Thursday, November 01, 2007

क्रोध किसी भाषा का मोहताज नहीं होता

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क्रोध किसी भाषा का मोहताज नहीं होता

गुस्सा
गुस्सा
1.[प्रेम की भाषा मौन है। क्रोध किसी भाषा का मोहताज नहीं होता। :) ]
2.[यूं वो जहां तक तक मुमकिन हो अपने गुस्से को कम नहीं होने देते थे। कहते थे मैं ऐसी जगह एक मिनट भी नहीं रहना चाहता जहां आदमी किसी पर गुस्सा न हो सके। गुस्सा जितना कम होगा ,उसकी जगह उदासी लेती जायेगी और यह बड़ी बुजदिली की बात है। खोयापानी ]
हमारे तमाम दोस्तों ने हम पर गुस्सा करते हुये कहा है कि हमें किसी झग़ड़े में पड़ने की बेवकूफ़ी नहीं करनी चाहिये। कुछ दोस्तों ने गुस्से वाली पोस्टों पर भा गुस्सा किया यह कहते हुये कि अजीब बेवकूफ़ी है-त्योहारों मे मौसम में गुस्से की बात करते हो। :)
हम अपने को बेवकूफ़ मान कर भी सन्तोष कर लेते लेकिन ज्ञानजी को यह भी नहीं भाया। वे बोले -आप चुगद होने का का दावा कैसे कर सकते हैं। इससे आप बेवकूफ़ होने के बहाने उल्लू बनना चाहते हैं। हमारे रहते आप उल्लू तो नहिऐं बन सकते हैं। हम आपकी मंशा न पूरी होने देंगे। :)
हमें पता है कि हर लाभ के पद पर लोगों की निगाह लगी रहती है। सोचते हैं कि सीट पर अगले का दावा पक्का हो इससे पहले हम उस सीट पर अपना रुमाल रख दें। :)
मतलब आप गुस्सा नहीं कर सकते! बेवकूफ़ी वर्जित है! इससे किसको गुस्सा नहीं आयेगा?
हमने एक से एक गुस्सैल देखे हैं। गुस्सैल लोगों को इस बात का फ़ायदा मिलता है कि इसकी आड़ में उनके दूसरे अवगुण छिप जाते हैं। (जैसे फ़ुरसतिया लम्बी पोस्ट लिखते हैं की आड़ में फ़ुरसतिया की दूसरी कमियां छिप जातीं हैं।:) )
भयंकर गुस्सैल व्यक्ति ,भले ही वह बास क्यों न हो, के गुस्से की आड़ में उसके भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, हरामखोरी और न जाने कौन-कौन सी अच्छी बुरी चीजें छिप जाती है। केवल गुस्सा दिखता है। उनके लिये गुस्सा ऐसी कालीन की तरह है जिसके नीचे तमाम कीड़े-मकोड़े टहलते रहते हैं।
गुस्सा
गुस्सा
आचार्य शुक्लजी ने लिखा है- गुस्सा बहुत फ़ुर्तीला मनोविकार है। हमें उनकी बात पर यकीन सा होता दिखता है। गुस्सैल लोगों की फ़ुर्ती देखकर चकित रह जाना पड़ता है। लोग जरा-जरा सी बात पर गुस्सा करके फ़ुर्ती से दूसरे की इज्जत उतार देते हैं। अमेरिका को ईराक पर गुस्सा आया और उसने फ़ुर्ती से उसे पटरा कर दिया।
क्रोध का सम्बंध केवल पटरा करने से ही नहीं है। प्यार करने से भी है। प्यार करने वाले भी इसे जताने के लिये इस्तेमाल करते हैं। नायक लोग नायिकाऒं के गुस्से को हसीन कहते पाये गये हैं। यह सुनने वाली कुछ नायिकायें इस पर विश्वास कर लेती हैं और गाहे-बगाहे हसीन दिखने का प्रयास करती हैं।
लोग अपना प्रेम भी गुस्से के माध्यम से इसलिये प्रकट करते हैं क्योंकि वे फ़ुर्ती से इसे प्रकट करना चाहते हैं। जरा सी देर हो जाने पर कोई दूसरा प्रेम-प्रकट कर जायेगा। :) और प्रेम गली तो आपको पता ही है कि संकरी होती है। इसमें दो नहीं समा सकते। :)
देखिये क्या लफ़ड़ा है! बात बास की हो रही थी और प्रेमी-प्रेमिका आ गये बीच में। कितनी गलत बात है।
जैसा कि हमने बताया कि गुस्सा किसी भाषा का मोहताज नहीं होता। गुस्सैल व्यक्ति शुरुआत तो चीखने-चिल्लाने से लेकिन बाद में जबान पर कर्फ़्यु लग जाता है, शरीर फ़ड़कने लगता है, जी धड़कने लगता है। जैसे खटारा बस का भोंपू छोड़ सब बजता है वैसे ही गुस्से की चरम अवस्था में जबान छोड़ सारी चीजें फ़ड़कने लगती हैं। गुस्से की अवस्था में गुस्सारत व्यक्ति का सौन्दर्य चकाचौंध करने वाला है। वह देखने की चीज नहीं महसूस करने की चीज हो जाती है।जिसे दुष्यन्त कुमार ने महसूसते हुये लिखा-

तुम किसी रेल- सी गुजरती हो,
मैं किसी पुल- सा थरथराता हूं॥
इसीलिये बाद में इस प्रक्रिया को लोगों ने थरथराइटिस के नाम से प्रसिद्ध किया।
हमारे एक दोस्त थे। बताते थे कि उनके बास बहुत गुस्सैल थे। उनसे बचाव की तरकीब बताते हुये उन्होंने बताया था कि उनका बास सबेरे से ही गुस्सा करना शुरू कर देता था। कोई भी गलती देखता तो गुस्सा करने लगता। कोई गलती न देख पाता तो और गुस्सा करने लगता। इसे भांपकर लोग कुछ छोटी-मोटी गलती छोड़ देते और छोटे-मोटे गुस्से झेल जाते। लेकिन उस दोस्त ने बताया कि वो बास के पास हमेशा लंच के एकदम पहले जाता था। सबेरे से डांटता-डांटता बास दोपहर तक खलास हो चुका होता था। डांटने के लिये लंच के बाद बुलाता लेकिन दोस्त हमेशा अगले दिन लंच के पहले गया। डांट से बचा।
गुस्सा करने वाले वाले बास का यह चरित्र होता है कि उसे हर वह बात बुरी लगती है जिससे उसके क्रोध के प्रवाह में कमी होती है। अगर वह बेवकूफ़ी की बात कर रहा है (अक्सर ऐसा ही होता है) तो आपकी ज्ञानबीड़ी उसकी आग में घी की तरह काम करगी। अगर आपने अपने बास की बेवकूफ़ी में अपनी बेवकूफ़ी मिलाने की कोशिश की तो वह और गुस्सा हो जायेगा कि उसकी बराबरी करने का प्रयास किया जा रहा है। अगर बास ज्ञानकी बातें (बहुत दुर्लभ मौके होते हैं ऐसे) के सहारे आपको डांटता है तब तो उसका यह सर्वाधिकार बन जाता है कि वह आपको आपकी बेवकूफ़ी पर डांट सके। बास के गुस्से से बचने का सबसे सही उपाय किबला ने बताया- कभी अपने बुज़ुर्ग या बॉस या अपने से अधिक बदमाश आदमी को सही रास्ता बताने की कोशिश न करना।उन्हें ग़लत राह पर देखो तो तीन ज्ञानी बंदरों की तरह अंधे बहरे और गूंगे बन जाओ!
अब यह विडम्बना ही तो है कि बास आम तौर आपसे बुजुर्ग भी होता है और आपसे बड़ा बदमाश भी। :)
जिन लोगों ने अपनी जिन्दगी में गुस्से करने के सिवाय कोई काम नहीं किया वे भी बास बनते हुये अपने पराक्रमों की गिनती करने लगते हैं। ये सारे पराक्रम उन्होंने ऐसे किये होते हैं जिनका उनके अलावा और कोई गवाह नहीं होता। जिंदगी भर डांट खाते रहने वाला व्यक्ति अपनी सारी जिंदगी डांटने में लगा देता है।
इस रोशनी में ये शेर बदला जाना चाहिये:
उम्रे दराज मांगकर लाये थे चार दिन,
दो हड़कने में निकल गये, दो हड़काने में।
हमारे एक बास इतने डांट प्रेमी जीव थे कि दफ़्तर में रहना पसन्द करते। छुट्टियों में तबियत खराब हो जाती। जितना दफ़्तर में डांट के हरे-भरे होते उतना ही छुट्टी में घर में अधमरे हो जाते। छुट्टी से आते ही हरे-भरे हो जाते। इसी हरे-भरेपन की तलाश में लोग देर तक दफ़तर में गुजरते हैं और गुजरते समय के साथ कर्त्वयपरायण, कर्मवीर, मेहनती आदि कहलवा लेते हैं अपने को। एक शानदार नकारात्मक विकार के इतने धनात्मक लाभ। लोग क्योंकर न गुस्सा करें।
लोग सामाजिक गुस्से की उपयोगिता बताते हैं कि इससे समाज में अच्छाई बढ़ती है। बुराई का नाश होता है। दुनिया का भला होता है। लेकिन इसमें होता यह है लोग अपने को ही समाज मानते हुये अपनी ही भलाई के लिए गुस्से का उपयोग करते करते हैं और लगे ही रहते हैं। लेकिन इससे क्रोध की उपयोगिता पर कोई उंगली नहीं उठा सकता है।
ये बातें ऐसा नहीं कि दफ़्तर में ही सच साबित हों। कहीं भी ऐसा हो सकता है। कोई भी आपका बास हो सकता। आपका दोस्त, पत्नी. प्रेमिका, पड़ोसी, दुश्मन । यहां तक कि आपका अधीनस्थ भी आपसे गुस्सा करते समय आपका बास का पद निर्वाह कर सकता है। हालांकि ऐसे सुखद -दुखद अपवाद कम ही दिखते हैं। चिट्ठाजगत में आपके ब्लाग पर टिप्पणी करने वाला पाठक, आपके ब्लाग का संकलक, आपको धांसू च फ़ांसू और वंदनीय च निंदनीय उपमायें देने वाला मतलब कोई भी आपका बास हो सकता है।
अब जरा बाजार तक जाना है। सोचकर गुस्सा आ रहा है। इसीलिये फ़ुर्ती से जा रहा हूं।
गुस्सा फ़ुर्तीला मनोविकार जो होता है। :)

13 responses to “क्रोध किसी भाषा का मोहताज नहीं होता”

  1. anita kumar
    भई गुस्से में हसीनाए और भी खूबसूरत लगती है पहले क्यो नही बताया बेकार में ब्युटी पॉरलर में इत्ते पैसे बरबाद किए, गुस्सा हो कर रौब भी झाड़ लेते और सुन्दर भी दिखते।
    आगे से ध्यान रखेगे बॉस को गुस्सा आये तो इतना कि बोलती ही बंद हो जाए, थरथराए हमें क्या , नहीं तो लंच टाइम में ही जायेगे
  2. समीर लाल
    जल्दी से निकलिये बाजार की तरफ-कहीं गुस्सा बहुत बढ़ जाये कि गुस्सैल व्यक्ति शुरुआत तो चीखने-चिल्लाने से लेकिन बाद में जबान पर कर्फ़्यु लग जाता है, शरीर फ़ड़कने लगता है, जी धड़कने लगता है।
    तब बाजार से सौदा कैसे खरीदेंगे. :)
    मस्त लेखन! बधाई.
  3. हर्षवर्धन
    धन्य है गुस्सा पुराण
  4. Gyan Dutt Pandey
    1. ऑन रिकार्ड – लिखा मस्त है।
    2. खिंचाई-पुराण – क्या सुकुलजी, क्रोध और खिसियाहट खतम नहीं हुई क्या! :-) अरे चार दिन की जिन्दगी है – 2 दिन हड़कने के , दो हड़काने के। इसी में नाइट शिफ्ट कर ‘आत्मन्येवात्मनातुष्ट’ की अवस्था भी पायी जाये।
  5. अभय तिवारी
    अब क्रोध नहीं आ रहा है.. अच्छा लग रहा है कि आप की एक पोस्ट का माल तीन पोस्टों में मिला.. सोचिये अगर एक बार में यह सब पढ़ना पड़ता तो कितना गुस्सा आता..
  6. आलोक पुराणिक
    क्रोध बोरियत मिटाने का अच्छा साधन है। कई रिटायर्ड जोड़ों को देखता हूं, सुबह गुस्सा होते हैं। दोपहर को एक पार्टी मना लेती है। शाम को सब नार्मल हो लेताहै, अगली सुबह फिर क्रोध।
    वैसे आप तो शांतिदूत के कारोबार में हैं, सारी पार्टियों का क्रोध झेलना पड़ता होगा।
  7. kakesh
    जय हो जय हो.हमारा गुस्सा शांत हो गया.
  8. rachana
    आपकी पिछली पोस्ट से गुस्सा हुए थे अब गुस्सा गायब!
  9. balkishan
    थरथराइटिस का जवाब नही. मस्त-मस्त गुस्सा है. मज़ा आगया.
  10. Dr .Anurag
    vah ji vah…….sahi kaha aapne…
  11. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] क्रोध किसी भाषा का मोहताज नहीं होता [...]
  12. Dayle Che
    Hello, everything is going sound here and ofcourse every one is sharing information, that’s really excellent, keep up writing.
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