Tuesday, November 06, 2007

आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं

http://web.archive.org/web/20140419212557/http://hindini.com/fursatiya/archives/366

आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं

प्रमोद तिवारी
कुछ दिन से हम सोच रहे थे कि हम भी कुछ पाडकास्टियायें। मामला बैठ नहीं रहा था। हालांकि रवि रतलामी जी ने बातचीत करते हुये कुछ टिप्स बताये लेकिन हमारी टिप्पस ठीक से भिड़ी नहीं। फिर हमने स्वामीजी से अनुरोध किया तो उन्होंने हमारे लिये पाडकास्टिंग का जुगाड़ किया।
पाडकास्टिंग में हम अपनी आवाज सुना के आपको बोर न करेंगे। इसके किये हमारे लेख पर्याप्त कारगर हैं। :) हम अपने पास कुछ कवि सम्मेलन के कैसेट उपलब्ध हैं। मेरा मन है कि आपको उनमें से कुछ ऐसे गीत सुनवाऊं जो मुझे अच्छे लगते हैं।
इस कड़ी में सबसे पहले मैं कानपुर के मशहूर पत्रकार, गीतकार प्रमोद तिवारी का गीत सुनाता हूं। प्रमोद तिवारी के बारे में शायर शाह मंजूर आलम ने लिखा है:-
हमारे प्रमोद तिवारी दीवाने पैदा हुये हैं, दीवाने होकर जवान हुये और जब भी इस दुनिया से उस दुनिया का सफर करेंगे तो दीवानगी के साथ ही झूमते हुये छलांग लगायेंगे।
ऐसे कानपुर के दुलरुआ गीतकार प्रमोद तिवारी खुद अपने बारे में बयान करते हुये कहते हैं-
सच है गाते गाते हम भी थोड़ा सा मशहूर हुए,
लेकिन इसके पहले पल-पल,तिल-तिल चकनाचूर हुए।
चाहे दर्द जमाने का हो चाहे हो अपने दिल का,
हमने तब-तब कलम उठाई जब-जब हम मजबूर हुए।
प्रमोद तिवारी के बारे में मैंने विस्तार से पहले भी लिखा है। बहरहाल आप कविता सुनें और साथ में पढ़ते भी जायें। कैसी लगी यह कविता बतायें।:)



आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं

राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं
आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं
अपने संग थोड़ी सैर कराते हैं।

मेरे घर के आगे एक खिड़की थी,
खिड़की से झांका करती लड़की थी,
इक रोज मैंने यूँ हीं टाफी खाई,
फिर जीभ निकाली उसको दिखलाई,
गुस्से में वो झज्जे पर आन खड़ी,
आँखों ही आँखों मुझसे बहुत लड़ी,
उसने भी फिर टाफी मंगवाई थी,
आधी जूठी करके भिजवाई थी।
वो जूठी अब भी मुँह में है,
हो गई सुगर हम फिर भी खाते हैं।
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।
दिल्ली की बस थी मेरे बाजू में,
इक गोरी-गोरी बिल्ली बैठी थी,
बिल्ली के उजले रेशम बालों से,
मेरे दिल की चुहिया कुछ ऐंठी थी,
चुहिया ने उस बिल्ली को काट लिया,
बस फिर क्या था बिल्ली का ठाट हुआ,
वो बिल्ली अब भी मेरे बाजू है,
उसके बाजू में मेरा राजू है।
अब बिल्ली,चुहिया,राजू सब मिलकर
मुझको ही मेरा गीत सुनाते हैं।
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।
एक दोस्त मेरा सीमा पर रहता था,
चिट्ठी में जाने क्या-क्या कहता था,
उर्दू आती थी नहीं मुझे लेकिन,
उसको जवाब उर्दू में देता था,
एक रोज़ मौलवी नहीं रहे भाई,
अगले दिन ही उसकी चिट्ठी आई,
ख़त का जवाब अब किससे लिखवाता,
वह तो सीमा पर रो-रो मर जाता।
हम उर्दू सीख रहे हैं नेट-युग में,
अब खुद जवाब लिखते हैं गाते हैं।
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।
इक बूढ़ा रोज गली में आता था,
जाने किस भाषा में वह गाता था,
लेकिन उसका स्वर मेरे कानों में,
अब उठो लाल कहकर खो जाता था,
मैं,निपट अकेला खाता सोता था,
नौ बजे क्लास का टाइम होता था,
एक रोज ‘मिस’नहीं मेरी क्लास हुई,
मैं ‘टाप’ कर गया पूरी आस हुई।
वो बूढ़ा जाने किस नगरी में हो,
उसके स्वर अब भी हमें जगाते हैं ।
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।
इन राहों वाले मीठे रिश्तों से,
हम युगों-युगों से बँधे नहीं होते,
दो जन्मों वाले रिश्तों के पर्वत,
अपने कन्धों पर सधे नहीं होते,
बाबा की धुन ने समय बताया है,
उर्दू के खत ने साथ निभाया है,
बिल्ली ने चुहिया को दुलराया है,
जूठी टाफी ने प्यार सिखाया है।
हम ऐसे रिश्तों की फेरी लेकर,
गलियों-गलियों आवाज लगाते हैं,
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं,
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं,
आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं,
अपने संग थोड़ी सैर कराते हैं।

पमोद तिवारी , कानपुर

21 responses to “आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं”

  1. anita kumar
    ये राहों के रिश्ते न सिर्फ़ मंजिल तक पहुंचाते हैं, इनसे सफ़र भी यादगार बन जाते है। बहुत सुन्दर गीत है।
  2. मीनाक्षी
    बहुत सुन्दर गीत और सुनकर आनन्द दुगना हो गया. भारी मन हल्का हो जाता है….
  3. kakesh
    अभी ऑफिस में पूरा नहीं सुन पाया. पर जितना भी सुना बहुत मजा आया.य़े भी बतायें कि कैसेट से कैसे कंनवर्ट किया…क्योंकि आवाज बहुत साफ आयी है जो कैसेट से आ नहीं पाती.
  4. अभय तिवारी
    हम भूले नहीं इस कविता को..
  5. जगदीश भाटिया
    दिल को छू गया गीत।
    हर किसी की जिंदगी में जूठी टॉफी, बाबा, बिल्ली और सरहद के दोस्त होते होंगे पर उन्हें इतनी सादगी और खूबसूरती से हर कोई अभिव्यक्त नहीं कर सकता।
    बहुत खूब:)
  6. rachna
    wish you a very happy diwali , since i did not have your email id i am communicating the same here
    regds
    rachna
  7. parul
    bahut aabhaar…sundar, bhaavpoorn rachna
  8. राजीव
    तिवारी जी की इस लोकप्रिय रचना को यहाँ प्रस्तुत करने का धन्यवाद! उनकी एक कविता, “हम किसी के पालतू तोते नहीँ” भी यदि आपके पास हो तो उसे उपलब्ध कराया जाय।
  9. समीर लाल
    वाह वाह!! क्या बेहतरीन प्रस्तुति की है आपने आज कि दिल खुश हो गया. मैं जानता हूँ कि अब सारा दिन यह गीत मेरे कानों में गुँजता रहेगा.
    प्रमोद तिवारी जी को इस बेहतरीन गीत को रचने और गाने के लिये बहुत बहुत हार्दिक बधाई.
    और लाईये.
  10. Gyan Dutt Pandey
    स्वागत, फुरसतिया नये अवतार में!
  11. paramjitbali
    बहुत बढिया!
  12. Sudhir
    bahut badhiya
  13. दिनेशराय द्विवेदी
    एक लम्‍बे समय के बाद इतना मीठा, जीवन और प्रेम का गीत मिला है, बिलकुल छत्‍ते से टपकती ताजी शहद जैसा। दीपावली पर पाठकों कें लिए उत्‍तम सौगात है। इसे मैं अपने एलबम में रखना चाहूंगा।
    दिनेशराय द्विवेदी, कोटा
  14. फुरसतिया » जैसे तुम सोच रहे साथी
    [...] प्रमोद तिवारी कविता सुनवाने के बाद मुझे लगा कि कुछ और कवितायें आपको सुनवायी जायें। इसी कड़ी में अगली कविता कानपुर के हमारे पसंदीदा विनोद श्रीवास्तव की प्रसिद्ध कविता जैसे तुम सोच रहे साथी पेश कर रहा हूं। यह कविता विनोद जी ने कानपुर में दो साल पहले हुये उसी कवि सम्मेलन में सुनायी थी जिसमें मैंने प्रमोद तिवारी जी की कविता पहली बार सुनी थी। [...]
  15. jyoti
    अदभुद!
  16. dr anurag
    अमूमन लम्बी कविता के साथ पाठक के दर तक न बंधे रहने का एक खतरा मौजूद रहता है .लेकिन प्रमोद जी इस कविता में कविता की सारी शर्त न होते हुए भी एक अजीब सी रवानगी है …..मसलन
    इक बूढ़ा रोज गली में आता था,
    जाने किस भाषा में वह गाता था,
    लेकिन उसका स्वर मेरे कानों में,
    अब उठो लाल कहकर खो जाता था,
    मैं,निपट अकेला खाता सोता था,
    नौ बजे क्लास का टाइम होता था,
    ………
    वो बूढ़ा जाने किस नगरी में हो,
    उसके स्वर अब भी हमें जगाते हैं ।
    राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
    ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।
    इसलिए इंटर नेट शानदार चीज है …वो कई ऐसी रचनाये सामने लाकर रख देता था ..जिन्हें पढने के लिए खोजना पड़ता है ….
    अनूप जी जिस तरह से आपकी गीतों में रूचि है …..आपने नईम जी को पढ़ा है ?अगर नहीं तो पढ़ डालिए …
  17. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं [...]
  18. जैसे तुम सोच रहे साथी
    [...] तिवारी कविता सुनवाने के बाद मुझे लगा कि कुछ और [...]
  19. archanachaoji
    आभार …
    archanachaoji की हालिया प्रविष्टी..शिरोमणि – एक कहानी
  20. वीरेन्द्र कुमार भटनागर
    अद्भुत रचना, सुन्दर अभिव्यक्ति
  21. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    वाह! क्या गीत सुनाया है!!! आपने दिन बना दिया। ..छोटे-छोटे एहसासों को शब्द देना भी कठिन काम है उसे गीतों में ढालना और गुनगुनाना तो और भी कठिन।

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