Thursday, May 13, 2010

अनूप शुक्ल, दम्भ और अभिमान और मौज की लक्ष्मण रेखा

http://web.archive.org/web/20140419212549/http://hindini.com/fursatiya/archives/1464

अनूप शुक्ल, दम्भ और अभिमान और मौज की लक्ष्मण रेखा

१.क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे? -पंच परमेश्वर
२.हम लोग सब विभाजित व्यक्तित्व (स्पिलिट पर्सनालिटी) के हैं। हम कहीं करुण होते हैं और कहीं क्रूर होते हैं। इस तथ्य को स्वीकारना चाहिये।- हरिशंकर परसाई
दो दिन पहले  ज्ञानजी ने पोस्ट ठेली जिसमें उन्होंने लिखा :
image समीर लाल अपने टिपेरने की कला पर बेहतर फॉलोइंग रखते हैं। उनकी टिप्पणियां जबरदस्त होती हैं। पर उनकी पोस्टों का कण्टेण्ट बहुत बढ़िया नहीं है। कभी कभी तो चुकायमान सा लगता है। उनकी हिन्दी सेवा की झण्डाबरदारी यूं लगती है जैसे अपने को व्यक्ति नहीं, संस्था मानते हों!
अनूप शुक्ल की पोस्टें दमदार होती थीं, होती हैं और होती रहेंगी (सम्भावना)। चिठ्ठा-चर्चा के माध्यम से मुरीद भी बना रखे हैं ढेरों। पर उनकी हाल की झगड़े बाजी जमती नहीं। दम्भ और अभिमान तत्व झलकता है। मौज लेने की कोई लक्ष्मण रेखा तय नहीं कर पाये पण्डित।
इसके बाद ज्ञानजी ने सवाल उछाल दिया- कौन बेहतर ब्लॉगर है – शुक्ल कि लाल?
हमको हमारे किसी दोस्त ने फ़ोन पर बताया कि ज्ञानजी ने ऐसा लिख मारा है। हमने सोचा कि पूछें- लिखा है कि मारा है? लेकिन धैर्य ने उत्सुकता को डांट के बैठा दिया। थोड़ी देर पर पता चला कि भाई सतीश सक्सेना जी मेल हेलकर बता रहे हैं कि कोई भैया डपोरशंख हैं जो कि ज्ञानजी के खिलाफ़ ऊल-जलूल लिख रहे हैं।
सतीश सक्सेनाजी में बड़ा भाईपन बहुतायत में है। वे हमेशा हमें बड़े भाई की तरह टोंकते रहते हैं, हमेशा हमें बताते रहते हैं कि मैं खराब लोगों से घिरा हुआ हूं, अक्सर हममें और समीरलाल में सुलह का आवाहन करते रहते हैं। कभी-कभी तो लगता है कि सतीश सक्सेनाजी न होते तो मुझसे और समीरलाल में अब तक मारपीट हो गयी होती। मैं सतीश सक्सेनाजी की उनके इस घणे बडप्पन भाव का बहुत सम्मान करता हूं।
बहरहाल जब पता चला कि ज्ञानजी ने हमारी और समीरलालजी जी की बेइज्जती खराब की है तो सोचा कि इलाहाबाद चलके एक ठो मानहानि का मुकदमा धांस देते हैं। अपनी तरफ़ से और समीरलाल की तरफ़ से भी। बाद में समीरलाल जब आयेंगे कानपुर तब उनसे हिसाब-किताब कर लेंगे पैसे का। लेकिन पता लगा कि इलाहाबाद के लिये उस समय कोई गाड़ी ही नहीं थी। हम तो भरे बैठे ही थे। सोचा  यह सोच डालें कि इसमें भी  ज्ञानजी की ही साजिश है लेकिन फ़िर सोचा नहीं! बहुत मेहनत लगती है भाई इस तरह की बातें सोचने में।
शाम तक देख ज्ञानजी के ब्लॉग पर नजर गढ़ाये रहे। गिनते रहे टिप्पणियां। जिसने हमारे पक्ष में कुछ लिखा मुझे लगा उसके अंदर हरिशचंद्र का अंश है। जिसने नही लिखा उसकी टिप्पणी देखकर लगा –जमाना बड़ा खराब आ गया है। लोग सच तक बोलने से हिचकते हैं। :)
हमारे लिये तो ज्ञानजी ने जो कुछ लिखा उस तरह की बातें तो अक्सर लोग कहते हैं। ज्ञानजी ने बहुत ज्ञानियों वाले अंदाज में लिखा- पर उनकी हाल की झगड़े बाजी जमती नहीं। दम्भ और अभिमान तत्व झलकता है। मौज लेने की कोई लक्ष्मण रेखा तय नहीं कर पाये पण्डित। लेकिन समीरलाल के लिये उन्होंने बहुत खराब लिखा। जैसा उनके लेखन के लिये लिखा उससे मुझे समीरलाल के प्रति प्यार उमड़ आया। मैंने सोचा समीरलाल को मेल करके लिखूं- पिटूं इस दुख की घड़ी में मैं तुम्हारे साथ हूं। तुम भी हमारे साथ ही आ जाओ। दोनों मिलकर इस दुख की घड़ी को पार करें। पिंटू बबुआ –आई लव यू! लेकिन शाम को ही देखा कि कई भाई लोग समीरलाल के लिये समर्थन में आये और ज्ञानजी की ऐसी-तैसी करने लगे। सुबह देखा कि समीरलाल सब समर्थन करने वालों के स्नेह से अवभूत हो लिये और कह आये कि स्नेह बनाये रहिये। समीर भाई की यह अदा मुझे बहुत अच्छी लगती है। वे अपने समर्थन से और स्नेह से सदैव अविभूत हो जाते हैं। इस मामले में वे किसी से भेदभाव नहीं करते। कोई उन पर यह आरोप नहीं लगा सकता कि स्नेह से अविभूत होने के मामले में उन्होंने भेदभाव बरता है। वे नामी, अनामी, बेनामी हरेक से बराबर से अविभूत हो लेते हैं। :)
बहरहाल अब जब ज्ञानजी ने कह दिया तो कह दिया। अब उनके कहे पर कुछ न लिखना उनके लेखन की उपेक्षा करना होगा। इसलिये इससे पहले कि यह बबाल शान्त होय उसके पहले अपनी बात कह दें नहीं तो ससुरा समय हमारे ऊपर तटस्थ रहने का आरोप लगा देगा। हम कहीं मुंह दिखाने लायक न रहेंगे। इति प्रस्तावाना।
ज्ञानजी और समीरलाल मेरी नजर में: ज्ञानजी और समीरलाल मेरे पसंदीदा ब्लॉगर थे, हैं और रहेंगे। दोनों की एक भी पोस्ट शायद ऐसी नहीं है जिसको मैंने बांचा नहीं है। टिपियाना न टिपियाना अलग बात है। दोनों से मैंने जी भरकर मौज भी ली है। ज्ञानजी का तो पर्सोना तक बिगाड़के धर दिया। समीरलाल से इत्ती मौज हम ले चुके हैं कि अगर आज लेने लगें तो समीरलाल को सम्बल प्रदान करने वाले हमें दो-तीन बार खोद के गाड़ दें-मजदूरी के पैसे भले नरेगा वाले खाते से भुगतान करने पड़ें। ज्ञानजी ने एक बार अपनी किसी पोस्ट में पूछा था- फ़ुरसतिया की मौज का रेगुलेटर कहां हैं! हम दबा गये। क्या पता दिख जाता ज्ञानजी को तो वे टेटुआ (रेगुलेटर) दबा देते। समीरलाल से भी मैंने बल भर मौज ली है। उनके  मधुर गायन के बारे में टिपियाते हुये एक बार लिखा- वे (समीरलाल)हमसे बहुत जलते हैं कि जित्ता बेसुरा वो मेहनत करके पसीना बहाकर गा पाते है उत्ता तो हम बायें हाथ से गा देते हैं। उनमे जन्मदिन पर भी मौज लेने से नहीं चूके। इसलिये मौज नहीं लेंगे तो बबुआ बुरा मानेगा और लिखा:

image
बबुआ समीर पैदा भये, और लगे तुरत टिपियान,
बिनु टिपयाये न चैंन लें, घर वाले सब हलकान,
घर वाले सब हलकान,न सुधि है खाने-पीने की है,
चेहरा खिला देखकर ,जो टिप्पणी अभी माडरेट करी है,
सब ब्लागरों की इस मौके पर तो है यही दुआ,
बने रहो बस क्यूट औ ब्लागिंग करत रहो तुम बबुआ।

ज्ञानजी और समीरलाल से मैंने इतनी मौज ली है कि दो साल पहले लगा कि शायद मैं एक तरफ़ा मौज लेता हूं। ये बेचारे भलमनसाहत में कुछ नहीं कहते नहीं हैं लेकिन ये अच्छी बात नहीं और तय किया बड़े-बुजुर्गों (ज्ञानजी, समीरलाल,शास्त्रीजी आदि-इत्यादि) से अतिशय मौज लेने से परहेज करना।
ज्ञानजी सही मायने में मार्निंग ब्लॉगर हैं। नित नये विषय खोज के लाते हैं। ब्लॉग चौपाल पर पटक के धर देते हैं। आओ भाई लोगों आओ अपनी टिप्पणियों से इस सार प्रदान करो। कभी-कभी वे अपनी पोस्टों में दो-तीन विषय नत्थी कर देते हैं। ये नहीं तो ये लो, ये नहीं तो वो लो। नयी-नयी चीजों को सीखने और अमल में लाने की उनकी ललक और क्षमता अद्भुत है। शुरुआत में अंग्रेजी के शब्द बहुतायत में होते थे उनकी पोस्टों में। बाद में इसी सीखने की ललक के हत्थे चढ़कर इत्ती घणी हिन्दी लिखने लगे कि हम उसका अंग्रेजी अनुवाद करके पढ़ने लगे। ज्ञानजी अपनी बुजुर्गियत और खिलंदड़ेपन को अपने मूड के अनुसार स्विचओवर करते रहते हैं। अक्सर ट्यूब खाली होने का हल्ला करते रहते हैं, जैसे अपने यहां हजारों सालों से कलयुग आने का हल्ला मचता रहता है। वैल्यू एडेड टिप्पणियां करने के प्रयास में कभी-कभी  ऐसी-ऐसी टिप्पणियां करते हैं जिनको देखकर ही लगता है यह नन अदर दैन ज्ञानजी ही किये होंगे। किसी विवाद में सीधे नहीं पड़ते। बहुत हुआ तो परमहंस ज्ञानी जैसी टिप्पणी कर देते हैं, फ़ाइनल टाइप की। मानना हो तो मानो वर्ना अपने ब्लॉग में जाओ। कभी-कभी अंग्रेजी और हिन्दी का ऐसा शानदार गठबंधन रहता है उनकी टिप्पणी में कि आप मन माफ़िक अर्थ निकाल सकते हैं। उनकी पोस्टों का एक खास पैटर्न है जिसमें और कुछ हो न हो लेकिन आठ-दस-पोस्ट बाद जी.डी. अब तुम चुक गये का सम्पुट अवश्य मिल जायेगा। उनकी आजकल की ब्लॉगिंग को देखकर लगता है कि उनकी ब्लॉगिंग को बन्द कराने का एक ही तरीका है वह है उनका मोबाइल गायब कर दिया जाये। :)
ज्ञानजी की बहुत सी बातों से असहमत होने की बावजूद यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि वे आजकल की हिन्दी ब्लॉगिंग की जरूरी और अपरिहार्य उपस्थिति हैं। मैं उनकी इज्जत करता था , हूं और आगे भी करता रहूंगा। इज्जत करने में कौन ससुर अपनी कोई इज्जत चली जायेगी। :)

image समीरलाल हिन्दी ब्लॉग जगत की एक बेहतरीन शक्सियत हैं। ज्ञानजी ने यह लिखा कि उनकी पोस्टों का कण्टेन्ट बहुत बढिया नहीं है। यह मेरी समझ में सही नहीं है। समीरलाल ने कुछ बहुत बेहतरीन पोस्टें लिखी हैं। उनकी जीरो साइज ठानी बाबा और अगले जनम मोहे बेटवा न कीजो… जैसी स्वत:स्फ़ूर्त शानदार पोस्टों के अलावा और भी तमाम शानदार पोस्टें उन्होंने लिखी हैं। जो चुकायमान होने की बात ज्ञानजी ने लिखी वह शायद इसलिये कि समीरलाल मूलत: कविता लिखते हैं। कविता लिखने वाला आम तौर एक  सेट पैटर्न में कवितायें लिखता है। समीरलाल भी लिखते हैं ऐसा। आजकल उनकी कविताओं के विषय आध्यात्मिक और गहन मतलब लेकर लिखी जा रही हैं। उनकी कविताओं का दुख कभी-कभी आरोपित लगता है। लेकिन उनकी पोस्टों को चुकायमान कहना समीरलाल के खिलाफ़ अन्याय होगा। समीरलाल अपना अधिकतर समय देश से बाहर रहते हैं। ऐसे में उनकी भावुकता का स्तर और हमारी भावुकता के स्तर में अंतर होगा। जो बात उनको भावुक करके आंखों आसू ला देती होगी उसई को देखकर हम मौज लेने के लिये उचकने की तैयारी करने लगते हैं। जैसे इसी मामले में समीरलाल जी सम्बल मिलने से भावुक हो गये वहीं हम मौज लेने के लिये की बोर्ड खटखटा रहे हैं।
समीरलाल जिम्मेदार व्यक्ति हैं। जो जिम्मेदारी साथी लोगो ने सौंप दी उन्होंने विनम्रतापूर्वक संभाल ली। अब यह आपकी समस्या है कि आप उनको संस्था मानने लगे। समीरलाल संस्था नहीं एक जिम्मेदार व्यक्ति हैं। इसका प्रमाण यह है कि समीरलाल एक विनम्र  हिन्दी सेवक हैं जबकि संस्थायें कभी विनम्र नहीं हो सकतीं। समीरलाल से मैं दो-तीन बार मिला हूं। घरेलू संबंध हैं। वे विनम्र, सहनशील, हितैषी, परदुखकातर और तमाम मानवीय अच्छाइयों से युक्त व्यक्ति हैं। मेरी बड़ी भतीजी की शादी में उन्होंने फोन करके पूछा भी था किसी किसिम की मदद की जरूरत हो तो बताना। उनकी नेटवर्किंग गजब की है। टिप्पणियों और उनके व्यवहार के चलते ब्लॉगजगत के तमाम लोग उनके बहुत मुरीद हैं।
हर  इंसान की तरह समीरलाल में भी कुछ कमियां भी होंगी। जहां तक ब्लॉगिंग का सवाल है मेरी नजर में उन्होंने जो अनामी, बेनामी, छद्मनामी ब्लॉगरों की नकारात्मक पोस्टों पर वाह,वाही टिप्प्णियां की हैं वह शायद न करते तो मेरी समझ में वे अपना और ब्लॉगजगत का बहुत भला करते। मेरी समझ  में आप जो भी लिखते पढ़ते हैं, टिपियाते हैं वह सब आपके पूरे व्यक्तित्व का आईना होती है।
यह बातें मैंने समीरलाल को बताई भी हैं, लिखीं भी हैं। उन्होंने महसूस भी किया है इसे लेकिन न्यूटन का जड़त्व का नियम हमेशा सही सिद्ध होता आया है।
इस सबके बावजूद ज्ञानजी की इस बात से मैं कत्तई इतफ़ाक नहीं रखता कि समीरलाल की पोस्टों का कण्टेन्ट बढिया नहीं है या वे चुकायमान है। रोज कोई बहुत अच्छा नहीं लिखता। समीरलाल भी इसके अपवाद नहीं है, कोई नहीं है। बाकी संस्था जैसी अदायें दिखाने तो यह मुझे भी खिजाऊ लगता है लेकिन इसको मैं समीर भाई का बचपना और अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने की मानवसुलभ इच्छा मानकर मटिया देता हूं। समीरलाल को टिप्प्णियां देना और पाना अच्छा लगता है। इसके लिये वे तरह-तरह से प्रयास करते हैं। उनके लिये मैंने लिखा भी था- सबसे ज्यादा चर्चित होने के बावजूद समीर बाबू का और चर्चित होने का हुलास देखकर लगता है कि एक बच्चा है जिसके सारी जेबें टाफ़ी/लेमनचूस से भरी हैं लेकिन बालक एक और कम्पट के लिये मचल रहा है।
ज्ञानजी के कहने का मतलब क्या है?: ज्ञानजी के कहने का मतलब जो तमाम लोग समझ रहे हैं वह नहीं है। ज्ञान जी की इस पोस्ट से पिछली पोस्टों को ध्यान से देखिये आपको सब सिलसिले मिल जायेंगे। ज्ञानजी मेरे लिये केवल और केवल यह कहना चाहते थे- पर उनकी हाल की झगड़े बाजी जमती नहीं। दम्भ और अभिमान तत्व झलकता है। मौज लेने की कोई लक्ष्मण रेखा तय नहीं कर पाये पण्डित। अब सीधे कहेंगे तो मजा नहीं आयेगा और पोस्ट नहीं निकलेगी। इसलिये ज्ञानजी ने घुन के साथ गेहूं भी पीस दिया। यहां मैं अपने बचाव में कुछ नहीं कहना चाहता। ज्ञानजी का आरोप मान लेता हूं। आखिर मैं ज्ञानजी की इज्जत करता हूं। सजा सुनने के लिये तैयार हूं।
 कौन बेहतर ब्लॉगर है – शुक्ल कि लाल?: हमारे एक भूतपूर्व महाप्रबंधक आदरणीय श्री विज्ञान शंकर जी ने एक बार एक मीटिंग में कहा था कि हर मशीन का विहैवियर अलग होता। वे ह्यूमन वीयिंग की तरह होती हैं। मतलब दो एक सरीखी मशीनें भी अलग-अलग तरीके से व्यवहार करती हैं। जब अलग-अलग व्यवहार होगा तो कोई किसी मामले में अच्छी होगी कोई किसी मामले में। लब्बोलुआबन दोभिन्न मशीनों की तुलना करना  ठीक नहीं होगा। जब मशीनों के बारे में ये हाल है तो आदमियों  के क्या हाल होंगे। हमारी और समीरलाल की तुलना किलोमीटर और किलोग्राम की तुलना सरीखी है। इस तरह का प्रयास करना ऐसा ही होगा जैसे हमलोगों को कुचल-कुचल कर एक ड्रम में भर दिया जाये और तौलकर देखा जाये कौन भारी है।यह डिजिटाइजेशन बुद्धिमानों के चोचले हैं। मुझे नहीं लगता कि इस तरह की तुलना का कोई मतलब है नहीं। तब तो और भी नहीं जब मैंने अपना अपराध मान लिया जो ज्ञानजी कहना चाहते हैं-पर उनकी हाल की झगड़े बाजी जमती नहीं। दम्भ और अभिमान तत्व झलकता है। मौज लेने की कोई लक्ष्मण रेखा तय नहीं कर पाये पण्डित।
और फ़िर भी  अगर आप पूछने पर अड़े ही हैं तो मै समीरलाल के समर्थन में बैठ क्या लेट जाता हूं और कहता हूं- समीरलाल बेहतर ब्लॉगर हैं , बल्कि कई गुना बेहतर ब्लॉगर हैं अनूप शुक्ल से।
ज्ञानजी की इस पोस्ट की उपलब्धि क्या है?: इस पोस्ट की सबसे बड़ी उपलब्धि मेरी समझ में ब्लॉग जगत  की प्रवृत्ति और रुझान के बारे में पता चलना है। यह मसला कल शुरू हुआ और आज खत्म हो गया ब्लॉग जगत में समर्थन और विरोध में पोस्टों की बाढ़  नहीं आयी। जिन लोगों ने लिखीं भी वे अनामी/बेनामी लिखीं। राजकुमार सोनी जी की पोस्ट देखकर लगा कि वे बहुत अच्छा लिखते हैं। लेकिन उनको अपने लिख्नने का अंदाज ऐसी-तैसी वाला ही पसंद है। शायद यह उनकी मजबूरी भी है वर्ना लो मानेगे ही नहीं कि यह पोस्ट राजकुमार ने लिखी है। इसके पहले उन्होंने मेरे खिलाफ़ भी लिखी थी। मुझे पहले थोड़ा ताज्जुब हुआ लेकिन जब लोगों ने बताया कि उनके लिखने का यही बिन्दास अन्दाज है तब मैं चुप हो गया। वैसे भी इस पोस्ट में  ज्ञानजी की ऐसी-तैसी करने के  लिखने के पहले ही मित्रों से क्षमा मांग चुके थे तब कोई क्या कर सकता था? 
इस बात से  यह भी लगा कि अब ब्लॉग जगत में विवाद दिनभंगुर होने लगे हैं। लफ़ड़े वाली पोस्ट दिनायु पूरी करके खलास हो जाती है। लोग समझदार हो गये हैं।
इस पोस्ट से यह भी पता चला कि हिन्दी ब्लॉग जगत में हम लोग कितने  संवेदनशील हैं। जरा सा किसी ने कुछ कह दिया और लेकर राशनपानी चढ़ बैठे। हम आपस में भले ही अच्छे संबंधों की कसमें खाते रहें, भाईचारे की जुगाली करते रहें लेकिन जहां किसी ने कुछ मनमाफ़िक के अलावा कुछ कह दिया तो उसकी इज्जत शाम के समय उतारे जाने वाले झण्डे की तरह उतार दी।
यह भी लगा कि सालों की साख पर एक पोस्ट कित्ती भारी पड़ती है। समीरलाल ने अपने लिये इसे कठिन समय और इस मौके पर साथ देने वाले तमाम बेहूदी बातें लिखने वालों को जिस तरह धन्यवाद दिया उससे लगा कि पिंटू बबुआ कितने संवेदनशील हैं। अपना कुछ नहीं बस लोग संबल बंधायेंगे ? आप जिन  ज्ञानजी के ब्लॉग पर रोज जाते है, उनके प्रशंसक हैं उनको कोई अनामी गरिया रहा है और कह रहे हैं आपने कठिन समय में साथ दिया।
अरे भाई ज्ञानजी कौन खलीफ़ा हैं  उनका कहा पत्थर की लकीर हो गया। उनकी अपनी समझ है। उन्होंने कहा! जरूरी थोड़ी कि उससे इत्तफ़ाक रखा जाये? अरे ज्ञानजी ने केवल एक बात कही !  उसई से तुम्हारा कठिन समय आ गया।
अरे भाई ज्ञानजी भले उमर में सीनियर हैं लेकिन ब्लॉगिंग में तो हम सीनियर हैं न! दोनों लोगों से! जब तक हम नहीं कहेंगे तब तक ज्ञानजी की बात फ़ाइनल कैसे मानी जायेगी। इत्ता छुई-मुई विश्वास लेकर कैसे चलेगा मुंडलिया नरेश? ये अच्छी बात नहीं है।
इसके अलावा मुझे लगा कि जिस बात को हंसकर उड़ा देना चाहिये उसको इतनी तव्व्जो दी गयी और अब हम भी तो वही कर रहे हैं। एक पोस्ट धांस रहे हैं। इससे लगता है कि हम लोगों का हास्यबोध बहुत कमजोर है। जरा से धक्के में सीवन खुल जाती है।
इस पोस्ट का एक और हासिले मकसद है वह यह कि एक बार और लोगों ने कह के डाल दिया हिन्दी ब्लॉगिंग का शैशव काल चल रहा है। जैसे भारत हमेशा विकासशील देश बना रहता है वैसे कुछ लोगों की नजर में हिन्दी ब्लॉग का हमेशा शैशव काल ही चलता रहेगा लगता है।
मौज की लक्ष्मण रेखा:  ज्ञानजी ने मुझमें दम्भ और अभिमान होने की बात कही। इस बारे में मैं अपनी कोई सफ़ाई नहीं देना चाहता। यह तो मेरे साथ जुड़े लोग ही बता सकते हईं कि मैं कितना दम्भी हूं और कितना अभिमानी हूं। वैसे ज्ञानजी की यह बात मैं सच्चे हितैषी की सलाह और समझाइस के तौर पर ले रहा हूं। बाकी रही बात मौज की तो वो सीमा रेखा मैंने बहुत पहले से तय कर रखी है। मैं किसी का मन दुखाने के लिये मौज नहीं लेना चाहता। जहां मुझे एहसास हुआ कि किसी को मेरी मौज खराब लग रही है, मैंने बंद कर दिया। बहुत सारे लोग हैं जिनसे मैं नियमित मौज लेता था लेकिन जब लगा कि उनको खराब लग रहा है मैंने बंद कर दिया। जानबूझकर किसी का मन दुखाना मैं  अपराध मानता हूं। हां, यह अवश्य है कि जहां भी बनावटीपन देखता हूं वहां खिंचाई करने का मन करता है। वहां भी जब देखता हूं कि मामला जमता नहीं तो निकल लेता हूं कभी वापस न जाने की सोचकर। अपनी बात के समर्थन में ये ड्म्पलाट कविता पंक्तियां पेश हैं:
जिस तट पर प्यास बुझाने से अपमान प्यास का होता हो,
उस तट पर प्यास बुझाने से प्यासा मर जाना बेहतर है।

यहां अपनी बात के हिसाब से बदलाव कर लिया जाये:
जिस तट पर मौज उड़ाने से अपमान मौज का होता हो,
उस तट पर मौज उड़ाने से बेमौजी रह जाना बेहतर है।

इसके अलावा मैंने अपने से छोटों और स्त्रियों की खिंचाई करने से खिल्ली उड़ाने से बचने का सदैव प्रयास किया है। जब भी कभी ऐसा हुआ है तो उनको अपने साथ का समझने के चलते । लेकिन जैसे ही अंदाज हुआ कि कहीं गलत बात कह गये वहां मैंने बिना शर्त माफ़ी मांग ली। दूसरे के लिये नहीं  अपने सुकून के लिये।
ब्लॉग जगत  खबरों की मंडी है। लोग यह भी कहते हैं मैंने यहां इस नाम से ये कहा उस नाम से वो कहा।लोगों का अपना सुख है कि उनको किसमें सुकून मिलता है लेकिन मैंने आज तक पिछले साढ़े पांच सालों में एक भी कमेंट अपने नाम के अलावा और किसे नाम से नहीं किया। आवश्यकता ही नहीं हुई। मैं जो अपने नाम से नहीं कह सकता वह दूसरे नाम से क्यों कहूं?
हमारे लगभग हर कार्य व्यवहार की तरह ब्लाग जगत में भी व्यवहार करने में  ये दो शेर मुझे अक्सर याद आते हैं:
१. मैं कतरा सही , मेरा वजूद तो है,
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है।
-स्व. कृष्ण बिहारी नूर
२. मुमकिन है मेरी आवाज दबा दी जाये
लेकिन मेरा लहजा कभी फ़रियाद नहीं हो सकता।
-स्व.वली असी
मतलब की बात: मतलब की बात ये है भैये कि इस दुनिया में अनूप शुक्ल, समीरलाल और ज्ञानदत्त पाण्डेय जैसे लिखने वाले खचियन हैं। सैकड़ों-हजारों  हम जैसे होंगे। बीत चुकें तो लाखों अरबों होंगे। हमसे कहा जाये पांच सौ पोस्टों में पांच पोस्टें ऐसी छांटकर लाओ जिसको आज  दस साल बाद भी पढ़ा  जायेगा तो कहो हम कांखने लगें और पहले आप,पहले आप कहने लगें। हम खुद अपना लिखा पलट कर नहीं देखते नया कार्बन कचरा फ़ैलाये जा रहे है ।ऐसे में अपने लेखन को तीसमार खां समझना अपने साथ ही अन्याय होगा। जो अपने को बहुत काबिल ब्लॉगर मानता हो वो तीन महीने नेट से दूर हो जाये फ़िर देखिये वो कित्ता सफ़ल ब्लॉगर रह जाता है। कम से कम अपने लिये तो मैं यह मानता हूं। धर्मपाल अवस्थी जी के शब्दों में कम से कम मैं अपने को औना-पौना-बौना सब टाइप का लेखक /ब्लॉगर मानता हूं। यह ज्ञानजी का बड़प्पन ह कि वे मेरी पोस्टों को दमदार मानते हैं लेकिन जब मैं  उनको देखता हूं तो मुझे ऐसा अक्सर नहीं लगता। मैं ज्ञानजी के बहकावे में नहीं आता।
ज्ञानजी ने मेरे व्यक्तित्व के बारे में जो कहा वह ज्ञान जी अनुभव सत्य होगा। मैं उसको लेकर परेशान बिल्कुल नहीं हूं कि हाय यह क्या कह दिया! ज्ञानजी ने इसके पहले न जाने कितने अच्छे उपमान मेरे लिये लिखे! एक बार तो टेन्स होकर लिख मारा- फुरसतिया हिन्दी ब्लॉगरी के ब्रिलियेण्टेस्ट स्टार हैं! एक दिन तो अपने मन में बतियाते हुये कहने लगे-एक बढ़िया चीज जो मैने अनूप शुक्ल के बारे में नोटिस की है, वह है कि इस सज्जन की ब्रिलियेन्स (आप उसे जितना भी आंकें) आपको इण्टीमिडेट (intimidate – आतंकित) नहीं करती।
हां लेकिन यह अवश्य लगा मुझे कि दो साल पहले तय की हुई बात अब अमल में ले ही आनी चाहिये! ज्ञानजी,समीरलाल और अन्य बड़े-बुजुर्गों  से मौज लेना बन्द कर देना चाहिये। खाली अनूप शुक्ल से मौज लेकर काम चलाया जाये!
यह लेख पोस्ट करने के पहले यह कहना चाहता हूं कि आभासी जगत में जब हम दूसरे के बारे में कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं तो वह हमारी उस समय की मन:स्थिति का आईना होती है। एक ही बात पर एक ही व्यक्ति की अलग-अलग मन:स्थिति के अनुसार अलग-अलग प्रतिक्रियायें हो सकतीं हैं। ऐसे में किसी एक बात को पकड़कर सर पकड़कर बैठ जाना सही नहीं होता। नेट पर तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त करने की सुविधा और आदत के चलते हम अक्सर नहले पर दहला मारने की आदत के शिकार हो जाते हैं और अक्सर ऐसा कह जाते हैं जो अन्यथा शायद कभी न कहते। इसई लिये हम हमेशा फ़ुरसतिया को समझाते रहते है कि बेट्टा जरा आराम से रहा करो। लेकिन वो सुने तब न!
इति ज्ञानजी, समीरलाल अनूप शुक्ल वार्ता!

मेरी पसन्द


भये छियालिस के फ़ुरसतिया
ठेलत अपना ब्लाग जबरिया।

मौज मजे की बाते करते
अकल-फ़कल से दूरी रखते।
लम्बी-लम्बी पोस्ट ठेलते
टोंकों तो भी कभी न सुनते॥

कभी सीरियस ही  न दिखते,
हर दम हाहा ठीठी करते।
पांच साल से पिले पड़े हैं
ब्लाग बना लफ़्फ़ाजी करते॥

मठीधीश हैं नारि विरोधी
बेवकूफ़ी की बातें करते।
हिन्दी की न कोई डिगरी
बड़े सूरमा बनते फ़िरते॥

गुटबाजी भीषण करवाते
विद्वतजन की हंसी उड़ाते।
साधु बेचारे आजिज आकर
सुबह-सुबह क्षमा फ़र्माते॥

चर्चा में भी लफ़ड़ा करते
अपने गुट के ब्लाग देखते।
काबिल जन की करें उपेक्षा
कूड़ा-कचरा आगे करते॥

एक बात हो तो बतलावैं
कितने इनके अवगुन भईया।
कब तक इनको झेलेंगे हम
कब अपनी पार लगेगी नैया॥
भये छियालिस के फ़ुरसतिया
ठेलत अपना ब्लाग जबरिया।

अनूप शुक्ल

53 responses to “अनूप शुक्ल, दम्भ और अभिमान और मौज की लक्ष्मण रेखा”

  1. हिमान्शु मोहन
    बड़ी ख़ुशी की बात है,
    (आज तक कोई बात हुई है छोटी ख़ुशी की?)
    कि ज्ञानदत्त जी (गुरुजी) भी अब इन्स्पायर होने लगे हैं, काहे से कि प्रेरणा में वो बात नहीं जो इन्स्पायर होने में है। हमको तो लगता है कि आप ने उन से मौज लेना पहले ही कम कर दिया, सो गुरु जी उबिया के खुल्ले में आ गए कि “आओ ससुरो, देखें कित्ती मौज लेते हो। सुकुल तो हमसे मौज लेंगे नहीं, बुजुर्ग घोषित कर दिए हमको। अभी 2007 में जन्मदिन मनाना सिखाए थे, और अब बुजुर्ग… :(”
    तो वो इन्स्पायर हो गए, वो भी लोकसंघर्ष वाले “सुमन” जी से, और ठेलिया गए एक ठो “very nice”।अब ये “वेरी” हो सकता है कि उन्होंने टेम्पलेट में ही जोड़ लिया हो। मगर हमें तो लग यही रहा है कि मौज लेते रहिए आप, वर्ना एक तो पब्लिक का मौज कण्टेण्ट कम हो जाएगा, दूसरे अगर आप मौज नहीं लेंगे तो लोग अभी तक “नाइस” से बचके रहते थे, अब वेरी नाइस भी खुला घूमेगा।
    मगर हम सीरियसली कह रहे हैं कि हम आप की बड़ी इज्जत करते हैं, :)
    सदा की तरह शानदार-सदाबहार-”वेरी नाइस” पोस्ट!
  2. K M Mishra
    जब ज्ञान काका ने यह पोस्ट लिखि थी तब मैंने एक टिप्पणी डालने की बड़ी कोशिशकी पर उन्होंने पता नहीं कौन सी तकनीकी तामझाम लगा रखा था कि मार थूक लगा कर कोशिश करने पर भी मेरी टिप्पणी वहां चिपकी नहीं थी ।
    हालांकि मैं किसी लफड़े न पड़ते हुये लिखना चाहता था ” श्री लाल शुक्ल सबसे बेहतर हैं ।“
    लेकिन समीर लाल जी कसम खा कर कहता हूं (पिछले महीने ज्ञान काका की कसम खायी थी तो वह अब तक एडमिट हैं) कि पूरे ब्लागजगत में कोई दस मन देशी घी खाकर भी आपके समान व्यंग्य नहीं लिख सकता । (भगवान समीर लाल जी का स्वास्थ्य टिपटाप रखे )
    रही बात मौज लेने की तो इस पापी दुनिया के चक्कर में आप मौज लेना बंद कर दोगे तो कसम रवि रतलामी की टिप्पणी पढ़ने का मजा चला जायेगा । बेधड़क लिखिये सर जी । अल्लाताला ने सबकी खोपड़ी अलग अलग बनाई है । जब लोगों को ज्ञान काका की एक पोस्ट में इत्ता दिमाग खर्च करना पड़ा तो आपकी मौज वाली टिप्पणी समझने के लिये मेटरनिटि लीव लेनी पड़ेगी । चिंतन गर्भावस्था से भारी होना चाहिये कि नहीं ।
  3. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] [...]

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