Monday, October 09, 2017

पुल भी मस्तिया रहा था सुबह-सुबह।

सबेरे निकले। आसमान सूरज की अगवानी में अपने एक हिस्से में लाल कालीन बिछा रहा था। कालीन बिछते-बिछते मटमैली हो गई थी। घिस गई थी। एक ही चीज, बहाना, अदा प्रयोग करते जाने में खत्तम होती जाती है।
चाय की दुकान पर पांच साइकिलिये रुके। चाय लेकर बिस्कुट डुबो-डुबोकर खाते हुये चाय पीने लगे। साइकिल पर फ़ेरी लगाते हुये धनिया बेचते हैं। अस्सी रुपये किलो चल रही है आजकल धनिया। आज धनिया बेच रहे, कल कुछ और। जब तक बिकता नहीं टहलते रहते हैं, गली-गली। दिन भर में सौ-पचास किलोमीटर साइकिल तो चल ही जाती है।
साइकिल वाले बिस्कुट ग्लास की चाय में बिस्कुट डुबोये, खाये, चाय पिये और चल दिये। कोई बिस्कुट चाय में नहीं गिरा, न टूटा, न डूबा। बहादुर , पहलवान टाइप बिस्कुट लगे मुझे वे।
न जाने कित्ते लोग चाय में बिस्कुट भीगकर गिर जाने की कहानी सुनाते रहते हैं। उनके बिस्कुट छुई-मूई टाइप के होते होंगे। बतासा टाइप , जो बनते ही घुलने और चाय में मिल जाने के लिए होंगे। अब जब सामान छुई-मुई टाइप होगा तो उसकी हरकतें कहाँ से लोहलाट होंगी।
बलरामपुर के रहने वाले हैं सब। वहां से कभी अटल बिहारी बाजपेयी जी चुनाव लडते थे। शानदार वक्ता। चीनी मिलें भी खूब थीं बलरामपुर में। अब बाजपेयी जी बोलने से मोहाल हैं, उधर बलरामपुर में चीनी मिलें सब बन्द। इसीलिये कहते हैं- 'समय होत बलवान।'
आगे सड़क पर रिक्शा वाला चला जा रहा था। सड़क और उसके गढ्ढे रिक्शे को सूप के अनाज जैसे इधर-उधर हिला रहे थे। रिक्शा किसी गढ्ढे में जाता तो अगला गढढा उसको संतुलित करके अपनी तरफ़ खैंच लेता। तहमद को चादर की तरह लपेटे रिक्शा वाला रिक्शे को लिये आगे चला जा रहा था।
सडक पर लोग जगे-सोये हुये थे। एक बच्चा रैक्सीन के टुकड़े से नाव बनाने की कोशिश कर रहा था। कई जगह दो-दो लोग एक ही खटिया पर खर्राटे भर थे।
’हमखटिया’/ हमचरपईया । हमबिस्तर को उस तरह से देखा जाता है दुनिया में। पता नहीं हमखटिया को किस तरह देखा जायेगा।
सड़क पर एक बुजुर्गबार अखबार को मुंह के पास सटाये हुये खबर बांच रहे थे। अखबार में किसी अफ़वाह का किस्सा पढते हुये बताया - ’रिक्शा चलाते हैं। हरदोई (हद्दोई) के रहने वाले हैं।’
पुल के मुहाने पर पड़ा कूड़ा गुडमार्निंग सरीखा कर रहा था। शुक्लागंज की सवारियां कानपुर भगी चली आ रही थीं। पुल पर खडे होकर सूरज भाई को देखा। नदी में नहाधोकर 'चिकन परेड' हुये आसमान पर अपना आसन संभाल लिये थे। किरणें , उजाला आदि नदी में डुब्कियां लगा रहे थे। खिलखिलाती किरणों के संग पानी की लहरें भी खिलखिलाने लगीं। जो लहरें दूर थीं वे भागकर किनारे तक इस खबर को बता आयीं। किनारे का पानी थोड़ा हिलडुलकर फ़िर शान्त हो गया।
नदी दो पाटों के बीच तसल्ली से बह रही थी। पुल भी मस्तिया रहा था सुबह-सुबह। किसी गाड़ी के गुजरने पर जरा सा थरथराकर फिर स्थिर हो जाता।
लौटते हुये एक रिक्शे वाले को अपने रिक्शे की गद्दी पर चित्त लेटे-सोते देखा। अपने दोनों हाथ अपने ही अंडरवीयर में घुसेड़े ’अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें’ के इश्तहार का मुस्तैदी से पालन करते हुये गहरी नींद सो रहा था।
आगे मसाला कारखानों से निकले कटे-फ़टे पाउच के टुकड़े इकट्ठा थे। पता चला ये भट्टी में प्रयोग होते हैं। भट्टियों में मूंगफ़ली बुनती हैं। सामने देशी दारू का ठेका है। दारू की दुकान के आसपास मूंगफ़ली की खपत खूब होती होगी। व्यापार में सब चीजें एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं।
लौटने हुये देखा एक बच्ची एक सोते हुये बच्चे को जगा रही थी। प्यार से हिलाते-डुलाते हुये। बच्चा कुनकुनाते हुये दूसरी करवट लेकर सो गया। बच्ची उसे फ़िर से जगाने का प्रयास करने लगी। बच्चा फ़िर करवटिया कर निद्रा की गोद में गुड़ीमुड़ी हो गया।
नुक्कड़ पर मालिन फ़ूल की दुकान पर आल्थी-पाल्थी मारे प्लास्टिक की ग्लास में चाय पी रही थी। बगल से हमको गुजरते देखकर जरा सा रुकी। फ़िर फ़ूंककर चाय पीने लगी। हमको भी चयास लग आयी। हम लपकते हुये घर आये। चाय चढाये। बनाये। छाने। थर्मस में डाले। इसके बाद कप में डाउनलोड करके मुंह में अपलोड करते हुये टाइप करते जा रहे हैं। स्वादिष्ट बनी है। चाय हम वैसे भी बढिया ही बनाते हैं।
सुबह के लिये फ़िलहाल इतना ही। बकिया फ़िर। आप मजे से रहना। ठीक।

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