Friday, April 03, 2009

चल सनीमा देखन को जायें गो्री

http://web.archive.org/web/20140419212721/http://hindini.com/fursatiya/archives/602

30 responses to “चल सनीमा देखन को जायें गो्री”

  1. Dr.Manoj Mishra
    सिनेमा के जरिये सही और अच्छा चित्रण.
  2. shobha
    अपने विचार को बहुत सहज रूप में प्रस्तुत किया है आपने।
  3. समीर लाल ’उड़नतश्तरी वाले ओरीजनल’
    मल्टीप्लेक्स के तो हम भी घणे आभारी हैं.
    वरना तो पिछले १५ वर्षों में १० सिनेमा भी नहीं देखे थे. बहुत भयंकर झेलन क्षमता चाहिये सिनेमा देखने के लिए भाई.
  4. नीरज रोहिल्ला
    वाह,
    शाहजहाँपुर का नाम लेकर आपने पुराने जख्म हरे कर दिये। इस्लामियाँ स्कूल से बंक मारके आधा दिन क्रिकेट और आधा दिन “निशात” सिनेमा में कोई भी फ़िल्म देखना। फ़िर दुर्गा टाकीज में भी हाथ साफ़ किया। बडा डर लगता कि कहीं पिताजी का कोई जानकार न मिल जाये, और एक बार पतलून की जेब में सिनेमा की टिकट घर में पकडी गयी। लगा आज तो खैर नहीं लेकिन पिताजी ने समझाया और जाने दिया, बडा अचरज हुआ बाद में अहसास हुआ कि शायद हमारे और पिताजी के जूते का साईज एक हो चला था, :-)
    यहाँ सिनेमाहाल में फ़िल्म कम ही देख पाते हैं तो डीवीडी और कम्प्यूटर पर काम चलाना पडता है। खराब फ़िल्में देखने में अधिक सुख मिलता है, अच्छी या तो बहुत अच्छी हो वरना मजा नहीं आता। खराब फ़िल्में कभी मायूस नहीं करतीं।
  5. दिनेशराय द्विवेदी
    न राग न बैराग! यह अच्छा है।
  6. अशोक पाण्‍डेय
    बहुत-सी यादें ताजा हो आयीं।
    जब पहली बार अपनी जेब से पैसे खर्च कर कस्‍बे के सिनेमाहॉल में फिल्‍म देखने गया था, तो पीछे बैठाए जाने पर बहुत क्षोभ हुआ था :)
  7. मुकेश कुमार तिवारी
    अनूप जी,
    बस मन खिंचा चला गया उन्हीं टूरिंग सिनेमाओ में जहाँ शाम मच्छरों की भिनभिन पटकथा के बहाव के साथ ताल मिलाती थी और चुभन ऐसी की खुजाते चमड़ी छिल जाये पर परदा पर से आँखें हटे ना.
    इस तरह के सिनेमाहाल कमोबेश सभी शहरों का अनिवार्य हिस्सा होते थे पर अब वो बात कहां इन मॉल्स के चक्करों में मजा ही खत्म हो रहा है.
    जहाँ तक बात रही नयनसुख की तो मैं यह आशंका करता हूँ इस मंदी के दौर से निजात पाने के तरीकों में प्लेटफार्म टिकिट की तरह ही कोई ना कोई व्यवस्था कोई टाईवाला एम.बी.ए. सुझा ही रहा होगा.
    मजेदार पोस्ट, आंनद आया.
    मुकेश कुमार तिवारी
  8. कुश
    आज का आपका लेखन समीर लालीय लेखन से मिलता जुलता है.. जिसमे बात बात में कई ग़ूढ बाते भी कही गयी है.. जैसे की ये “बाद में समझ में आया कि पीछे से मजा लेने के मजे ही कुछ और हैं। कुछ लोग हमेशा पीछे रहकर ही आराम से तमाशा देखते/ मजा लेते रहते हैं। वेवकूफ़ नहीं समझदार लोग होते हैं पीछे से मजा लेने वाले!”
    बॉमबे में तो कई माल्स में शुल्क लगता भी है दस रुपये लिए जाते है अंदर जाने पर.. और यदि आप कुछ खरीद कर लाते है तो दस रुपये वापस ले सकते है.. यहा भी ऐसे कई सिस्टम है जैसे खरेड कर लाने पर पार्किंग फ्री हो जाती है..
    मुझे जयपुर के ही एक मॉल में शॉपर्स स्टॉप के सेल्समैन ने कहा सर आप यहा का कार्ड बनवा लीजिए फिर आप जब भी शॉपिंग करेंगे आपकी पार्किंग फ्री हो जाएगी.. तो हमने उससे कहा प्यारे अगर मैं शॉपर्स स्टॉप से कोई सामान खरीद सकता हू तो मैं पार्किंग के दस रुपये भी डे सकता हू.. :)
    बहरहाल आपका सनिमा चित्रण अच्छा है.. हम तो सिनेमा ही खाते है सिनेमा ही पीते है. .ओढ़ते है और बिछाते भी है.. नीरज गोस्वामी जी की ये पंक्तिया मुझे बहुत पसंद है.. कि मैं आज भी हिन्दी फ़िल्मे देखना अपना फ़र्ज़ समझता हू..
  9. ताऊ रामपुरिया
    “केवल कार-स्कूटर पार्किंग का खर्चा है। बिजली हमेशा रहती है। लगभग सारे माल बस्तियों के बीच बने हैं। शहरों में बिजली गायब। माल जगमगा रहा है। शहर में आदमी पसीने-पसीने है माल में ठंडी-ठंडी कूल-कूल हवा है।”
    आपने बहुत अच्छा गर्मी मिटाने का उपाय सुझाया. और हमारे यहां तो अभी पार्किंग शुल्क भी नही है. हा कुछ बिना खरीदे वापस निकलो तो १५ रुपये लगते हैं. तो हम फ़ोकट तफ़रीह करके वापस आने का उपाय भी ढूंढ लिये हैं. आपको बताये देते हैं. कार की पीछे की डीक्की मे खाली कार्टून पटक रखे हैं तो उनको देख कर पार्किंग वाला समझ लेता है कि साहब बडी खरीदी करके लौटे हैं. सभी लोग आजमा कर देखे… यह फ़ार्मुला काफ़ी समय से चल रहा है.:)
    रामराम.
  10. संजय बेंगाणी
    समीमा हॉल में पैसे खर्च कर सनीमा देखना….अब क्या कहें कम ही देखते है. कभी श्रीमतिजी खर्च उठाने को तैयार हो तो उनके लिए देख आते है :)
  11. Anonymous
    वो पिक्चर हमने सबसे आगे बैठकर देखी थी। उस समय और उसके बहुत बाद तक भी मुझे यह समझ में नहीं आया कि लोग ज्यादा पैसा खर्च करके पीछे बैठकर काहे पिक्चर देखते हैं। अजीब बेवकूफ़ हैं।
    कम से कम आपने इसके लिए लडाई नहीं की … एक के बारे में सुना है … लडाई करने लगा … पैसे पूरे ले लो … पर आगे बैठने दो।
  12. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    सनीमा देखने के मामले में आप की रुचि मुझसे काफी मेल खाती है। यहाँ इलाहाबाद में मल्टीप्लेक्स का मजा उठाने का अवसर नहीं मिल पाता है। शायद कोई नया शुरू होने वाला है। लखनऊ में एक दो बार देखने गया। फिल्म से ज्यादा वहा आए लोगों को देख कर आनन्द आया। सच में खुशहाली वहीं नजर आती है।
  13. kanchan
    बहुत सी चीजें याद आ गईं इस पोस्ट से ।
    मेरे अम्मा और बाबूजी जबर्दस्त पिक्चर देखने वाले थे तो हमारे यहाँ फिल्म देखने का तो अच्छा माहौल था। लेकिन बाबूजी के बाद अम्मा ने फिल्म देखना बिलकुल बंद कर दिया। अंतिम फिल्म निक़ाह देखी थी उन्होने। साजन बिना सुहागन, सौ दिन सास के, क्रांति, जुगनू, बिन फेरे हम तेरे, अनपढ़, क्रांति जैसी फिल्में हमने माँ की गोद में निपटा दी थीं। लेकिन फिर ९० के बाद जब बाबूजी नही रहे और मैं भी माँ की गोद के लायक नही रह गयी, तब से फिल्मों पर ब्रेक लग गई और इसी के साथ आ गई मेरी किस्मत से केबल सभ्यता। मेरी फिर मौज..! इधर फिल्म आई, उधर केबल पर। हाँ मगर ये था कि जब लोग कहते कि टाकीज़ की बात ही और है, तब थोड़ा अखरता था। जीने चढ़ के जाना थोड़ा मुश्किल था मेरा। मगर अब जब से मल्टीप्लेक्स सभ्यता आई है तब से मेरे लिये आराम हो गया। अब व्हीलचेयर बाहर ही मिल जाती है और लिफ्ट से सीधे हाल के अंदर तक जाती हूँ।
    मैं कभी कभी कहती हूँ कि हम जैसे लोगो के लिये ये best era चल रहा है। जब सहायक यंत्रों के सहारे खुश रहा जा सकता है।
    और हाँ आज कल मल्टिप्लेक्स में आगे बैठने के कम पैसे लगते हैं, पीछे के चार्जेज़ अधिक होते हैं। उल्टा सिस्टम…! :)
  14. जि‍तेन्‍द्र भगत
    मजेदार वृतांत :)
  15. डाकटर अमर

    यही हाल अपना भी है..
    पर.. बुरी सोहबत में महीने में कम से कम दो पिक्चर देखने की नौबत आ ही जाती है..
    यह सोहबत इस ज़न्म में न छूटे, तो अच्छा ही है..
    अब हम इज़ाज़त चाहेंगे , तो जायें ?
    रामनवमी पर मेरे यहाँ पिक्चर देखने का रिवाज़ है !

  16. मानसी
    आपकी एक लंबी पोस्ट जो बिना स्किप किये पढ़ गई। पोस्ट को बांध कर रखा है आपने।
  17. विवेक सिंह
    हमारा हाल तो ऐसा है कि जब दाँत थे तब चने नहीं थे , अब चने हैं तो दाँत नहीं हैं !
    जब शुरू में पिक्चर के बारे जाना तो उसके साथ यह अवधारणा भी मिली कि यह पिक्चर देखना कोई भले लोगों का काम नहीं है . जैसे बीड़ी पीना , शराब पीना आदि वैसे ही वीसीआर देखना ! वीसीआर गावँ में किसी की सगाई समारोह आदि के उपलक्ष्य में ही आता था और बिजली की मेहरबानी पर रात में चलता था . आसपास के कई गावों से लोग वीसीआर देखने आते थे . हमारे गावँ के ऐसे ही लोग दूसरे गावों में जाते थे . पर हमारे ऊपर अपने गावं में भी वीसीआर देखने पर पाबंदी थी . कहा जाता था कि यह समय पढ़ाई करने का है . अगर अभी मेहनत कर लोगे तो जिन्दगी भर खूब पिक्चरें देखना . और अब पिक्चर देखने लगे तो जिन्दगी भर घास खोदोगे ! हमें यह बात बिल्कुल वैसी ही लगती थी जैसी कि अब मैनेजमेण्ट की यह बात कि ड्यूटी पर सोना नहीं है . पर क्या करें तब भी और अब भी BOSS IS ALWAYS RIGHT . लोग पाजिटिव आदेश क्यों नहीं देते कि अपनी पढाई पूरी करो . या अपना काम पूरा करो . उसके बाद हम चाहे पिक्चर देखें या सोयें यह हमारी मर्जी होनी चाहिये . पर नहीं यहाँ सब ऐसे ही चलता है . फ़िर भी हमने कई बार रात में चुपके चुपके जाके पिक्चरें देख ही लीं . कितना मजा आया कुछ वर्णन नहीं किया जा सकता . असीम आनन्द की प्राप्ति हो जाती थी . फ़िल्म बडे़ पर्दे पर हाल में भी चलती है इसका पता तो बहुत बाद में चला . बडे़ परदे पर पहली बार शायद दसवीं क्लास में पहली फ़िल्म देखी थी महावीरा जिसमें माँ की मौत पर रोते रोते डिम्पल कपाडिया की नाक टपक जाती है . घर वालों को आज तक नहीं पता . आपको ही बता रहे हैं :)
    जब हमें यह पता चला कि यह फ़िल्में और टीवी पर आने वाले प्रोग्राम सब सच नहीं हैं तो हमारा दिल टूट गया ! एकदम झिक्की लग गयी फ़िल्मों से . पहले हमें पता ही नहीं था कि ये गोविन्दा अमिताभ बच्चन वगैरह वगैरह ही सभी फ़िल्मों को बनाते रहते हैं . फ़िल्मों को क्या पब्लिक को बनाते रहते हैं . बल्कि यूँ कहें कि बिगाड़ते रहते हैं तो शायद ज्यादा सही लगे !
    उसके बाद मैच का शौक लगा . बस क्रिकेट मैच सुनना ही मजेदार काम था ( देखने के लिए तो टीवी उपलब्ध नहीं था ) गरदन में रेडियो लटकाकर मुहारा फ़ोड़ते थे खेत में पानी लगाते समय . अगर हम हम रेडियो मेंड़ पर रख देते और सचिन आउट हो जाय तो बड़ी ग्लानि होती . इसलिए ऐसा अवसर ही न आने दिया जाय . अपनी तरफ़ से गलती न हो . हाँ सचिन स्वयं की गलती से ही आउट हो जाय तो हम जिम्मेवार नहीं होंगे ! पर इसका भी वही हश्र हुआ जो फ़िल्मों का हुआ . अब मैच होकर परिणाम इतिहास में दर्ज़ हो जाता है और हमें पता ही नहीं . आधा दर्ज़न छोटे सगे और चचेरे भाइयों को बिगाड़्कर हम सुधर गये हैं :)
    अब बात बिलागिंग की !: इसका भी स्तर शुरू में आसमान पर था . पर अब पता चलने लगा है कि ये अनूप शुक्ल , G.D.पाण्डेय , कुश आदि भी ताऊ जैसे ही छद्म हैं . सत्य है तो बस प्रशान्त प्रियदर्शी ! जय बजरंग बली !
  18. Arvind Mishra
    दो चिट्ठाजगत पुन्गवों ने एक ही दिन -रामनवमी के दिन चलचित्र चर्चा की -मल्टीप्लेक्स तक का भी जिक्र दोनों में कामन रहा –अब इन दोनों महारथियों में स्थानिक दूरी भले हो मगर चिंतन में इतना साम्य हैरान करने वाला है -साफ़ जाहिर है चिंतन का स्तर अलौकिक हो तो वह दो महान दिमागों में एक साथ पनप सकता है ! हम नतमस्तक हैं !
    हमारी भी कुछ ऐसी ही दिनचर्या थी और अपनी अहमन्यता में फिल्मों को वाहियात और फालतू ही समझते रहे ,अपवादों को छोड़कर -गोविन्द निहलानी ,प्रकाश झा ,हृशी दा ,आदि को छोड़कर जिन्हें तो जरूर देखा ! मगर वह छोड़ता गया जिन्हें छोड़कर अब पछतावा होता है -आँखें तो तब खुली जब एक युवा आई ये एस टापर (१९८….) बैच ने अपने साथ लेकर बगल की सीट पर बैठा फिल्म दिखाया और बार बार पूंछते रहे ये करिश्मा कैसा लग रहा है -इसका यह कैसा है वह कैसा है आदि आदि और हम पसीने पोंछ पोंछ कर ऊल जलूल जवाब देते रहे !
    पर नतीजा यह हुआ कि अचानक फिल्मों में मेरी रूचि का पुनर्जागरण हो गया ! सत्य से साक्षात्कार हुआ ! नाहक ही एक उम्र तक जनम गवायो ! आज भी उन साहब का फोन तक आ जाता है -वो वाली फिल्म देखी ? अब मैं इस दर से कि उनका फोन न आ जाय कई फिल्मों का पहला ही शो देख आता हूँ ! और बहुत बारीक से -उनके प्रश्न का उत्तर देना होता है -नौकरी तो करनी है न भाई !
  19. लावण्या
    माल/मल्टीप्लेक्स से आबाद भारत की छवि
    मेरे लिये बिलकुल नई – सी है -
    मुफ्त मेँ मनोरँजन ! वाह जी वाह !!
    हिन्दी फिल्मेँ बम्बई मेँ बहुत देखीँ ..
    अब तो घर पर डीवीडी देख लेती हूँ .
    अँग्रेज़ी सिनेमा देखना चाहेँ तब,
    ये अवश्य देखियेगा ..
    1) A Beautiful Mind
    2 ) Gone with the wind
    3) sound of Music
    स स्नेह,
    - लावण्या
  20. dr anurag
    मालूम है बुरा शौंक है .पर छूटता नहीं…ससुरा अंग्रेजी फिल्म भी देख लेते है ..ओर जब से वर्ल्ड मूवी का चैनल आया .इरानियन भी….क्या करे ..इन दिनों बेटा ५ साल का है तो ढेरो करतों फिल्म उसके साथ देख ली..कसम से ऐसे डाइलोग है की आप भी किसी दिन कहोगे भाई अनुराग निमो दुबारा चलायो…….नीरज जी का डाइलोग अगर पेटेंट न हो तो हम भी बोलेगे…
    भाग कर पिक्चर एक बार देखी थी अंग्रेजी की .नाम नहीं बताएँगे समझ जाइये …आगे बैठकर पहली पिक्चर देखने को मिली थी .आमिर की सरफ़रोश…आधे घंटे में सर एडजस्ट हुआ था…. बाद में दुबारा पैसे खर्च करके हमने पिक्चर देखी…..हमारे शहर में मोल में घूमने का पैसा नहीं लगता ….पर नोइडा की पार्किंग में गाड़ी कहाँ खड़ी है ये यद् करना मुश्किल हो जाता है….खैर पिक्चर देखा कीजिये ….”.कुछ बुरे शौंक भी कभी कभी अच्छे होते है “
  21. pallavi trivedi
    hamne to hamari maummy ke film dekhne ke shauk ke chalte bachpan se hi khoob filme dekhi…aaj bhi dekh rahe hain!
  22. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    लोग अपने फिल्म-नोस्टाल्जिया के किस्से सुना रहे हैं।
    हमने तो छात्र जीवन में ही सिनेमा हाल में फिल्में देखी हैं। और अंग्रेजी फिल्मों का अंग्रेजीदां नुमा विद्यार्थियों में बहुत क्रेज था। एक से एक फर्राटेदार अंग्रेजी खींचने वाले बन्दे थे। हम तो देसी स्कूल से हिन्दी माध्यम से आये थे। पर मुझे अब भी याद है कि एक अंग्रेजी फिल्म की रीलें गड्ड-मड्ड कर दिखा दी थीं सिने क्लब के कर्मचारी ने और धाकड़ अंग्रेजीदां समझ ही न पाये कि कुछ गड़बड़ है। :-)
  23. anil kant
    kaafi dilchasp hai post …maza aa gaya
  24. mamta
    भाई हम तो पहले भी खूब फ़िल्म देखते थे जब मल्टीप्लेक्स नही होते थे और आज भी देखते है मल्टीप्लेक्स मे ।
  25. anitakumar
    आप की पोस्ट ने लोगों को अपना इतिहास याद दिला दिया, सब बूढ़े हो लिए कि “हमारे जमाने में ……॥” हम कैसे अछूते रहते, यादों के अंबार लगे हैं लेकिन वो किस्से फ़िर कभी, आज की सबसे बड़िया टिप्पणी रही विवेक की तो चार एप्रिल के टिप्पणी सरदार है विवेक सिंह्। कुश बोम्बे के कौन से मॉल में घुसने के लिए पैसा देना पड़ता है बता दें तो उधर का रुख कभी न करेगें। जब से ब्लोगजगत में विचरण की लत लगी है, नहीं कहना चाहिए, ऐसी लागी लगन्…कि अब तो टी वी पर भी पिक्चर तो क्या रोज के सीरियल भी छूट गये।
  26. कविता वाचक्नवी
    इस रोचक चित्रपट प्रसंग ने कई स्मृतियाँ ताज़ा कर दीं।
    औअर यह विवेक क्या खुलासा कर रहे हैं, कितने छद्म?
  27. रौशन
    सिनेमा का शौक भी अजीब सा शौक है दो-एक बार तो हमने ऐसी फिल्म देख डाली हैं जिनमें हालमें हमारे अलावा बहुत बस चार-छः लोग और रहते रहे हैं और वो भी जोडों में
    एक दिन हमने भी तय किया कि बहुत हो चुका अब अकेले फिल्म देखने नहीं जाना है. तब से फिल्म देखना कम हो गया .
    लखनऊ में मॉल्स में एंट्री टिकेट नहीं लगता इसके चलते ये तो आसानी रहती है कि समाज के अलग अलग वर्गों के लोग मॉल्स पहुँच रहे हैं . वो खरीदारी भले न कर सकें , उनके घूमने की जगहों में कुछ जगहों की बढोत्तरी हो ही गयी है नहीं तो मॉल्स धनाढ्य लोगों के गढ़ भर बन के रह गए होते
  28. amit
    सनीमा तो हम भी अधिक नहीं देखते हैं। फिल्म बेकार हो तो टीवी पर ही भुगतना भारी पड़ जाता है, सनीमा में तो जेब अलग से ढीली होती है। इसलिए हम तो बहुत ही लिमेटिड चॉयस रखते हैं अपनी, फलानी फिल्म रुचि की है और कब आ रही है और जब आ जाए तो उसको देख लिया जाए। यदि हिन्दी फिल्म है तो पहले जाकर देखने का पंगा नहीं लेते, अन्य लोगों को देख आने दिया जाता है और यदि फिल्म के बारे में अच्छे विचार मिलते हैं तो ही फिल्म देखने के बारे में सोचा जाता है! :)
  29. आभा
    हमारे तीन चचेरे भाइयों के नाम भी अशोक , किशोर ,अनूप हैं।वे सब आजकल चंपारन में रहते हैं ।
  30. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
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