जन्मदिन हमारा माला साइकिल को। सबेरे -सबेरे जगा के नई साइकिल पर बैठा दिया घरवालों ने। कहा -‘लेव चलाओ।’ घोर बेइज्जती। करेला पर नीम यह कि कहा गया -‘ थोड़ा मुस्कुराओ तो।’ ग़ुस्सा तो बहुत आया। लेकिन मजबूरी में मुस्कुराना पड़ता है। ऐसे जबरिया उठाने, जगाने और मुस्कराने के लिए कहने वाले लोगों से ही तो ज़िंदगी है। हमने बेइज्जती देवी को इज़्ज़त के साथ विदा कर दिया कहते हुए -‘ फिर कभी आना।’ वो मुँह फुलाकर जा रही है। लगता है अब कभी आएगी नहीं।
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