Thursday, March 05, 2015

द्वापर में भू- अधिग्रहण

आजकल देश में भूमि अधिग्रहण कानून चर्चा में है। कुछ लोग इस कानून के खिलाफ़ हैं और कह रहे हैं कि यह आम जनता के खिलाफ़ है।  उनको लगता है कि इस कानून से आम लोगों की जमीन पर खास लोग कब्जा कर लेंगे और जनता  सड़क पर आ जायेंगी।

हमारे एक मित्र इस कानून के परम समर्थक हैं। वे कहते हैं  देश के विकास के लिये जरूरी है यह।

"दुनिया में जहां-जहां भी तरक्की हुई है वहां-वहां भूमि अधिग्रहण हुआ है। बिना भूमि अधिग्रहण के तरक्की हो ही नहीं सकती। हमेशा से ऐसा होता आया है।"

इतना कहकर वे मुझे घसीटकर द्वापर युग में ले गये और सुदामा की जमीन का अधिग्रहण का किस्सा सुनाया जो कि इस प्रकार है:

महाभारत की लड़ाई निपटाने के बाद कृष्ण जब राजकाज निपटाने लगे तो उनको किसी भक्त ने समझाया- "प्रभो आप अपने पूर्ववर्ती अवतार राम चन्द्र जी से ज्यादा समर्थ हो। आपकी कलायें उनसे चार ज्यादा हैं। फ़िर भी आपके राज्य में विकास रामराज्य के मुकाबले पिछड़ा हुआ। दुनिया अभी भी खुशहाली के मामले में रामराज्य का ही हवाला देती है। आप कुछ करिये वर्ना रामजी के ज्यादा काबिल होने के बावजूद आपका नाम पिछड़ जायेगा।"

कृष्ण जी ने उत्सुकतावश पुराना गजट मंगवाया।  रामराज्य के रिकार्ड में था:

"नहिं दरिद्र कोऊ दुखी न दीना। नहिं कोऊ अबुध न लक्षन हीना॥
दैहिक, दैविक, भौतिक तापा ।   रामराज नहिं काहुहिं व्यापा॥"

कृष्ण जी ने अपने मुंहलगे चेले से, जिसको कि वे विद्वान भी मानते थे ,  इस बारे में चर्चा की। पूछा--"रामराज्य में  कोई दुखी और दरिद्र नहीं था। ऐसा कैसे हुआ? क्या रामचन्द्र जी राजकाज हमसे भी अच्छे से चलाते थे। इसलिये ऐसा हुआ। हमारे यहां क्या गड़बड़ है जिसको सुधारना चाहिये हमें? "

विद्वान चेले ने बताया- "आपके यहां गड़बड़ कोई नहीं। लेकिन आज के मुकाबले  रामराज्य में  विकास बहुत धड़ाधड़ हुआ। क्योंकि उनके यहां विकास के लिये जमीन फ़टाफ़ट मिलती गयी। कारण यह कि उस समय भूमि अधिग्रहण का तरीका सहज और प्रभावी था। राम जी अश्वमेघ यज्ञ के नाम पर अपना घोड़ा देश -दुनिया में टहलाते थे। घोड़ा जहां-जहां से गुजर गया वहां -वहां की जमीन उनकी हो गयी। इसके बाद वे अपनी जमीन पर मनचाहा विकास करते रहे। रामचन्द्र जी की सफ़लता का राज उनके समय में भूमि अधिग्रहण की सफ़लता की कहानी है। आपको भी अपने राज्य के विकास के भूमि अधिग्रहण तेजी से करना होगा। "

"लेकिन जहां सुई की नोक के बराबर जमीन के लिये भाई-भाई में महाभारत हो गया वहां राज्य के विकास के लिये अपनी जमीन कौन देगा भाई?" -कृष्ण कुछ हताश से बोले।

"होगा मालिक, सब होगा। आप चिन्ता न करें। आप रामचन्द्र जी से ज्यादा कलाओं के स्वामी हैं। इसलिये आपके राज्य में विकास तो ज्यादा होकर ही रहेगा। हम तरीका खोजते हैं। आप चिन्ता न करें।" -कहकर विद्वान चेला फ़ुर्ती से निकल गया।

इसके बाद कृष्ण जी के सलाहकारों ने खोजबीन करके पता किया कि कृष्ण जी के बाल सखा सुदामा गरीबी में दिन गुजार रहे हैं। वे ब्राह्मण थे। मांगते-खाते गुजारा करते मस्त रहते थे। उनकी पत्नी कभी टोकती तो कहते- "औरन को धन चाहिये बाबरि, बामन को धन केवल भिक्षा।"

यह कुछ इसी  तरह था जैसे आज अपने देश के वैज्ञानिक सोचते हैं दूसरों को मौलिक काम करने दो, अपन तो नकल में मस्त रहेंगे।

कृष्ण के सलाहकारों ने सुदामा को विकास के लिये उकसाया और भूमि अधिग्रहण के  लिये पटाने की कोशिश की। पहले तो वे नहीं माने लेकिन फ़िर उन्होंने सुदामा की पत्नी के माध्यम से पटाया।


सुदामा की पत्नी ने सुदामा को ठेल-ठालकर  कृष्ण के पास भेजा। उन्होंने सुदामा को सारे इलाके का प्रतिनिधि मानकर इलाके की सारी जमीन के अधिग्रहण वाले कागज पर सुदामा का अगूंठा लगवा लिया। अधिग्रहण हो गया। 


कृष्ण को अंदेशा था कि हो सकता है कि सुदामा को रास्ते में कुछ लोग भड़कायें और वे बाद में अधिग्रहण मानने से मना कर दें। इसकी व्यवस्था उन्होंने पहले से ही कर रखी। निर्माण एजेन्सियों को ठेके पहले ही दिये जा चुके था। इधर सुदामा ने अधिग्रहण कागज पर दस्तखत किये उधर  उनके गांव में विकास की नींव खुदने लगी। इमारतें खड़ी होंने लगीं। अब उस समय कोई ट्रेन चलती नहीं थी कि आज निकलो कल पहुंच जाओ। सुदामा महीने-दो महीने में मांगते-खाते वापस अपने गांव पहुंचे  तब तक वहां सब निर्माण कार्य पूरा हो गया।  ऊंची-ऊंची अट्टालिकायें बन गयीं थीं। सुदामा अपने इलाके का विकास देखकर भौंचक्के रह गये। उनके हाल वैसे ही हो गये जैसे विकट पिछड़े इलाके में हफ़्ते महीने हाट-बाजार से सौदा सुलफ़ जुगाड़ते गरीब के हाल शहर के विराट माल को देखकर होते हैं।

सुदामा के गांव के विकास से चौंधियाये आसपास के गांव के लोगों ने भी अपनी भूमि अधिग्रहण  में दे दी। इसके बाद तो धड़ाधड़ विकास के काम हुये।   इसीलिये लोग आज भी कृष्ण का नाम लेते हैं। उनको मर्यादा पुरुषोत्तम राम से ज्यादा काबिल मानते हैं।

फ़िर तो सुदामा और उनके गांव वालों के ऐश हो गये होंगे। मैंने मित्र से पूछा?

इस बारे में कोई रिकार्ड नहीं मिलता। क्योंकि राज्य की रुचि अधिग्रहण और उसके बाद  विकास तक ही रहती है। लेकिन उड़ती खबर से पता चलता है कि सुदामा को अपनी जमीन के मुआवजे में जो रकम मिली वह साल भर में उनके ही गांव में खुले मंहगी दुकानों में खर्च कर हो गयी। गांव खतम हो जाने के चलते भीख मिलना भी बन्द हो गया। बाद में उनको वहीं के एक मॉल में चौकीदारी का काम मिल गया क्योंकि बाहर से बुलाने पर चौकीदार मंहगे पड़ते थे। किसी तरह गुजर बसर होती रही।

इस तरह द्वापर में कृष्ण राज्य में भूमि अधिग्रहण संपन्न हुआ।







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1 comment:

  1. फ़ेसबुक से टिप्पणी

    Kumkum Tripathi बधाई...

    Rk Bajpai बहुत बढ़िया , त्रेता , द्वापर और कलियुग तो इस पोस्ट में समाहित हैं, सतयुग क्यों छूट गया
    Mani Bhushan अनूप जी ढेर सारी बधाई |

    चंचल बैसवारी बहुत बढ़िया है.... सरोकारी कटाक्ष
    Ashish Rai badhai
    Atul Chaturvedi शानदार पौराणिक संदर्भों को लेकर कटाक्ष
    Rachana Tripathi वाह!! बहुत सुन्दर

    Vivek Ranjan Shrivastava mast aalekh
    राजेंद्र अवस्थी ह्रदय अधिग्रहण कर लिया आदरणीय आपने.....बहुत सुंदर..वाह

    Brijendra Pandey कलयुग को सतयुग,द्वापर के साथ तौल दिया आपने मोदी को रामकृष्ण के साथ खडा कर दिया है।वाह , बहुत बहुत बधाई।।
    Gitanjali Srivastava maja aa gaya. holi par kya khoob tulna ki hai. awesome.

    Suresh Sahani सर!पूरा पढ़ने के लिए क्या करें?

    Dhananjay Kumar Singh wah bahut sundar.

    Sudesh Arya Journalist बहुत अच्छा जी ! शुभकामनाएं
    Neeraj Mishra Bahut khoob sir. Congratulations.

    महेन्द्र मिश्र mainen E. Pepar men padha bahut bahiya lekh hai .... shubhakamanayen ...

    Santosh Singh व्यंग गज़ब है
    Sanjay Pandey dil jeet liya aapne

    Shyam Sunder Mishra वह, बहुत ही बढ़िया लेख है आपका | आप अपनी रचनाएँ regularly प्रेषित किया करें अखबारों में, सर |

    Naveen Tripathi Waaaaaaah bahutkya bat hai
    Aananad aa gya . Sundar vyngatm shaili me badi bat kah dena hi apki pahchan hai sir ji
    सुन्दर होली पर हार्दिक शुभ कामनाएं।
    Suender Kumar शुक्ल जी क्या बात क्या बात

    56 मिनट · पसंद

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