Saturday, November 11, 2017

इंसान कुदरत का बेहया दुलरुआ है


सबेरे घूमने निकले। सड़क किनारे की सब दुकानें साफ़। पप्पू की चाय की दुकान का टट्टर गायब, भट्टी लापता, बेंच तिरोहित। पता चला कैंट में किसी टूर्नामेंट में सुरक्षा के लिहाज से आसपास के अतिक्रमण हटा दिये गये हैं। पप्पू अपनी बेंच, टट्टर और मोमिया समेटकर घर ले गये। भट्टी दीवार की आड़ में छिपा दी। कुछ दिन बाद फ़िर जमायेंगे अड्डा।
कुदरत भी इंसान के साथ ऐसी ही कार्रवाई करती है। जब देखती है आदमी ने ज्यादा अतिक्रमण मचा दिया है तो अपने बुलडोजर से सब ढहा देती है। नदियां अपने रास्ते में बने निर्माण, होटल और दीगर बहुमंजली इमारतों को टीन-टप्पर की तरह तिड़ी-बिड़ी कर देती हैं। लेकिन इंसान भी तो इसी कुदरत का बेहया दुलरुआ है। ढीठ जिजीविषा कुदरत से विरासत पाया है। उजड़ने के बाद फ़िर बस जाता है।
सड़क किनारे लोग खटियों में सोये हुये थे। सुबह हो गयी थी लेकिन कायदे से नहीं थी। मने ड्राफ़्ट सुबह हुई थी। सोये हुये लोग , एक बार जगकर फ़िर से सो गये थे। करवट बदलकर। जाड़े ने अपनी हाजिरी लगवा सी लगवा ली है। पतली रजाइयां निकल आई थीं। बहुत दिन बाद बक्सों, बोरों से निकलकर रजाइयां आजादी की सांस लेकर खुशनुमा महसूस कर रही थीं। लोगों के बदन से लपटकर उनकी गर्माहट, गुनगुनाहट की रखवाली कर रही थीं। रजाइयां हमारी बदन की गर्मी की चौकीदार हैं। रजाई, कम्बल न हों तो हमारे आसपास की हवा हमारी सारी गर्मी का अधिग्रहण करके हमको ठिठुरा दे।
आगे कुछ लोग अलाव ताप रहे थे। पुल की सड़क की मरम्मत हो रही है। पैचवर्क। उसी के लिये डामर मतलब कोलतार यानी कि अलकतरा पिघलाने के लगने वाली लकड़ियां सुबह को गर्माने के लिये इस्तेमाल हो रही थीं। एक भगौना चाय की पत्ती और छन्नी अपने अन्दर समेटे बता रहा था कि अभी ताजा-ताजा चाय बनी है।
अलाव तापते लोगों में से एक लड़के के गाल पर हरे रंग से कुछ लकीरें बनीं थीं। बताया कि रात में कोई उसके गाल रंग गया। एक और साथ के हैं उनके गाल पर 420 लिख गया। हंसते हुये कहा लड़के ने -’ पकड़ लेतन लिखत भये तो मारनेम बेलचा घसीट के’ (लिखते हुये पकड़ लेते तो बेलचा मारते घसीटकर)। सब मजूर हैं। वह साथ के लोगों को इंजीनियर, कान्ट्रैक्टर बताते हुये बतिया रहा था। हम लोग अपने से जुड़े लोगों में ऐसी ही मानद उपाधियां देते रहते हैं।
लड़का पतारा से आया है। पढने की उमर है। घर छोड़कर काम करने निकला है। दांत मसाले से लाल। हम पूछते हैं तो हंसता है। दांत और रंगे हुये दिखते हैं।
पुल के मुहाने चढा पर एक लड़का पोस्टर लगा रहा है। हम खड़े होकर देखते हैं तो कहता है- ’अंकल जी एक बैनर दे दीजिये निकालकर।’ उसकी मोटर साइकिल से निकालकर देते हैं। बतियाते भी हैं। वह कोचिंग चलाता है 12 वीं तक के बच्चों की। ’ग्रेविटी क्लासेस’ के नाम से। कुछ और लोग भी साथ में पढाते हैं। खुद एल.एल.बी. भी कर रहा है। बताता है आज देर हो गयी निकलने में। इतनी देर में कई पोस्टर लगाने थे लेकिन अभी तक दो ही लग पाये।
पुल पर आवाजाही अभी कम है। रेल गुजर रही थी। सूरज भाई लाल दिखे। लगता है प्रदूषण से आंखें लाल हैं। शायद भन्नाये हुये हैं। भन्नाने दो। हम तो मचा के रहेंगे गन्दगी।
नदी में पानी भी अभी अलसाया सा सो रहा है। नावें जरा सा हिलाती-डुलाती हैं पानी को लेकिन वह फ़िर कुनमुनाते हुये पलटकर सो जाता है। जैसे पाइलट जहाज को ऑटो मोड में डालकर सो जाता है वैसे ही नदी भी पानी को ऑटो मोड में डालकर सुस्ता रही है।
लौटते हुये देखते हैं कि सड़क किनारे की मूंगफ़ली की दुकानें जम गयी हैं। एक आदमी बोरे के चने को तसले में डालता है। पहले चना तसले में गिरते हुये आवाज करता है। दर्द हुआ होगा बोरे से तसले में गिरते हुये तो चिल्लाया होगा - ’अरे बाप रे, अरी अम्मा मर गये।’ यह भी हो सकता है बोरे से तसले में गिरते हुये अंग्रेजियाया हो -’हाऊ डेय़र यू थ्रो मी ऑन दिस आयरन पॉट’ (मुझे इस लोह के बर्तन में फ़ेंकने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी?) लेकिन उसके ऊपर लद्द-फ़द्द गिरते दूसरे चने के दानों की आवाज में उसकी अंग्रेजी का गला घुट गया होगा। चने के ढेर की नींव का चना बना अंधेरे में पड़ा होगा वह बेचारा अकेले अंग्रेजी बोलने वाला चना।
दुकान सज गयी। मूंगफ़ली के पिरामिडों के पीछे बैठी लड़की ग्राहक के इंतजार में है। बगल में इधर-उधर फ़ुदकती, खेलती तमाम बच्चियां, बच्चे हैं। उनसे पूछते हैं -’स्कूल नहीं जाते?’ सब मुझे ताज्जुब से देखते हैं। मानो पूछ रहे हों - ’ये स्कूल क्या होता है?’
सामने से सूरज भाई मुस्कराते हुये कहते हैं -’चलो अब बहुत हुई घुमाई। जल्दी से तैयार होकर दफ़्तर जाओ वर्ना लेट हो जाओगे।’

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