लेबल
अमेरिका यात्रा
(75)
अम्मा
(11)
आलोक पुराणिक
(13)
इंकब्लॉगिंग
(2)
कट्टा कानपुरी
(119)
कविता
(65)
कश्मीर
(41)
कानपुर
(315)
गुड मार्निंग
(44)
जबलपुर
(6)
जिज्ञासु यायावर
(17)
नेपाल
(8)
पंचबैंक
(179)
परसाई
(4)
परसाई जी
(129)
पाडकास्टिंग
(3)
पुलिया
(175)
पुस्तक समीक्षा
(4)
बस यूं ही
(276)
बातचीत
(27)
रोजनामचा
(901)
लक्षद्वीप
(23)
लेख
(36)
लेहलद्दाख़
(12)
वीडियो
(7)
व्यंग्य की जुगलबंदी
(35)
शरद जोशी
(22)
शाहजहाँ
(1)
शाहजहाँपुर
(141)
शाहजहांपुर
(1)
श्रीलंका
(41)
श्रीलाल शुक्ल
(5)
संस्मरण
(48)
सूरज भाई
(167)
हास्य/व्यंग्य
(401)
Thursday, May 28, 2026
खोना मोबाइल का
कुछ दिन पहले अपन डिस्पेंसरी गए। दवा लिखवानी थी। ऑटो खरीदा रैपिडो एप से। ऑटो आ गया। हम बैठे। चल दिए।
घर से चौराहे तक तो मामला ठीक रहा। चौराहे के आगे ऑटो दायीं तरफ़ मुड़ गया। हमारे हिसाब से बायें मुड़ना था। हमने ऑटो वाले से बायें चलने को कहा। उसने बताया कि मैप में दायें दिखा रहा है। हमने कहा -'बायें चलो।'
ऑटो वाला बायें चल दिया। मोबाइल में रैपिडो एप बार-बार बता रहा था कि हम मंजिल से अलग जा रहे हैं। लेकिन हम मैप को नकारते हुए चलते रहे। ऑटो को दायें, बायें, सीधे चलने का संकेत देते रहे। उस जगह पहुँचे जहाँ हमारे हिसाब से डिस्पेंसरी थी।
ऑटो वाले को पैसे दिए। उतरकर देखा वहाँ डिस्पेंसरी का 'डी' तक नहीं था। ग़लत जगह आ गए यह सोचना भी ग़लत लगा। ग़लत समझे जाने का डर भी हमसे कई बार तमाम ग़लतियाँ करवाता है।लेकिन सच यही था। हमने सोचा किसी से पूछ लें लेकिन यह सोचकर नहीं पूछा कि जिससे पूछेंगे वह हँसेगा। सोचेगा -'बताओ, इतनी बार जा चुके डिस्पेंसरी। फिर भूल गए।'
हमने फिर गूगल मैप देखा। फिर ऑटो किया। जिस जगह डिस्पेंसरी दिख रही थी वहाँ का ऑटो कर लिया। वहाँ पहुँचकर देखा कि वहाँ डिस्पेंसरी थी तो लेकिन हमारी CGHS वाली नहीं थी। हमने इस बार शरम का दामन छोड़कर एक मित्र से पूछ ही लिया। उसने बताया कि डिस्पेंसरी की जगह बदल गई है। अब वह बंगला बाजार चली गई है। मतलब मैप सही बता रहा था। हमने दो बार ऑटो करके सौ रुपये बर्बाद कर दिए थे।
मैप पर ऑटो का किराया देखा। पचास रुपए बता रहा। हमने ऑटो वाले से कहा -'छोड़ दो वहाँ। एप के हिसाब से पैसे ले लेना।'
उसने कहा -'सौ रुपए लगेंगे।'
हम भलमनसाहत, नैतिकता जैसे घराने के शब्द बोलते हुए ऑटो से नीचे उतर आए। एक बार फिर ऑटो किया।ऑटो आया। बैठे चल दिए। आधे घंटे के अंतराल में यह हमारी तीसरी ऑटो की सवारी थी।
तीसरी ऑटो में बैठते ही पता चला कि हमारा दूसरा मोबाइल साथ नहीं था। हमने इधर-उधर खोजा। नहीं मिला। पिछले दोनों ऑटो के नंबर रैपिडो एप्प से लेकर फ़ोन किया। दोनों लोगों ने अपना ऑटो देखकर बताया -'उनके ऑटो में नहीं छूटा है मोबाइल।'
हम मोबाइल वियोग में दुखी होते हुए डिस्पेंसरी गए। दवा लिखवाई। एक बारगी तो मन किया डॉक्टर मैडम से पूछ लें -'मोबाइल खो गया है। उसके वियोग को कम करने की दवाई है क्या कोई? लेकिन फिर पूछा नहीं। क्या पता वो बुरा मान जाती। आजकल लोग जरा-जरा सी बात पर तो बुरा मान जाते हैं।'
अपने खोए मोबाइल में बार-बार घंटी बजाते रहे। कुछ देर तक तो बाजी घंटी। बाद में वह भी बंद हो गई। जिसको मिला होगा उसने बंद कर दिया होगा।
हमने एक बार फिर ऑटो वालों को फ़ोन किया। उन्होंने फिर मना किया। उनकी बात मानने के अलावा कोई चारा भी नहीं था।
रास्ते में और घर आकर भी हम याद करते रहे कि उस मोबाइल में क्या-क्या था। याद किया तो इतनी बातें याद आई की मन दुखी हो गया। न जाने कितनी यादें सुरक्षित थीं उस मोबाइल में। कई फोटो। संदेश। और न जाने कितनी यादें। आठ साल से ज़्यादा का साथ था मोबाइल का। स्क्रीन चटक गई थी। लेकिन काम बखूबी करता था। कहीं जाते तो साथ ले जाते। अब वह बेचारा कहाँ धूप में परेशान हो रहा होगा। हम मोबाइल के खोने से ज़्यादा इस बात से दुखी थे कि बेचारा बेजुबान मोबाइल अकेला परेशान हो रहा होगा।
मोबाइल खोजने की कोशिश में गूगल की शरण में गए। आख़िरी लोकेशन देखी। वह तीन किलोमीटर दूर क़िला के पास थी। हम फौरन गाड़ी लेकर वहाँ गए। हमको पहले वाले ऑटो वाले पर शक था कि उसने ही मार लिया मोबाइल। किसी पर शक करने में कोई खर्च नहीं पड़ता। इसलिए शक करने का चलन आम है दुनिया में।
मोबाइल की आख़िरी लोकेशन के पास पहुंचते हुए हमें लगा कि ऑटो वाला मेरा मोबाइल लिए बैठा होगा। हम उसको मोबाइल के साथ पकड़ लेंगे। लेकिन वहाँ कोई ऑटो दिखा नहीं। एक आदमी चारपाई पर लेटा बदन तोड़ रहा था।
हमने उससे अपनी मोबाइल व्यथा बताई। पूछा कि कोई ऑटो वाला आया था यहाँ? उसने मना किया। हमने फिर पहले वाले ऑटो वाले को फ़ोन किया। उसने फिर बताया कि उसके ऑटो में मोबाइल नहीं छूटा
फिर हमने अपने दिमाग़ का इस्तेमाल करते हुए पूछा -'हमारे बाद कोई सवारी बैठाई थी क्या किला की तरफ़ की?'
उसने बताया -'हाँ बैठाई थी।'
हमें लगा कि क़िले के पास मोबाइल पाया गया। सवारी क़िले तक आई। उसके पास ही होगा मेरा मोबाइल। हमने अपने ज्ञान का उपयोग करते हुए सोचा कि उसने भुगतान गूगल पे से किया होगा। उससे उसका नम्बर पता करके पकड़ लेंगे। मोबाइल मिल जाएगा।
लेकिन ऑटो वाले ने मेरी इस आशा पर पानी फेर दिया यह बताकर कि उसने दस रुपये नकद दिए थे। आन लाइन भुगतान नहीं किया था। हम अपना दुखी मन वापस लौट आए।
इसके बाद कई बार मोबाइल की लोकेशन देखी। घंटों मेरा मोबाइल बेचारा किला के पास दिखता रहा। लेकिन मिला नहीं। बेचारा मोबाइल भूखा, प्यासा किस हाल में कहाँ होगा यही सोचकर दुखी होते रहे। उसको पेट भरने को बिजली मिली होगी या भूखा ही रखा गया यही सब सोचकर दुखी होते रहे। दुखी होने में अभी कोई प्रतिबंध भी तो नहीं है। लोग तो बिना कारण दुखी होते रहते हैं। हमारे पास तो कारण था।
दो दिन तक हम मोबाइल को किला में पड़ा हुआ देखते रहे। कई बार कॉल किया। हर बार वह स्विच ऑफ़ या रेंज से बाहर बताता रहा। हमने गूगल की सुविधा से मोबाइल को खोया हुआ दिखाया। सिम ब्लॉक किया। ऑन होने की स्थिति में उसके फ़ैक्ट्री सेटिंग मॉड में करने का निर्देश दिया। अगले दिन जाकर दूसरा सिम लिया। ई सिम लिया इस बार। दोनों सिम एक ही मोबाइल में रहने लगे। पता नहीं उनमें आपस में बातचीत होती है या वे भी आधुमिक पड़ोसियों की तरह एक-दूसरे की निजता में दखल न देने वाले अंदाज़ में रहते हैं। एक दूसरे से निर्लिप्त रहते हैं।
आज अचानक सुबह फिर याद आ गई उस बिछुड़े हुए मोबाइल की। पता नहीं कहाँ होगा। क्या पता उसमें कौन सी सिम चल रही होगी। दिन में कितने घंटे चलता होगा। जहाँ होगा वहाँ बिजली आती होगी या नहीं। उसकी फ़ोटुएँ किस हाल में होंगी?
तमाम और भी बातें सोचते हैं लेकिन क्या फ़ायदा वह सब बताने का। अब यही सोचकर मन को तसल्ली दे रहे हैं कि हमारा और मोबाइल का साथ इतने दिन का ही था। रमानाथ अवस्थी जी कविता याद आ रही है :
आज आप हैं हम हैं लेकिन
कल कहाँ होंगे, कह नहीं सकते
ज़िन्दगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment