Friday, December 19, 2008

फ़ौजियों के साथ एक दिन

http://web.archive.org/web/20140419212902/http://hindini.com/fursatiya/archives/564

29 responses to “फ़ौजियों के साथ एक दिन”

  1. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह
    हमारे पडोस में एके-47, हैंडग्रेनेड मिले है आइये निशाना लगा लीजिए :)
    सुन्‍दर यात्रा वर्णन, फोटो भी फब रही है।
    महाशक्ति
  2. Arvind Mishra
    रोचक रही यात्रा !
  3. दिनेशराय द्विवेदी
    पाँच में से एक तो अच्छी सफलता है। यहाँ तो पचास में से एक भी मु्श्किल होता।
  4. विवेक सिंह
    निशाना आप शौक से लगाइए . पर यह भी तो देखिए कि हम सामने ही बैठे हैं . आपकी गोली चल गई तो कम्प्यूटर स्क्रीन को फोडती हुई हमारे बगल से जाएगी :)
    वैसे जैकिट तो अच्छा है . जैकिट पहनने वाले वाले के बारे में क्या कहें . फ़ोटू में आपके ऊपर बर्फ सी जमी लगती है . काफी देर से बैठे हैं लगता है :)
  5. seema gupta
    जरा नजरों से कह दो कि निशाना चूक न जाये दोहराते हुये पांचो फ़ायर कर डाले।
    ” अरे वाह का का करतब दिखाई रहे आप ….”
    regards
  6. ताऊ रामपुरिया
    बहुत बढिया रहा जी ! पहली बार मे एक निशाना मार दिया टारगेट पर ! आपको तो गोल्ड मैडल दिया जाना चाहिये ! हमसे निशाना और फ़ायर करना दूर ससुरी बन्दूक ही नही ऊठाई जाती ! :)
    जैकेट बडी जंच रही है ! ये ब्लागर की नजर से नही कैमरे की कि नजर से बोल रहे हैं !:)
    वैसे आप सोच रहे होंगे कि ताऊ १२ बजे आता है आज सुबह सबेरे कैसे टपक गया ? तो राज की बात ये है कि ताऊ की नजर कमजोर हो चली है ! आपका टाईटल है – फ़ौजियों के साथ एक दिन — और हमको दिखा.. फ़ौजिया के साथ एक दिन… अब हम इसी चक्कर मे दुसरे ब्लाग छोड के आपके यहां टपक लिये कि शुकल जी ने ये क्या गुल खिला दिये ! :) पर यहां तो भाई करनलसिन्ह और जनरलसिन्ह दिखे सो चुपचाप वापस जा रहे हैं !
    राम रम !
  7. अरूण अरोरा
    नैनीताल में कक्षा रगड़ाई के बाद चाहे कितनी रगडाई करलो पर बूढे तोते कही पढते है क्या ? :)
    बाद में जाकर देखा कि पांच में से केवल एक निशाना ठीक लगा था। देख लो कैसे हथियार बनाते हो . वो तो हमारे फ़ौजी है जो इन हथ्यारो से सही निशाना लगा लेते है . तुरंत कम से कम गुणवत्ता तो सुधार ही लो जनाबे आली :)
  8. Ghost Buster
    फ़ुरसतिया जी अचूक निशानेबाज और विकट बन्दूकबाज हैं, आज तक कभी चूकते नहीं देखे गये, जरूर इस वाली बन्दूक में ही कुछ गड़बड़ी रही होगी.
    कानपुर से बाहर निकलें तो सूचना यहां ब्लॉग पर देना बेहतर होगा, दूसरे शहर में किस-किस ब्लॉगर से मिलेंगे? जहां रुकें, वहां का पता दे दें तो उस शहर के ब्लॉगर ही आपसे मिल लेंगे, अब आप तो सेलेब्रिटी ब्लॉगर हैं ना. शायद कभी हमें भी आपके दर्शन का सौभाग्य मिल जाए.
    सर्दियां अपने शबाब की ओर अग्रसर हैं, ताऊ के साथ हमारी ओर से भी रम रम!
  9. Dr.Anurag
    फुरसतिया के हाथ में बन्दूक ..आयला ……कौन है निशाने पे ठाकुर ???? गोया की जाकेटवा भी अच्छी है पर हमें लाल स्वेटर ज्यादा भाया……….बन्दूक तो नीचे रखो भाई अब !
  10. ranjana
    फोटोग्राफ और विवरण दोनों बहुत बढ़िया लगे…बड़ा अच्छा लगा पढ़कर.मुफ्त में सैर और जानकारियां मिल गई.
  11. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    जैकेट में आदमी सुख समृद्धि युक्त नजर आता है। और बन्दूक के साथ रोबदाब वाला। आज टू-इन वन दर्शन कर लिये।
    सुन्दर लिखा है – सतत लिखते रहें! :-)
  12. गौतम राजरिशी
    हाथ में इंसास उठाये बड़े फब रहे हैं आप अनूप जी….कभी कोई टि.डी. बना कर इधर देहरादून में भारतीय सैन्य अकादमी भी आईये निरिक्षण के लिये.इसी बहाने आपसे रूबरू मुलाकात हो जायेगी
  13. विष्‍णु बैरागी
    लगता है, यात्रा की थकान लिखने पर हावी हो गई है । वर्णन तो विस्‍तृत और सम्‍पूर्ण है किन्‍तु पोस्‍ट में कल वाली बात बिलकुल ही नदारद है । आज श्रीलाल शुक्‍ल की परछाई का आभास भी नहीं है ।
    बहरहाल, निरापद यात्रा के लिए बधाइयां और यात्रा वृतान्‍त निरन्‍तर उपलब्‍ध कराने के लिए धन्‍यवाद ।
  14. लावण्या
    रानी खेत मेँ फौजी भाइयोँ से मुलाकात की बातेँ बताईँ वे बहुत रोचक लगीँ – खास तौर से ये जान कर खुशी हुई कि फौजी लोग जलेबी खाते हैँ नाश्ते मेँ :) वाह जी वाह !
    और रास्ते मेँ फिल्मी गाने सुनकर आपको सही गीत याद आया
    “जरा नज़रोँ से कह दो जी, निशाना चूक ना जाये ”
    और ५/१ = ४ चूक गये !
    कोई बात नहीँ -
    अगली बारी, पाँचोँ ” बुल्ज़ आइ ” / रहेँगेँ :)
    और हाँ इस स्टोर का पता या वेब साइट हो सके तो बतलाइयेगा -
    हम भी खरीदारी करेँगेँ -
    अग्रिम, धन्यवाद सहित,
    (” युद्ध विधवा संस्थान द्वारा चलाये जा रहे शापिंग स्टोर से तमाम खरीदारी की। “)
    स स्नेह,
    - लावण्या
  15. cmpershad
    रानीखेत के चूज़े मशहूर हुआ करते थे। अब आपने दम्बूक तानी है तो निश्चय ही कुछ चूज़े अल्लाह को प्यारे हो गए होंगे। रही बात निशाने की तो पांच में से पांच भी सही हो सकते है- इसका उपाय है कि पहले गोली दाग दें और जहां बुलेट लगी उसके अतराफ सर्कल बना दें। लग गया ना तीर निशाने पर:)
  16. dhirusingh
    युद्ध विधवा सस्थान मे गर्म हैण्ड मेड शाल, ट्वीड बहुत ही अच्छे मिलते है . रानीखेत का सौन्दर्य स्विट्जरलैंड की टक्कर का है आपने क्या महसूस किया ?
  17. anitakumar
    वाह, अच्छा रहा वृतांत्। जैकेट भी अच्छी लग रही है अलबत्ता हमें तो आप के कंधे पर वो बर्फ़ नहीं दिख रही जिसका जिक्र किया जा रहा है।
  18. anupam agrawal
    waakai इस pooree post में बर्फ गायब है .
    ये सबसे achhaa huaa की इसी बहाने fauziyon kee कुछ dikkaton kaa pataa to चला.
  19. प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर
    सेलेब्रिटी ब्लॉगर के यहाँ हमारी भी उपस्थिति लगा ली जाए!!!
    सुन्‍दर यात्रा वर्णन, फोटो भी गजब !!
  20. मसिजीवी
    ढेर भीड़ के कारण नैनीताल हमें कुछ खास प्रिय नहीं पर रानीखेत पसंद है। शादी के पिछले चौदह साल में पत्‍नी के लिए केवल दो शॉल खरीदने के गुनहगार हैं दोनों ही रानीखेत के इस शाल विक्रय केंद्र से ही खरीदीं।
    ‘लपूझन्‍ना वाले अशोक पांडेय’ ????
    बताने वाले को समझना चाहिए था कि फुरसतिया बातों को पचा जाने में कोई यकीन नहीं रखते बजाने में करते हैं। जब वे लपूझन्‍ना रहना चाहते हैं तो काहे आप उन्‍हें अशोक बनाने पर तुले हैं
  21. Anonymous
    लाजवाब सोच है आपकी अनुरोध है मेरे भी ब्लॉग पर पधारे
  22. SHUAIB
    बहुत अच्छा वक़्त बिताया आपने।
    वाह चहरे से लगता ही नहीं कि बंदूक़ थामे ज़रा भी डर खौफ़ मेहसूस नही हुआ आपको।
    आपकी ज़िन्दगी के ये यादगार दिन बहुत बहुत मुबारक हो।
  23. Anonymous
    अनूपजी नववर्ष की आपको बहुत-बहुत बधाई। ये पंक्तियां मेरी नहीं हैं लेकिन मुझे काफी अच्‍छी लगती हैं।
    नया वर्ष जीवन, संघर्ष और सृजन के नाम
    नया वर्ष नयी यात्रा के लिए उठे पहले कदम के नाम, सृजन की नयी परियोजनाओं के नाम, बीजों और अंकुरों के नाम, कोंपलों और फुनगियों के नाम
    उड़ने को आतुर शिशु पंखों के नाम
    नया वर्ष तूफानों का आह्वान करते नौजवान दिलों के नाम जो भूले नहीं हैं प्‍यार करना उनके नाम जो भूले नहीं हैं सपने देखना,
    संकल्‍पों के नाम जीवन, संघर्ष और सृजन के नाम!!!
  24. kapil.gzb
    नववर्ष की आपको बहुत-बहुत बधाई। ये पंक्तियां मेरी नहीं हैं लेकिन मुझे काफी अच्‍छी लगती हैं।
    नया वर्ष जीवन, संघर्ष और सृजन के नाम
    नया वर्ष नयी यात्रा के लिए उठे पहले कदम के नाम, सृजन की नयी परियोजनाओं के नाम, बीजों और अंकुरों के नाम, कोंपलों और फुनगियों के नाम
    उड़ने को आतुर शिशु पंखों के नाम
    नया वर्ष तूफानों का आह्वान करते नौजवान दिलों के नाम जो भूले नहीं हैं प्‍यार करना उनके नाम जो भूले नहीं हैं सपने देखना,
    संकल्‍पों के नाम जीवन, संघर्ष और सृजन के नाम!!!
  25. mahendra mishra
    फोटो में आपकी बन्दूक का रुख समझ में नही आ रहा है कि किस तरफ़ है ?. ढेर सारी यादे बांटने के लिए आभार .
  26. Abhishek
    गोली-बन्दूक ! बढ़िया है, ये जो आप चला रहे हैं वो इंसास है क्या? हमारे एक मित्र भी डीआरडीओ में थे अब एक अमेरिकन कंपनी के लिए काम करते हैं. उनकी यादें भी बड़ी अच्छी होती हैं लेकिन क्या करें बेचारे पैसा बीच में आ जाए तो …
  27. DR R K RAWAT
    It was nice to see you on blog and with sri rajeev kumar sir. regards to you both. will write some thing –after reading. thanks keep on posting.
    ( pehchan kaun)
    dr rawat
    hindi officer
    iit khargpur
  28. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] फ़ौजियों के साथ एक दिन [...]
  29. चंदन कुमार मिश्र
    दू-चार गो दुश्मनों पर भी लगता तब न…
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्र

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Thursday, December 18, 2008

कस्सम से इससे कम न हो पायेगा

http://web.archive.org/web/20140419214120/http://hindini.com/fursatiya/archives/563

कस्सम से इससे कम न हो पायेगा

और मजाक-मजाक में तीन-चार दिन गुजर गये। जैसे-जैसे समय गुजरा लोगों ने भुनभुनाना च उलाहना शुरू कर दिया। इत्ती चढ़ाई करके क्या हम खाली पढ़ाई करने आये हैं? क्या नैनीताल आकर भी बिना इसके दर्शन के वापस चले जायेंगे? ई त बड़ा जुलुम है।
हमारे कोर्स डायरेक्टर गुरुदेव भी बोले हां बात तो सहियै है। एक दिन तो मिलना चाहिये था। लेकिन दिन मिले कहां से? अल्लाताला ने सब हफ़्तों के लिफ़ाफ़े में सात-सात दिन ही भर के भेजे हैं। बाहर से आने वाली फ़ैकल्टी का समय भी कम नहीं किया जा सकता। फ़िर जहां चाह वहां राह के नियम का पालन करने हुये एक दिन निकाला गया। जैसा परसाई जी कहे हैं बसन्त आता नहीं लाया जाता है। सो हम लोग एक गुरु जी की तीन दिन क्लास को सवा दो दिन में ही निपटा लिये। दो दिन रात नौ-नौ बजे तक पढ़ाई किये और तीसरे दिन दस बजे घंटा बजा के चाय तुड़ाई करके नैनीताल दर्शन के लिये निकल लिये।
एक बार फ़िर यह तय हुआ कि जो काम करने का मन हो उसके लिये समय निकल ही आता है।


सबसे पहले हम लोग हिमालय दर्शन के लिये गये। इसके बाद एक झरने स्थल। आसपास की दुकाने देखकर लगा कि पतला सा, स्लिम-ट्रिम सा, झरना तमाम लोगों की रोजी-रोटी का जुगाड़ बना हुआ है। आसपास की हरियाली और पानी देखकर हम हरे-हरे हो लिये। फ़ोटॊ-सोटो हुआ। झरने का साफ़-सफ़ेद पानी देखकर लगा कि किसी दिन कोई विज्ञापन आयेगा जिसमे कोई डिजरजेन्ट वाला बतायेगा कि यह पानी हमारे पाउडर से धोकर ही साफ़ हुआ है।
झरने के बाद वहां गुफ़ा दर्शन करने गये। सात ठो गुफ़ायें। संकरी-संकरी। तमाम फ़ूले-फ़ूले लोगों की सांस गुफ़ा द्वार तक पहुंचते ही फ़ूल गई और उन्होंने अंदर जाने से मना कर दिया। बोले हम गुफ़ा युग में न जायेंगे। गुफ़ाओं के रास्ते संकरे, टेढ़े-मेढ़े थे। कहीं तो लगभग लेटकर भी आगे बढ़ना पड़ा। वहीं एक नवविवाहित जोड़ा भी इकक्ले-इकल्ले एक-दूसरे की फोटो खैंच रहा था। हमने उनको साथ करके फोटो खैंचा। उन्होंने हमें शुक्रिया कहा। हमने सुन लिया।
अब अगर हम कवितागिरी करते होते तो एक ठो कविता यहां घुसा सकते थे। गुफ़ा में जोड़ा, सुन्दरता , हम और वे। तीन-चार महीन बिम्ब और पांच-छह सुन्दर-सुन्दर से ऐंवैं टाइप शब्द से एक ठो कविता बन जाती। लेकिन हम हैं नहीं न कवि सो ये कच्चा माल यहीं छोड़ दे रहे हैं।
आगे ऊंचाई पर चाय की दुकान थी। वहां चाय-साय पी गयी। चाय वाला कुछ डांस सहयोगी गाने बजा रहा था। पता चला कि कुछ बच्चियां वहां आईं हुयी हैं। थोड़ी दूर पर दिखा तो चार लड़कियां डांस का कुछ कर रहीं थीं। डांस कर क्या रहीं थीं हिल-हिला रहीं थीं। पता चला कि उनमें से एक का जन्मदिन था। हमने सोचा कि जब पता चल ही गया और वे खुश भी हैं तो उनको जन्मदिन की बधाई ही दे दें। ऐसा है क्या जब आदमी घर से बाहर निकलता है तो पूरी दुनिया से जुड़ जाना चाहता है? लेकिन संकोच और बड़प्पन बड़प्पन के झांसे में आकर हम उनको जन्मदिन की बधाई अपने मन में ही देकर खुश हो लिये।
हमारे एक गुरु जी डांस करती लड़कियों की फ़ोटो ग्राफ़ी करते रहे। उन बच्चियों में से एक हम लोगों की तरफ़ कैमरा करके फोटो बाजी किया। अफ़सोस कि हमारे पास उनके फोटो नहीं हैं। करीब पन्द्रह-बीस साल की उन बच्चियों को वहां जन्मदिन मनाते देखकर अच्छा लगा। मौसम भी लगता है इसीलिये खुशनुमा सा हो गया था।
गुफ़ाओं से निकलकर हम ताल दर्शन के लिये निकले। तल्लीताल-मल्लीताल-भीमताल-नौकुचियाताल-नैनीताल। भीमताल पहुंचते-पहुंचते दोपहर का खाने का समय हो गया था। लंच पैकेट निकाले गये। खाये गये। फ़ैलाये गये। फ़ैलाये जाते समय अचानक हमको वहां की स्वच्छता का ख्याल आया। डिब्बे एक डस्टबिन में डाल दिये गये और खाना आसपास के दुकानदारों से पूछ्कर ताल में फ़ेंक दिया गया। तमाम बतखें क्वैक-क्वैक करते हुये वहां लाइन लगा कर आ गयीं। वे फ़ेका हुआ खाना खाने का प्रयास करती रहीं। कुछ खाया होगा उन्होंने लेकिन ज्यादातर उनके पेट में पहुंचने से पहले ही ताल-तल में पहुंच गया। हमारा बतखप्रेम काफ़ी देर तक चलता रहा। प्रकृति जरूर भुनभुनाती रही होगी।
आसपास तमाम दुकाने खुलीं थीं लेकिन भीड़ नहीं थी। पता चला सीजन में बहुत भीड़ होती है। दुकान वाले सीजन का इंतजार साल भर करते हैं। भीमताल , नौकुचियाताल के किनारे न जाने कित्ती नावें बंधीं खड़ी थीं। पता चला कि इनके चलाने वाले सीजन में आते हैं। कमाते हैं चले जाते हैं। सीजन मतलब गर्मियों के कुछ महीने। सीजन के दिनों में चहल-पहले भरे रहने वाले दिन के इंतजार में वे नावें यहां बंधी खड़ी थीं।
स्कूल से छूटी लड़कियां नीली-सफ़ेद ड्रेस में खिलखिलाती घर वापस लौट रहीं थीं। आगे भी एक गांव के पास कुछ बच्चियां अपने घर लौटती दिखीं। एक बड़ी बच्ची अपने साथ की बच्ची का हाथ पकड़े अपने साथ ले जा रही थी। उस समय तो नहीं लेकिन अभी ख्याल आया कि क्या पता कि इनमें से ही कोई बच्ची आगे चलकर दुनिया हिलाकर रख दे। जिस गांव की हो उस गांव का नाम पूरी दुनिया में उजागर कर दे। लेकिन यह भी है कि कोई कहे कि -शुरुआती दिन गांव में गुजारने में के कारण हमें प्रारम्भिक फ़ायदा नहीं मिला।
पहाड़ों में जहां सैलानियों की भीड़ होती है वहां जगह-जगह सुलभ शौचालय बने हैं। एक जगह हमारे मित्र गये। लघुशंका के तीन रुपये मांगे जाने पर फ़िर शंकाग्रस्त हुये। बताया गया शंका चाहे जिस स्तर की हो निवारण के लिये यहां तीन रुपये ही लगते हैं। सब धान बाइस पसेरी। वे क्या बोले अब क्या बतायें! :)
नौकुचियाताल पहुंचते-पहुंचते शाम हो गयी थी। वहां भी नावें अकेलेपन का दुख झेल रही थीं। ताल सूनसान सा दिख रहा था। किसी भी कोने से ताल पूरा नहीं दिख रहा था। देखते-देखते साथी एक घोड़े पर चढ़ गये। पता चला कि जिंदगी में पहली बार घोड़े पर सवार हुये थे। फ़ट से फ़ोटो खैंचवा लिये थे। हमने तड़ से यह विचार बनाया कि आदमी जो काम बहुत कम करता है उसकी फोटो जरूर खिंचवाता है। खिंचवा इसलिये लेता है ताकि सनद रहे। फोटो देखकर हम झांसे में आ जाते हैं कि यह अक्सर ऐसा करता होगा लेकिन ऐसा है नहीं न! होता नहीं है न!
वहीं एक जर्मन जोड़ा टहल रहा था। पता चला लखनऊ से टहल के आया है। उसने हमसे पूछा कि ये ताल नेचुरल है कि बनाया गया है। हम उनको जैसा समझ में आया बता दिये। आपको पूछना हो तो पूछियेगा आपको भी बता देंगे।
लौटकर हम मालरोड पर उतर लिये। एक बार फ़िर माल रोड पर। वहां से पास ही भूटानी मार्केट के नाम से जाना जाना वाले मार्केट है। वहीं प्रसिद्ध हनुमान मंदिर है। भूटानी मार्केट की एक दुकान के ऊपर -तिब्बत को आजाद करो का बैनर थका-थका सा लहरा रहा था। पास ही दो तिब्बती सी लगने वाली लड़कियां एक छोटी चौकोर सी गेंद से हैंडबाल सा कुछ खेल रहीं थीं। गेंद बार-बार हमारे पास आकर गिर रही थी। दोस्त लोग हनुमान दर्शन के लिये मंदिर गये थे। हम बच्चियों का खेल देखते हुये पास की प्रसाद के दुकान के एक बच्चे से बतियाते रहे।
तेवर में रुप्पन बाबू टाइप का बच्चे से हमने पूछा कि नारियल कहां से लाता है वह। उसने बताया हल्द्वानी से। हमने पूछा कि हल्द्वानी में कहां होता है नारियल? उसने हमारे मजाक का बुरा नहीं माना और कायदे से समझाया कि केरल नारियल में होता है। वहीं से वाया तमाम जगह फ़िर यहां आता है। उसने यह भी बताया कि मार्केट केवल उस दिन बंद होता जिस दिन हड़ताल होती है या कोई मर जाता है।
दोस्त लोग जब हनुमान दर्शन करके आ गये तो विचार बना कि कुछ खर्च-वर्च भी होना चाहिये। बाहर जाने पर अगर कुछ खरीदारी न हो तो लगता नहीं कि घूमकर आये हैं। ज्यादातर दुकानों में वहां लड़कियां या महिलायें काऊंटर पर थीं। हमें मौसम और दोस्तों ने मिलकर समझाया कि हमें एक जैकेट खरीद लेनी चाहिये। किसी भी खरीदारी के बारे में हमारी इमेज बहुत खराब है। कपड़ों के बारे में तो और भी मासाअल्लाह है। कपड़ों के बारे में तो हम कहते भी हैं कि भैया हम तो मैनीक्वीन हैं। जो पहनाया जाता है पहन लेते हैं।
हमारी श्रीमतीजी हमारे स्मार्ट से पड़ोसी राजीव शर्मा जो हमारे साथ गये थे फोन पर हमारे लिये अच्छी सी जैकेट खरीदने का आदेश दिया था। भाईजी ने एक जैकेट हमारे लिये पसंद करके मोलभाव शुरू कर ही दिया।
दुकान में बच्ची ने साढे आठ सौ से शुरू करके मोलभाव की शुरुआत के जमीन तैयार की। हम लोग नीचे से ऊपर आ रहे थे वह ऊपर से नीचे। हर बार वह कस्सम से इससे कम नहीं हो पायेगा कहते हुये दाम कम कर रही थी। कई बार कस्सम से सुनने और अपने बेमतलब के तर्क सुनाने के बाद साढ़े सात सौ रुपये में जैकेट लेकर हम वहीं पहन कर निकल लिये। पैकिंग के लिये एक पालीथीन का पैकेट लेकर क्या नैनीताल का पर्यावरण खराब करते। :)
तब से लेकर और अभी तक भी मैं सोच रहा हूं कि अगर वह जैकेट हमको दो हजार रुपये में बतायी जाती तो हम खुशी -खुशी पन्द्रह सौ की लेकर आ जाते। जो भी दाम बताया जाये उसमें चवन्नी कम करा के बहादुर बन जाते हैं। बाद में हमारे दोस्तों ने जो भी खरीदारी करी ,हमें साथ ले गये। दोनों के दाम का अंतिम निर्णय फ़िर हमारी मध्यस्थता से होता। वह दुकान हमारी दुकान हो गयी।
उस लड़की के व्यवहार और बातचीत के अंदाज का कुछ तो हाथ रहा होगा कि बाद में हमारे दोस्तों और हमने भी तमाम सारे सामान उसी दुकान से लिये। एक दिन दाम कम कराते-कराते हमारे दोस्त को एक अठारह सौ की जैकेट बारह सौ में दे दी। बाद में उसको गलती का एहसास हुआ। उसने कहा- आप और चाहे जो लौटा दीजियेगा लेकिन यह वाली मत लौटाइयेगा। हमें डांट पड़ेगी कि हमने इत्ती सस्ती कैसे बेंच दी।
चलने से पहले हम उससे मिलने गये। उस दिन उसके पिताजी भी थे। चहकने वाली बच्ची शांत थी। इत्ते दिन की बातचीत के बाद उसके बारे में काफ़ी कुछ जान गये थे। हाईस्कूल एक नंबर से फ़ेल हो गयी। हमने उससे आगे पढाई करने के लिये कहा। उसके पिताजी से उसके व्यवहार और दुकानदारी के हुनर की तारीफ़ की।
बच्ची शांत थी, पिताजी की मौजूदगी की वजह से कुछ सहमी सी थी लेकिन अपनी तारीफ़ सुनकर धीरे से मुस्करा भी रही थी। :)

22 responses to “कस्सम से इससे कम न हो पायेगा”

  1. दिनेशराय द्विवेदी
    नयी जैकट मुबारक हो। हम वहाँ न थे वरना एक कप कॉफी की चंदी लगा कर सेलिब्रेट करते।
  2. समीर लाल
    अच्छा लगा यह वृतांत पढ़ना. अब हमको भी बता ही दिजिये कि वो ताल मैनमैड था या नेचुरल??
    जैकेट पहिन के फोटो नहीं चापें?? :)
  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    ”…उसने हमारे मजाक का बुरा नहीं माना और कायदे से समझाया कि केरल नारियल में होता है। वहीं से वाया तमाम जगह फ़िर यहां आता है।…”
    सुना है पहाड़ में ‘टल्ली’(बेवड़ा) लोग भी खूब होते हैं। आप से मिले नहीं या आपने जानबूझकर बताया नहीं? वैसे यह बताइए कि ‘केरल नारियल में’ होता है यह बताने वाला उस मूड में था कि यह लिखने वाला…? :)
  4. seema gupta
    हमारी श्रीमतीजी हमारे स्मार्ट से पड़ोसी राजीव शर्मा जो हमारे साथ गये थे फोन पर हमारे लिये अच्छी सी जैकेट खरीदने का आदेश दिया था। भाईजी ने एक जैकेट हमारे लिये पसंद करके मोलभाव शुरू कर ही दिया।
    “” हा हा हा आपको आदेश काहे नही दिया, आप का उनका आदेश का पालन नही करते ????”
    Regards
  5. विवेक सिंह
    वा अनूप बाबू ! नई जैकिट ! बढिया है :)
  6. Prashant (PD)
    जैकेट वाली फोटू चाहिये.. हम तो कहते हैं चिट्ठाचर्चा में लगाईये.. आप भी दूल्हा लगने लगेंगे.. ;)
    मजा आ गया आपकी कहानी पढ़कर.. हम तो वो डांस वाला फोटो ढूंढते रह गये.. नहीं मिला.. :D
  7. anil pusadkar
    पब्लिक डिमांड है अनूप बाबू ,जैकेट वाली फ़ोटू मे कस्सम से इस्मार्ट लगेंगे।
  8. ताऊ रामपुरिया
    किसी भी खरीदारी के बारे में हमारी इमेज बहुत खराब है। कपड़ों के बारे में तो और भी मासाअल्लाह है। कपड़ों के बारे में तो हम कहते भी हैं कि भैया हम तो मैनीक्वीन हैं। जो पहनाया जाता है पहन लेते हैं।
    बहुत लाजवाब नैनीताल दर्शन करवाया आपने आज तो ! लगता है सचमुच ही वहां आपके साथ साथ है ! घणा आनन्द आया ! ये सोप ओपेरा चालु रहना चाहिये !
    राम राम !
  9. ranjana
    आपका बहुत बहुत आभार . फोटो और विवरण इतना सजीव और जानदार है कि लगा यहीं बैठे बैठे हम आपके साथ पूरा भ्रमण कर आए. आनंद आ गया.
  10. संजय बेंगाणी
    कस्सम से मजा आया.
    फोटू नहीं देख पाए…क्या नए फायरफोक्स में कुछ गड़बड़ है? भगवान जाने.
  11. himanshu
    बड़ी रोचक यात्रा-कथा.
    एक जगह अटक गया – “लघुशंका के तीन रुपये मांगे जाने पर फ़िर शंकाग्रस्त हुये”.
    शंकाग्रस्त क्यों हुए ? तीन रुपये के लिये ही, तब तो ठीक. मुझे लगा तीन रुपये सुनकर लघु छोड़ कहीं………??
  12. Dr.Arvind Mishra
    इस यात्रा वृत्तांत के कुछ अंश तो मन को छूते हैं और कुछ सचमुच अछूते हैं !
  13. विवेक सिंह
    “उसने हमारे मजाक का बुरा नहीं माना और कायदे से समझाया कि केरल नारियल में होता है। वहीं से वाया तमाम जगह फ़िर यहां आता है।”
    उसने समझा दिया और आप समझ गए ? बडे समझदार निकले आप . शाबाश :)
  14. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    बहुत अच्छा प्रयास … इसी तरह निरन्तर लिखते रहें आप।
    (यह कट-पेस्टिया कमेण्ट मैने कई पोस्टों पर देखा। मैने सोचा कि किसी ब्लॉगर का उत्साहवर्धन के लिये बहुत सुन्दर पंक्तियां हैं ये! :-) )
  15. Shiv Kumar Mishra
    पूरा ताल ठोंक के लिखे हैं. इसे कहते हैं ‘ताल-ठोंकू’ लेखन.
    अद्भुत शैली है. पढ़कर बहुत मज़ा आया. कस्सम से…
  16. प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर
    नैनीताल कथा चालु आहे!!!!
    बढ़िया लगा !!!
    कथा को जारी रखें!!
  17. राज भाटिया
    बहुत सुंदर लगा आप के लेख से नेनीताल, ओर आप ने घुमा घुमा कर थका दिया.
    धन्यवाद
  18. विष्‍णु बैरागी
    अनूपजी, रात के (सवेरे के) तीन बजने वाले हैं । आपकी पोस्‍ट पढते-पढते श्रीलाल शुक्‍ल बार-बार सामने आने लगे । दो दिन से बाहर था । कल लौटा तो सोचा सारे ब्‍लाग देख लूं । इसी कोशिश में तीन बज रहे हैं । थकान सी होने गली थी । किन्‍तु आपके इस यात्रा वर्णन ने ताजगी ला दी । इतना ही नहीं, थोडी देर पहले अजदकजी की पोस्‍ट ने विचित्र सी अकुलाहट पैदा कर दी थी – उससे भी राहत मिली ।
    आपके सैर-सपाटे ने आज तो आनन्‍द ला दिया ।
    जीयो फुरसतियाजी ।
  19. anitakumar
    आप की पोस्ट द्वारा हम भी नैनीताल घूम लिए। फ़ोटूएं बहुत सुंदर हैं, खास कर बतखों की फ़ोटुएं बहुत अच्छी है। गहरे हरे पानी में सफ़ेद सफ़ेद बतखें बहुत मनोरम लग रही हैं और पानी इतना साफ़ है कि बतखों के पांव तक दिख रहे हैं।
  20. नितिन
    सुन्दर संसमरण, बहुत खूब.. कस्सम से इससे कम नहीं हो पायेगा!
  21. Abhishek
    नैनीताल में तो ताले-ताल है !
    बड़ा जीवंत लगा ये वर्णन. अभी हम भी घूम-घुमा के आए हैं, लेकिन कस्स्म से अईसा कहाँ लिख पायेंगे.
  22. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] कस्सम से इससे कम न हो पायेगा [...]

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