Wednesday, October 24, 2012

रावणजी के बहाने कुछ इधर-उधर की

http://web.archive.org/web/20140420084243/http://hindini.com/fursatiya/archives/3500

रावणजी के बहाने कुछ इधर-उधर की

रावण
आज देश भर में दशहरा मनाया। सबेरे-सबेरे फ़ेसबुक पर सात साल पहले की पोस्ट का लिंक चस्पा करके आज का स्टेटस सटाया:
राम-रावण जी लोग आज के जमाने में होते तो शायद रावण जी मारे नहीं जाते। उन पर सीताजी के अपहरण का मुकदमा चल रहा होता। तारीख पर तारीख पड़ रही होंती। हनुमानजी जरूर सरकारी सम्पत्ति का नुकसान करने के आरोप में अंदर हो गये होते। रामचंद्रजी किष्कन्धा पर्वत पर बैठे मिस्काउट कर रहे होते और सोचते -चलें अब आगे की लड़ाई अयोध्या में शपथग्रहण के बाद लड़ी जायेगी। :)
इस स्टेटस पर कई साथियों के विचार/बयान आये। कुछ आप भी देखिये:

  1. Suresh Sahani: आज के सन्दर्भ में बहुत सही बात लिखी है|हो सकता है जंतर -मंतर पर धरना चलता होता और नारा होता “सीता वापस करनी होगी-करनी होगी,करनी होगी|या सीताजी के वापस आने पर खाप पंचायत बैठती और फैसले में सीता को पत्थर मारकर मृत्युदंड दिया जाता|
  2. Amit Kumar Srivastava:और खाप पंचायतों ने स्त्रियों के भिक्षा देने पर रोक लगा दी होती
  3. Baldeo Pandey :” अगर संवेदनशीलता हो तो, जो पैसे मूर्ति-पूजन, रावण के पुतले फूंकने और पटाखे फोड़ने में खर्च किये जाते हैं, वह किसी जरुरतमंद की सहायता में लगाया जा सकता है.हम जिस धर्म – पालन की हेकड़ी भरते हैं, वह अक्सर हमारा सदियों से चला आरहा अन्धविश्वास, दंभ, सुसुप्त वर्ण-व्यवस्था की अभिव्यक्ति, बौद्धिकता की कंगाली और तथाकथित कुलीनता का नंगा नाच ही प्रतीत होता है. धर्म हमेशा शुभ, समग्रता और प्रेम का सन्देश देता हैं, कभी भी ईश्वर का डर, आत्मकेंद्रित कंगाली और असंवेदनशीलता की बात नहीं करता. – आमीन ! “
  4. प्रकाश गोविन्द: सुग्रीव और विभीषण मिल के नया गठबंधन भी बना चुके होते।
  5. Virendra Bhatnagar: इस सम्भावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि सारा मामला संयुक्त राष्ट्र संघ को रेफर कर दिया गया होता, अयोध्या और लंका के बीच सौ-पचास सचिव स्तरीय वार्तायें हो चुकी होतीं, रावण को वार्ता के लिए सम्मान सहित अयोध्या आमंञित किया गया होता और सीता जी लंका में बैठे-२ बूढ़ी हो गयी होतीं।
राम-रावण जी आज के समय होते तो क्या होता इस बारे में केवल कयास ही लगाये जा सकते हैं। लेकिन यह तो पक्का है कि सब कुछ वैसा तो नहीं ही हुआ होता जैसा हो चुका है। हमारे एक सीनियर ने अपनी राय जाहिर करते हुये विचार प्रकट किये कि अगर राम जी की विजय न हुई होती तो विभीषणजी राजद्रोह की सजा पाते। रावणजी ने उनको भाईचारे के चलते सस्ते में छोड़ दिया। आज की तारीख में ऐसा होता तो कोई न कोई आर.टी.आई. कार्यकर्ता इस पर जरूर सवाल उठाता। बवाल मचाता। तदोपरान्त टी.वी. चैनलों पर प्राइमटाइम बहस यज्ञ होता। क्या पता कोई इसी पक्षपात के चलते रावणजी से इस्तीफ़ा मांग लेता। वे देते न देते यह बात दीगर है। उनका व्यक्तिगत मामला ठहरा। वैसे भी इस्तीफ़ा होता ही मांगने के लिये है, दिया थोड़ी जाता है।
हनुमानजी ने लंका में रावणजी की संपत्ति जलाई इसके चलते उनके ऊपर वहां सरकारी संपत्ति के नुकसान का मुकदमा तो पक्का चलता।
लंका विजय के पश्चात रामजी ने जिस तरह लोकमर्यादा के बहाने सीताजी का परित्याग किया उसकी आज के समय में बहुत धुआंधार आलोचना होती। शायद महिला संगठनों और अन्य मानवाधिकारवादियों की आलोचना के चलते वे अपने फ़ैसले पर फ़िर से विचार करते। क्या पता इसी के चलते सीताजी इत्ती जल्दी विदा न होतीं। उनका गृह्स्थजीवन सुखमय बीतता। लम्बा खिंचता।
क्या पता कोई चैनल इस बात का खुलासा करता कि राम-रावण जी युद्ध में ये घपला हुआ। वो घोटाला हुआ। बाण खरीदने में ये लेन-देन हुआ। धनुष की बिड में वो कमीशनबाजी हुई। सूचना के अधिकार के चलते तमाम खुलासे होते। तब शायद सारी रामकथा वैसी ही न होती जैसी आज के समय चलन में हैं।
आज जब भी रावण जी की बात होती हैं तो कुछ लोग उनको बड़ी कड़ाई से संबोधित करते हैं। ऐसे लगता है कि वे उनके रावणजी उनके संगी-साथी रहे हों या फ़िर कोई आजकल के बदनाम जनप्रतिनिधि। ’रावण ऐसा था, वैसा था’ इस तरह की बातें जब लोग लिखते हैं तो मुझे लगता है कि हम अपने पूर्वज का अपमान कर रहे हैं। रावणजी भले ही बुराई के प्रतीक थे लेकिन थे तो अपन के बुजुर्गवार ही। रामजी की सारी हीरोगीरी रावणजी की विलेनगीरी पर टिकी है। उनका स्मरण जरा सलीके से किया जाना चाहिये। आज के समय में भी अमरीशपुरीजी, प्राणजी, अमजद खानजी की जब बात चलती है तो उनके बारे में तरीके से लिखते हैं न! रावणजी ने तो दुनिया के सबसे बड़े विलेन का पार्ट अदा किया। तो उनको तो और भी कायदे से संबोधित किया जाना चाहिये। है कि नहीं? :)
क्या पता अगर राम-रावण जी की लड़ाई में परिणाम उलटा होता तो रावणायण भला किस तरह लिखी जाती। शायद इस रूप में लिखा जाता कि एक बलशाली राजा रामजी ने लंका पर कब्जा करने के इरादे से हमला किया। जिसका रावणजी ने बहादुरी से मुकाबला किया और लंका की रक्षा की। क्या पता इस तरह की कहानी लिखी भी गयी हो लेकिन आलोचकों ने उस समय उसको तवज्जो न दी हो और रामकथा की अच्छी आलोचनायें लिखकर उसको चलन में ला दिया हो।
कुछ लोगों ने अपने स्टेटस में लिखा- हमको अपने अंदर के रावण को मारना चाहिये। अब बताइये भला कि जब रावणजी नही रहेंगे तो रामजी को कौन पूछेगा। मामला रामराज की तरह एकरस सा हो जायेगा। मीडिया के पास कुच्छ रहेगा नहीं रिपोर्ट करने के लिये। रामराज के समाचारों की बाइट के बारे में उस समय के विवरण यही तो मिलते हैं- नहिं दरिद्र कोऊ दुखी न दीनी। नहिं कोऊ अबुध न लच्छन हीना॥ कोई दुखी नहीं है, कोई दरिद्र नहीं है, कोई कुलच्छनी नहीं है तो समाज में एकरसता आजायेगी न। दैहिक, दैविक, भौतिक ताप न होने पर सारे मेडिकल कालेज उजड़ जायेंगे न। रामराज में एन.आर.एच.एम. घोटाले नहीं होंगे तो पुलिस क्या करेगी बेचारी? राम जीका महत्व बने रहने के लिये रावण जी की उपस्थिति अनिवार्य है।
आज तमाम टीवी चैनल भ्रष्टाचार रूपी रावण के दहन की बात कर रहे थे। लेकिन रावण जी और भ्रष्टाचार में मौलिक अंतर है। रावण जी का पता, ठिकाना, पिन कोड, आई.पी.एड्रेस सब पता था। जबकि भ्रष्टाचार का पूरा पता ही नहीं चलता। पता चलता है कि जो भ्रष्टाचार के संहार में जुटा दिखता है वो भी किसी दूसरे के नजर में कोई अलग तरीके के भ्रष्टाचार में संलग्न है। रोज भ्रष्टाचार की नयी कलायें दिखायी देती हैं। गणितीय लप्पेबाजी में कहें तो भ्रष्टाचार ऐसा कृत्य है कि जिसे कोई फ़ंकशन पूरी तरह परिभाषित नहीं कर पाता। हर फ़ंक्शन कहीं न कहीं फ़ट जाता है भ्रष्टाचार को परिभाषित करने में। रावणजी बेचारे तो त्रिविमीय( Three Dimentional) ही थे। भ्रष्टाचारजी तो अनन्त विमीय हैं। उनकी तुलना रावणजी से करना रावणजी जैसे शरीफ़ विलेन को बदनाम करना जैसा है।
जहां तक मुझे पता है उसके हिसाब से रावणजी के खिलाफ़ भ्रष्टाचार का कोई केस बनता ही नहीं। वे सब काम फ़ुल बकैती से करते थे। कुबेरजी उनके यहां नौकरी बजाते थे। उनको कोई जरूरत ही नहीं थी करप्शन के पचड़ों में पड़ने की। उन पर अधिक से अधिक सीताजी के अपहरण का केस बनता। आज अगर वे होते और अपना अपराध स्वीकार कर भी लेते तो उनको अधिक से अधिक कुछ साल की सजा होती। इसके बाद वे छूट जाते। भ्रष्टाचार जैसे कोई काम उनके खाते में दर्ज ही नहीं हैं। लेकिन आज जिसे देखो वही हर बुराई उन पर टैग कर देता है। उनको भ्रष्टाचार का प्रतीक बनाना तो ऐसा ही है जैसे कि लाखों करोड़ के घपले-घोटाले के लिये किसी बाबू को चार्जशीट दिया जाना।
अरे कहां आप भी गणित में उलझ गये। चलिये आपको आज की कुछ झलकियां दिखाते हैं:

ये आर्मापुर की रामलीला के रावण-मेघनाद हैं। पानी बरसा तो रावणजी ऊपर से थोड़ा ढीले हो गये। ऊपर देखिये सात साल पहले के रावण-मेघनाद। कितना बदलाव आया इस बीच दोनों में। शायद उमर के असर के चलते रावण जी थोड़ा कम चमकदार दिख रहे हैं।

ये थोड़ा और पास का सीन है। रावण जी की गरदन टेढ़ी होने का कारण बताते हुये रामलीला के संयोजक ने कहा- रावण अट्टहास कर रहा है इसलिये उसका गरदन टेढ़ी हो गयी है। अट्टहास करते समय गरदन सीधी थोड़ी रहती है।

ये एक कार में मिनी रावण जी ले जाये जा रहे हैं। शायद अपने हिस्से का रावण जलाने वाले फ़ेसबुकिया स्टेटस से प्रभावित होकर ले जा रहे हैं।

ये थोड़ा और पास से रावणजी का फोटो। आपको नहीं लगता जैसे कोई रावणजी का अपहरण करके ले जा रहा है- हाथ,पांव बांधकर। बेचारे बुजुर्गवार को यह दिन भी देखना नसीब था।
आगे जागकर रावणजी को लादकर ले जाने वाले ने रास्ता बदल लिया और हमारी सड़क के लम्बवत जाती सड़क में लेकर चले गये और देखते-देखते आंखों के सामने से ओझल हो गये। अब तो उनको फ़ूंक-ताप दिया गया हो गया। अपने-इसके-उसके-सबके इस साल के रावण जल चुके होंगे।

बुराई के प्रतीक माने जाने रावणजी के दर्शन के पहले हमने कल्याणकारी देवी दुर्गा जी के दर्शन किये। आर्मापुर के दुर्गापूजा पाण्डाल में।
आज बुराई के प्रतीक रावणजी को जला दिया गया। कल अच्छाई की प्रतीक कल्याणकारी दुर्गा जी भी विसर्जित हो जायेंगी।
हर साल हम बुराई के प्रतीक को जलाते रहते हैं। अच्छाई के प्रतीक को विसर्जित करते हैं। इसके बाद दुनिया अपने ढर्रे पर लौट आती है। अपने हिसाब से चलने लगती है। चलती रहती है।

मेरी पसंद

कविता पोस्टर पेशे से वकील कुलदीप सिंह दीप जी के फ़ेसबुक स्टेटस से आभार सहित।

26 responses to “रावणजी के बहाने कुछ इधर-उधर की”

  1. vd ojha
    सरजी प्रणाम बल्देव पाण्डेय जी का विचार बहुत ही उत्तम लगा | मुझे याद है शाहजहांपुर की राम लीला में आज से ४-५ वर्ष पहले सिरफ आतिशबाजी का खर्चा ६००००-८०००० के आस पास होता था | हमारे देश में आज भी ऐसे लोग हैं जिनके बच्चों के पास किताबे खरीदने ले लिए पैसे नहीं होते हैं |
  2. vd ojha
  3. विवेक रस्तोगी
    जय राजा रावण की !!!
    विवेक रस्तोगी की हालिया प्रविष्टी..मैं तुम और जीवन (मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी)
  4. Indian Citizen
    मैं तो पहले भी कहता आया हूँ कि आज के जैसे पढ़े लिखे, सेकुलर, समाजसेवी होते तो भगतसिंह को ही दोषी ठहरा देते, अशफाक और बिस्मिल को दीवाना बता देते. अब तो भाग्य पर विश्वास बढ़ता जा रहा है. जो जिस लायक होता है उसे वही मिलता है. हमें भी वही मिल रहा है. ओसामा जी मिल गये ये क्या कम है.
    Indian Citizen की हालिया प्रविष्टी..भूकम्प की भविष्यवाणी में खोट और छ: साल की चोट.
  5. सलिल वर्मा
    हम तो कल्पना में खो गए कि सचमुच ऐसा होता तो क्या हुआ होता.. अच्छा है कि नहीं हुआ.. या कहें अब जो हो रहा है वह आपकी इस ‘यूं होता’ का ‘यूं हो रहा है’ संस्करण है.. जितनी होने वाली घटनाओं का ज़िक्र आपने किया वो हो ही रही हैं ना.. बस तो समझिए कि हम वही ‘रावण चरित मानस’ देख रहे हैं!!
  6. देवेन्द्र पाण्डेय
    इतना लिख दिये हैं कि कुछ न कुछ तो हर किसी को अच्छा लग ही जायेगा।:)
    ..भ्रष्टाचार का प्रतीक बनाना तो ऐसा ही है जैसे कि लाखों करोड़ के घपले-घोटाले के लिये किसी बाबू को चार्जशीट दिया जाना।..
    ..यह तो लाइन जोरदार लगी । इसमें दोहरा व्यंग्य है।
    रावण के पुतले के नीचे फैले कबाड़ को देखकर ही समझा जा सकता है कि आर्मापुर यूपी में होगा। अच्छा किया जो आपने आर्मापुर के आगे कानपुर नहीं लिखा,। :)
    धूमिल को पढ़ने के बाद हमेशा यही लगा है कि कोई आकर झन्नाटेदार झापड़ रसीद करके चला गया और मैं उफ्फ भी नहीं कर पाया। वे इतनी कम उम्र में इतना कुछ महसूस कैसे कर गये यही सोचकर अचरज होता है! जो लिखे वह चमत्कार तो है ही।
    1. sundar-nagri wale
      (:(:(:
      प्रणाम,
  7. प्रवीण पाण्डेय
    इतना पका दिये होते मीडिया वाले कि राम कभी अपनी कथा नहीं सुनाते..
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..लैपटॉप या टैबलेट – तकनीकी पक्ष
  8. प्रवीण शाह
    .
    .
    .
    हर साल हम बुराई के प्रतीक को जलाते रहते हैं। अच्छाई के प्रतीक को विसर्जित करते हैं। इसके बाद दुनिया अपने ढर्रे पर लौट आती है। अपने हिसाब से चलने लगती है। चलती रहती है।
    यह दुनिया अपने ढर्रे पर ही क्यों चलती है… धूमिल के कविता रचने और सबके उस कविता को पढ़ने के बाद भी… इस बात पर बिचारने का भी बनता है न सर जी… धूमिल अपवाद तो नहीं ?
  9. देवांशु निगम
    रामजी की सारी हीरोगीरी रावणजी की विलेनगीरी पर टिकी है। :) :) :)
    अयोध्या वापस आकर राम जी भी तो हड़ककाये जाते :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..हैप्पी बड्डे टू मी !!!!
  10. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    आज के जमाने में रावण-प्रकृति का बहुमत है। राम-प्रकृति अल्पमत में है। लोकतंत्र का तकाजा तो यही है कि रावण को सत्ता में होना चाहिए। अब सभी इसे सालोसाल तो सिर-आँखों चढ़ाते ही रहते हैं। एक दिन के लिए जला लेने की रस्म थोड़ा री-फ्रेश करने जैसी ही है। :)
    हमेशा की तरह यह पोस्ट भी बहुत मजेदार है।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..अपनी फ़िक्र पहले…
  11. aradhana
    हे हे हे ! हमरा स्टेटस भी ‘कुओते’ कर दिए. आप सुधरोगे नहीं :)
    हम तो ई मारे बोले थे कि ‘अपने अन्दर के रावण को मारो’ क्योंकि लोग सारे इल्जाम बेचारे रावण पर लगा देते हैं, जैसे खुद दूध के धुले हों. ऊ कहावत है ना ‘पहला पत्थर वो मारे, जिसने कोई पाप ना किया हो’ हमरा मतलब वही था.
    मुड़ी हुयी गर्दन वाले रावण जी बड़े मस्त लग रहे हैं :)
    बकिया तो हम आपके फेसबुक स्टेटस पर पढ़ चुके हैं. पुरानी वाली पोस्ट बाद में पढ़ेंगे. फिलहाल तो धूमिल की कविता बहुत पसंद आयी. और देवेन्द्र जी का कमेन्ट भी कि ‘ऐसा लगा किसी ने झन्नाटेदार थप्पड़ रसीद कर दिया हो’
    aradhana की हालिया प्रविष्टी..New Themes: Something Fishy and Blissful Blog
  12. दीपक बाबा
    बाकि दक्षिण राज्यों में जिस तरह ईसाइयत की लहर सी है तो मेरे ख्याल से रावन आज ईसाई बन चुका होता और जाहिर सी बात है उसे दिल्ली से राज्याश्रय भी मिला होता ….
  13. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] रावणजी के बहाने कुछ इधर-उधर की [...]

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