Sunday, May 31, 2026

तैराकी सीखने का दूसरा दिन

 


आज तैराकी सीखने का दूसरा दिन था। सबेरे आठ बजे से नौ बजे की क्लास थी। आठ बजने में कुछ मिनट पहले पहुँच गए। अटेंडेंस लगाने वाली मैडम ने नाम लिखा Anupa . हमने देख लिया। नाम के हिसाब से लिंग बदलने का खतरा देख कर हमने फौरन आख़िरी का a कटवाया। मैडम ने बिना एतराज किया नाम सही कर दिया। लगा कि एक आम इंसान और चुनाव आयोग में अंतर होता है।

सॉवर लेकर पानी में उतरे। तैराकी कोच से पूछा -'आज क्या करना है?' उसने कहा -'पानी में पांव चलाने का अभ्यास करो।'
हम पानी से ऊपर आकर किनारे पानी में पांव डालकर पांव चलाने लगे। साइकिल जैसी चलाने हुए। पास से गुजरते बच्चे ने कहा -'अंकल, पाँव मोड़िए नहीं। सीधा रखिए।'
बच्चा उमर में छोटा है। लेकिन तैराकी हमसे पहले से सीख रहा है। सीनियर तैराक है। सीनियर की बात माननी चाहिए। नौकरी के दिनों में अपने एक सीनियर की बात याद आई। एक घामड़, अकुशल और कामचोर सीनियर से किसी मसले पर तू तड़ाक होने पर उन्होंने जूनियर को समझाइस देते हुए कहा था -'सीनियरिटी का हमेशा लिहाज करना चाहिए (सीनियरटी मस्ट बि रिस्पेक्टेड)। उस समय तो नहीं लेकिन बाद में लगा कि शायद वे अपने लिए भी सम्मान सुरक्षित रखने का इंतज़ाम कर रहे थे।
हमने पाँव सीधे करके पानी में चलाने लगे। कोच ने देखते हुए कहा -'पंजे फैलाकर चलाइये पांव।' हमने पंजे फैला लिए। पाँव चलाते रहे।
हमको पचास बार चलाने के लिए कहा था । हमने पाँच-छह बार 'पचास बार बार पानी में पांव चलाने का अभ्यास किया। इसके बाद कोच के कहने पर पानी में उतर गए। अब हमको पानी में पांव चलाने थे।
साँस अंदर लेकर मुँह पानी में घुसाया। रेलिंग हाथ से पकड़े रहे। शरीर पानी में सीधा हो गया। हम पानी में पैर चलाने का अभ्यास करते रहे। साँस रोककर पानी में मुँह किए पैर चलाते हुए गिनती गिनते रहे। पहली बार दस तक, फिर पंद्रह, बीस करते हुए चालीस तक की गिनती गिनने तक पानी के अंदर मुँह किए, साँस रोके पाँव चलाते रहे। कोच को दिखाया। उनसे दूसरी कोशिश में अंगूठा ऊपर करके हमको पास कर दिया। मतलब ठीक कर रहे थे हम।
बाद में देखा कि लड़का नुमा लगती वह कोच लड़की थी। शायद उसने भी जल्दी में ही बॉब्ड कट बाल कटवाये हैं। क्या पता वह Sudipti की फेसबुक फ्रेंड हो और उनसे ही प्रेरणा लेकर हेयर स्टाइल बदला हो। फ़ैशन भी संक्रामक होता है।
पैर चलाते हुए पीछे की तरफ़ से गुजरते हुए पांव किसी के शरीर से टकराए। हमने सॉरी बोला। उसने कहा -'कोई बात नहीं। जबसे आए हैं पूल में तबसे रोज़ लातें खा रहे हैं।'
पूल में एक युवा जोड़ा तैरने का अभ्यास कर करा था। एक-दूसरे का हाथ पकड़े तैरने का अभ्यास कर रहे थे। मोबाइल बाहर रखा था नहीं तो उनका पूँछकर उनका फ़ोटो खींचते।
एक छूटके बच्चे को उसके माता-पिता गुब्बारे नुमा कमर पेटी बांधकर उसको पानी में उतारने का प्रयास कर रहे थे। बच्चा पानी में जाने से मना कर रहा था। मम्मी से चिपक गया। मम्मी ने झुककर उसको पानी में डालने की कोशिश की। बच्चे ने मम्मी के कपड़े कसकर पकड़े हुए थे। ऊपर के कपड़े खिंचने के चलते मम्मी ने बच्चे को पानी में डालने का प्रयास छोड़ दिया। हमने बिना माँगी सलाह दी-'तुम लोग ख़ुद पानी में उतरो तब बच्चा आसानी से पानी में चला जाएगा।' उन्होंने कहा -'कल से जाएँगे।'
शायद उन लोगों ने बच्चे की फ़ीस जमा थी। 3600/- रुपए। शायद बच्चे को ही सिखाने का प्लान होगा उनका। अपने लिए खर्च नहीं करना चाहते होंगे।
पूल में पानी साफ़ था। नीचे का फर्श दिख रहा था। हमारे पंजे भी। कई महिलायें भी पूल में तैराकी सीख रहीं थीं। तीस-चालीस लोग थे। सब सीखने वाले जोन में जहाँ पानी की गहराई साढ़े चार फीट है।
कई बार फ्लोटिंग और पानी में पाँव चलाने का अभ्यास किया। केवल एक बार पानी मुँह में गया। ख़ासी आई। बाक़ी चकाचक रहा। अभ्यास करते-करते एक घंटा बीत गया। सेशन खत्म होने की सीटी बज गई । लोग बाहर निकलने लगे। हम सबसे बाद में निकले।
कोच ने कहा -'अंकल दूसरे दिन के हिसाब से आप अच्छा कर रहे हैं। हफ़्ते भर में तैरना सीख जायेंगे।'
उसने बताया यहाँ चार-पाँच सौ लोग स्वीमिंग करने आते हैं। सुबह छह से नौ, शाम को पाँच से दस। शाम को भीड़ ज़्यादा होती है। सुबह पाँच कोच रहते हैं, शाम को आठ। स्वीमिंग पूल मार्च से अक्टूबर तक चलता है। कोच ने सलाह दी- 'फूल टाइम मेम्बरशिप ले लीजिए, फ़ायदा रहेगा।'
हमने उससे पूछा -'जब स्वीमिंग पूल नहीं चलता है तो क्या करते हो?'
उसने कहा -' कुछ नहीं। कोई काम नहीं मिलता। आप कोई काम दिलवा सकते हैं तो बताइए।'
हमने सोचा कहें -'हम ख़ुद कोई काम खोज रहे हैं, मिल नहीं रहा। तुमको कैसे दिलायें?' लेकिन फिर कहे नहीं। उसको लगता उसकी खिल्ली उड़ा रहे हैं। अच्छी बात नहीं है यह।
बाहर आकर कार का लॉक दूर से खोला। गाड़ी की न लाइट जली, न कोई आवाज हुई। गाड़ी शांत खड़ी थी। पास जाकर देखा तो दरवाज़ा खुल गया। लाइट न जलने का कारण समझ में आया। हम गाड़ी बिना बंद किए चले गए थे। गाड़ी एक घंटे बैटरी पर चलती रही। थोड़ी देर और चलती तो फिर स्टार्ट नहीं होती। रोड साइड असिस्टेंस वाले को बुलवाना पड़ता। घंटे-आधे घंटे और ठुक जाते।
याद आया कि गाड़ी जब ठीक तरह से बंद होती है तो दरवाजा बंद करते समय 'गुड बाई।' बोलती है। सुबह शायद हम बिना 'गुड बाई' सुने चले गए। अब तय किया 'गुड बाई' सुनकर ही आगे बढ़ा करेंगे।
घर आते समय देखा कि सड़क किनारे दिहाड़ी मजदूरों की लाइन लगी थी। लोग उनसे बातचीत करते हुए दिखे। आज अपेक्षाकृत बहुत कम लोग थे वहाँ। शायद आज लोगों को काम मिल गया होगा। इतवार होने के चलते लोग अपने घरों में काम कराने के लिए ले गए उनको। यह भी हो सकता है कि कुछ दिहाड़ी मज़दूर अपने घर चले चले गए हों।
यह हमारा तैराकी सीखने का दूसरा दिन था

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