Friday, December 05, 2008

नैनीताल से लौटकर

http://web.archive.org/web/20140419214201/http://hindini.com/fursatiya/archives/558

34 responses to “नैनीताल से लौटकर”

  1. Manoshi
    वापस घर आना अच्छा लगता है, सच है…आपकी पसंद हमेशा पसंद आती है। कन्हैया लाल नंदन की कविता के बारे में अब हम क्या कहें…बहुत सुंदर लगी, नहीं पढ़ी थी पहले हमने…
  2. rachna
    एक दिन, शाम को, यह भी देखा कि जितनी भी लिंक लगी थीं सब गलत थी लेकिन किसी की टोंका-टांकी नहीं थी।
    log padhtey haen yaa daekhtey haen iska faislaa bhi aap hi karey
  3. Dr.Arvind Mishra
    यहाँ आपके पीछे क्या से क्या नही हो गया -आओ गद्दी संभालो महाराज !
  4. vidhu
    क्या हर आदमी एक नौकुचिया ताल होता है! कभी पूरा का पूरा नहीं दिखता। ध्यान से देखो तो हर बार कुछ नया सा लगता है! hmeshaa ki tarah badhiyaa
  5. seema gupta
    ” हम्म आप तो हमेशा ही सबकी क्लास लगती रहतें हैं अपनी चर्चा मे, अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे हा हा हा , तो कैसे रही आपकी क्लास , ”
    और यह सब कुछ मैं ही था
    यह मैं
    बहुत देर बाद जान पाया।
    “बेहद भावुक शब्द”
  6. manvinder bhimber
    कभी कभी घर से बहार जाना अच्छा तो लगता ही है….फ़िर लोटना भी …….अच्छे लेखकों ने अच्छी रचनाये हिल एरिया में ही लिखी है…..उम्मीद करती हु कि आपकी भी कोई रचना जल्द ही पुरी हो कर ब्लॉग पर पोस्ट बनेगी……
  7. पा.ना. सुब्रमणियन
    मुंबई हादसे के हॅंगओवर के बाद आज आपका नैनीताल सफ़र नामा पढ़कर मज़ा आया. आभार.
  8. anil pusadkar
    घर-परिवार दोस्त-यार सब कुछ ज्यादा याद आते है जब हम घर से बाहर होते है।मैन भी घर से बाहर ज्यादा दिन नही रह सकता और वापस लौटते समय तो ऐसे लगता है जैसे पंख लग जाये और उड़कर घर लौटूं।
  9. ताऊ रामपुरिया
    फ़ूलों का गुच्छा
    सूखकर खरखराया!
    और यह सब कुछ मैं ही था
    यह मैं
    बहुत देर बाद जान पाया।
    डा. नंदन जी की रचना पढ़कर शुकून मिला ! उनके नाम का पर्याय ही बचपन है ! उनके नाम से ही बचपन की यादे जुडी हैं ! आशा है उनकी कुछ रचनाओं को आप भविष्य में भी पढ़वाते रहेंगे !मेरे एकमात्र प्रिय लेखक ! क्योंकि पढने की उम्र में ही नंदन पढ़ना शुरू किया था , कोर्स की किताबो के इतर !
    आपकी नैनीताल यात्रा के तो क्या कहने ? बिल्कुल फुरसतिया स्टाईल में आनंद दे रही है ! बकिया भी तो लिखिए ना ! कोई इत्ते से में दस दिन थोड़े निकल गए होंगे ?
    रामराम !
  10. समीर लाल
    लौट के ..घर को आये. चलिये, बढ़िया रहा घर आ गये. अब नियमित लिखेंगे ऐसी आशा की जाये. आपकी पसंद की नन्दन जी की कविता बहुत भाई.
  11. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    क्या हर आदमी एक नौकुचिया ताल होता है! कभी पूरा का पूरा नहीं दिखता। ध्यान से देखो तो हर बार कुछ नया सा लगता है!
    ————
    सौ बातों की एक बात! आप वह लिख देते हैं, जो हम लिखना चाहते हैं!
  12. विवेक सिंह
    यह फुरसतिया ब्राण्ड माल है ही नहीं . जरूर किसी और ने लिखा है .
  13. Anonymous
    aapki pasand hamesha ki tarah pasand aai…!
  14. kanchan
    aapki pasand fir pasand aai
  15. कुश
    नैनीताल में तो पढ़ने का भी अलग मज़ा है.. उमीद है नेट पर आपने गड़बड़-सड़बड़ साइटस नही देखी होगी..
    चर्चा पर लोगो द्वारा लिंक नही देखा जाना भी मुंबई हमले को लेकर उनकी क्षुब्धता रही होगी.. मेरा तो कम से कम यही हाल है.. खैर आप लौट आए जानकार खुशी है.. अब जल्दी से ईश्वर द्वारा प्रदत ज़िम्मेदारी का निर्वाह करे.. अर्तार्थ मौज लेने का कार्य संपन्न करे
  16. दीपक
    उगता सुरज देखने का अपना मजा है चाहे फ़िर वक खेत कि मेड पर उगे ,पहाड पर या समंदर के उपर !! मगर खासीयत यह है कि सुरज उगने और डूबने दोनो के समय लाल रहता है !!
  17. Abhishek Ojha
    क्लास में सोये तो नहीं? गड़बड़ साईट तो नहिये देखे होंगे… अब हाथ-पैर झार के लिखिए आराम से !
  18. डा. अमर कुमार
    ऎसे माहौल में ज़िन्दा और सही-सलामत हाथ गोड़ लेकर घर लौट आये, न ?
    अब और क्या चाहिये, यह क्या कम उपलब्धि है ?
    लगे-हाथ एक ब्लागर-भोज का आयोजन कर ही डालिये !

  19. Shiv Kumar Mishra
    “सुबह उठते ही खिड़की के बाहर देखे भगवान भुवन भास्कर अपना प्रकाश प्रसाद बांट रहे है।”
    ई लाइन अगर लेख का पहिला लाइन होता तो हम कहते कि “एही शाश्वत लेखन है.” लेकिन आपका ई लेख शाश्वत होने से करीब दस-एगारह लाइन से रह गया. बाकी का बात अरबिंद जी लिखिए दिए हैं. संभालिये गद्दी अब!….:-)
  20. जि‍तेन्‍द्र भगत
    कि‍तनी अच्‍छी बात कही-
    स्मृति कम होते जाना भी एक वरदान है न!
  21. Dr.Anurag
    आज एक जुदा अनूप शुक्ल से रूबरू हुए ,कवि आप है है , आज भावुक भी नजर आए … ओर शायद एक खास रौ में लिखा है….नैनाताल का असर है की छुट्टी का नही कह सकता …कविता भी आपने खूब चुनी है….घर वापसी सकूं दे यही दुआ है
  22. प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर
    लौट के …….. नैनीताल से आये!!!!!
    “फोटोबाजी”!!!!!
    नैनीताल सफ़र नामा!!!!!
  23. अशोक पाण्‍डेय
    ”तमाम नई चीजें सीखीं। आधी वहीं नैनीताल में छोड़ आये। कुछ रास्ते में बिसरा दीं। बाकी दो-चार दिन में भूल जायेंगे”
    इससे पहले कि आप भूल जाएं नैनीताल में सीखी गयीं वो नयी चीजें हमें भी बता दें। वैसे विवरण से लग रहा है कि नैनीताल में फुरसतिया भैया को सचमुच में फुरसत मिली हुई थी। आपने अच्‍छा किया जो फुरसत के उन लम्‍हों को किताबों के साथ मगजमारी में जाया नहीं किया।
  24. राज भाटिया
    घर लोटना बहुत अच्छा लगता है, नेनीताल मे हम भी गये थे एक बार, होटल वालो ओर कुलियो ने हमे खुब लूटा, भला हो एक सज्जन जो हमे वही मिले ओर उन्होने हमे बताया कि यह लोग आप से बहुत ज्यादा पेसे ले रहे है, फ़िर हम सम्भल गये थे.
    धन्यवाद
  25. - लावण्या
    हमेँ सुँदर चित्रोँ से सजी, पोस्टेँ पसँद हैँ और नँदन जी की कविता के लिये भी शुक्रिया -
  26. नीरज रोहिल्ला
    शुकुलजी नैनीताल घूम आये और हमें अपनी हिन्दी की किताब का संस्मरण “ठेले पर हिमालय” याद आ गया । हम बरेली ३ साल रहे और हर बार सोचते रहे पडौस में तो है नैनीताल चाहेंगे तो अगले हफ़्ते घूम लेंगे । अगला हफ़्ते के चलते अगला दशक आ गया और न जा पाये ।
    चर्चा थोडी छोटी रही, मौज तो खूब रही होगी । बोन-फ़ायर वगैरह लगाकर कवितापाठ किया कि नहीं :-)
    लडका लोगों का नाम फ़ालतू में खराब होता है, हम तो कोई ऐसा-वैसा साईट नहीं देखते हैं :-)
  27. abha
    हाँ घर परिवार, दोस्तों का महत्व समझने के लिए घर से दूर जाना ही चाहिए फिर दूर जगह भी अच्छी तो शुकून और ताजगी दुगुनी ले कर घर लौटना और भी अच्छा होता है। ।
  28. अजित वडनेरकर
    बहुत बढ़िया । आप नैनीताल घूम आए और चिन्तन करने लायक, घर-परिवार को याद करने लायक फुर्सत जुटा ली।
    नंदनजी की कविता सुंदर है।
  29. कविता वाचक्नवी
    ” जिस उमर में हम साथ थे, हमारे बच्चे अब उस उमर में हैं। लेकिन यादों में वह और हम अभी भी बीस साल पहले जी रहे हैं। मामला गड़बड़ है न!”
    जब इसी तरह लगातर जीनें लगें तो सचमुच अपनी आयु को जीत कर पुनर्नवा हो जाएँ।
    सुन्दर चित्र व मीठी स्मृतियाँ !
    आपकी ये स्मृतियाँ सदा ताज़ा बनी रहें।
  30. E-Guru Rajeev
    परनाम फुरसतिया चच्चा आख़िर लौट ही आए. :)
    जीका हम ताल समझत रहे ऊ त सागर निकला. :)
  31. कानपुर से नैनीताल
    [...] महीने एक ट्रेनिंग के सिलसिले में नैनीताल जाना हुआ। दस दिन का हिसाब-किताब था। [...]
  32. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] नैनीताल से लौटकर [...]
  33. हिन्दी ब्लागिंग का वीरबालकवाद : चिट्ठा चर्चा
    [...] प्रवास के फ़ोटू देखकर मुझे अपने नैनीताल के किस्से याद आ [...]
  34. पंकज उपाध्याय
    देखिये कुछ घटनायें कैसे एक दूसरे की ज़ीरॉक्स लगती हैं… आप नैनीताल होकर आये और मुम्बई में ब्लास्ट हुये… परसों ही मैं भी वहाँ से लौटा और फ़िर से मुम्बई में ब्लास्ट :-(
    घर से बाहर जाने वाली बात पर विनोद कुमार शुक्ल की नौकर की कमीज की याद आ गयी जिसमें वो लिखते हैं कि –
    “यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने, तो यह घर से खास बाहर निकलना नहीं था. क्योंकि मुझे वापस लौटकर आना था. और इस बात की पूरी कोशिश करके कि काम पूरा हो, यानी पान खाकर. घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है”
    - क्या हर आदमी एक नौकुचिया ताल होता है! कभी पूरा का पूरा नहीं दिखता। ध्यान से देखो तो हर बार कुछ नया सा लगता है!
    बहुत ज्यादा डीप वाली फ़िलॉसोफ़ी :-) ये पोस्ट बहुत पसंद आयी…
    पंकज उपाध्याय की हालिया प्रविष्टी..जो भी हैं बस यही कुछ पल हैं…

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