Friday, February 06, 2015

हमें ऐसे मजाक पसंद नहीं

पता चला कि कल अमेरिका के राष्ट्रपति ने कहा है - ’गांधी जी आज होते तो भारत में धार्मिक असहिष्णुता से आहत होते।’

अब हम कोई राष्ट्रीय प्रवक्ता तो हैं नहीं जो उनके बयान पर  कोई आधिकारिक बयान जारी कर सकें। लेकिन मन तो करता है कुछ कहने का। लेकिन यह समझ नहीं आ रहा कि क्या कहें?

पहले मन किया कि कह दें कि आप हमारे प्यारे देश की चिन्ता छोड़कर अपने देश की चिन्ता करिये। हम गांधी जी को संभाल लेंगे। गांधी जी जब विदा हुये थे  तब ही कौन कम आहत  थे । आज होते तो थोड़ा और आहत हो लेते। जब बाकी क्षेत्रों में प्रगति होगी तो ’धार्मिक असहिष्णुता’  ने कौन किसी की भैंस खोली है जो वह न बढे। बाकी बुराइयों की तरह उसको भी प्रगति करने  का हक है।



फ़िर मन किया कि कह दें हमारा देश ’वसुधैव कुटुम्बकम’ वाला देश है। ’सुजलाम् सुफ़लाम्’ वाला देश है। ’मलयज् शीतलाम’ की भी चौकस व्यवस्था है यहां। ऐसे देश में धार्मिक असहिष्णुता का क्या काम?  क्या करेगी , कैसे रहेगी ऐसे देश में धार्मिक असहिष्णुता जहां ’वन्दे मातरम’ का नारा लगाने वाले गली-गली मिलते हों? आपको धोखा हुआ होगा मिस्टर प्रेसीडेंट। आप किसी और देश के लिये दिया जाने वाला बयान पढ़ गये होंगे गलती से। भारत चूंकि आपके दिल में बसता है इसलिये आप भारत का नाम ले लिये। इसके पहले कि आपसे इस तरह  की और बचकानी गलतियां हों आप अपना बयान लेखक बदल डालिये।

फ़िर सोचा उनको गाना सुनाकर बता दें कि -’जहां-जहां डाल-डाल पर सोने की चिडियां करती हैं बसेरा, वह भारत देश है मेरा।’ यहां सब जगह अमन-चैन है। सुबह सूरज उगता है, शाम को ढल जाता है। नियम से चुनाव होते हैं। अपने-अपने जाति, धर्म के हिसाब वोट पड़ते हैं। सरकार बनती है। राज-काज चलता है। विकास होता है। घपले-घोटाले होते हैं। कोई धार्मिक मसला फ़ंसा  तो दंगे से सुलटा लेते हैं। किसको यहां फ़ुरसत है धार्मिक असहिष्णुता फ़ैलाने की?

वैसे होने को तो धार्मिक असहिष्णुता से वह भी आहत होता है जो  सब धर्मों को समान भाव से देखता है। वह धर्म के नाम पर होते बवाल देखकर दुखी होता है। इसी तरह कट्टर धार्मिक भी धार्मिक असहिष्णुता को देखकर दुखी होता है। उसको लगता है कि दूसरे धर्म वाले उसके धर्म वालों  को ज्यादा नुकसान पहुंचाये जा रहे हैं। दूसरे धर्म के लोग ज्यादा सुविधायें बटोरे ले रहे हैं। दंगो में हर धर्म के कट्टर लोग दुखी होते हैं यह सोचकर कि दूसरे धर्म के लोग कम लुटे, कम मरे। यह सोच-सोचकर कट्टर लोग भी आहत होते हैं कि क्या फ़ायदा ऐसे धार्मिक असहिष्णुता का जिसके होते हुये भी विधर्मी को निपटा न सके।

एक मन यह भी हुआ कि चंदा करके जायें अमेरिका और लौटते ही हम भी कोई ऐसा  फ़ड़कता हुआ बयान जारी करें अमेरिका के बारे में अमेरिकी लोग बिलबिला के रह जायें लेकिन फ़िर यह सोचकर  कि अभी प्लान बनायेंगे तो जाते-लौटते अमेरिका का राष्ट्रपति बदल जायेगा योजना मुल्तवी कर दिये। फ़िर चलते-चलते मन किया वक्त फ़िल्म का डायलाग मार दें- ’जिनके घर शीशे के होते हैं वो दूसरे के घर में पत्थर नहीं फ़ेंकते।’  लेकिन यह सोचकर कि थोड़ा ज्यादा हो जायेगा नहीं मारे।

यह सब लिखते हुये मुझे अपने प्रधानमंत्री की बात याद आ गयी वे और अमेरिकी राष्ट्रपति आपस में मजाक करते रहते हैं। चुटुकुले साझा करते हैं। क्या पता अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह बात मजाक में कही हो। यही सोचकर हम कुछ और कह नहीं रहे। लेकिन अगर यह बात मजाक में कही गयी है तो यही कहेंगे कि भई इतना सीरियस मजाक मत किया करें। व्यक्तिगत मजाक अलग बात है। देश के साथ दिल्लगी अलग। हमें ऐसे  मजाक पसंद नहीं।

आप बताओ आपकी क्या प्रतिक्रिया है धार्मिक असहिष्णुता वाले बयान पर?


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1 comment:

  1. बहुत ही अच्‍छा लेख प्रस्‍तुत किया है आपने। धन्‍यवाद।

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