प्रमोद सिंह द्वारा कैच करते देखकर सोच रहे थे कि इनको भारत की टीम का फ़ील्डिंग कोच बना देना चाहिये।
कैमरे वाले जब फुरसतिया को घेर के खड़े हो गये तो माइक वाले भी आ गये। सवाल-जवाब के दौर शुरू हो गये।
सवाल- आपने राहुल का ब्लाग नारद पर बैन क्यों किया?
जवाब- हम कौन होते हैं भाई बैन करने वाले। संसार का नियंता तो वह है। ऊपर वाला। सब कुछ उसकी मर्जी से चलता है।होइहै सोई जो राम रचि राखा ।को करि तर्क बढ़ावहि शाखा।
सवाल: आप इस तरह के बयान देकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। (कैमरामैन माइक कैमरे को हथकड़ी की तरह मुंह के सामने नचाते हुये चीखा)।
जवाब: भाई, पिछले तीन दिन में आप पहले आदमी हैं जो हमें जिम्मेदार बता रहे हैं। इतने दिन हो गये यह सुनते-सुनते कि हम गैर जिम्मेदार हैं। अगर आप डायबिटिक न हों तो आपके मुंह में घी शक्कर। डायबिटिक हों तो आपके मुंह में करेले का रस।
सवाल: आपको एक ब्लाग को नारद पर प्रतिबंधित करते हुये कैसा लगा? लेके पहला-पहला प्यार की तर्ज पर गुदगुदी सी हुयी या कुछ और …? आई मीन हाऊ डिड यू फ़ील आन योर मेडेन एक्शन आफ़ बैनिंग अ ब्लाग आन नारड?
जवाब: जैसा एक मेडेन ओवर फ़ेंकने के बाद एक बालर को लगता है। (अंग्रेजी में पूछे सवाल में केवल मेडेन ही पल्ले पड़ा था फुरसतिया के)।
सवाल: लेकिन आपने तो कहीं लिखा है कि यह दुखद है। क्या आप उस बयान को वापस लेना चाहते हैं?
जवाब: अरे अच्छा ये मतलब था आपका! हां दुख हुआ बहुत दुख हुआ। मुझे ही नहीं हमारे तमाम साथियों को दुख हुआ। तमाम लोगों के हाथ दर्द करने लगे नारे लगाते-लगाते। ये देखो अफलातून भाई का एक हाथ नीचे नहीं हो रहा जिससे वे नारे लगाते रहे। दूसरा ऊपर नहीं उठ रहा है जिससे वे हमारे विरोध में कवितायें टाइप करते रहे।
सवाल: कुछ आर्थिक नुकसान भी हुआ?
जवाब: हां भाई बहुत हुआ। सागर देखो अपने पीसीओ में सारे ब्लाग जगत पर टकटकी लगाये बैठे रहे। ग्राहक आये चले गये। प्रमोद सिंह जी पांच डिब्बे सिगरेट फूंक चुके। संजय बेंगाणी हर ब्लाग पर जा-जाकर शाबास नारद कहने वालों का हौसला बढ़ाने के चक्कर में अपना व्यापार छोड़ना पडा़। प्रत्यक्षा ने बताओ आज इतवार के दिन पोस्ट लिखी। अब कल आफिस में दिन भर कमेंट देखने में गुजार देंगीं। काम पर असर होगा कि नहीं? अविनाश की नारे लगा-लगाकर हालत खराब हो गयी। अपने पैसे से आज गये हैं इलाज कराने। मसिजीवी का रोते-रोते हाल खराब हो गया। चार रुमाल खरीदने पड़े। न जाने कितना बिजली खर्च हो गयी। देश की अर्थव्यवस्था की वाट लग गयी।
सवाल: लोग कहते हैं कि इससे नारद की प्रतिष्ठा कम हुयी। छोटापन जाहिर हुआ?
जवाब: लोग कहते हैं तो कुछ सोचकर ही कहते होंगे। वैसे आमतौर पर ऐसी बातें कहने से पहले सोचने का रिवाज नहीं है। लेकिन खराब तो लग ही रहा है।
सवाल: नारद को लोग तानाशाह बता रहे हैं?
जवाब: हां बता रहे हैं। असल में यह कदम उनकी बात को सच साबित करने में सहायक होगा। ब्लाग पर प्रतिबंध तो आज लगा लेकिन नारद पर तानशाही के अलावा भी तमाम आरोप लोग पहले से ही लगाते आ रहे हैं। कुछ लोग तो गुडमार्निंग कहने की जगह सुबह की शुरुआत नारद तानाशाह है कह कर करते थे। उनको खुशी होगी इस बात से कि अब उनको कोई झूठा नहीं ठहरा सकता। यह कुछ उसी तरह का सोच है कि जब बदनामी हो ही रही है तो कायदे से हो।
सवाल: आपके जिन साथियों को ब्लाग के बैन करने से एतराज है वे आपकी इस बात से सहमत क्यों नहीं हैं कि ब्लाग को प्रतिबंधित करना नारद का अधिकार है?
जवाब: वे इसलिये सहमत नहीं हैं क्योंकि फिर वे हमको धिक्कारेंगे कैसे?
सवाल: नारद की इस तार्किक बात का विरोध वे किसलिये कर रहे हैं? क्यों आपके काम अतार्किक बता रहे हैं?
जवाब: अब यह तो आप उन्हीं से पूछिये तो बेहतर होगा। वैसे मुझे लगता है कि इस तरह का आभासी विरोध उनके संघर्ष के अहम को संतुष्ट करता होगा। इस चिलचिलाती गर्मी में बाहर सड़क पर किसी सामाजिक समस्या के लिये जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने में खून जलेगा, पसीना बहेगा, रंग काला होगा, हो सकता है कुछ दिन के लिये एक बार फिर मुफ़्त का रहना, खाना,पीना नसीब हो जाये। इस कष्टकारी झमेले में पड़ने से अच्छा है कूलर की हवा में ठाठ से चाय सुड़कते हुये नारद के धुर्रे उड़ा दिये जायें, फुरसतिया को भीष्म की तरह असहाय बता दिया जाये, चौधरी को प्रचार कामी बता दिया जाये। यह बड़ी आसान तरकीब है। इसलिये विरोध हो रहा है। करेंट फ़ालोस द लीस्ट रेजिस्टेंट पाथ।विद्युतधारा न्यूनतम प्रतिरोध के रास्ते पर चलती है।
सवाल: इस सारी विरोध प्रक्रिया को आप किस तरह देखते हैं?
जवाब: यह मेले ठेले में भीड़ भड़क्का खाते हुये देवी दर्शन के मुकाबले आन लाइन आरती की तरकीब सुगम है। सहज है। इसी लिये प्रचलित है चर्चित है। ऐसी आजादी और कहां?
सवाल: आपको भीष्म के तरह असहाय बताया गया इस तुलना के बारे में आप क्या कहते हैं?
जवाब: यह तुलना भीष्म जैसे महापुरुष ज्ञानी का अपमान है। उपमा सांगोपांग न होने से बचकानी प्रतीत होती है। भीष्म चिरकुंवारे थे। अपने भाइयों के लिये कन्यायें हर लाये। जबकि हमारे एक पत्नी है जिसने दुई सुत सुन्दर जाये हैं। हम नौकरी करते हैं उनको जरूरत नहीं थी। सबसे अलग हम ब्लागिंग करते हैं जबकि भीष्म ब्लागर नहीं थे।
सवाल: आपको क्या लगत है? इस विवाद का कोई हल निकलेगा?
जवाब: अनुनादजी के ब्लाग पर एक श्लोक है जिसका मतलब है ऐसा कोई अक्षर नहीं जिससे कोई मंत्र न बने, ऐसी कोई जड़ नहीं जिससे कोई औषध न बन सके। इसी तर्ज पर मैं मानता हूं कि ऐसा कोई विवाद नहीं जिसका कोई हल न हो?
सवाल: किस चीज ने इस विवाद को उकसाया?
जवाब: आपसी अविश्वास ने और पूर्वाग्रह ग्रस्त गलतफ़हमियों ने। कुछ लोग अपने को सर्वज्ञानी मानते हुये आस्था चैनेल के बाबाऒं की तरह हमेशा उपदेश रत रहे, कुछ अपने अज्ञान को अपना आभूषण मानते रहे। तकनीकी अज्ञानता के चलते भी लोगों न नासमझी भरे बयान दिये। जो लोग नारद के इस कदम से नाराज हैं उन्होंने इस बात की तरफ़ तनिक भी ध्यान देना जरूरी नहीं समझा कि इसके तकतीकी काम-धाम देखने वालों का अपना कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं जुड़ा रहा इससे। सिवाय काम की तारीफ़ के और कोई इन्सेंटिव नहीं रहा। इसके बावजूद उनकी मेहनत की अनदेखी करके तानाशाह, अलोकतांत्रिक आदि बाते कहना सही नहीं था मेरे ख्याल से। अगर वे उस मेहनत को ‘विजुलाइज’ कर पाते जो इस तरह की सुविधाऒं को जुटाने में लोगों न की तो शायद उनका रुख अलग होता। एक गलत बात लिखने वाले ब्लाग को प्रतिबंधित करने के नारद के कदम की तुलना आपातकाल से करने की प्रवृत्ति शायद यह बताती है कि वे कल्पना में आपातकाल जैसी स्थितियों से जूझने का चरम आनंद प्राप्त कर रहे हैं। ‘कोशल मेरी कल्पना में गणराज्य है’ की तर्ज पर वे चार ठो पोस्ट टाइप करके आपातकाल का मुकाबला करने का सुख पा रहे हैं। यह मेरे ख्याल से दुखद है। यह अलग बात है कि इसक आधिकतर ‘कम्युनिकेशन गैप’ के कारण है।
सवाल: धुरविरोधी के द्वारा ब्लाग बन्द कर देने को किस तरह से देखते हैं?
जवाब: यह दुखद है। धुरविरोधी जैसे जुझारू साथी को ऐसा नहीं करना चाहिये। उनके जैसा प्रखर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थक अपनी लड़ाई को छोड़कर दुकान बंद कर दे यह उसकी प्रवृत्ति का लोचा लगत है। वैसे लगता है कि उन्होंने अपना ब्लाग अभी डिलीट नहीं किया है। उनको यह समझना चाहिये कि उनके लिखे पर हमारा भी हक है। जो वे लिख चुके वह मात्र उनका नहीं रहा। अपनी पोस्ट के साथ-साथ हमारी टिप्पणियां मिटा दें तो वे कैसे दूसरों की अभिव्यक्ति के हिमायती हैं। लोग एक ,संघर्ष के प्रतीक को, बेचारा अब हमारे बीच नहीं रहा कहें, इससे अधिक दुखद और शर्मनाक और कुछ नहीं है। इसके लिये धुरविरोधी जी को सोचना चाहिये। कहा भी है- धीरज धर्म मित्र अरु नारी/ आपत काल परखिये चारी। उनके धैर्य और मित्रता की जब परीक्षा हुयी तो वे वाक आउट कर रहे हैं।
सवाल: इस विवाद के तूल देने के लिये कौन से कारण रहे?
जवाब: मैंने प्रत्यक्षाजी की पोस्ट में अपनी टिप्पणी लिखते हुये कहा है -
इस तरह के प्रतिबंध किसी तरह से दुखद हैं। एक ब्लाग के लिये भी और संकलक की हैसियत से नारद के लिये भी। नारद से एक चिट्ठा गया साथ में धुरविरोधी ने अपना ब्लाग बंद कर दिया। यह नुकसान है। लेकिन इस तरह की घटनायें इंटरनेट जैसे ब्लाग जैसे अभिव्यक्ति के माध्यम के लिये शायद अपरिहार्य हैं।राहुल का जो ब्लाग बैन हुआ उसमें वे वैसे भी कुछ लिखते नहीं थे। और आज भी उन्होंने उस पर एक फोटॊ ही लगाया है। बहरहाल इस घटना के माध्यम से आप देखिये हिंदी ब्लाग से जुड़े लोगों की मन:स्थिति पता चल रही है। लोग अभिव्यक्ति के आजादी के लिये कितने चिंतित हैं दिख रहा है। अफ़लातूनजी नयी पुरानी कवितायें खोज रहे हैं। अविनाश नये-नये ब्लाग बनाकर जिंदाबाद मुर्दाबाद कर रहे हैं। बैन के समर्थक विजय घोष कर रहे हैं। धुरविरोधी के ब्लाग के बंद होने पर मसिजीवी चिट्ठाचर्चा पर शोकसभा कर रहे हैं। इसके बाद पाठ्कों के एतराज अब शायद धुरविरोधी की अनुपस्थिति में उनका परिचयात्मक शेर झटक कर दोहरे हो जायें। चारो ओर अभिव्यक्ति के झरने बह रहे हैं। आपकी यह पोस्ट पढकर सुकून हुआ और पता चला कि आप किसको अच्छा समझती हैं और किसको खराब!कुछ सवाल भी हैं जो मैंने अभय तिवारी जी की पोस्ट पर टिप्पणी करके पूछे थे। आप उसे देखियेगा तब बताइयेगा कि क्या यह गलत किया गया? मैं मानता हूं कि बैन दुखद रहा। लेकिन उस समय के हिसाब से सही था। फिलहाल बहाली के लिये मौका देने के पहले ही इस मुद्दे को पक्ष-विपक्ष वाले जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने के लिये छीनकर ले गये।
ये जो नेट की तुरंता सेवा है यही इसकी सामर्थ्य है यही इसकी सीमा। लोगों ने दूसरों के मनोभाव समझे बिना अपने भावों की पतंगों से आसमान पाट दिया। अब इतने पेंच उलझ गये कि सुलझाना मुश्किल है।
सवाल: आपको इसका क्या हल दीखता है? क्या आप उस ब्लाग को बहाल करने के बारे में सोचते हैं?
जवाब: सवाल मेरे सोचने या न सोचने का नहीं हैं। मेरी व्यक्तिगत बात होती तो ब्लाग प्रतिबंधित ही न होता। मुझे पहले भी लोगों ने न जाने क्या-क्या कहा। एक बार तो किसी ने मुझे और अतुल को जुतियाने तक की बात कही। मैंने वह टिप्पणी अगले दिन चिट्ठाचर्चा पर प्रकाशित की। अपनी कोई टिप्पणी किये बिना। आज वह ब्लाग लिखने वाला कहां हैं कोई नहीं जानता सिवाय उसके।
जहां तक उस ब्लाग को बहाल करने या न करने के बारे में बात है तो अभी इस बारे में कुछ बात नहीं हो पायी। जीतेंन्द्र मिले नहीं। दूसरे लोग भी अभी नेट से शायद दूर हैं। इसलिये इतने हल्ले के बाद मैं अपनी तरफ़ से फिलहाल इस पर कुछ नहीं कहना चाहता। लेकिन यह आशा करता हूं कि लोग इस बात को महसूस करें कि एक गलत भाषा प्रयोग करने पर किसी ‘ब्लाग’ (जिस पर कुल जमा तीन पोस्ट लिखीं गयीं अब तक) को बैन करने के सवाल पर अड़ने की जिद करके वे पूरे समूह के संकलक को छोटा बना रहे हैं। व्यक्ति से की कीमत की तुलना संस्था कर रहे हैं। अगर उस ब्लाग पर अच्छी पोस्टें आयेंगी तो लोग खुद उसको पढ़ेंगे और शायद जिद भी करें उसको बहाल करने के लिये।
सवाल: आगे इस बारे में आपका क्या सुझाव है?
जवाब: मेरा तो यही अनुरोध सबसे है कि इस मसले पर बहुत वाक युद्ध हो चुका। अब इसे बंद करें। अगर इस बारे में बात करना जरूरी ही समझें तो मेल से बात करें। क्यॊंकि टिप्पणियां लगातार कटु होती जा रही हैं। अगले महीने जब जुलाई में दिल्ली में मिलें तो जीतेंद्र, संजय बेंगाणी, अविनाश, रवीशजी, नीरजदीवान, प्रत्यक्षाजी, मसिजीवी, नीलिमाजी, सुजाताजी, अरुण(पंगेबाज) मैथिलीजी, रंजूजी, शानू, जगदीश भाटिया और तमाम दिल्ली के ब्लागार आपस में बातचीत करके निर्णय कर लें। उनका फ़ैसला हमें मान्य होगा। आगे के लिये भी रूप रेखा तय कर लें। नारद के इस कदम के विरोधियों से अनुरोध है कि वे अपनी राय पर कायम रहते हुये भी नारद की दृष्टि से इस समस्या को देखें। नारद की इस कार्रवाई के समर्थक यह समझें कि नारद परिवार से जुड़ा एक ब्लाग पर प्रतिबंध लगने पर इसमें खुशी के ढोल पीटने जैसी बात नहीं है। इस तरह की पोस्टों पर शाबासी टिप्पणियां करना भी कहीं से शोभा नहीं देता। जैसा कि रविरतलामी कहते हैं कि नेट पर आज आप जो लिखते हैं वह चिरकाल तक अमर रहता है। आप आज जो लिखते हैं वह आपके नाती-पोते तक देखेंगे/पढेंगे। इसलिये ऐसा न लिखें कि बाद में आप या आपकी पीढ़ियां शर्मिंन्दा महसूस करें। बकौल बशीर बद्र- 
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, फिर कभी जब दोस्त बन जायें तो शर्मिंन्दा न हों।
सवाल: बस्स कि और कुछ कहना है? कोई संदेश-फंदेश भी देना है कि समेटें?
जवाब: हम अभी जा कहां रहे हैं जो संदेश दें? चले गये तो ये कौन सुनेगा कि फुरसतिया हाय,हाय। तानाशाही मुर्दाबाद। बैन आपातकाल के बराबर है। अभी तो यह सब सुनना नियति में है। फिर भी रमानाथ अवस्थी जी की लाइनें दोहराता हूं-
strong>वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये,
प्यास पथरा गयी कुछ तरल बनिये,
जिसको पीने से स्वर्ग मिलता हो
आप मीरा का वह गरल बनिये।
माइक वाला माइक उठ के भाग गया। जिंदाबाद-मुर्दाबाद ,हाय-हाय वाली भीड़ बाय-बाय कर रही थी। जो हाथ एक दूसरे के खिलाफ़ नारे रहे थे वे एक दूसरे को पकड़े हुये हिल रहे थे। ज्ञानदत्त जी और प्रमोद सिंह बर्नाल लगाने के आफ़्टर इफ़ेक्ट की चर्चा में मशगूल थे। सागर उनके पास बैठकर प्रवचन की तरह सुन रहे थे। मसिजीवी भीड़ में धुरविरोधी को खोज रहे थे। नीलिमाजी उनसे पासवर्ड मांग रहीं थीं। शशिसिंह देबाशीष को फोनियाते हुये कह रहे थे सारी रिकारडिंग हो गयी है।
आगे का हाल सुनाते इसके पहले ही सबेरे का अलार्म घनघना के बजा। टेढ़ी-मेढ़ी तान के सो रहे फुरसतिया बिस्तर पर ही उठ के बैठ गये और आंखे मलने लगे।
सबेरा हो चुका था। सूरज निकल आया था। चिड़ियां बोलने लगीं थीं।
पापा आज टहलने नहीं चलेंगे। आप कह रहे थे सबेरे उठकर ठहलेंगे। एक्सरसाइज करेंगे।
स्लीपिंग इज द बेस्ट एक्सरसाइज कहते हुये फुरसतिया करवट बदल कर फिर से सो गये । खर्राटों के शोर में जिंदाबाद-मुर्दाबाद, संघर्ष करो, बाज आओ जैसी आवाजें दब गयीं थीं। बड़े सुख ने छोटे सुख के आसमान पर अपन तम्बू तान दिया था। सबेरे-सबेरे अपना परलोग सुधारने की गरज से उठी एक आत्मा कामना कर रही थी- सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्ति मा कस्चिद दुख भाग भवेत।

27 responses to “वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये”

  1. RC Mishra
    इस वीकेन्ड मे आउटिंग का प्रोग्राम गड़बड़ा गया था, इस विवाद के चलते हमने भी मौज कर ली। वैसे मौज-मौज:D में हमको अभी एक टिप्पणी पर स्पष्टीकरण लेना बाकी है, देने वालों अभी मामला स्थगित करने को कहा है। अभी इसको पढ़ के सोने के बाद भी आपकी इस पोस्ट के सपने आने का भय है :)
  2. मैथिली
    “इस मसले पर बहुत वाक युद्ध हो चुका। अब इसे बंद करें। अगर इस बारे में बात करना जरूरी ही समझें तो मेल से बात करें। क्यॊंकि टिप्पणियां लगातार कटु होती जा रही हैं। ”
    बहुत शान्तकारी लिखा है.
  3. abhay tiwari
    शुरु में तो लगा कि आप ने अपने चिर परिचित अंदाज़ में कुछ हास्य बिखेरा होगा.. पर निराशा हुई.. एक तो निहाय्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्त लम्बा है.. बातों का दोहराव बहुत ज़्यादा है.. बोरियत इतनी हुई कि दो चार पैरा के बाद बीच बीच से पढ़ा.. फिर भी खत्म होने को आता न था.. न कोई पैनापन न तीखापन.. आपको थोड़ा सम्पादन का अभ्यास करना चाहिये.. कोशिश कीजिये कि जो लिखिये पहले सिर्फ़ उसका आधा ही रखिये.. फिर तिहाई.. ऐसा करते करते आपको समझ आने लगा कि कितना रखना उचित है.. वैसे लिखने वाले को अपने एक एक अक्षर से प्यार हो जाता है.. जैसे छोटे बच्चे उत्सर्जन कर के उसमें रचनात्मक सुख लेते हैं.. और उस चार छै महीने के फ़ेज़ में मल मूत्र से अभिभूत रहते हैं.. यदि आप को कुण्डलिनी और चक्रों और वृत्तियों के बारे में कोई जानकारी हो तो आप जानते होंगे कि रचनात्मकता.. किसी उच्च चक्र से नहीं.. बल्कि स्वाधिस्थान से संचालित है.. वही मल मूत्र वाला चक्र.. तो इस प्रवृत्ति से बच पाना आसान नहीं.. लेकिन सचेत मन से प्रयास करके उसे काटने छाँटने की कोशिश करें.. आप और अच्छा लिखेंगे.. आज का लेखन मुझे नहीं जमा.. लेकिन इसे भी पसन्द कर के वाहवाह करने वाले मिलेंगे आप को..
  4. आशीष
    अनाव्श्यक बहस काफी हो गयी है ! अगले महीने होने वाली ब्लागर महापंचायत मे निर्णय लिया जाये !
    ओम शांति, शांति, शांति।
  5. संजय बेंगाणी
    अगले माह होने वाली मीट को महा पंचायत का नाम देकर उसे भी कटु न बनाएं. मामला यहीं पूरा समझ प्यार मोहबत की पोस्टे लिखे. यही सही होगा. जो हो गया उसे भूल जाएं.
    विजयोत्सव मनाने की आवश्यकता नहीं थी मगर जब देखा की मातम कुछ ज्यादा मनाया जा रहा है, तथा चुप्पि को कमजोरी माना जा रहा है तो यह जरूरी कदम उठाना पड़ा. मैने शाबासी दी तो यह मेरा अधिकार है की चाहूँ तो जो लोग नारद के साथ रहे है उनकी पीठ थपथपाऊँ. भविष्य सवाल करेगा तो जवाब भी दिया जाएगा.
    मजेदार पोस्ट रही. इस बार लम्बाई को लेकर कोई शिकायत नहीं.
  6. masijeevi
    इस मसले का निवाला फुरसतिया तक के मौज-मूलक हाजमे से बड़ा सिद्ध हो रहा है। फुरसतिया मापदंड तक पर पोस्‍ट ज्‍यादा लंबी थी….मौज लेते लेते सफाई देने की मुद्रा में आना पड़ गया और पिछली पोस्‍ट वाली बातों का दोहराव भी है।
    फिर भी अच्‍छा किया कि लिखा, कम से कम कल तो ठीक से सो पाएंगे :)
  7. अफ़लातून
    फुरसतिया , मेरे अप्रिय निर्णय वाले प्रिय भाई , अफ़लातूनवा का मोबाइल का नं पाने के लिए हम भी बेकरार हैं ।
  8. सागर चन्द नाहर
    गर्मी से तपती धरती पर बारिश की बूंदो सी राहत दे रही है यह पोस्ट, मजेदार! पढ़ कर कई जगहों पर बहुत हंसी आई और ना ही पोस्ट लम्बी लगी।:)
    मेरा परिचय सभी नये ब्लॉगरों से बढ़िया करवा दिया धन्यवाद; और हाँ सबसे यह भी बता देते की टंकी पर चढ़ने का अधिकार सिर्फ मेरा है। :)
  9. रवि
    तिवारी भइया, तब तो आपको मुझे भी , और तमाम ब्लॉगर बंधुओं को आपसे सीखना पड़ेगा लगता है. हमें भी अपना चक्र खोलने का रास्ता बतइदो.
    वैसे भी, हर कोई अपने लेखन में दूसरों के हिसाब से कच्चा ही रहता है.
    बच्चा बहुत छोटा रहता है तो अपने मलमूत्र में लिपटा-लिथड़ा रहता है. परंतु जब वह तनिक बड़ा हो जाता है ना, तो वह अपने मलमूत्र को अपने अंदर समेटने में ज्यादा अच्छा महसूस करता है. उसे अपना मलमूत्र बाहर निकालने में अच्छा नहीं लगता. बड़ी मजबूरी में, अन्य विकल्प नहीं होने पर बाहर निकालता है. और, ये, मेडिकली सत्य बात शायद आप भी जानते हों…
    सार्थक व्यंग्य वह होता है जो अपने पाठकों को तिलमिला दे. उसके शरीर में आग लगा दे. पढ़ने के बाद घंटों तिलमिलाता रहे पाठक. वही व्यंग्य सार्थक होता है.
    फुरसतिया इस दफ़ा भी कामयाब हुए हैं. टिप्पणियाँ गवाह हैं. :)
  10. उन्मुक्त
    मेरे विचार से सारे चिट्टाकार बन्धु इस विवाद के विषय को छोड़ कर अन्य रचनात्मक बातों में ध्यान लगायें और चिट्ठियां लिखें। राहुल जी भी अपने चिट्ठे पर लिखें। शांति पुनः स्थापित हो। शांति के महीने भर बाद, नारद का प्रबन्धतंत्र, राहुल जी के चिट्टे पर आयी चिट्ठियों का अवलोकन कर, इस फैसले पर पुनः विचार करें।
    अंतरजाल पर हिन्दी को लाने में, शायद सबसे बड़ा योगदान नारद के प्रबन्धतंत्र का है और वे बधाई के पात्र हैं। मुझे इस बात पर पूरा विश्वास है कि अन्तरजाल पर हिन्दी की बड़ोत्तरी के लिये, वे ठीक कदम लेंगे।
  11. डा प्रभात टन्डन
    शायद यह पोस्ट इतनी गर्मी मे ठंडक का काम करे :) ; शायद , लेकिन लगता तो नहीं , अगर ब्लाग मे AC लगवाने का बन्दोबस्त हो तो कुछ शांन्ति मिले -ओम शांति, शांति, शांति।
  12. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    बड़े ईंट-पत्थर चल रहे हैं. इसलिये हम तो अपने चेम्बर में ही रहे. वातानुकूलित में. ऊपर बर्नाल वाला आपके सपने में हमारा कोई प्रॉक्सी कर रहा होगा!
    वैसे एज अ मैटर ऑफ स्ट्रेटेजी हमने अपने ब्लॉग पर 100-500 शब्द अंग्रेजी के ठेलने शुरू कर दिये हैं – ताकि प्रेक्टिस रहे. हिन्दी का माहौल अगर और गाली-गलौज वाला होता है तो अंग्रेजी में माइग्रेशन की गुंजाइश रहे.
    और, हमने “काशी का अस्सी” पढ़ने की सलाह दी थी. भाई लोग तो उस भाषा से जमीनी तौर पर जुड़ गये!
  13. Anunad Singh
    सार्थक व्यंग्य ! लेकिन बहुत बड़ा हो गया। तीन-चौथाई पढ़ने के बाद बाकी बाद के लिये छोड़ दिया।
    एक बात बहुत ही सार-स्वरूप लगी कि इस पूरे विवाद का कारण कुछ लोगों का अपने को जरूरत से ज्यादा ज्ञानी बनने और पूरी दुनिया में फेल हो चुकी विचारधारा को दूसरों पर गाली के बल थोपने की प्रवृति है।
  14. श्रीश शर्मा
    पोस्ट का फर्स्ट हाफ पढ़कर मजा आ गया, आपकी कल्पना का जवाब नहीं। पढ़ते पढ़ते नजरों के सामने चित्र बनने लगते हैं। :)
    पोस्ट का सैकेंड हाफ मनन करने योग्य है।
  15. pramod singh
    क्षमा कीजिएगा, पंडिजी, पढ़ते-पढ़ते आंख लगी गई.. अब बस यही उम्‍मीद है कि प्रियंकर बाबू आकर एक क़ुतुब मीनार टाइप टिप्‍पणी लिखें तो चौंककर हमरी आंख खुले.. वैसे लगता है लिखते-लिखते आपकी भी आंख लग गई थी. या फिर आंख लगे-लगे ही आपने लिख मारा. चलिए, ऐसा वक़्त भी आता है कि आंखें मूंदे रहने के सिवा और कुछ सूझे भी नहीं..
  16. rajesh roshan
    aapne kuch jayada hi lamaba likh diya hai. Maine kewal 3 paragraph padh. Sorry for this. I should read this full but…. :). Abhay ji ki baat maniye thoda editing ka prayaas kijiye.
    Sorry and Thanks
    Rajesh Roshan :)
  17. समीर लाल
    पढ़ लिये पूरा.
    चलिये, किसी भी तरह, बस शांति बहाल हो जाये, यही आशा करते हैं.
    ओम शांति, शांति!!!
  18. Jagdish Bhatia
    “वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये,
    प्यास पथरा गयी कुछ तरल बनिये,
    जिसको पीने से स्वर्ग मिलता हो
    आप मीरा का वह गरल बनिये।”
    बहुत हंसाये हैं कि हंसते हंसते आखिर की पंक्तियां पढ़ मन भर गया।
    आपकी मनःस्थिती को समझ रहे हैं, केवल आप ही इस मनःस्थिती में ऐसा लिख सकते हैं।
  19. अरुण
    अब बस भी करे,बहुत हुआ,जो विजय पताका फ़ैरा रहे है वो भी और और जो नारज है वो भी,आखिर क्या चाहते है आप सब,कुछ चाहते है
    की ऐसा फ़िर दुबारा ना हॊ,और जॊ पहले हुआ वो ना हो
    पर आपका कहने का ढंग जर सा आज दबंग वाला है,मै जानता हू ये बात आपको उधर से पहले होने वाले हमले जॊ मोदी हिन्दू,और अन्य इस तरह की बातो से घयल होने के वक्त के है,जो आप्को मिले,पर दोस्तॊ हर बार बदला तो लेने का वक्त नही होता ना,आज जरुरत है शांती की फ़िर से एक अच्छा माहोल बनाने की
    मै सब से अपील करना चाहत हू,खत्म करे ये सब और आ जाये फ़िर से साथ,बस दिल मे एक बात लेकर,की अब किसी का दिल दुखाने वाला काम नही करना है,न आपने ,ना आपने
  20. नीलिमा
    अनूप जी, न केवल आप जबरिया लिखते हैं वरन जबरिया पढवाते भी हैं ! अत्यंत कल्पनाशील , शरारत के टच के साथ , बात – बात में मन की बात ….अति आनंद आया !
  21. Pratik Pandey
    बहुत ज़बरदस्त लिखा है। लेकिन “वधू चाहिए” वाले कॉलम में हमारी फ़ोटू न दिखेगी कभी। ब्रह्मचारी रहेंगे ऐसा नहीं है, लेकिन कॉलेज में बहुत स्कोप है और अपने बूते कुछ करने की प्रतिभा भी है। :)
  22. शशि सिंह
    पोस्ट लम्बी जरूर रही मगर मैंने एक बार में ही पूरी पढ़ी। मेरा ध्यान पोस्ट की लम्बाई की तुलना में उसके मर्म और लिखे जाते समय की मनोदशा पर ज्यादा था… मैं आपके इस बात से पूर्णत: सहमत हूं कि हर समस्या का समाधान जरूर होता है। बस उसे खोजने की ईमानदार कोशिश की दरकार होती।
    हम एक छोटी-सी बात क्यों नहीं समझ पाते कि हम जो व्यवहार अपने लिए अपेक्षा करते हैं वैसा ही व्यवहार हमें दूसरों के लिए भी रखना चाहिये। अब गाली-गलौज करने पर कोई फूल-माला थोड़े न भेंट करता है अलबत्ता जुतमपैजार की सम्भावना अधिक रहती है। रही बात आंदोलनकारियों कि तो भैया, अपने ब्लॉग के पन्नों पर ज़िन्दाबाद-मुर्दाबाद करने से सूरतें नहीं बदलती… और भी ग़म हैं जमाने में ब्लॉग के सिवा। अगर दम-गुर्दा है तो सामने आइये… मिलकर एक संगठन का निर्माण करें जो गरीब-गुरबों के बीच जाकर काम करने को तैयार हो। … वरना सब बातें हैं बातों क्या?… कुछ तुम कहो, कुछ हम कहें और ज़िन्दगी चलती रहे… … …
    जय हिंद
  23. चौपटस्वामी
    फ़ुरसतिया भाई!
    ये किस अबूझमाड़ में प्रवेश कर गए कि निकलते नहीं बन रहा है .
    बिना कम्पास के गहरे सागर में निकल गये लंबी यात्रा पर . और अब लौटने का रास्ता सूझ नहीं रहा है . अंधेरा है तो क्या , ध्रुवतारा देखिए और कृपया लौट आइए . हम सब विकल हैं .
  24. Sanjeet Tripathi
    खालिस फ़ुरसतिया और शानदार पोस्ट!!
    श्रीश भाई की बात से सहमत!!
  25. फुरसतिया » संवेदना के नये आयाम
    [...] काफ़ी पहले नारद पर एक ब्लाग को बैन करने पर हुये बवाल को लेकर अपनी समझ में एक बड़ी धांसू च फ़ांसू पोस्ट लिखी थी मैं। ये पोस्ट मेरी सबसे खराब पोस्टों में से एक होगी शायद (उसके बाद से कभी पढ़ी भी नहीं) लेकिन जिस दिन लिखा उस दिन हमारी स्थिति मुग्धा नायिका की थी। मुझे इस पोस्ट की एक उपलब्धि इस पर अभय तिवारी की टिप्पणी लगती है। अभय ने लिखा थालिखने वाले को अपने एक एक अक्षर से प्यार हो जाता है.. जैसे छोटे बच्चे उत्सर्जन कर के उसमें रचनात्मक सुख लेते हैं.. और उस चार छै महीने के फ़ेज़ में मल मूत्र से अभिभूत रहते हैं..! [...]
  26. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये [...]

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