Sunday, October 13, 2013

रावण जी आज होते तो….

http://web.archive.org/web/20140420082702/http://hindini.com/fursatiya/archives/4958

रावण जी आज होते तो….

रावणआज दशहरा है। आज जगह-जगह रावण का पुतला फ़ूंका जाता है। भलाई की बुराई पर जीत का जश्न मनाया जाता है। रावण का पुतला जलाकर लोग खुश हो लेते हैं कि बुराई स्वाहा हो गयी। साल भर की छुट्टी। अब अगले साल फ़िर निपटा जायेगा बुराई से।
अब राम और रावण तो हमारे पूर्वज थे। उनका आपस में क्या बवाल था ये तो वे लोग ही जान सकते हैं। लेकिन सुनी-सुनाई बातों को अगर सच माने तो रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण कर लिया था। जिसके चलते पहले तो राम जी बहुत रोये ताकि लोग उनको पत्नी को प्रेम करने वाला आदर्श पति मानें। इसके बाद हनुमान, सुग्रीव आदि की मदद से रावण पर हमला कर लिया और उनको मार डाला।
अब ये बात तो पुरानी है तो कहा नहीं जा सकता कि उस समय के लिहाज से क्या किसी स्त्री की अपहरण की सजा मौत रही होगी? आज के हिसाब से तो देखा जाये तो सजा जरा ज्यादा है। स्त्री से दुराचार तक की सजा सात है मात्र। जबकि रावण जी तो सीता के साथ फ़ुल इज्जत के साथ पेश आये। खाने-पीने का ख्याल रखा। अशोक वाटिका नाम फ़ार्म हाउस में रखा। इत्ती सुविधायें तो बड़े-बड़े वीआईपी कैदियों तक को नहीं मिलतीं। त्रिजटा नामक के सेविका भी उनके लिये रखी। इत्ती सुविधा देने के बावजूद उनको मार दिया राम जी ने! तो भाई ये उन दोनों पूर्वजों के बीच के मामला है हम कुछ कह नहीं सकते लेकिन लगता है कुछ सजा ज्यादा हो गयी।
हमें तो ये लगता है राम जी के इरादे कुछ और थे और उन्होंने बताये कुछ और। कुछ-कुछ अमेरिका की तरह हिसाब था उनका। जैसे अमेरिका हर देश में शांति स्थापना के लिये बमवर्षाता रहता है वैसे ही राम जी ने भी रावण को बहाने से मार दिया। रामजी के इरादे कुछ और भी रहे होंगे। जैसे अमेरिका हर देश की सरकारें उलट-पुलट कर अपने चेले-पिट्ठू बैठाता रहता है वैसे ही रामजी ने भी किया। पहले बालि को निपटाकर सुग्रीव को गद्दी दिलाई। फ़िर लंका में आग लगवा दी ताकि वहां अस्थिरता हो जाये और फ़िर धीरे से रावण को निपटाकर विभीषण को गद्दी पर बैठा दिया। जैसे आजकल अमेरिका अरब देशों के तेल पर कब्जे की नीयत से उलट-पुलट करता है उसी तरह शायद राम जी की नजर लंका के सोने पर रही हो। रावण को मारने के पहले उसको कायदे से बदनाम करवा दिया ताकि उसके मारे जाने पर ज्यादा हल्ला न मचे।
दशहरालगता है कि उस समय के मानवाधिकार वाले भी कमजोर रहे होंगे। नहीं तो खाली एक स्त्री के अपहरण के अपराध में किसी को खुले आम मारने पर तो वे आसमान सर पर उठा लेते और टांगे-टांगे घूमते रहते। जबकि उसी समय में तमाम देवताओं ने ॠषियों ने छल-बल से न जाने कित्ती स्त्रियों से दुराचार किया लेकिन उनको कोई सजा नहीं मिली। यह सजा का भेदभाव है।
यह भी हो सकता है कि राम जी ने रावण को इसलिये मार दिया हो जिससे कि उन्होंने जो खर दूषण, ताड़का, सुबाहु को मारा, सूर्पणखा की नाक काट दी और रावण के दूसरे रिश्तेदारों को निपटा दिया उसकी फ़ाइलें रावण न खुलवा सकें। उनको लग गया होगा कि अगर कहीं रावण जिन्दा बचा रहा और बाद में इन सब मामलों की सच्चाई सामने आई तो उनका ’मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनने के अभियान में बाधा आ सकती है।
सीता जी के प्रति राम के अगाध प्रेम की बात भी इसलिये कम समझ में आती है क्योंकि अगर खाली सीता के प्रति लगाव के चलते राम ने रावण को मारा होता तो बाद में सीता जी को त्यागते नहीं। वह भी तब जब सीता जी गर्भवती थीं। आजकल की सरकारें तक मातृत्व/पितृत्व अवकाश देती हैं स्त्रियों की देखभाल के लिये। ऐसे में रामजी ने उनको जंगल भेज दिया। यह कुछ समझ में नहीं आया मामला। ये अच्छा नहीं किया राम जी ने। वो तो कहो सीता जी भले घर की थीं वर्ना इसके चलते और बाद में सीता जी की आत्महत्या के चलते उनको लेने के देने पड़ जाते।
अब जबकि हजारों साल बीत गये होंगे इस घटना को तो कुछ कहा नहीं जा सकता कि सच क्या था लेकिन लगता यही है कि रावण के साथ कुछ ज्यादती हुयी। आज के समय में इत्ते बड़े अपराध की सजा हद से हद दो-तीन साल होती। वह भी पचीस तीस साल मुकदमा चलने के बाद। आज के समय में होता तो रावण देश के सबसे बढिया वकील करता और वकील साबित कर देता कि रावण सीता की रक्षा के लिये उनको अपने फ़ार्म हाउस में ले आया। उसका कोई गलत इरादा नहीं था। हो सकता है वो अपने फ़ार्म हाउस का खर्चा राम से वसूल लेता। क्या पता काटजू जी टाइप का कोई जज होता तो वो राम जी को चार बातें भी सुनाता कि अपनी पत्नी की देखभाल ठीक से नहीं कर पाते तो उनको साथ में लेकर जंगल क्यों आये।
लोग कहते हैं कि अंत में सत्य की विजय होती है। लेकिन हमें तो यही लगता है कि जो अंत में होता है उसी को लोग सत्य मान लेते हैं। यही रावण जी के साथ हुआ। बेचारे छोटे अपराध में बड़ी सजा पा गये। विद्वान बेचारा, बदनाम होकर मरा। रावण के मुकाबले कई गुना बड़े अपराधी उसको बुराई का प्रतीक मानकर जलाते हैं। पर्यावरण का नुकसान करते हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत का गाना गाते हैं।
लगता है इस बार रावण के साथ हुये अन्याय का आभास हुआ आसमान को इसीलिये पानी बरसा है। जगह-जगह रावण के पुतले भीग गये। समन्दर भी गवाह रहा था रावण के साथ हुये अन्याय का सो वह भी गरजता हुआ तूफ़ान के रूप में आया है रावण की दुर्दशा बचाने।
आपको क्या लगता है?

11 responses to “रावण जी आज होते तो….”

  1. देवांशु निगम
    हमको तो ई लग रहा है कि कोई तगड़ा विचार-विमर्श (लड़ाई – झगड़े का शुद्ध भाषा में नाम)शुरू होने वाला है :) :)
    बाकी, सीता जी के त्याग वाले मुद्दे पर राम चन्द्र जी का पक्ष मुझे समझ नहीं आता |
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..The “Talented” Culprit Since 1992
  2. संतोष त्रिवेदी
    बहुतै सटीक ठोंके हैं आज के राम को :-)
  3. rachana tripathi
    कौन जाने कहीं इससे भी बड़का रावण तैयार हो रहा हो. बादल उसी की भविष्यवाणी कर रहा हो
    rachana tripathi की हालिया प्रविष्टी..राजनीति अब शरीफों के लिए नहीं रही…
  4. प्रवीण पाण्डेय
    सच में, सत्य कुछ और लिखा गया होता, रावणजी अपना दृष्टिकोण अवश्य बताते। ओसामाजी को अवसर मिला भी था।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..कानपुर से बंगलोर
  5. arvind mishra
    रावण की परम्परा साबित है
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..और ज़िंदगी चल पडी …..(नौकरी के तीस वर्ष-श्रृंखला )
  6. arvind mishra
    अध्यात्म की नायाब भेंट
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..और ज़िंदगी चल पडी …..(नौकरी के तीस वर्ष-श्रृंखला )
  7. PN Subramanian
    बहुत सुन्दर. अब यह बहस का मुद्दा बन गया है और चारों तरफ हो भी रही है.
    PN Subramanian की हालिया प्रविष्टी..ब्रेड फ्रुट ट्री – हमारा कल्प वृक्ष
  8. अन्तर सोहिल
    यही लगता है कि
    नायक विजयी नहीं होता, बल्कि विजयी ही नायक होता है।
    कहानी या इतिहास तो बाद में लिखा जाता है।
    प्रणाम स्वीकार करें
  9. Abhishek
    मीडिया -विडिया भी मिला के मामला बहुत टीआरपी वाला बनता :)
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..संयोग
  10. Anonymous
    दशहरा है। आज जगह-जगह रावण
    का पुतला फ़ूंका जाता है। भलाई की बुराई पर
    जीत का जश्न मनाया जाता है। रावण
    का पुतला जलाकर लोग खुश हो लेते हैं कि बुराई
    स्वाहा हो गयी। साल भर की छुट्टी। अब अगले
    साल फ़िर निपटा जायेगा बुराई से।
    अब राम और रावण तो हमारे पूर्वज थे। उनका आपस
    में क्या बवाल था ये तो वे लोग ही जान सकते हैं।
    लेकिन सुनी-सुनाई बातों को अगर सच माने
    तो रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण कर
    लिया था। जिसके चलते पहले तो राम जी बहुत रोये
    ताकि लोग उनको पत्नी को प्रेम करने
    वाला आदर्श पति मानें। इसके बाद हनुमान, सुग्रीव
    आदि की मदद से रावण पर हमला कर लिया और
    उनको मार डाला।
    अब ये बात तो पुरानी है
    तो कहा नहीं जा सकता कि उस समय के लिहाज
    से क्या किसी स्त्री की अपहरण की सजा मौत
    रही होगी? आज के हिसाब से तो देखा जाये
    तो सजा जरा ज्यादा है। स्त्री से दुराचार तक
    की सजा सात है मात्र। जबकि रावण
    जी तो सीता के साथ फ़ुल इज्जत के साथ पेश आये।
    खाने-पीने का ख्याल रखा। अशोक वाटिका नाम
    फ़ार्म हाउस में रखा। इत्ती सुविधायें तो बड़े-बड़े
    वीआईपी कैदियों तक को नहीं मिलतीं।
    त्रिजटा नामक के सेविका भी उनके लिये रखी।
    इत्ती सुविधा देने के बावजूद उनको मार दिया राम
    जी ने! तो भाई ये उन दोनों पूर्वजों के बीच के
    मामला है हम कुछ कह नहीं सकते लेकिन लगता है
    कुछ सजा ज्यादा हो गयी।
    हमें तो ये लगता है राम जी के इरादे कुछ और थे और
    उन्होंने बताये कुछ और। कुछ-कुछ अमेरिका की तरह
    हिसाब था उनका। जैसे अमेरिका हर देश में
    शांति स्थापना के लिये बमवर्षाता रहता है वैसे
    ही राम जी ने भी रावण को बहाने से मार दिया।
    रामजी के इरादे कुछ और भी रहे होंगे। जैसे
    अमेरिका हर देश की सरकारें उलट-पुलट कर अपने
    चेले-पिट्ठू बैठाता रहता है वैसे ही रामजी ने
    भी किया। पहले बालि को निपटाकर सुग्रीव
    को गद्दी दिलाई। फ़िर लंका में आग
    लगवा दी ताकि वहां अस्थिरता हो जाये और
    फ़िर धीरे से रावण को निपटाकर विभीषण
    को गद्दी पर बैठा दिया। जैसे आजकल
    अमेरिका अरब देशों के तेल पर कब्जे की नीयत से
    उलट-पुलट करता है उसी तरह शायद राम
    जी की नजर लंका के सोने पर रही हो। रावण
    को मारने के पहले उसको कायदे से बदनाम
    करवा दिया ताकि उसके मारे जाने पर
    ज्यादा हल्ला न मचे।
    लगता है कि उस समय के मानवाधिकार वाले
    भी कमजोर रहे होंगे। नहीं तो खाली एक स्त्री के
    अपहरण के अपराध में किसी को खुले आम मारने पर
    तो वे आसमान सर पर उठा लेते और टांगे-टांगे घूमते
    रहते। जबकि उसी समय में तमाम देवताओं ने
    ॠषियों ने छल-बल से न जाने कित्ती स्त्रियों से
    दुराचार किया लेकिन उनको कोई
    सजा नहीं मिली। यह सजा का भेदभाव है।
    यह भी हो सकता है कि राम जी ने रावण
    को इसलिये मार दिया हो जिससे कि उन्होंने
    जो खर दूषण, ताड़का, सुबाहु को मारा,
    सूर्पणखा की नाक काट दी और रावण के दूसरे
    रिश्तेदारों को निपटा दिया उसकी फ़ाइलें रावण
    न खुलवा सकें। उनको लग गया होगा कि अगर
    कहीं रावण जिन्दा बचा रहा और बाद में इन सब
    मामलों की सच्चाई सामने आई
    तो उनका ’मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनने के अभियान में
    बाधा आ सकती है।
    सीता जी के प्रति राम के अगाध प्रेम की बात
    भी इसलिये कम समझ में आती है क्योंकि अगर
    खाली सीता के प्रति लगाव के चलते राम ने रावण
    को मारा होता तो बाद में
    सीता जी को त्यागते नहीं। वह भी तब जब
    सीता जी गर्भवती थीं। आजकल की सरकारें तक
    मातृत्व/पितृत्व अवकाश देती हैं
    स्त्रियों की देखभाल के लिये। ऐसे में रामजी ने
    उनको जंगल भेज दिया। यह कुछ समझ में
    नहीं आया मामला। ये अच्छा नहीं किया राम
    जी ने। वो तो कहो सीता जी भले घर
    की थीं वर्ना इसके चलते और बाद में
    सीता जी की आत्महत्या के चलते उनको लेने के देने
    पड़ जाते।
    अब जबकि हजारों साल बीत गये होंगे इस
    घटना को तो कुछ कहा नहीं जा सकता कि सच
    क्या था लेकिन लगता यही है कि रावण के साथ
    कुछ ज्यादती हुयी। आज के समय में इत्ते बड़े अपराध
    की सजा हद से हद दो-तीन साल होती। वह
    भी पचीस तीस साल मुकदमा चलने के बाद। आज के
    समय में होता तो रावण देश के सबसे बढिया वकील
    करता और वकील साबित कर देता कि रावण
    सीता की रक्षा के लिये उनको अपने फ़ार्म हाउस
    में ले आया। उसका कोई गलत इरादा नहीं था।
    हो सकता है वो अपने फ़ार्म हाउस का खर्चा राम
    से वसूल लेता। क्या पता काटजू जी टाइप का कोई
    जज होता तो वो राम जी को चार बातें
    भी सुनाता कि अपनी पत्नी की देखभाल ठीक से
    नहीं कर पाते तो उनको साथ में लेकर जंगल
    क्यों आये।
    लोग कहते हैं कि अंत में सत्य की विजय होती है।
    लेकिन हमें तो यही लगता है कि जो अंत में होता है
    उसी को लोग सत्य मान लेते हैं। यही रावण जी के
    साथ हुआ। बेचारे छोटे अपराध में
    बड़ी सजा पा गये। विद्वान बेचारा, बदनाम होकर
    मरा। रावण के मुकाबले कई गुना बड़े
    अपराधी उसको बुराई का प्रतीक मानकर जलाते
    हैं। पर्यावरण का नुकसान करते हैं। बुराई पर अच्छाई
    की जीत का गाना गाते हैं।
    लगता है इस बार रावण के साथ हुये अन्याय
    का आभास हुआ आसमान को इसीलिये
    पानी बरसा है। जगह-जगह रावण के पुतले भीग गये।
    समन्दर भी गवाह रहा था रावण के साथ हुये
    अन्याय का सो वह भी गरजता हुआ तूफ़ान के रूप में
    आया है रावण की दुर्दशा बचाने।
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