Tuesday, May 16, 2023

नौकर की क़मीज़

 *घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है।

*शेर से ज्यादा वह मालिक से डरता था।
*हैसियत के अनुसार नियत डोलने की सीमा निर्धारित होती है।
*हम लोगों की सारी तकलीफ उन लोगों की होशियारी और चालाकी के कारण थीं जो बहुत मजे में थे और जिनसे हमारा परिचय नहीं था। इस सबके बीच जिंदगी का मकसद ढूंढना मुश्किल काम नहीं था।
*भीख मांगने वाले और रईस कोई काम नहीं करते।
*ऐसी अक्लमंदी किस काम की कि हर आने वाला दुख पहले से बड़ा होता चला जाए और बीते दुख का संतोष हो कि बड़ा नहीं था।
*जिंदा रहना और दुख सहना दोनों की शक्ल इतनी मिलती- जुलती थी , जैसे जुड़वा हों।
*यदि एकबारगी कोई गर्दन काटने के लिए आए तो जान बचाने के लिए जी-जान से लड़ाई होती। इसलिये एकदम से गर्दन काटने कोई नहीं आता। पीढ़ियों से गर्दन धीरे-धीरे कटती है। इसलिए खास तकलीफ नहीं होती और गरीबी पैदाइशी रहती है।
*मेरा वेतन एक कटघरा था, जिसे तोड़ना मेरे बस में नहीं था। यह कटघरा मुझमें कमीज की तरह फिट था। और मैं अपनी पूरी ताकत से कमजोर होने की हद तक अपना वेतन पा रहा था।
*आदमी के विचार तेजी से बदल रहे थे। लेकिन उतनी ही तेजी से रद्दीपन इकट्ठा हो रहा था। रद्दीपन देर तक ताजा रहेगा, अच्छाई तुरंत सड़ जाती थी।
*जिंदगी जितनी खराब लगती है, उतनी खराब नहीं है।
- विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ' नौकर की कमीज' से

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