Tuesday, December 09, 2008

कानपुर से नैनीताल

http://web.archive.org/web/20140419214814/http://hindini.com/fursatiya/archives/559

28 responses to “कानपुर से नैनीताल”

  1. डा. अमर कुमार
    एक उत्तम ट्रवेलाग्यु !
    ट्रेन में नये विचारों और नये लोगों से टकराना बहुत सारा कच्चा माल मुहैय्या करता है ।
    पर, आज कविता ? कविता क्यों नदारद है ?

  2. cmpershad
    बढिया चित्र और बढिया प्रेसेंटेशन लेख को और प्रभावी बनाता है ही। बच्चे तो मस्त रहे ही होंगे क्योंकि पिताजी नहीं है तो वेकेशन ही लगेगा ना। और फिर पिता को बी फुर्सत… रोचक संस्मरण के लिए बधाई।
  3. satish saxena
    आपकी मस्ती देख जलन होती है !
  4. ताऊ रामपुरिया
    आज तो बड़ा आनद आगया इतने सालो बाद नैनीताल के फोटो देख कर ! लगता है नैनीताल की सरदी अभी तक गई नही है ! ?
    यात्रा वृतांत थोडा छोटा है ! अगला भाग ज़रा फुरसतिया जी स्टाइल में लिखियेगा ! सही में ऐसा लगता है की एक बार इस सर्दी में भी नैनीताल जाना चाहिए !
    रामराम !
  5. दीपक
    ब्लागगिरी से ट्रेवलोगगीरी पर !! कैमरे वाला मोबाईल के सर्वोत्तम उपयोग किया है !!वैसे इस टापिक पर भी फ़ुरसतीया धांसु लेख लिख सकते है !!
  6. दिनेशराय द्विवेदी
    लगता है अब तो यात्राएँ भी किसी काम के बहाने ही होती हैं। पर यात्रा का अनुभव हमेशा सुखद होता है अगर आप यात्रा में या उस के बाद बीमार न हो गए हों। हाँ देरी से चलने वाली ट्रेनें कभी कभी ही निराश करती हैं।
  7. singh
    अच्छा यात्रा विवरण मगर यह बताइये की वोट क्लब जाना हुआ या नही …..नैना देवी मन्दिर भी वैसे अच्छी जगह है…….मगर सरकारी काम के बेच आपने घूम घाम लिया यह सुकून की बात है……
  8. abha
    यात्रा के पहले की उलझन ,उत्सुकता साफ है ,स्माईली ने आपना काम किया. बेटे से फोन न करने की शिकायत -डैडू का प्यार क्या कहना…
  9. amit
    वाह, आज पढ़कर मजा आया। बहुत दिन बाद कोई पोस्ट लिखी बिना कविता के तो पूरी तरह अपनी समझ में आई, ही ही ही!! :D
    एक किताब की दुकान में घुस कर किताबें देखीं और तालाब के किनारे बने हुये एक पुस्तकालय में टहलते रहे।
    वहाँ किताबें काहे देख रहे थे अनूप जी? घूमने की जगह गए हैं तो किताबों का क्या काम और काम के सिलसिले में गए हैं तो भी किताबों का क्या काम? ;)
  10. मानोशी
    ” टैक्सी विश्व की अर्थव्यवस्था सी इधर-उधर होने लगी। ” :-)
    एक बार में ही पाढ़ गई इस बार, मतलब कहने का ये कि इस बार आपने बहुउउउउउउउउउउउत लंबा नहीं लिखा, इसलिये पढ़ने में मज़ा आया, स्किप कर-कर के नहीं पढ़ा। आगे का इंतज़ार है अनूप।
  11. सतीश पंचम
    सही कहा है….अभी कल ही अमरकांत जी की कहानी मित्र-मिलन पढ रहा था….आपकी यह बात कि @ जितना आप किसी के बारे में सालों साथ रहते हुये नहीं जान पाते उतना उसके साथ एक यात्रा में रहते हुये जान जाते हैं तुरंत मुझे उस कहानी मित्र-मिलन की याद दिला गया। इस कहानी में बताया गया है कि कैसे दो मित्र पचास साल बाद इलाहाबाद रेल्वे स्टेशन पर मिले……बेहद रोचक इस कहानी के पात्र भी एक दूसरे को सिर्फ आधे घंटे के मित्र-मिलन में अच्छी तरह जान सके……कभी पढियेगा जरूर।
    और ये लाल स्वेटर पहन कर वोडाफोन के विज्ञापन के सामने खडे हैं आप…..तो क्या वोडाफोन वालों ने आपको Brand अंबेसडर तो नहीं बना दिया है :)
    रोचक यात्रा विवरण।
  12. समीर लाल
    नैनीताल कभी नहीं गये..आपने दर्शन करवाये दिये तो आभार कह देते हैं. बढ़िया संस्मरण रहा. बिना नेट के दो दिन कैसे कटे होंगे, समझ सकते हैं.
    अच्छा लगा पढ़कर और तस्वीरें देखकर. और लिखिये इस यात्रा के बारे में.
  13. vidhu
    दुनिया में अगर बात-चीत के घनत्व का औसत निकाला जाये तो रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन शायद अव्वल आयें। जितनी बातें यहां होती हैं , शायद और कहीं नहीं होती होंगी।
    aapkaa lekh subah-subah man ko tarotajaa kar gayaa…man ki ye baat bhi achchi lagi
  14. parul
    badhiyaa..hamaara do baar ka ghuuma hai..isliye aur bhi rochak lagaa padhnaa!!
  15. कुश
    जितना आप किसी के बारे में सालों साथ रहते हुये नहीं जान पाते उतना उसके साथ एक यात्रा में रहते हुये जान जाते हैं ”
    पुरे लेख का यही सार है… आनन्दम आनन्दम
  16. seema gupta
    ” नैनीताल यात्रा का वर्णन और अनुभव बढा रोचक लगा …”
    regards
  17. Dr.Anurag
    इस लाल स्वेटर से घना लगाव है जी .स्टेशन से नैनीताल तक आपने छोडा नही ..झील के पास जो घोडो का मैदान है शाम को वहां घूमने का आनन्द कुछ ओर है ….. ओर एक छोटा सा बाजार भी लगता है जहाँ अच्छी रंग बिरंगी छतरी ओर टोपी
    मिलती है……झील में पूरा चक्कर नही कटाता नाव वाला …..पता नही आपको गोभी के पराँठे पसंद है या नही….उसी रोड पे एक रेस्टोरेंट में खाए थे ….सुबह सुबह….आह ..मुंह में स्वाद आज भी है……वैसे ये सर्दियों में ब्रेक लेने के पीछे क्या कारण था ?
  18. anil pusadkar
    नैनीताल कभी जाना नही हुआ,आपको पढ कर ही वँहा की सैर कर ली.रोचक और मज़ेदार यात्रा सँस्मरण.
  19. kanchan
    photo dekhi… Nainitaal ki manoramtaa dikh rahi hai
  20. विवेक सिंह
    एक बुढिया ने किसी लडके से पूछा, “बेटा तू कितना पढा है?” लडका बोला, “अम्मा मैं बी ए तक पढा हूँ ” बुढिया बोली, “रहने दे बेटा दो अक्षर पढे वो भी उल्टे “
  21. मसिजीवी
    नैनीताल सर्दियों में पहुँचे भला ही हुआ क्‍योंकि गर्मियों में अब ये देर से ही राम राम करने लायक शहर हो गया है
    खूब मौज की गई लगता है।
  22. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    बहुत सुन्दर। यह स्लाइड शो तो बड़ा हाईटेक बना दे रहा है पोस्ट को।
    पर यह पोस्ट बड़ी जल्दी समाप्त हो गयी। जरा फुर्सत से पुन: विषय उठाइयेगा।
  23. ranjana
    सुंदर प्रस्तुतीकरण.आपने अपने संस्मरण सह आनंद का हमें सहभागी बनाया,उसके लिए आभार.
  24. प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर
    नैनीताल कभी नहीं गये..आभार !!!!!!!!!!!!!!!!!!!
    अच्छा लगा पढ़कर और तस्वीरें देखकर!!!!!!!!!!!
    “ट्रेन में घुसते ही कलकत्ता से आ रहे दो वरिष्ठ साथी ऊपर की बर्थों से बरामद हुये।”
    हो हो हो
    ही ही ही
    हा हा हा
    हे हे हे हे
    हु हु हु
    हू हू हू
  25. Abhishek Ojha
    हमें लगा की कानपुर से सिक्किम वाली यात्रा हो रही है. हम भी रजाई छोड़कर नहिये निकल पाये थे, अन्दर से ही बोले थे… अबे जान बच गई तो फिर देख लेंगे ! जान बच गई लेकिन फिर नहीं देख पाये. सुबह नौबजे निकले तो बाहर बर्फ जमी थी.
  26. सोचते हैं उदास ही हो जायें
    [...] का मन बनायेंगे- हमें याद आ जायेगा डा.अनुराग आर्य का कमेंट जिसमें उनको हमारे लाल स्वेटर बहुतै [...]
  27. Saroj Rajput
    famaly k sath jana chahiye tha
  28. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] कानपुर से नैनीताल [...]

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