Tuesday, December 31, 2024

नई किताबें

 





















वर्ष 2024 में मेरी दो किताबें आईं। दोनों स्व प्रकाशन (self publication) के तहत। किताबों के विवरण इस प्रकार हैं:
1. बेवक़ूफ़ी का सफ़र: इस किताब में 2010 से लेकर 2024 तक की अंतर्देशीय रेल यात्राओं और हवाई यात्राओं के वृत्तांत हैं। किताब ई बुक प्रिंट माध्यम में उपलब्ध हैं। प्रिंट वाली किताब अमेजन और फ़्लिपकार्ट पर उपलब्ध है। ई बुक पोथी, नाट नल में उपलब्ध है। विदेश में रहने वाले साथी किंडल पर पढ़ सकते हैं।
2. पुलिया पर ज़िंदगी: आमलोगों की ज़िंदगी का रोजनामचा। किताब जबलपुर की वाहननिर्माणी के पास स्थित पुलिया पर बैठने वाले लोगों से मुलाक़ात, बातचीत के विवरण का संकलन है। फ़ोटो सहित। यह किताब 2014 में प्रकाशित किताब 'पुलिया पर दुनिया' के आगे की कड़ी है। किताब ई बुक प्रिंट माध्यम में उपलब्ध हैं। प्रिंट वाली किताब अमेजन और फ़्लिपकार्ट पर उपलब्ध है। ई बुक पोथी, नाट नल में उपलब्ध है। विदेश में रहने वाले साथी किंडल पर पढ़ सकते हैं।
दोनों किताबों को प्राप्त करने के लिंक नीचे दिये गए हैं।
किसी मित्र को अपनी किताब यदि स्व प्रकाशन के माध्यम से करना हो तो निस्संकोच मुझसे सम्पर्क कर सकता है।

'पुलिया पर ज़िंदगी' ई बुक का लिंक : https://store.pothi.com/book/ebook-अनूप-शुक्ल-पुलिया-पर-ज़िंदगी

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Monday, December 30, 2024

'सुट्टा-सवारियों' के लिए इंतज़ाम

 



दो हफ़्ते पहले रहीमदास जी का मक़बरा देखकर लौटते हुए टैक्सी से आए (रपट का लिंक टिप्पणी में)टैक्सी मतलब कैब। गाड़ी में बैठते ही बग़ल के 'गाड़ी-आले' में माचिस की डिब्बी दिखी। माचिस की डब्बी पर ‘ब्लू बार्ड’ का स्टिकर। ‘ब्लू बर्ड’ मतलब नीली चिड़िया।
लगा गाड़ी वाले ने 'सुट्टा-सवारियों' के लिए इंतज़ाम रखा है।
पूछने पर बताया गाड़ी वाले ने,' एक मैडम सिगरेट पीती हैं। उनके लिए ही माचिस रखी है।'
हमने थोड़ी उत्सुकता दिखाई तो गाड़ी वाले ने बताया, 'मैडम सुबह हमारी ही गाड़ी से आफिस जाती हैं। घर के पास ही रहती हैं। रोज सुबह की पहली सवारी मैडम ही होती हैं। किसी आफिस में बड़ी पोस्ट पर हैं। ख़ास सिगरेट पीती हैं। बताती हैं क़ि उसको सबलोग नहीं बेच सकते। लाइसेंस चाहिए उसको बेंचने के लिए।'
मैडम के बारे में और भी कई जानकारी बिना पूछे दनादन साझा की गाड़ी वाले ने। बताया कि मैडम सुबह जाती हैं आफिस, उनके हसबैंड शाम को जाते हैं। जब मैडम वापस आती हैं, साहब के आने का समय हो जाता है। सप्ताहांत में ही साथ हो पाते होंगे।
और भी तमाम बातें हुईं इधर-उधर की। उनमें से ज़्यादातर बिसरा गयीं। पता नहीं वे कैब की दीवारों, शीशों , सीटों ने भी सुनी होंगी या नहीं। कुछ खिड़की के रास्ते बाहर हो गयीं होंगी शायद। क्या किसी तकनीक से उन सब बातों को फिर से सुना जा सकता है?
क्या प्रकृति का अपना कोई रिकार्डर होता है?

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समीर लाल एवं देबाशीष की बातचीत

 पाँच दिन पहले समीर लाल जी (Udan Tashtari) और देबाशीश (Debashish Chakrabarty) की बातचीत की कड़ी मिली थी। दोनों अपन के ब्लागिंग के शुरुआती दिनों के साथी हैं। देबाशीश से 20 साल और समीरलाल जी 18 साल से ब्लागिंग का साथ रहा। देबाशीश ने ब्लागिंग के शुरुआती दिनों में तमाम परियोजनाएँ शुरू की और हिंदी ब्लागिंग को जमाने का काम किया। निरंतर आनलाइन पत्रिका कई स्मरणीय अंक निकाले। पाडभारती से प्रसारण का काम किया। जो भी काम किया,पूरे मन से, पूरे जुनून से काम किया।

समीरलाल जी का आना धमाके की तरह रहा। आए और छा गए। समीर लाल ब्लॉगिंग के सबसे लोकप्रिय ब्लॉगर रहे हैं। अब नेटवर्किंग, मेंटरिंग में नाम कमा रहे हैं। किताबें बेस्टसेलर हो रही हैं। कनाडा की राजनीति में आगे बढ़ रहे हैं। यह सब देखना सुखद है। बहुत अच्छा लगा इस बातचीत को सुनकर।
देबाशीष इसे जारी रखें। बातचीत का शीर्षक है - नेटवर्किंग आपके करियर की लाइफ़ लाइन है। समीर भाई को उनकी किताब और तमाम उपलब्धियों की बधाई। शुभकामनाएँ ।

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Thursday, December 26, 2024

जयप्रकाश पांडेय जी को विनम्र श्रद्धांजलि

 पिछले दिनों Jai Prakash Pandey जी के अस्वस्थ होने की सूचना मिली थी। फिर पता चला कि डाक्टरों ने जवाब दे दिया है। इसके बाद उनके स्थिर होने की खबर मिली। इसके बाद उनके निधन का दुःखद समाचार। बहुत अफ़सोस।

जयप्रकाश जी से पहले भोपाल में मुलाक़ात हुई। इसके बाद 'व्यंग्य की जुगलबंदी' के दौरान बातचीत होती रही। वे 'व्यंग्य की जुगलबंदी' में नियमित रूप से सक्रिय रहे। परसाई जी ने अपने एक संस्मरण में उनके योगदान का ज़िक्र किया था। व्यंग्य के क्षेत्र में अपने लेखन, सम्पादन से नियमित योगदान देते रहे।
पिछले जून में जबलपुर यात्रा के समय जयप्रकाश ही उनके घर मुलाक़ात हुई थे। अस्वस्थ थे उन दिनों लेकिन ठीक हो रहे थे और पूर्ण स्वस्थ होने के प्रति आश्वस्त भी थे स्वयं पांडेय जी और उनके परिवार के लोग भी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
रिटायरमेंट के बाद जब उनका परिवार के साथ रहने और तसल्ली से जीवन जीने का समय था तब वे असमय विदा हो गए।
जयप्रकाश पांडेय जी के असमय निधन का बहुत अफ़सोस है। ईश्वर उनके परिवार और प्रियजनों को इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की ताक़त प्रदान करे।
विनम्र श्रद्धांजलि ।

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Wednesday, December 18, 2024

Gyandutt Pandey जी से मुलाक़ात


 Gyandutt Pandey जी से मुलाक़ात। उनके बनवाये मचान के दर्शन की रपट। इसके पहले कि मचान देखने का किराया लगने लगे , हमने इसे कल मुफ्त में देख लिया, भरपूर स्वादिष्ट नाश्ते के साथ।

♥️🙏




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https://gyandutt.com/2024/12/18/anup-shukla-came-to-machaan/

रहीम दास के मकबरे की सैर

दिल्ली वाक में शामिल लोग। फ़ोटो अनूप शुक्ल ने खींची इसीलिए दिख नहीं रहे यहाँ।


 बीते इतवार को 'दिल्ली टहल' (#walkedelhi) के सिलसिले में रहीमदास जी से मिलना हुआ। रहीमदास मतलब अब्दुलरहीम खानखाना। वाक 15 दिसम्बर को तय थी। संयोग से एक मांगलिक कार्यक्रम में सिलसिले में अपन उधर ही थे सो शामिल हो लिए।

'कोई काम मुफ्त में करना आर्थिक अपराध है।' के नारे की आड़ में लगभग डेढ़ साल में वाक के दाम 400 से 500 रुपए हो गए हैं। मतलब 25% की बढ़ोत्तरी। लेकिन किसी भी चैनल पर इस बात की चर्चा नहीं हुई। इससे पता चलता है (बक़ौल Alok Puranik ) कि देश का मीडिया किस कदर बिका हुआ है। आम जनता की उसे चिंता ही नहीं है।
बाद में पता चला कि इस बार बोलने वाले लोग बैटरी वाले माइक का प्रयोग कर रहे थे। उस खर्चे के पैसे भी ज़रूर इस बढ़ोत्तरी में शामिल होंगे। कुछ भी मुफ़्त नहीं होता न।
वाक सवा नौ बजे होनी थी। अपन क़रीब आधे घंटे पहले पहुँच गए। गेट पर मुस्तैद दरबान ने बताया -'कल एक प्रोफ़ेसर साहब आए थे। बता रहे थे वाक होगी।' इसके बाद उसने सामने धूप में मौजूद एकमात्र कुर्सी पर धूप सेंकते बच्चे को हमारे लिए कुर्सी छोड़ देने को कहा। बच्चे ने फ़ौरन कुर्सी छोड़ भी दी। इससे लगा कि प्रोफ़ेसर आलोक पुराणिक साहब का इक़बाल कितना बुलंद है दिल्ली में।उनके नाम पर लोग कुर्सी धूप जाड़े की धूप में रखी कुर्सी तक छोड़ देते हैं।
अगले ने कुर्सी छोड़ भले दी लेकिन अपन खड़े-खड़े धूप सेंकते रहते। आम इंसान और एक राजनेता में यही फ़र्क़ होता है।
थोड़ी देर बाद वाक में शामिल होने वाले लोग आते गए। धूप में खड़े होते गए। आलोक पुराणिक जी गेट पर खड़े होकर अपने पास मौजूद लिस्ट में आ गए लोगों के नाम पर टिक लगाकर उनकी हाज़िरी टाइप लगाते रहे। दो-तीन लोग तबियत नासाज़ होने के चलते आ नहीं पाए। उनके नाम के आगे क्रास लगाया गया।
हम गेट पर आलोक पुराणिक जी के साथ लोगों को आते देख रहे थे। आलोक जी ने एक आगंतुक का स्वागत ,आइए, 'संजय जी' कहकर किया। अगला हमको देखते ही गले पड़ गया। इत्ती ज़ोर से गले मिला कि हमको लगा ज़रूर कोई मोदी जी का भक्त होगा जो उनके गले लगने वाले तरीक़े से प्रभावित होकर उनकी नक़ल कर रहा है।
लेकिन फिर पता चला कि हमारे गले लगाने वाला इंसान हमारा अज़ीज़ दोस्त संजय चाँदवानी Sanjay Chandwani है। कालेज के जमाने से ही हम लोग संजय चांदवानी का 'संजय' उड़ा चुके थे। केवल चाँदवानी बचा नाम में। उसको भी सिकोड़ के 'चंदू' कहते हैं अब हम लोग। वो चंदू यहाँ संजय जी के नाम से टहल रहा है।
चंदू ने आलोक पुराणिक जी की दिल्ली वाक में अक्सर आते रहते हैं। उसका कारण बताया,' सुकुल, तुम्हारी दिल्ली वाक वाली रिपोर्ट देखकर हमने छह महीने बाद इस वाक में आना शुरू किया। अब रेगुलर आते हैं। हमको लगा कि कहीं चंदू हमसे उन सब वाक का खर्चा न माँग ले कहते हुए ,'तुम्हारे कारण ही इतना वाक की। सबका खर्चा मुझे वापस करो।' लेकिन शुक्र रहीम दास जी का कि ऐसा कुछ नहीं हुआ।
दिल्ली वाक में 42 साल पुराने दोस्त से एकबार फिर अचानक मुलाक़ात होना अपने में एक ख़ुशनुमा अनुभव है। जब तक दिल्ली वाक शुरू हो तब तक हम लोग फटाफट अपनी यादों की गलियों में टहल लिए। पिछली तमाम सूचनाएँ अपडेट कर लीं।
सबके इकट्ठे हो जाने पर वाक में आए लोगों का परिचय हुआ। आलोक पुराणिक जी ने लोगों का स्वागत करते हुए सबकी इस बात के लिए तारीफ़ की लोगों ने रज़ाई के ऊपर रहीम दास जी को प्राथमिकता दी और वाक के लिए आए।
सभी के परिचय के बाद अपन लोग मक़बरे में दाखिल हुए। रहीम दास जी का परिचय बताने वाले शिलापट्ट से टिकी एक झाड़ू यह संकेत दे रही थी कि यहाँ दिमाग़ के जाले साफ़ किए जाते हैं। झाड़ू का दूसरा संकेत आम आदमी पार्टी के प्रचार से भी लगाया जा सकता था। इस तरह एक ही झाड़ू अपनी उपस्थिति दिल्ली-वाक में श्लेष अलंकार की पुष्टि हो रही थी।
रहीमदास मुग़ल सम्राट हुमायूँ और अकबर के दरबार में प्रभाव शाली भूमिका निभाने वाले बैरम खान के पुत्र थे। अकबर को सम्राट बनवाने में बैरम खान का अहम योगदान था। अकबर के पिता हुमायूँ के 27 जनवरी, 1556 को निधन की खबर को छिपाकर उसके स्वस्थ होने की खबर भेजते रहे। मुग़लों का विश्वास पात्र मुल्ला बेक़सी जो कि हुमायूँ का हमशक्ल रोज हुमायूँ के रूप में क़िले से जनता को दर्शन देता रहा। आख़िर में 14 फ़रवरी, 1557 को अकबर का मुग़लसम्राट के रूप में घोषणा हुई।
बैरम खान ने अकबर के संरक्षक के रूप में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना में अहम योगदान दिया। शुरुआती दिनों में सल्तनत के कामकाज के निर्णय बैरम खान ही लेते रहे। बाद में अकबर और बैरम खान के बीच सत्ता सम्बन्धी निर्णयों में मतभेद भी उभरे। बैरम खान ने कुछ ऐसे निर्णय लिए जो अकबर को अप्रिय थे। अकबर ने बैरम खान से रिटायर होकर कहीं रह जाने या फिर हज यात्रा पर चले जाने को कहा। बैरम खान ने हज यात्रा पर जाना तय किया।
हज के लिए निकले बैरम खान की हत्या गुजरात में अफ़ग़ानी लड़ाके मुबारक खान लोहानी ने कर दी। उसके पिता की हत्या मुग़लों से लड़ते हुए हुई थी।
बैरम खान की मौत की जानकारी अकबर को कई महीने बाद हुई। अकबर ने रहीम दास को अपने पास आगरा बुलवाया। अपनी देखरेख में रखा। रहीम दास बाद में अकबर के प्रशासन में शामिल हुए। वे अकबर के नौरत्नों में से एक थे। अकबर ने रहीम दास को खान-ए-खाना (सरदारों के सरदार) की उपाधि से विभूषित किया। वे अब्दुल रहीम खान -ए-खाना हुए।
रहीमदास अकबर के दरबार में नवरत्न थे। दरबार में उनका प्रमुख स्थान था। वे चालीस हज़ार घुड़सवारों के कमांडर थे। अनेक सैन्य अभियानों में उन्होंने भाग लिया।
रहीमदास जी के बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार थे। फ़ारसी, ब्रज और संस्कृत भाषा पर उनका अधिकार था। उन्होंने अनेक ग्रंथो की रचना की। बाबरनामा को चगताई भाषा से फ़ारसी में अनुवाद किया। कई ग्रंथों का संस्कृत से फ़ारसी में अनुवाद कराया। ज्योतिष के दो ग्रंथो की रचना संस्कृत में की।
रहीम की ख्याति उनके द्वारा रचित नीति विषयक दोहों के कारण हैं। जन सामान्य की भाषा में उनके दोहे प्रसिद्ध हैं। इन दोहों के माध्यम से रहीमदास जी ने आम इंसान को आचरण सम्बन्धी सीख देने वाली कही हैं। हममें से तमाम लोग इन दोहों को बचपन में अपनी किताबों में पढ़ चुके हैं।उनमें से पाँच दोहे यहाँ पेश हैं :
1. जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग॥
2. तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥
3. रहिमन बिपदाहू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय ॥
4. बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥
5. चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥
(रहीम दास जी के कुछ और दोहों का लिंक टिप्पणी में)
रहीमदास जी तुलसीदास जी के समकालीन थे। लोकश्रुति के अनुसार रहीमदास जी ग़रीबों को दान देते समय अपनी नज़रें नीची रखते थे। तुलसीदास जी ने रहीम दास जी को लिखा :
"ऐसी देनी देंन ज्यूँ, कित सीखे हो सैन
ज्यों ज्यों कर ऊंच्यो करो, त्यों त्यों निचे नैन"
(दान देने की ऐसी तरकीब कहाँ से सीखी आपने कि जैसे-जैसे देने के लिए हाथ ऊपर होते हैं वैसे-वैसे नज़रें नीची होती जाती हैं आपकी)
इस पर रहीमदास जी ने जबाब लिखा :
"देनहार कोई और है, भेजत जो दिन रैन
लोग भरम हम पर करे, तासो निचे नैन"
(देने वाला कोई और है जो दिन-रात भेजता रहता है। लोग हमको दाता समझते हैं इसी बात से आँखे नीची रहती हैं)
वाक के दौरान रहीमदास से जुड़े अनेक प्रसंगो की जानकारी Alok Puranik आलोक पुराणिक जी, मनु कौशल जी Manu Kaushal और इरा पुराणिक Ira Puranik जी ने दी। सबके हाथ में अपनी-अपनी स्क्रिप्ट थी। बारी-बारी से सब अपनी स्क्रिप्ट पढ़ते जा रहे थे। टेलीप्रामप्टर ने हाल में कुछ मौक़ों पर धोखा दिया यह खबर जानने के दिल्ली वाक की टीम ने इसका उपयोग नहीं किया।
ऊपर की मंज़िल पर पहुँचकर मनुकौशल जी अपना ग़ालिब का स्थाई रूप छोड़कर रहीमदास के भेष में आए। उन्होंने रहीमदास जी के तमाम दोहे व्याख्या सहित पेश किए। इन दोहों को आज की राजनीति से जोड़ते हुए मज़ाक़िया टिप्पणी आलोक पुराणिक जी ने रोचक अन्दाज़ में की।
एक बार तानसेन द्वारा सूरदास के पद "जसोदा बार-बार यों भाखै, है कोऊ ब्रज में हितू हमारो चलत गोपालै राखै" गाए जाने पर दरबार के लोगों ने अपने-अपने हिसाब व्याख्या की। बाद में सम्राट अकबर के कहने पर रहीमदास ने जो व्याख्या की वह उनके साहित्य मर्मज्ञ होने, लोक जीवन के जानकार होने और अद्भुत प्रत्युत्पन्न मति युक्त होने का परिचायक है। (लिंक टिप्पणी में)
ऊपर की मंज़िल पर रहीमदास और उनकी पत्नी महबानो की कब्र साथ-साथ हैं। पहले रहीमदास जी की पत्नी का निधन हुआ। उनको यहाँ दफ़नाया गया। बाद में रहीमदास के निधन के बाद उनको भी यहीं दफ़नाया गया।
रहीमदास के मक़बरे में स्वास्तिक का चिन्ह और फ़ारसी शैली की लिखावट साथ-साथ थी। यह उस समय की सांस्कृतिक विरासत की मिसाल है।
रहीमदास का जीवन बहुत खुशहाल नहीं रहा। अकबर के बाद जहाँगीर के साथ उनको काफ़ी कष्ट रहा। शायद जहांगीर को शक था कि रहीमदास उनके ख़िलाफ़ साज़िश में शामिल हैं। इसी शक में उसने रहीमदास के एक बेटे की हत्या की भी करवा दी। सम्राटों, बादशाहों के दौर में सत्ता के चक्कर में अनेक हत्याएँ हुई हैं।
इसी तरह की अनेक जानकारियों से परिचित कराया गया हम लोगों को दिल्लीवाक में। लगभग 35-40 लोग शामिल थे वाक में। क़रीब ढाई घंटे हम लोग धूप-छाँह में इतिहास की गालियों में टहलते रहे। नीचे की मंज़िल में एक कुत्ता भी साथ में टहल रहा था। पता नहीं उससे घुमाने की फ़ीस चार्ज की गयी या उसको मुफ़्त वाक कराया गया। वैसे आलोक जी ने बातचीत के दौरान बताया कि इसके पहले जब वे यहाँ तैयारी के लिए आए तब अकेले यह कुत्ता ही मिला उनको यहाँ।
बैरम खान और रहीम खान दोनों मिलाकर हुमायूँ से लेकर जहांगीर तक की सल्तनत में दोनों का सम्मिलित योगदान सौ वर्षों का रहा। आज उनका नामोंनिशान नहीं है। उनका कोई वारिस नहीं है। लेकिन अपनी रचनाओं के माध्यम से वे हमारे बीच आज भी मौजूद हैं, आने वाले समय में बहुत दिनों तक बने रहेंगे।
इस लिखाई में जितनी बातें लिखीं गयीं उससे ज़्यादा छूट गयीं। छूट गयीं सारी यादें मुझपर मानहानि का मुक़दमा का करने की धमकी दे रही हैं। हम उनको मनाने की कोशिश कर रहे हैं।
दिल्लीवाक के माध्यम से आलोक पुराणिक -मनुकौशल -इरा पुराणिक की टीम बहुत बढ़िया काम कर रही हैं। उनकी ख्याति दूर-दूर तक पहुँच रही है। इसी ख्याति का नतीजा है भयंकर जाड़े के मौसम में सुबह की धूप का मोह त्यागकर लोग पैसे खर्च करके उनकी वाक में पहुँच रहे हैं। इस वाक में आगरा, सिंगापुर, कानपुर, अमेरिका तक से लोग आए थे। मतलब दिल्लीवाक ग्लोबल हो गयी। दिल्ली वाक की टीम को शुभकामनाएँ।
दिल्लीवाक में शामिल होना अपनी विरासत के बारे में जानकारी पाना है। अगर मौक़ा मिले तो दिल्ली वाक में अवश्य शामिल हों। आप दिल्ली वाक में शामिल होने के बाद बेहतर महसूस करेंगे।


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