Thursday, October 19, 2017

बाजार पैसे का मायका होता है

बहुत दिन बाद आज शाम को निकले साइकिलियाने। निकलते ही लोगों के ठट्ठ के ठट्ठ अड़ गये सामने। गोया कह रहे हों सड़क पार न करने देंगे। ठहरे-ठहरे चलते हुये सड़क पार की। बचते-बचते।
सड़क , आप ये समझ लो कि, देश की आम जनता सरीखी चित्त लेटी थी। उस पर वाहन साझा सरकार में अध्यादेश सरीखे और बहुमत वाली सरकार में नित नये कानून सरीखे फ़र्राते हुये चले जा रहे थे।
आगे सड़क किनारे एक मार्गदर्शक कार उपेक्षित सी खड़ी थी। किसी फ़ुस्स हुये पटाखे सी शक्ल लिये गाड़ी सड़क पर गुजरती, फ़र्राटा मारते जाती , गाडियों को हसरत से देख रही होगी यह सोचते हुये कि कभी वह भी सरपट चलती थी।
रास्ते में साइकिल की दुकान दिखी। साइकिल दुकान दिखते ही मचल गयी। बोली - गद्दी बदलवायेंगे। क्या करते। बदलवाई खड़े होकर। 270/- विदा हो गये देखते-देखते। साइकिल की गद्दी बदलते ही वह चहकते हुये चलने लगी।
चौराहे पर एक रिक्शा वाला उदास मन सवारी के इंतजार में जम्हुआ रहा था। मन किया उसको 'हैप्पी दीवाली' बोल दें लेकिन उसकी उदास जम्हुआई में दखल देने की हिम्मत न हुई। बढ गये आगे।
सड़क पर लोग बड़ी तेजी से आगे भगे चले जा रहे थे। जगह-जगह दुकाने सजी हुईं थी। सड़क पर स्ट्रीट लाइट की कमी लोग अपनी हेडलाइट से पूरी कर रहे थे।
जेड स्क्वायर जगमगा रहा था। झालर पहने खिलखिला रहा था। रोशनी की कमी उसने विज्ञापनों के चमकते फ़ुंदनों से पूरी कर ली थी। बड़ी भीड़ जेड स्क्वायर के अंदर घुसी चली जा रही थी। सबको अपने पैसों को कत्ल करना था। पास की लक्ष्मी को हिल्ले लगाना था। नई आ रहीं थीं न दीपावली पर। नई लक्ष्मी के आने से पहले पुरानी से मुक्त हो जायें।
याद आया अपना एक ठो डायलाग - ’बाजार पैसे का मायका होता है। पैसा मौका मिलता ही बाजार की तरफ़ भागता है।
बड़े चौराहे के पहले एक लड़की अपने किसी दोस्त से बतिया रही थी। किसी बात पर हंसी तो फ़ुलझड़ी सी हंसती ही चली गयी। हंसते-हंसते सड़क की तरफ़ झुक सी गयी। ज्यादा हंसी पेट को दोहरा करके निकाल रही होगी। फ़िर शायद उसको याद आया होगा कि झुकते हुये हंसने के चक्कर वह और टुंइया हो गयी है। यह याद आते ही वह सीधे हो गयी। लड़के का चेहरा हेलमेट के अंदर था। चमक रहा होगा वह भी।
बड़े चौराहे पर ट्रैफ़िक सिपाही तैनात थे। व्यवस्था के लिये दूसरे सिपाही बगल में थे। हमने पूछा
-’आगे साइकिल ले जा सकते हैं?’
वो बोला कि हां ले जा सकते हैं।
हमने पूछा -मोटर साइकिल ले जा सकते हैं?
वह बोला - हां, पर आपके पास मोटर साइकिल है कहां?
हमने सोचा कह दें- है तो हमारी पास बुलेट ट्रेन लेकिन कुछ साल लगेंगे लाने में। लेकिन फ़िर बोले नहीं।
चौराहे पर ही आटो पर लिखा दिखा-
"लटक मत टपक जायेगा
घूर मत जल जायेगा"
आगे ठग्गू के लड्डू के नारे भी देखिये:
पेड़ा उवाच:
’हमारा नेता कैसा हो,
दूध के पेड़े जैसा हो
पूर्ण पवित्र, उज्ज्वल चरित्र।’
बदनाम कुल्फ़ी की कहन भी सुनिये:
बिकती नहीं फ़ुटपाथ पर
तो नाम होता टॉप पर।
कचहरी होते हुये वापस लौटे। दिन में चहल-पहल वाली कचहरी में सन्नाटा पसरा था। आगे चौराहे पर स्वच्छता अभियान का लोगो बापू की एनक चमक रही थी।
वहीं बगल में फ़ुटपाथ पर तमाम लोग गुड़ी-मुड़ी हुये सो रहे थे। दो रिक्शे वाले एक गद्दी को साझा तकिया निद्रा निमग्न थे। एक महिला अपने बच्चे को चिपटाये हुये सो रही थी। दो लोग सीधे आसमान की तरफ़ मुंह किये लेटे थे। एक महिला एक बड़े गेट के सामने सड़क पर अपनी पॉलीथीन की चद्दर बिछाते हुये सोने की तैयारी कर रही थी। अभी फ़ुटपाथ पर सोने वाली सुविधा आधार से लिंक नहीं हुई है इसलिये ये लोग धड़ल्ले से सो ले रहे थे। आने वाले समय पर क्या पता कि इस सुविधा पर भी सर्विस टैक्स लग जाये जीएसटी सहित।
सड़क किनारे ही एक बुजुर्गवार औंधाये हुये पान मसाला के ठेले पर लेटे हुये थे।
लौटते में पटाखा लेते हुये आये। बाजार में साइकिल घुसने की अनुमति न थी। लेकिन एक वायरलेस थामे पुलिस वाले ने जाने दिया यह कहते हुये - अब अन्दर जगह है। जाने दो।
अन्दर पटाखा बाजार के बाहर एक बुजुर्गवार रस्सी का ’बाधा बार्डर’ साइकिल रोक दिये। फ़िर बात दस रुपये पर टूटी कि साइकिल गेट पर ही रख दें और वे देखभाल करते रहेंगे। साइकिल गेट पर ठडिया के हम आगे बढे।
पटाखा बाजार में भीड़ थी। हमने एक दुकान से थोड़े पटाखे लिये। दीपावली छुडाने के लिये नहीं , उसके बाद बंदर भगाने के लिये। बंदर का किस्सा बाद में। दुकान पर एक बुजुर्गवार बैठे दिखे। पता चला उनकी उमर 94 साल है। मतलब सन 1924 की पैदाइश। दांत सब विदा हो गये थे लेकिन बकिया चुस्त-दुरुस्त।
पटाखे लेकर लौटने के बाद बुजुर्गवार को दस का सिक्का दिये। पता चला कि बाजार वालों ने 300 रुपया दिहाड़ी पर गेट पर बैठाया है। न्यूनतम मजदूरी से 200 रुपया से भी कम। चाय-पानी हुआ नहीं। पास के किसी गांव के रहने वाले हैं।
लौटते हुये साइकिल का ताला खुलने से मना कर दिया। लगता है नयी गद्दी को देखकर भन्ना गया। बहुत हिलाये डुलाये लेकिन हिला नहीं। साइकिल का पिछवाड़ा उठाये हुये आगे बढे। दस कदम बाद धर दिये। फ़िर खोले तो ताला सट्टा से खुल गया। पसीज गया होगा हमारी मेहनत देखकर।
घर के बाहर एक सब्जी वाला खम्भे से टिका सब्जी खैनी रगड़ रहा था। शुक्लागंज से आते हैं भाई जी सब्जी बेचने। दस बजा था रात का। साढे दस बजे दुकान बढायेंगे। हमने फ़ोटू खैंचा तो अधरगड़ी खैनी को हथेली में सहेज के देखकर बोले- बढिया है।
लौट आये घर। अभी सुबह हुई सोचा किस्सा सुनाये आपको भी दीपावली के पहले का।

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