Thursday, December 28, 2023

पांडिचेरी में चहलकदमी



पांडिचेरी में रहने का ठिकाने का जुगाड़ हो गया तो तसल्ली हुई । समुद्र की तरफ वाले कमरे के यहाँ एक हजार रुपये अतिरिक्त लगे थे। हमें लगा कि जो लोग समुद्र के किनारे रहते हैं वो साल भर में तीन लाख पैसठ हजार तो बचा ही लेते हैं।
इसी तर्ज़ पर कहा जा सकता है कि समुद्र तट के किनारे बसे लोग दूर बसे लोगों के मुक़ाबले अमीर होते हैं।
अपने रहने के इंतजाम के बाद ड्राइवर के लिए जुगाड़ किया गया। होटल में कोई इंतजाम नहीं था। पास ही गाडी रखने और रुकने का इंतजाम बताया ड्राइवर ने। अगले दिन मिलने की कहकर चला गया ड्राइवर।
बालकनी से समुद्र साफ़, एक दम नजदीक दिखता था। लोग किनारे की बेंचो, पत्थरों पर बैठे समुद्र की लहरों को उठते-गिरते , किनारे तक आते , किनारे से टकरा कर लौट जाते देख रहे थे। हमने भी देखा। हमको लगा समुद्र की लहरें उत्साह और उमंग से किनारे की तरफ आती हैं । ऐसे लगता है मानों लहरें किनारे से गहन आलिंगन के लिए व्याकुल होकर भागती चली आ रहीं हैं। लौटते समय वह उत्साह नहीं दिखा लहरों में। ऐसे लौटती दिखीं मानो बेमन से वापस जा रही हों। मिलन और विछोह का अंतर दिखा लहरों के आने -जाने में।
कुछ देर आराम करने के बाद खाना खाने निकले। पास ही स्थित उडुपी होटल बंद हो चुका था। थोड़ा और आगे एक रेस्टोरेंट , जिसका नाम होटल वाली बालिका ने बताया था, खुला था। पहली मंजिल पर मौजूद भोजनालय में लंचार्थियो की भीड़ थी । एक किनारे की मेज पर जगह मिली। बैठकर आर्डर दिया। बालक मोबाइल में आर्डर नोट करके चला गया। जबतक वह वापिस आया , हम अगल-बगल के और सामने मनचले समुद्र के नज़ारे देखते रहे।
आसपास अधिकतर लोग अपने मोबाइल में डूबते-तैरते-उतराते दिखे। बगल वाली टेबल वालों के साथ छोटे बच्चे थे। उन्होंने आते ही मोबाइल में वीडियो लगाकर बच्चे को थमा दिया। बच्चे मोबाइल में और वो लोग अपने में मशगूल हो गए। आने-वाले समय में मोबाइल दादी-नानी की भूमिका निभायेंगे।
खाना खाकर होटल लौटे। कुछ देर आराम फर्माने के बाद घुमने निकले। अधिकतर घूमने की जगहें, जिनका जिक्र इधर-उधर दिखा, आसपास ही , एक-दो किलोमीटर के दायरे में थीं। पैदल ही निकले। समुद्र की लहरों और आते-जाते लोगों को देखते हुए।
सड़कें लोगों, गाडियों और सड़क किनारे ठेलियों से भरी-पूरी थीं। दोनों किनारे गाड़ियों , सामान के ठेलों की लाइन। दूर-दूर तक ऐसा कोई हिस्सा नहीं दिखा सड़क का जिसके दोनों किनारों पर गाड़ियां , ठेले न खड़ी हों। सड़क के बीच में थोड़ी जगह गाड़ियों और लोगों के आने-जाने के लिए भी छोडी गयी थी। इतनी भीड़ के बावजूद कहीं कोई अफरा-तफरी, हल्ला-गुल्ला या हडबडी नहीं दिखी। लगता है सब यहाँ शान्ति के साथ ही आये हैं।
सबसे पहले अरविन्द आश्रम देखने की बात तय हुई। रास्ते में मिलने वाले भारती पार्क , म्यूजियम, रोम्या रैला लाइब्रेरी, आर्ट गैलरी से कहते गए –‘आते अभी लौटकर, कहीं जाना नहीं, इन्तजार करना।‘
अरविन्द आश्रम में अन्दर जाने के पहले जूते-चप्पल बाहर ही उतारने थे। आश्रम के सामने फुटपाथ पर मुफ्त जूते-चप्पल रखने की व्यवस्था थी। एक बुजुर्ग महिला निर्लिप्त जिम्मेदारी वाले भाव से लोगों के जूते रैक में रखकर टोकन देती । लौटने पर टोकन के हिसाब से जूते-चप्पल वापस लौटा देती।
कहीं कोई साम्य नहीं लेकिन वहां जूते-चप्पल रखने की व्यवस्था देखकर मुझे शरीर-आत्मा-यमदूत के सुने किस्से याद आये। क्या पता यमदूत इसी शरीर को आत्मा से अलग करते हुए आत्मा को एक टोकन थमाते हों। अगले जन्म में आत्मा अपने टोकन के हिसाब से शरीर धारण करके नया जीवन शुरु करती हो।
अन्दर आश्रम में फोटो लेना मना था। घुसते समय सबके मोबाइल बंद करा दिए गए। अन्दर लोग अरविंद जी और माँ मीरा की समाधि पास शान्ति से बैठे थे। समाधि पर ताजे फूल सजे हुए थे। कुछ देर वहां बैठने के बाद हम लोग बाहर आ गए।
बाहर आकर हमने अपने जूते -चप्पल वापस लिए और लौट लिए। रास्ते में अरविंदो आश्रम पोस्ट आफिस दिखा । पोस्ट ऑफिस के बाहर सूचना लिखी थी -'यह डाकघर महिला डाक कर्मचारियों द्वारा संचालित है।'
शाम होने के कारण डाकघर बंद हो चुका था। बाहर एक लड़की मोबाइल पर कुछ देख रही थी। वहीं चौराहे के नुक्कड़ पर एक महिला नारियल पानी बेंच रही थी। मन किया नारियल पानी पिया जाए। लेकिन फिर बिना पिये आगे बढ़ गए।
आगे म्यूजियम , लाइब्रेरी और आर्ट गैलरी देखी। म्यूजियम में मूर्तियाँ , सिक्के, कलाकृतियाँ , फर्नीचर, पुराने जमाने के वाहन और तमाम चीजें रखीं थीं। बाहर रखी मूर्तियों के साथ लोग फोटो खिंचा रहे थे। म्यूजियम का टिकट दस रुपये था।
म्यूजियम से बाहर बगल आर्ट गैलरी में कुछ पेंटिंग्स लगी थी। पेंटर के फोटो बाहर लगे थे। अंदर घुसकर पेंटिंग्स देखते हुए एक का फोटो भी ले लिए। गेट पर बैठे आदमी ने टोंका -'डोंट टेक फोटो।' हम थम गये। पेंटिंग्स बिक्री के लिए भी उपलब्ध थीं। हमने दाम नहीं पूछे। देखकर ही लौट आये।
बगल की रोम्यां रैला लाइब्रेरी में लोग लम्बी मेज के दोनों तरफ बैठे अखबार पढ़ रहे थे। ज्यादातर अखबार तमिल के थे। हमने वहां बैठकर फोटो खिंचाया।हमको फोटो खिंचाते देखकर सामने वाले ने हमारी तरफ अंग्रेजी का अखबार सरका दिया। उसको पता लग गया होगा कि अपन तमिल नहीं जानते।
किताबों की तरफ वाले सेक्शन ने नीचे तमिल की ही किताबें थीं। ऊपर गए तो अंग्रेजी और हिंदी के अलावा और भाषाओं की किताबें भी दिखीं। हिंदी की ढेर सारी किताबें थीं। एक किताब नामवर सिंह जी से बातचीत की थी। किताब पलटते हुए जो पन्ना खुला उसमें एक जबाब में नामवर जी ने बताया था कि उनके गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी जी मुक्तिबोध जी की कविता को पसंद नहीं करते थे। उस समय तय किया था कि यह किताब मंगवाएँगे।
लाइब्रेरी से वापस आते हुए वहां मौजूद लोगों से पूछा-'लाइब्रेरी कितनी पुरानी है।' सबने एक दूसरे की तरफ देखा। इधर-उधर देखते हुए एक ने दराज से एक किताबिया निकालकर हमको थमा दी। मतलब इसमें लिखा है लाइब्रेरी के बारे में। पढ़ लो।
पढ़ने पर पता चला कि पांडिचेरी में, जहां करीब तीन शताब्दियों तक फ्रांसीसियों का शासन रहा, लाइब्रेरी मूवमेंट की शुरुआत 1827 में हुई। पब्लिक लाइब्रेरी होने के बावजूद शुरुआत में इसमें केवल यूरोपीय लोगों को आने की अनुमति थी। सन 1850 में यहां किताबों की संख्या 6500 थी। आज की तारीख में करीब 334865 किताबें हैं। करीब 35000 लोग लाइब्रेरी के सदस्य हैं। साल भर में करीब 2 लाख किताबें पढ़ने के लिए इशू की जाती हैं। औसतन करीब एक हजार लोग लाइब्रेरी की सुविधा का उपयोग करते हैं।
1966 में रोम्यां रैला जी की जन्मशताब्दी के मौके पर लाइब्रेरी का नामकरण उनके नाम पर किया गया।
लाइब्रेरी से बाहर निकल कर हम वापस लौटे। शाम को सड़क और गुलजार हो गयी थी। समुद्र किनारे लोग चहलकदमी करते हुए टहल रहे थे। तमाम लोग समुद्र की लहरों को देखते हुए फोटोबाजी कर रहे थे।
अपन भी टहलते हुए एक चट्टान पर बैठ गए और समुद्र और जनसमुद्र दर्शन में जुट गए।

https://www.facebook.com/share/p/gndtm12pWd9PLMET/

Wednesday, December 27, 2023

पांडिचेरी की ओर



पिछले दिनों महाबलिपुरम और पांडिचेरी जाना हुआ। पांडिचेरी इसके पहले चालीस साल पहले आये थे। इलाहाबाद से कन्याकुमारी तक साइकिल यात्रा के दौरान अगस्त , 1983 के दूसरे हफ्ते । एक दिन रुके थे। अरविंद आश्रम और समुद्र तट की बहुत धुंधली यादें थीं पिछली यात्रा की।
पिछली बार पांडिचेरी से चेन्नई की तरफ आये थे। इस बार महाबलिपुरम से पांडिचेरी जाना हुआ। पांडिचेरी को पुदुचेरी और कहीं-कहीं पोंडी भी लिखा देखा।
पांडिचेरी में रुकने के लिए होटल बुक नहीं कराया था। सोचा वहीं देखेंगे। चलने के एक दिन पहले आनलाइन बुकिंग की बात सोची तो लोगों ने बताया कि वहां सब होटल भरे हैं। कहीं कोई जगह नहीं है। हमने सोचा कि अब समय आ गया बुकिंग कराने का। यात्राओं में रोमांच लाने का यह भी एक तरीका है कि इंतजाम में देरी की जाए ताकि परेशानी आये और फिर उस परेशानी को हल करने की कोशिश की जाए।
आनलाइन बुकिंग की कोशिश की तो तमाम होटल में जगह दिखी। लगभग हर जगह एक ही कमरा बाकी दिखा रहा था। शायद हमारे लिए ही बचा रखा था। कमरे का किराया हजार-पन्द्रह सौ से लेकर पचीस-तीस हजार तक बताया जा रहा था।
बहरहाल एक कमरा बुक करा लिया । फ्रेंच कालोनी में एक विला था। कमरे के फोटो भी ठीक-ठीक ही दिख रहे थे। बुकिंग के कोई पैसे एडवांस में नहीं देने पड़े थे । सोचा अगर अच्छा नहीं होगा तो दूसरा खोजेंगे होटल।
महाबलीपुरम से पांडिचेरी की दूसरी लगभग 95 किलोमीटर है। कानपुर से लखनऊ की दूरी के बराबर। बढ़िया सड़क। सड़क के दोनों तरफ आबादी, गाँव , खेत । सबको देखते हुए पांडिचेरी की तरफ बढे। सड़क किनारे दीवारों पर इश्तहार। ज्यादातर तमिल में। कहीं-कहीं अंग्रेज़ी भी दिख जाती।
रास्ते में एक जगह चाय पी गयी। काउंटर पर मौजूद महिला तमिल ही जानती थी। लेकिन चाय लेने और पैसे देने में कोई अड़चन नहीं आई। पैसे की भाषा सबकी सबको फ़ौरन समझ में आ जाती है। दस रुपये की एक चाय । भुगतान गूगल पे से किया। आजकल पूरे देश में आनलाइन भुगतान की व्यवस्था हो गयी है।
पांडिचेरी पहुंचकर ठहरने की जगह गए। एक घर को होटल में बदल दिया गया था । अँधेरे कमरे । फ़ोटो में जितना अच्छा दिख रहा था होटल , उतना अच्छा दिखा नहीं। पास में स्थित मछली बाजार से ‘मछली गंध’ की मुफ्त व्यवस्था। मन नहीं हुआ रुकने का। दूसरा होटल खोजने निकले।
जिस भी होटल में पता किया वो भरा मिला। लोगों ने बताया कि महीनो पहले से बुकिंग कराते हैं लोग। कोई होटल खाली नहीं मिलेगा।
आसपास तमाम होटल देखने के बाद भी कहीं जगह नहीं मिली। तय किया कि जो बुक किया था उसी में रुक जाते हैं। रात को सोना ही तो है। एक दिन की बात । वापस चल दिए होटल की तरफ। उसको फोन भी कर दिए। आ रहे हैं रुकने के लिए।
लेकिन होटल की तरफ चलते हुए उसके कमरे के हाल याद आये। रुकने का मन नहीं किया। एक बार यह भी सोचा कि शाम तक घूमकर वापस लौट जायें पांडिचेरी से।
एक बार फिर होटल-होटल पूछते फिर। आनलाइन खोजा। एक होटल दिखा। हमने बुक करके पूछा तो बताया गया आ जाओ। खाली है। होटल वाले ने लोकेशन भी भेज दी। हम चल दिए।
होटल की तरफ चलते हुए उसी नाम का एक और होटल दिखा होटल वाले ने लोकेशन भी भेज दी।
होटल की तरफ जाते हुए उसी नाम का एक और होटल दिखा। हम लपके होटल वाले बताया कि एक कमरा खाली है। दाम एक हजार ज्यादा बताये। हमने पूछा इसी नाम का तुम्हारा और होटल भी है ? तो उसने बताया हाँ है ! हमने कहा आते उसको देखकर । उसने कहा- ठीक।
होटल के रास्ते में हमको यही लगता रहा कि कहीं वहां पहुँचने के पहले कमरा उठ न जाए इसलिए हम उससे बतियाते रहे। होटल पहुंचकर तसल्ली हुई कि कमरा अभी उठा नहीं था। काउंटर पर तीन लड़कियाँ थीं। उनमें से दो बाहर से यहाँ काम करने आईं थी। हर सवाल के जबाब फुर्ती से मुस्कराते हुए ' मुझे पता नहीं' कह रहीं थीं। तीसरी लड़की ने लडके को कमरा दिखाने के लिए भेजते हुए बताया -'सी फेसिंग रूम थाउजेंड एक्स्ट्रा।' कुल किराया 7499 रुपये । मतलब दिल्ली या किसी और शहर के फाइव स्टार होटल के एक कमरे के किराए के बराबर !
आखीर में जिस कमरे में सामान रखा गया समुद्र वहां से कुल जमा बीस-तीस मीटर दूर था। समुद्र की लहरें इठलाते हुए हमारा स्वागत कर रहीं थी।
इस बीच उस होटल से फोन भी आ रहा था जिसकी बुकिंग हमने महाबलीपुरम से कराई थी और जहाँ हम आने के लिए कह आये थे। जब हमने उसको बताया कि हम दूसरी जगह रुक गए हैं तो उसने कहा -'आप आनलाइन बुकिंग कैंसल कर दें।' हमने उसकी आज्ञा का पालन किया और कुछ देर में पांडिचेरी दर्शन के लिए निकल लिए।

https://www.facebook.com/share/p/iAhj99d5AYXun61u/

Tuesday, November 14, 2023

39 साल पुराना शुभकामना पत्र



दीवाली के मौक़े पर सैकड़ों मित्रों की शुभकामनाएँ मिली। हमने भी भेजीं। कुछेक मित्रों को छोड़कर लगभग सभी ने डिज़ाइनर ग्रीटिंग कार्ड भेजे। एक से एक खूबसूरत चित्र और मनभावन संदेश। कुछ के संदेश बाद में भी मिले। भूल हुए होंगे देना पहले।
हम भी भूल गये होंगे कुछ मित्रों को शुभकामनाएँ देना। ऐसे सभी मित्रों को फिर से दीपावली की शुभकामनाएँ। जिनको लगता है दीपावली तो तो बीत गई उनको बता दें कि हमारी दीवाली नीरज जी वाली है जिसमें वो लिखते हैं :
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
अब अंधेरे के पास कोई जीपीएस तो है नहीं न गूगल मैप जो अंधेरी गली से निकल कर रास्ता खोज लेगा।
ग्रीटिंग कार्ड की बात इसलिए कि आज हमारे कॉलेज के सीनियर Anil Srivastava जी ने दीवाली के मौक़े पर मेरे द्वारा उनको भेजा गये ग्रीटिंग कार्ड की फ़ोटो भेजी। पोस्टकार्ड पर बना हुआ ग्रीटिंग कार्ड। शायद स्केच पेन से बनाया था। दिये का स्केच और साथ में फ़्रॉस्ट की प्रसिद्ध कविता पंक्ति :
Woods are lovely dark and deep
But I have promises to keep
And miles to go before I sleep
And miles to go before I sleep.
ये कविता पंक्तियाँ नेहरू जी की पसंदीदा थीं। (संयोग से आज नेहरू जी का जन्मदिन भी है)हमने उस समय क्यों लिखा था याद नहीं। शायद अनिल सर को या ख़ुद की हौसला आफ़ज़ाई के लिए।
यह बात 1984 की दीवाली की है। हम बीई फ़ाइनल ईयर में थे। अनिल सर एमई कर रहे थे। उनके साथ के तमाम दोस्त किसी न किसी नौकरी में जा चुके थे। वे अकेले रह गये थे। पहली बार हम लोग एक ही विंग में रहने के कारण संपर्क में आये थे। देर देर तक बातें -मुलाक़ातें होती थीं। उस समय के साथ के हुबहू बयान करना मुश्किल है। लेकिन आज 39 साल पहले का यह कार्ड देखकर अनगिनत यादों के दरीचे खुल गये। कार्ड देखते ही फ़ौरन फ़ोन मिलाया अनिल सर को तमाम नई पुरानी यादें ताज़ा हुईं।
ग्रीटिंग कार्ड देखकर याद आया किं पहले अपने मित्रों को पत्र लिखने का बहुत शौक़ था मुझे। लंबे-लंबे पत्र लिखते थे। लोग भी जबाब लिखते थे। आज भी मन करता है कभी मित्रों को पत्र लिखें। लेकिन अब शायद पोस्ट कार्ड का चलन भी बंद हो गया।
मित्रों के पतों की जगह उनके फ़ोन नंबरों ने ले ली है।
39 साल पहले भेजा यह ग्रीटिंग कार्ड देखकर लगा कि दो दिन पहले भेजी गई और पाई गई शुभकामनाएँ जो ह्वाट्सऐप या अन्य माध्यमों से आईं -गई वो क्या चालीस साल बाद इसी तरह सुरक्षित रह सकेंगी जैसे यह कार्ड में भेजी शुभकामनाएँ। क्या पता तब तक व्हाटसप और सोशल मीडिया के रूप इतने बदल जायें कि संदेश खोजे न मिलें। पढ़े न जायें।
आगे की बात आगे की देखी जाएगी अभी तो तय किया है कि मित्रों को कभी -कभी पत्र लिखने का सिलसिला फिर से शुरू किया जाये। देखते हैं अमल में कितना आता है। क्या आपको भी पत्र लिखना अच्छा लगता है?

https://www.facebook.com/share/p/EXoo2x7a4VUwHpcM/

Friday, November 10, 2023

सोशल मीडिया की रीच

 




अक्सर मित्र लोग अपनी पोस्ट की रीच कम हो जाने की बात करते हैं। इसके लिए सोशल मीडिया को कोसते हैं। चिंता व्यक्त करते हैं कि पाठक कम हो गए, टिप्पणी नहीं आती, लाइक नहीं मिल रहे।
सहज भाव है यह। पाठक कम होना, टिप्पणी कम मिलना, लाइक कम होना सोशल मीडिया में नियमित लिखने वालों को और कभी-कभी भी लिखने वालों को खराब लगता है।
जहां तक रीच कम होने की बात है तो हमको लगता है कि सोशल मीडिया इसका प्रयोग करने वालों के लिए सोशल है। इसको चलाने वालों के लिए यह कमाई का साधन है। कमाई बढाने के लिए तरह-तरह के जुगाड़ अपनाता है मीडिया। उसको इस बात से मतलब नहीं कि आपकी पोस्ट कितनी अच्छी है, कितनी समाजोपयोगी है। जिस भी तरह की पोस्टों से देखने वाले बढ़ेंगे उनको बढ़ावा देगा।
फेसबुक पर ही पहले मित्रों की तमाम पोस्टें एक के बाद एक दिखती थीं। अब उनकी जगह स्पॉन्सर्ड पोस्ट, विज्ञापन दिखते हैं। सजेस्टेड पोस्ट दिखती हैं। स्पॉन्सर्ड पोस्ट और विज्ञापन से पैसा मिलता है। सजेस्टेड पोस्ट खाता धारक की रुचि पर आधारित होती हैं।
फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया के हाल अब अखबार सरीखे हो गए हैं जिनमें कभी पहले पेज की शुरुआत प्रमुख खबरों से होती थी। उनकी जगह अब पहले, दूसरे, तीसरे पेज तक भी खबरों की हिम्मत नहीं होती जो छप जाएं। पूरे-पूरे पेज विज्ञापनों से भरे हैं। हर जगह बाजार का हल्ला है, समाचार चुपचाप कहीं अंदर छिपा है। बाजार ही आजकल प्रमुख समाचार है।
तो मुझे तो यही लगता है कि हमारी पोस्ट कम पढ़ी जा रही है तो इसका कारण पैसा कमाऊ पोस्टों का हमसे पहले पेश किया जाना है। यही सोशल मीडिया संचालकों के लिए फायदे का आधार है।
कुछ मित्रों का मानना है कि पोस्ट्स को मित्रों को टैग करना इससे मुकाबले का उपाय है। सही है। सौ-पचास मित्रों को टैग करेंगे तो वो हमारी पोस्ट फौरन देख लेंगे। शर्मा-शर्मी टिपिया भी देंगे। लेकिन वह सब मुंह देखी बात होगी।
अपनी हर पोस्ट को टैग करके पढ़वाने की कोशिश ऐसी ही लगती है मुझे मानो किसी ट्रेन को पकड़ने के लिए लपकते इंसान का कुर्ता घसीटकर हम कहें -'ये कविता अभी-कभी लिखे हैं। जरा सुनकर तारीफ तो करिए जरा। ट्रेन फिर पकड़ लीजिएगा।'
मुझे लगता है कि अगर लोग हमारी लिखाई पसंद करते हैं तो वो देर-सबेर पढ़ेंगे ही। अपने दोस्तों को टैग करना मतलब उनका ध्यान जबरियन अपनी तरफ खींचना। यह जबर्दस्ती का मसला कवि सम्मलेन/मुशायरों में कवियों/शायरों की उस अदा की तरह है जिसमें लोग जबरियन श्रोताओं से तवज्जो चाहते हैं, ताली लूटते हैं।
हम अपने जिन मित्रों का लिखा पढ़ना पसंद करते हैं उनको खोज कर पढ़ते हैं। छूट जाता है तो बाद में पढ़ते हैं। कुछ बहुत अच्छा पढ़ने में देर होती है तो अफसोस भी करते हैं कि देर हो गई पढ़ने में।
टिप्पणी/लाइक कम होने का कारण यह भी है कि आजकल नेट पर चमक-दमक और उलझावों का सैलाब आया है। यह दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। रील है, स्टोरी है, फ़ारवर्डेड सन्देश हैं, गुडमार्निंग है, सुप्रभात है। नित नए बनते ग्रुप हैं। आप अच्छे भले बैठे हैं, पता लगा आपको किसी ग्रुप में शामिल कर लिया गया। आप देओ हाज़िरी दिन रात।
लोगों के पास समय की कमी बहुत बड़ा कारण है टिप्पणी, लाइक कम होने का। अपन दिन भर ऑनलाइन भले रहते हों लेकिन लिखने-पढ़ने के लिए हद से हद घण्टे-दो घण्टे मिल पाते हैं। इतने में कुछ ही मित्रों का लिखा पढ़ पाते हैं। बहुत कम पर टिप्पणी कर पाते हैं। टिप्पणी के जबाब तो और भी कम , देना चाहते हुए हुए भी , बहुत कम दे पाते हैं। लाइक अलबत्ता जरूर कर देते हैं दिल वाले निशान के साथ। लाइक।किया मतलब पढ़ लिया।
कहने का मतलब यह कि अपन ऐसा सोचते हैं कि यह मुफ्त की सुविधा है। यह सुविधा कैसी मिलेगी, कितनी मिलेगी यह देने वाले की मर्जी और फायदे से तय होगी। एक बहुत बड़े बाजार में मुफ्त की ठेलिया लगाने का मौका मिलने जैसी बात है(फिलहाल यही सूझ रहा) यह अभिव्यक्ति की सुविधा। इससे यह आशा रखना कि यह हमें मुफ्त में प्रोत्साहित करेगा, खाम ख्याली होगी।
इसलिए मेरा तो यही मानना है कि लिखते-पढ़ते रहें। पढ़ने लायक लिखेंगे तो पाठक जरूर आएंगे। पढ़ेंगे भी देर सबेर।
बहुत ज्यादा तारीफ और लाइक मिलने से यह गलतफहमी भी हो सकती है कि अपन बहुत अच्छे लेखक हैं। इस गलतफहमी बचना बहुत जरूरी है।
यह हमने अपने समझाने के लिए लिखा। हो सकता है आप इससे अलग सोचते हों।

https://www.facebook.com/share/p/uBBsfLdWmHk7LojX/

Tuesday, November 07, 2023

सपने में सैर और किताबों में दीमक



आजकल घूमना-फिरना स्थगित है। सुबह सोचते हैं शाम को निकलेंगे, शाम को बात सुबह पर टल जाती है। बहाने ठोस और तार्किक रहते हैं तो ज्यादा अफसोस नहीं होता। लेकिन लगता तो है कि निठल्ले हो गए एकदम। जाहिल भी लिख देते लेकिन मन नहीं किया। छोड़ दिया।
तर्क ऐसा जुगाड़ है जिससे इंसान अपना बड़ा से बड़ा अपराध सही ठहरा लेता है। लाखों लोगों की हत्याओं को सही ठहराकर चैन से रह लेता है।
जो काम जगते में नहीं किया वो कल सोते में हुआ। सपने में देखा कि कहीं घूमने निकले हैं। पैदल। थक गए तो किसी सवारी की खोज करने लगे। मिली नहीं। चलते रहे। फिर कोई स्कूटर वाला दिखा। उससे लिफ्ट मांगी। कहा -'जहां तक जा रहे हो छोड़ देना।'
स्कूटर की पीछे सीट पर बैठ गए। वो अपने घर ले गया। बोला -'चाय पीकर जाओ।' हम थोड़ी देर रुके लेकिन चाय पी नहीं। चले आये। फिर इधर-उधर टहलते हुए घर आ गए। रास्ते में क्रासिंग भी मिली। बंद थी। कुछ देर बाद खुली। क्रासिंग खुलने पर लोग ऐसे भागे जैसे किसी बक्से में रखी किताबों में लगी हुई दीमक किताबें खोलने पर बिलबिला कर भागती हैं।
किताब में दीमक वाली बात मतलब बिम्ब आने का कारण यह रहा कि परसों देखा कि बक्से में रखी कई किताबों पर दीमकों ने हमला बोल दिया। गत्ते का बक्सा चाट गईं। फिर किताबें भी। कोई किताब आधी, कोई चौथाई। किसी किताब में बस घुसी ही थी लेकिन उनको खाना शुरू नहीं किया था। कुछ किताबों में तो घुसीं भी लेकिन शायद उनको खाने की हिम्मत नहीं हुई।
इससे कहा जा सकता है कि कुछ किताबें इतनी गरिष्ठ या अपठनीय होती हैं कि उनको दीमक तक नहीं खाती। यह भी हो सकता है कि कुछ दीमकें पढ़ी लिखी होती हों और वे किताबों को पढ़कर ही खाती हों। अपठनीय किताबों को छोड़ देती हों।
बहरहाल किताबों को अब धूप दिखा रहे हैं। जितनी बची हैं कोशिश कर रहे हैं उससे ज्यादा न खराब हों। इन किताबों में कुछ मित्रों द्वारा भेंट की हुई किताबें भी थीं। उनकी खुद की लिखी हुई। कुछ तो इतनी जर्जर हो गईं थीं कि उनको जलाना पड़ा। अफसोस और सुकून दोनों एक साथ हुए। अफसोस किताब जलने का, सुकून उनसे मुक्त होने का।
इतना लिखने के बाद सोच रहे हैं कि सपने में स्कूटर पर लिफ्ट देने वाले को धन्यवाद बोलना भूल ही गए थे, चाय के लिए मना करने पर उसकी घरैतिन को कैसा लगा होगा, दीमक के बारे में लिखने से वो बुरा तो नहीं मानेंगी।
पोस्ट के साथ दीमक़ खाई किताबों की फोटो लगाने के लिए फोटो खींचा था लेकिन लगाया नहीं। यह सोचकर कि दीमक़ बिना कपड़े पहने किताब पर सन बाथ टाइप ले रही है, उसकी फोटो लेकर फेसबुक पर पोस्ट करना उनकी निजता का उल्लंघन होगा।
अलबत्ता जूतों के फ़ोटो लगा रहे हैं । यह भी सोच रहे हैं कि सपने में कौन से जूते पहनकर गये थे। आप कुछ अंदाज़ा लगाकर बताएँ।

https://www.facebook.com/share/p/P7Czv3xqGQdzLeLL/

Tuesday, October 31, 2023

रागिनी टाइम्स से बातचीत

 यू ट्यूब चैनल रागिनी टाइम्स के माध्यम से Ragini शाहजहाँपुर और आसपास की खबरों की जानकारी देती रहती हैं।रागिनी शाहजहाँपुर की अकेली रजिस्टर्ड महिला पत्रकार हैं। पिछले दिनों मुलाक़ात हुई तो रागिनी ने पत्रकारिता जीवन के अनुभव और संघर्ष के बारे में जानकारी दी। एयरहोस्टेस बनने के सपने के साथ जीवन शुरू करने वाली रागिनी का सपना है कि वो कुछ ऐसा कर जाएँ की लोग उनको याद करें। “किसके जैसा बनना चाहती हैं?” के जबाब में रागिनी ने जो बताया उससे कानपुर के भगवती चरण दीक्षित ‘घोड़ेवाला’ की बात याद आ गई:

चलो न मिटते पदचिह्नो पर,
अपने रस्ते आप बनाओ।
बहरहाल आप सुने बातचीत और बताएँ कैसा लगा बिना किसी तैयारी के लिया गया रागिनी का इंटरव्यू? ठीक लगे तो रागिनी टाइम्स को सब्सक्राइब भी करें। रागिनी को शुभकामनाएँ।

https://www.facebook.com/share/p/1NM6SVuarE2ABqGq/

Monday, October 30, 2023

व्यवहार में निष्कपटता सौन्दर्य का लक्षण है- श्रीलाल शुक्ल

 


{श्रीलाल शुक्ल जी से प्रख्यात एवं सााहित्यिक पत्रिका तद्भव के संपादक अखिलेश से हुई चीत। यह बातचीत तद्भव के प्रवेशांक के मौके पर हुई थी। तद्भव का पहला अंक श्रीलाल शुक्ल जी पर केन्द्रित था। इस इंटरव्यू में श्रीलाल जी ने अपने उपन्यास रागदरबारी, लेखन प्रक्रिया , निजी जिन्दगी और पसंद-नापसन्द से से जुड़े अनेक सवालों का जबाब दिया था}
सवाल-बचपन का गांव किस तरह याद करते हैं?
जबाब- जसके दो पक्ष हैं। जमींदारी वाले दिनों की व्यवस्था में जकड़ा हुआ गांव जिसमें अलग-अलग जातियों की अपनी-अपनी परम्परायें
,अपने तौर तरीके थे। किसी भी तरह की वर्ग चेतना नहीं थी। हर आदमी की अपनी हैसियत मुकर्रर थी। गंदी गलियां,बच्चे रास्ते आदि थे और एक भी पक्का मकान नहीं था। दूसरा पक्ष परिवेश और प्रकृति का था। गांव के तीन ओर खेत और विस्तीर्ण जंगल थे। चौथी ओर लखनऊ जाने वाली सड़क थी और घनी अमराइयों का सिलसिला था। आज जब उस गांव के बारे में सोचता हूं तो वह एक ओर कई अद्भुत व्यक्तित्वों और दूसरी तरफ अपनी प्राकृतिक मोहकता के कारण याद आता है।
सवाल-उस गांव में आप बड़े हो रहे थे। घर परिवार,साहित्यिक वातावरण कैसा था?
जबाब- गांव में मेरे वंश के कई परिवार थे जिनमें दो सम्पन्न थे,बाकी बहुत गरीब थे। मेरा परिवार गरीबों कापरिवार था पर पिछली दो-तीन पीढ़ियों से पढन-पाठन की परम्परा थी। बचपन से लेकर १९४८ तक जब मुझे विपन्नता के कारण एम.ए. और कानून की पढ़ाई छोड़नी पड़ी गरीबी तथा साहित्य के प्रति अदम्य आग्रह, इम तत्वों के द्वारा मेरे व्यक्तित्व का संस्कार
होता गया।
सवाल-आपने अपने परिवार में दो तीन पीढ़ियों से पठन पाठन की परम्पराकी बात कही है, उसके बारे में कुछ अधिक बतायें।
जबाब- मेरे बाबा अध्यापक थे और उर्दू फारसी की सामान्य जानकारी के साथ संस्कृत के बहुत अच्छे पंडित थे। उनके द्वारा रचित कुछ श्लोक भी उपलब्ध हैं। मेरे पिता बहुत छोटे किसान थे; उन्होंने स्कूली शिक्षा नहीं पायी थी पर हिंदी ,उर्दू ,संस्कृत का उन्हें सामान्य ज्ञान था। पिता के चचेरे भाई चंद्रमौलि शुकुल १९०७ के ग्रेजुएट थे और बी.ए. की परीक्षा में उन्होंने सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। अपने समय के वे अच्छे लेखक और शिक्षाशास्त्री थे। इस वातावरण के कारण मुझे १०-११ वर्ष की अवस्था से ही हिन्दी की तत्कालीन सभी पत्र-पत्रिकायें और पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिलने लगा था;उसी के साथ साहित्यिक रचना का प्रोत्साहन भी।
सवाल-उक्त प्रोत्साहन से क्या-क्या लिखा?
जबाब- बहुत अच्छा है कि उन दिनों की लिखी हुई चीजें अब उपलब्ध नहीं हैं। पर ग्यारह वर्ष की अवस्था से लेकर उन्नीस वर्ष तक मैंने उन दिनों के फैशन के अनुकूल न जाने कितनी कवितायें लिखीं,कहानियां लिखीं और उपन्यास भी लिखे,कुछ आलोचनात्मक निबंध भी। इनमें से कुछ की प्रशंसा भी हुई और कुछ कवितायें छपीं भी। इनमें से दो-तीन कहानियां मेरे संग्रह 'यह घर मेरा नहीं है' में देखी जा सकती हैं जैसे 'अपनी पहचान',और 'सर का दर्द'। पर बी.ए. तक आते-आते मेरा रचनात्मक उफान खत्म हो गया था और मैं अपनी शिक्षा तथा जीवन यापन की समस्याओं में धंस गया था।
सवाल-लेखन में वापसी कब और कैसे संभव हुई?
जबाब- लिखने से विरत हो जाने के दिनों में भी मैं आधुनिक हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य बराबर पढ़ता रहता था। उ.प्र. प्रशासनिक सेवा में मेरे आ जाने के बाद १९५३-५४ में हमीरपुर जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में रहते हुये वहां के अपेक्षाकृत शांत जीवन में मुझे पुन: लिखने की प्रेरणा मिली। एक रेडियो नाटक की रूमानियत और अवास्तविकता से भरी हुई प्रवृत्ति के खिलाफ प्रतिक्रिया दिखाते हुये मैंने 'स्वर्णग्राम और वर्षा' नाम की एक घोर यथार्थपरक व्यंग्यपूर्ण रचना लिखी। इसे धर्मवीर भारती ने निकष-१ में स्थान दिया। मुझे सुखद विस्मय हुआ कि निकष-१ पर आने वाली पाठकों की चिट्ठियों में मेरी इस रचना का उत्साह से स्वागत हुआ और कई पत्र पत्रिकाओं के सम्पादकों ने भारती से मेरे बारे में पूछताछ की। उसके बाद भारती ,विजयदेवनारायण साही और केशव चंद्र वर्मा जैसे मित्रों के प्रोत्साहन से मैंने नियमित लेखन शुरु कर दिया। वास्तव में मेरा उपन्यास 'सूनी घाटी का सूरज' इन्हीं मित्रों को समर्पित है।
सवाल-आपके ये मित्र साहित्य की यथार्थवादी परम्परा के लेखन के घोर विरोधी संगठन 'परिमल' के आधार स्तम्भ थे। आपका परिमल से क्या नाता बना?
जबाब- लेखक के रूप में जब मैं उभरा तब तक इलाहाबाद में परिमल की धार खत्म हो चुकी थी और उसके सदस्य अलग-अलग ढंग से अलग-अलग स्थानों पर जाकर लिखने लगे थे।
सवाल-लेकिन परिमल के बारे में आपका अपना दृष्टिकोण क्या रहा?
जबाब- विजय देव नारायण साही,भारती,सर्वेश्वर,केशवचंद्र वर्मा से मेरी घनिष्ठ मैत्री थी। ये सब परिमल के सक्रिय सदस्य थे लेकिन परिमल ने मुझे कभी आकृष्ट नहीं किया।
सवाल -आपके रागदरबारी के पूर्व के दो उपन्यासों में ग्रामीण जीवन के दुखों,संघर्षों,मुसीबतों के प्रति आपका रवैया सहानुभूतिपूर्ण दिखता है। उसे मैं पक्षधरता भी कहना चाहूंगा लेकिन तमाम लोगों का कहना है कि राग दरबारी में गांव के प्रति आपका दृष्टिकोण उपहासपूर्ण है।
जबाब- उपहासपूर्ण दृष्टि मैंने नहीं डाली है। ग्रामीण जीवन में जो प्रवत्तियां थीं मैंने उन्हें लिखा । गांव में आदमी भांग घोटता है,नंगे बदन रहता है,विपन्न है तब भी वह ठिठोली करता है,हंसता है,बातें करता है,एक जीवंत वातावरण सृजित करता है...
सवाल -राग दरबारी में ग्रामीण समाज की संकट में भी हंसते रहने की दुर्घर्ष क्षमता का चित्रण है कि या समाज में व्याप्त पतनशीलता का चित्रण है?
जबाब- दोनों है।
सवाल-लेकिन कभी-कभी ऐसा हुआ कि जिसे सहानुभूति मिलनी चाहिये वह आपके निशाने पर है,जैसे लंगड़।
जबाब- राग दरबारी में अनेक छोटे-छोटे चरित्र हैं जिनकी उपहास्पदता को लेकर मैंने सम्पूर्ण वातावरण का निर्माण किया है,मगर अंतत: वे तंत्र के ऊपर किये गये मेरे आघात को अधिक तीव्र बनाते हैं। लंगड़ को ही लें, उसका चरित्र उपहास्पदता ज्यादा प्रकट करता है या सत्ता तंत्र के अन्याय को?
सवाल-क्या ऐसा नहीं सम्भव हो सकता था कि लंगड़ को बख्स देते और सिर्फ सत्ता तंत्र को ही निशाने पर रखते?
जबाब- लंगड़ को बख्शने न बख्शने का क्या सवाल है? वह जैसा है मैंने वैसा ही चित्रित किया है। उस पर मैंने कोई वैल्यू जजमेण्ट नहीं दिया है।
सवाल-रागदरबारी व्यंग्य का महाविस्तार है लेकिन कुछ आलोचकों का कहना है कि रागदरबारी का जो व्यंग्य है वह कथा के बाहर की टिप्पणियों में है न कि स्थितियों में।
जबाब- वे मानकर चलते हैं कि व्यंग्य को स्थितियों में ही अंतर्निहित होना चाहिये। अपनी उसी मान्यता पर वे राग दरबारी को कसते हैं। जबकि मैं दूसरी तरह की लेखन शैली अपने लिये चुनता हूं। और यह तो मानना पड़ेगा कि कोई लेखक अपनी विषयवस्तु के अनुरूप शैली चुनने के लिये स्वतंत्र है। अगर यथार्थ के उद्‌धाटन में मेरी शैली आलोचकों के ढांचे से अलग चली जाती है तो यह मेरा दोष नहीं है, उनके बनाये पूर्व निर्धारित ढांचे की अपर्याप्तता है।
सवाल- राग दरबारी में जो भाषा है ,वह आपके यहां पहले नहीं थी,बल्कि समूचे हिंदी लेखन में वह सम्भव न थी। वह भाषा एक विस्फोट थी। कैसे वह भाषा आविष्कृत हुई?
जबाब- एक तरफ अवधी है और दूसरी तरफ आपने गौर किया होगा ,अंग्रेजी के मुहावरे आते हैं। अंग्रेजी का मुहावरा जहां मैंने इस्तेमाल किया है ,वह अनुवाद कर के नहीं ,उसकी प्रकृति को हिंदी में आत्मसात करने की कोशिश की है। हां ज्यादा मूलभूत रूप से अवधी है जिसको इस्तेमाल किया है खड़ी बोली के क्रियापदों और व्याकरण के अंतर्गत।
सवाल- राग दरबारी में बेला को छोड़ कर स्त्री पात्र नहीं हैं। और बेला की भी कोई खास अहमियत नहीं है।
जबाब- दरअसल भारतीय ग्राम पुरुष प्रधान है। वहां स्त्री आनुषांगिक अस्तित्व मात्र है। मगर राग दरबारी में स्त्री चरित्रों के न होने के पीछे अनिवार्यत: यह कारण नहीं है। राग दरबारी का जो तंत्र है, कथा का सूत्र है, उसमें स्त्री चरित्रों की गुंजाइस नहीं बनती।
सवाल- राग दरबारी छपने से पूर्व आपको यह उम्मीद थी कि यह इतनी महत्व पूर्ण कृति सिद्ध होगी?
जबाब- मेरे दिमाग में यह बात स्पष्ट थी कि कुछ हो न हो ,भौतिक तथ्य तो यह था ही कि परिहास की मुद्रा में ४५० पृष्ठों का हिन्दी का तो क्या, मैं समझता हूं कि समस्त भारतीय भाषाओं का यह पहला उपन्यास है। जब एक नितांत भिन्न प्रकार का प्रयोग किया जायेगा तो तो कहीं न कहीं खामियां भी होंगी;यही हुआ। तब भी और आज भी मेरे भीतर स्पष्ट है कि अच्छी रचना दोषरहित हो यह आवश्यक नहीं। बहरहाल... राग दरबारी लिख लेने के बाद यह तो मुझे मालूम था कि इसमें खामियां भी हैं लेकिन इसकी अन्य विशेषताओं के कारण मैं अवश्य आशा करता था कि इसका कोई विशेष प्रभाव होना चाहिये।
सवाल- उपन्यास को आप कितनी बार लिखते हैं?
जबाब- कम से कमतीन बार तो लिखना ही पढ़ता है।
सवाल- सबसे अधिक ड्राफ्ट किस उपन्यास के हुए?
जबाब- मैं समझता हूं कि राग दरबारी भी तीन चार बार लिखा गया था।विस्रामपुर का संत बहुत बार लिखना पड़ा।
सवाल- कौन सी चीजें आपको एक ही कृति को पुन: लिखने को विवश करती हैं?
जबाब- दो चीजें । एक तो उपन्यास लिखने में जो उपकथायें होती हैं उन्हें मैं पहले से पूरी तरह सोचता नहीं हूं, उनका आविष्कार लिखते समय ही होता है। बाद में पहले की घटनाओं का भी रूप बदलना पड़ता है और कभी- कभी वे घटनायें खारिज कर दी जाती हैं। दूसरी चीज ,जहां मुझको भाषागत कृत्रिमता नजर आती है या पता चला कि भावना का आवेग उसमें ज्यादा है या अनावश्यक विशेषणों की भरमार हो रही है तो उनको काटता छांटता हूं। कोशिश करता हूं कि वह देखने में, पढ़ने में बहुत ही साधारण मालूम दे,हां ध्वनि उसकी असाधारण मालूम हो।
सवाल- जैसा आपने कहा है कि कहानी को आप दोयम दर्जे की विधा मानते हैं उपन्यास की तुलना में ,फिर भी आपने कहानियां लिखीं?
जबाब- मेरे कहने का अर्थ यह नहीं कि मुझे कहानियों से परहेज है या उसके प्रति मेरे मन में कोई आकर्षण नहीं । दूसरे यह भी था कि हिन्दी में पांचवे या छठे दशक में कहानियों के बहुत से आंदोलन चले,उनको लेकर जो घालमेल था उससे मुझे लगता था कि इस समय कहानियां लिखना केवल कहानियां लिखना नहीं है। उसे लिखने का अर्थ है किसी आंदोलन में शामिल होना, जो स्वभाववश मेरे लिये बहुत पसंदीदा स्थिति नहीं थी।
सवाल- व्यंग्य आपकी रचना का मूल स्वर रहा है पर कहानियों में व्यंग्य की आजमाइश कम है?
जबाब- बहुत सी कहानियां आपको ऐसी मिलेंगी जिसमें व्यंग्य का स्वर परिस्थिति में अंतर्निहित हुआ है।मेरी आरम्भिक कहानियां'अपनी
पहचान' और बाद की 'दंगा','सुरक्षा','शिष्टाचार' आदि ऐसी कहानियां हैं।
सवाल- व्यंग्य को लेकर आपकी स्थापना है कि व्यंग्य विधा नहीं,एक शैली है ,इसे थोड़ा स्पष्ट करेंगे?
जबाब- भारतीय साहित्य की परम्परा में व्यंग्य अभिव्यक्ति की एक भंगिमा है। अमिधा,लक्षणा,व्यंजना में व्यंजना का प्रयोग करते समय आपका जो आधार रहता है वह व्यंग्य है। इस रूप में भारतीय साहित्य में व्यंग्य को कभी वैसी विधा नहीं माना गया जिस रूप में नाटक या कविता आदि थे। पाश्चात्य साहित्य में जरूर यह एक विधा के रूप में रहा मगर बीसवीं सदी तक आते-आते वहां भी यह एक विधा के रूप में समाप्तप्राय हो गया। हुआ यह कि व्यंग्य के सभी महत्वपूर्ण तत्व सामान्य लेखन में घुलमिल गये। कहानी में,कविता में ,उपन्यास में उन सभी विशेषताओं का समावेश सम्भव हो गया जो प्राचीन समय में व्यंग्य के उपासन माने जाते थे। लेकिन जब मैं यह कहता हूं तो इसका मंतव्य यह नहीं कि व्यंग्य नाम की चीज ही समाप्त हो गयी। आज भी व्यंगात्मक शैली में लिखी गयी कहानी या उपन्यास का रस दूसरा होगा,दूसरी शैली में लिखी गयी रचना का दूसरा।
सवाल- व्यंग्य के दो रूप माने जाते हैं,त्रासदीपूर्ण व्यंग्य और हास्य व्यंग्य,आपकी दृष्टि में कौन अधिक महत्वपूर्ण है?
जबाब- मैंने जिसे हाई कामेडी कहते हैं,उसी में ज्यादातर कृतियां लिखी हैं,कम से कम राग दरबारी का वही मूड है।
सवाल- एक बड़े लेखक के रूप में आप भारतीय समाज की मुख्य चुनौतियां क्या पाते हैं?
सवाल- बड़े लेखक की बात जाने दें ,व्यक्तिगत रूप से मेरी दृष्टि में सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक दिशाहीनता की है जिससे लगभग सभी पार्टियां ग्रस्त हैं। वे अपने चुनाव घोषणा पत्र भले ही अलग-अलग निकालें लेकिन किसी के घोषणापत्र में यह स्पष्ट नहीं होता कि उस पार्टी के विचार से समग्र रूप से समाज का क्या स्वरूप होना चाहिये। सभी पार्टियों के तात्कालिक लक्ष्य हैं । इसी का परिणाम है कि समाज के सर्वांगीण विकास की कोई दिशा नहीं दिखाई दे रही है।
सवाल- भारतीय लोकतंत्र का भविष्य?
जबाब- भारतवर्ष में अराजकता और अस्तव्यस्तता को शताब्दियों तक झेलने की असाधारण क्षमता रही है। इसी आधार पर आप कह सकते हैं कि भारतीय लोकतंत्र का भविष्य वही है जो उसका वर्तमान है।
सवाल- आपके लिये सुख का क्या अर्थ है?
जबाब- मेरा एक लेख है 'जीवन का एक सुखी दिन'। उसमें मैंने सब निषेधात्मक पक्षों को लिया है कि आज यह नहीं हुआ आज वह नहीं हुआ। आधुनिक जीवन के जितने भी खिझाने वाले पक्ष हैं , उनकी सूची दे दी है कि यह नहीं तो दिन अच्छा बीता । लेकिन सुख का पाजिटिव पक्ष होता है वह बहुत आध्यात्मिक विषय है। सच्चाई यह है कि इस प्रश्न के मेरे दिमाग में कई उत्तर हैं जिनका एक बातचीत में विश्लेषण करना मेरे लिये मुश्किल होगा। अब एक पहलू तो यही है कि नितांत अभाव ,कमियों के होते हुये भी एक दार्शनिक स्तर पर सुख की कल्पना की जा सकती है। जैसे जिस समय महात्मा गांधी लम्बे-लम्बे अनशन कर रहे थे ,भूखे प्यासे थे तो क्या कहा जाये कि वे बहुत दुखी थे? या सुखी ? हां,सहज ढंग से कहा जा सकता है कि कि सुख यह है कि कोई आकांक्षा न हो जो आपको कचोटती हो, ऐसा कोई तात्कालिक अभाव न हो जिससे आपके ऊपर दबाव पड़ रहा हो,मनुष्य या प्रकृति द्वारा सृजित ऐसा कोई कारण न हो जो आपको शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट दे रहा है।
यहां भी आप देख रहे हैं कि कोई पाजिटिव बात नहीं ,निषेधात्मक चीजें ही हैं। इसी रूप में मैं भौतिक सुख की कल्पना करता हूं।
सवाल- पाजिटिव चीजें मसलन संगीत,अच्छा संग,प्रकृति आदि...
जबाब- एक समय था जब ये सब चीजें मुझे उत्साहित करती थीं,मगर धीरे-धीरे शायद इस समय मेरी प्रवृति बदल रही है। मुझे लगता है कि शायद इन सबके बिना भी एक ऐसे मनोलोक की सृष्टि की जा सकती है जिसमें संतोष ,आत्मिक शांति यानी सुख का अनुभव हो सकता है। हो सकता है कि यह अवस्था के कारण हो...
सवाल- जिस तरह की दृष्टि की बात आप कर रहे हैं उसकी रचना में बाह्य जगत के उपादान हैं या वह पूरी तरह आत्यंतिक और निरपेक्ष सृष्टि है?
चारो ओर जो हताशा का वातावरण बन रहा है
जबाब- राजनीतिक,सामाजिक,आर्थिक परिदृश्य पर ,उसके भीतर रहते हुये आपको कुछ न कुछ ऐसी युक्तियां खोजनी पड़ेंगी जिनसे आप संतोष और सार्थकता का अनुभव कर सकें, अन्यथा आप खीझ की स्थिति में रहेंगे। इनसे बचने के लिये संगीत,विविध कलायें,अच्छे मित्रों का साथ, ये स्थूल आधार मदद करते हैं। मगर कुछ समय बाद ये अपना जादू खोने लगते हैं। तब आपको अपने भीतर ,कह लीजिये कि आध्यात्मिक स्तर पर कोई खोज करनी पड़ेगी। में आध्यात्मिक शब्द का प्रयोग कर रहा हूं,किसी धार्मिक अनुष्ठान की बात नहीं कर रहा हूं।
सवाल- एक समय तो ऐसा था ही जब आपको संगीत से गहरा लगाव था। मेरे ख्याल से वैसा उत्साह भले न हो लेकिन लगाव अभी भी है,आपको किस तरह का संगीत पसंद है?
जबाब- संगीत अगर अच्छा हो तो सब तरह का पसंद है मगर मुख्यत: शाष्त्रीय संगीत ,ख्याल की गायकी ज्यादा आकर्षित करती है।
सवाल- कोई ऐसी ध्वनि ,संगीत से इतर कोई ध्वनि जो आपको आकर्षित करती है?
जबाब- कुछ ध्वनियां तो मुझे बहुत आकर्षित करती हैं। जैसे रात को और अलस्सुबह खिड़की के बाहर बारिश की आवाज। इसी प्रकार खास तौर पर जाड़े में,हल्की हवा की आवाज मेरे लिये अत्यंत उत्तेजक है।
सवाल- पसंदीदा रंग कौन सा है?
जबाब- फूलों को छोड़कर चटक रंग मुझे पसन्द नहीं । मेरे पास शायद ही कोई कमीज ,कुर्ता या ऐसी शर्ट होगी जो गाढ़े रंग की हो। हल्का भूरा,हल्का नीला,स्लेटी,सफेद कुछ इस प्रकार के रंग मुझे ज्यादा आकर्षित करते हैं।
सवाल- आपके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति क्या है और सबसे बड़ा दुर्गुण क्या है?
जबाब- दुर्गुण मैं बड़ी आसानी से बता सकता हूं। वह यह है कि मैं किसी भी विषय के ऊपर एकाग्र होकर लम्बे समय तक काम नहीं कर पाता हूं। शक्ति अगर है तो वह है कि मैकेनिकल और तकनीकी चीजों को छोड़कर नयी चीजों ,नये व्यक्तियों,नये विचारों के प्रति मुझमें तीव्र जिज्ञासा रहती है। इन सबको जानने ,समझने या कहूं किसी मानवीय अनुभव के लिये मेरा दिमाग ज्यादा खोजपूर्ण है।
सवाल- ऐसी कोई चीज जिससे आप मुक्त होना चाहें?
जबाब- पान तम्बाकू की लत थी लगभग तेरह वर्ष पहले छोड़ दी। रहा सुरापान ,मैं चाहता हूं उससे भी पूरी तौर पर मुक्त हो जाऊं। लम्बे-लम्बे समय तक उससे मुक्त भी रहा। मैं सुरापान को अपने व्यक्तित्व की समग्रता में असंगत पाता रहा हूं । इसी से आगे के लिये आशान्वित हूं।
सवाल- खाने में क्या पसंद है?
जबाब- खाने में कोई विशेष रुचियां नहीं हैं।मैं शाकाहारी हूं । दूसरी संस्कृतियों के भोजन एग्जाटिक फूड में मेरी विशेष दिलचस्पी नहीं है। शाकाहारी भोजन जो भी ठीक ढंग से बना हुआ हो , वही अच्छा लगता है। मिर्च मशाले ज्यादा पसंद नहीं ,पर 'ब्लैंड' चीजें भी उतनी ही कम पसंद हैं।
सवाल- दोस्त कैसे अच्छे लगते हैं?
जबाब- पारस्परिक निष्ठा और निश्छलता तो होनी ही चाहिये। इसके अलावा जिन विषयों में मेरी रुचियां हैं ,साहित्य,संगीत,इतिहास,नाटक,सिनेमा आदि में जिनसे इन विषयों पर संवाद बन सके। इसके अतिरिक्त लेखक कलाकार
तो आते ही हैं मुकाबले दूसरे व्यवसाय के लोगों के । साथ ही वंश के लोगों से, रिश्तेदारों से भी मेरे बराबर मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहे हैं।उनके साथ बैठकर अवधी में गांव घर की बातें करने का अटूट आकर्षण है। इसके अवसर भी बराबर मुझे मिलते रहते हैं।
सवाल- कैसी स्त्रियां आपको सुंदर लगती हैं?
जबाब- आपका यह प्रश्न सुनकर मेरे दिमाग में कई चेहरे कौंधे और लगता है कि चेहरे का कोई ऐसा माडल नहीं है जो सभी में समान रूप से मौजूद हो। फिर भी जो रूप की सुंदरता है वह कुछ हद तक तो होनी ही चाहिये। घरेलूपन की कद्र करता हूं पर मात्र घरेलूपन उबाऊ चीज है। जीवन की विराट सम्भावनाओं से से कुछ खींचने की जिसमें रुचि हो,चाहे वह साहित्य संगीत कला का क्षेत्र हो या किसी व्यवसायिक विशिष्टता का वही मुझे ज्यादा आकर्षित कर सकती है। अत्यंत बहिर्मुखी प्रवृत्ति न तो मुझे पुरुष मित्रों में अच्छी लगती है , न नारी मित्रों में ही। और कहने की शायद जरूरत नहीं कि व्यवहार में निष्कपटता भी सौन्दर्य का लक्षण है।
सवाल- इन गुणों की कसौटी पर किसे खरा पाया आपने?
जबाब- इसे दिखावा न समझें तो मैं अपनी दिवंगता पत्नी का जिक्र कर सकता हूं। इसके अलावा ,मेरा सौभाग्य रहा कि पुरुष मित्रों की तरह इस कोटि की नारी मित्रों को लेकर भी मैं सर्वथा विपन्न नहीं हूं। पर उनका नाम न लेना ही बेहतर होगा क्योंकि उसके बाद हो सकता है आपके प्रश्न साक्षात्कार को छोड़कर जिरह के दायरे में पहुंच जायें।
सवाल- लेखक का विचारधारा से क्या रिश्ता होता है?
जबाब- लेखक अपने सामान्य जीवन व्यापारों में किसी भी विचारधारा से प्रतिबद्ध रहे,यह उसका हक है। पर रचनाकार की हैसियत से लेखक की प्रतिबद्धता उसको राह खोजने की ,चुनौतियों से जूझने की ,भटकने की कठिनाइयों से बचा लेती है। यदि लेखक वास्तव में अत्यधिक संवेदनशील और प्रतिभाशाली न हुआ तो वह इसके रूढ़िग्रस्त इकहरेपन में फंसने का खतरा भी पैदा कर सकती है।
सवाल- आपकी विचारधारा क्या है?
जबाब- जिसे आप दक्षिणपंथ कहते हैं ,उससे मैं बहुत दूर हूं। मैं भारतीय परिस्थितियों में रचनाकर्म की पहली शर्त उसकी समाज धर्मिता को मानता हूं और इस सिद्धांत को कि रचनाकार की मूल प्रतिबद्धता केवल अपनी रचना के प्रति होती है एक अस्पष्ट और वायवीय वक्तव्य मानता हूं। लेकिन पिछले कई दशको में राजनीतिक उठापटक के दौरान साहित्य में प्रगतिशील विचारधारा की जो गति बनी है और उसे अपने बचाव के लिये जितने मैकेनिज्म खोजने पड़ रहे हैं,उससे मैं बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं हो पा रहा हूं। संक्षेप में ,भले राजनीति की भाषा में इस रुख को संदिग्ध माना जाये,मैं सड़क के बीच कुछ कदम पर बायीं ओर खड़ा हूं।
सवाल- आज आप मुड़कर अपने अब तक के लेखन को देखते हैं तो कैसा लगता है?
जबाब- शायद प्रत्येक लेखक का यह अनुभव हो ,मुझे य ही लगता है कि अब तक जितना हुआ तटवर्ती लेखन भर है, अभी धारा के बीच जा कर लहरों से मुकाबला करना बाकी है।

https://www.facebook.com/share/p/1DYzrwp5nG/