Sunday, October 01, 2006

कान से होकर कलेजे से उतर जायेंगे

http://web.archive.org/web/20110101200329/http://hindini.com/fursatiya/archives/194

कान से होकर कलेजे से उतर जायेंगे



वक्त के पांव अनायास ठहर जायेंगे,
गौर से देखो तो कुछ और नजर आयेंगे।
डूब के सुनोगे जो रफ़्ता – रफ़्ता,
कान से होकर कलेजे से उतर जायेंगे।

यह गीत पंक्ति हमने कल सुनी अपने क्लब में। गीतकार थे राजेश मिश्र। मौका था हिंदी माह के समापन का। पितर पक्ष हफ्ते भर पहले समाप्त हो चुके थे। पितरों का तर्पण हो चुका था माता हिंदी का बाकी था। पितरों के तर्पण के एक सप्ताह बाद हिंदी का तर्पण होता देखकर यही लगा कि भारत दैट इज इंडिया में,लाख नजरें चुराने के बावजूद, लैंगिक भेदभाव के नजारे यदा-कदा दिख ही जाते हैं।
बहरहाल, काम की बात यह कि कल हम जमा हुये कवितागीरी करने के लिये। चंद कवि और कवियों से कुछ चंद ही अधिक श्रोता। बंद हाल और चायपानी की खुली
व्यवस्था ने श्रोताऒं का बाहर जाना मुश्किल कर दिया था। कल के बाद से हम साल भर के लिये हिंदी की चिक-चिक से मुक्त होने वाले थे। इसके बाद साल भर तक हिंदी को याद करने की मजबूरी से मुक्ति का अहसास हमारे मन में गुदगुदी मचा रहा था। हम गुदगुदायमान के साथ गदगदायमान थे।
कुछ ही देर में कवि सम्मेलन शुरू हो गया। या कुंदेंदु तुषार हार धवला वगैरह हुआ। इसके बाद तो कवि सम्मेलन धलल्ले से शुरू हो गया।
कवि गण कुल जमा सात थे। हमें भी कहा गया था कविता पढ़ने के लिए लेकिन हमने नखरे दिखाते हुये मना कर दिया- अरे हम कहां कविता लिखते हैं। अनुरोध करने वालों ने हेंहेंहें करते हुये सूचित किया कि वे हमारे बारे में सब जानते हैं। इस पर हमने कहा कि जानते हो तो काहे कह रहे हो कविता सुनाने को! वह फिर बोला हम जानते हैं आपको।
कवियों का चयन अधिकारियों ने किया था। उन अधिकारियों को कविता और कवि के बारे में केवल इतना ही पता था जितना कि हमें इस बात का कि आज के दिन,इस समय ऒसामा बिन लादेन जी। बहरहाल हर व्यक्ति सर्वइस चयन में चयन प्रकिया ऐसी थी कि कोई भी कायदे का कवि धंस न जाये, वो तो खास तौर जिसको लोग सुनना चाहते थे। । हर व्यक्ति सब कुछ् नहीं जानता। अज्ञानता पर सबका समान अधिकार है।
पहले कवि ने पढ़ी हास्य कविता और काफ़ी जमा। लोगों ने तालियां बजाईं। संचालिका खुश। बोली -आगाज़ अच्छा है। इस अच्छे आगाज़ का अंजा़म यह हुआ कि मुख्य अतिथि उठ लिये। उनको एक दूसरी पार्टी में जाना था। हम कविता सुनते,तालियां बजाते रहे। तीन कवि खत्म होते-होते कवि सम्मेलन हमारे स्तर तक आ गया। हमें लगा कि हमें तो मंच पर होना चाहिये। इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा अपनी कविता सुनाने का। लिहाजा हम टेढ़े-मेढ़े होते हुये सीधे आयोजक साथी को
अपनी तत्काल लिखी एक कुंडली दिखा दी। परिणमत: कुछ् ही देर में हम मंच पर थे। कुछ ही देर में माइक हमारे हाथ में था और हम कह रहे थे:-


वैसे तो कवि बदनाम होता है माइक पकड़कर खुद् या माइक के न टूटने माइक न छोड़ने का लेकिन मैं देख रहा हूं कि कुल जमा सात कवियों के सामने कम से कम ऐसे सत्ताइस लोग ऐसे बैठे हैं जिनको पास में आया /पकड़ा गया माइक छोड़ने का कोई अनुभव नहीं है। सच पूछा जाये तो वे कविता सुनने की बजाय वे इस लालच में थे कि पता नही किस बहाने माइक मिल जाये ताकि और वे अपने किस्से बयान कर सकें।

शुरू करने के पहले हमें याद आया कि कुंडलिया नरेश समीरलालजी ने मुझे बफैलो कवि सम्मेलन में याद किया था। मेरे पास बदला चुकाने का अच्छा बहाना था और फिर मैंने समीरलाल की शान में कसीदे काढ़े। लोगों ने तालियां पीटीं। फिर हमने समीरलाल जी का नाम याद करके उसी समय रची कुंडली पढ़ डाली:-


मजे-मजे में आ गये, सब कविता सुनने आज,
हमें माइक पर देखकर, कोई मत होना नाराज ।
मत होना नाराज कि हम तो सबको मौज करायेंगे,
ताली आप बजायेंगे ,तो खुद ही खुश हो जायेंगे।
खुश होकर सबके चेहरे,हो जायेंगे सजे-सजे से,
कविता सुनकर के जायेंगे,घर को सब जन मजे-मजे में।

लोगों ने कुछ तारीफ़ कर दी तो हम उड़ने लगे और कुंडली से सीधे हायकू के बारे में बताते हुये हायकू सुनाना शुरू कर दिया और सुनाया:-
दीवारें बोलीं,
आऒ उधर चलें,
कोने में मिलें।
इसके बाद मैंने अपने बारिश के मौसम के बारे में लिखे अपने हायकू सुनाना शुरू किया और सारे नहीं सुना पाये कि पब्लिक हक्का-बक्का से रह गये| हमने तुरंत मौके की नजाकत को देखते हुये हायकू-कतरन समेट लिया और कविता का पूरा थान फैला दिया| कविता पढ़ी:-

आओ बैठे कुछ देर पास में,
कुछ कह लें,सुन लें बात-बात में|
इस तरह होते करते हमारा कविता पाठ पूरा हो गया और चार-छह श्रोता भी सरक गये| उनके घर वाले उनको बुला रहे थे| रात होते-होते हम सब वापस आ गये|
आखिरी समय ७+१(=८) कवियों के लिये कुल जमा २२ लोग लगेंगे| मतलब एक कवि पर लगभग तीन श्रोता| एक औरश्रोता होता तो कवि चारो तरफ् होते| अब केवल तीन तरफ ही श्रोता थे।
खैर हमें रात के कविसम्मेल में से एक भी याद नहीं थी लेकिन समीरलाल से सबेरे बात हुयी तो बता दिया हिसाब बराबर कर दिया। हमें रात की कविता भी याद थी -राजेश मिश्र की। हमने उनको पढा़ दिया:-


वक्त के पांव अनायास ठहर जायेंगे,
गौर से देखो तो कुछ और नजर आयेंगे।
डूब के सुनोगे जो रफ़्ता – रफ़्ता,
कान से होकर कलेजे से उतर जायेंगे।

एक घंटे के बाद देखा तो हमारे मेल बाक्स पर समीरजी की कवितांजली चढ़ी थी:-


डूब के सुनोगे तो रफ़्ता-रफ़्ता ,
कान से होकर कलेजे में उतर जायेंगे
तू बता के तो देख अपनी पसंद,
उसी राग से हो मेरे गीत गुजर जायेंगे। तुम जो बैठी हो सामने मेरे ,
कितनी खुशनुमा हुई जाती है जिंदगी मेरी
जो भी लिखूँ मै कुछ शेर मेरे,
वो तेरी गज़लों मे खो कर उतर जायेंगे।

अच्छा हुआ हमने समीरजी को पूरा कवि सम्मेलन नहीं सुनाया। ऐसा होता तो वे सारे कवियों की कविताऒं का जवाबी कीर्तन कर डालते और फिर विनय उनके
ब्लाग पर छापा मार कर सारी गलतियां बरामद कर लेते।
मेरी पसंद
मेरी, कुछ आदत, खराब है
कोई दूरी, मुझसे नहीं सही जाती है,
मुँह देखे की मुझसे नहीं कही जाती है
मैं कैसे उनसे, प्रणाम के रिश्ते जोडूँ-
जिनकी नाव पराये घाट बही जाती है।
मैं तो खूब खुलासा रहने का आदी हूँ
उनकी बात अलग, जिनके मुँह पर नकाब है।
है मुझको मालूम, हवाएँ ठीक नहीं हैं
क्योंकि दर्द के लिये दवायें ठीक नहीं हैं
लगातार आचरण, गलत होते जाते हैं-
शायद युग की नयी ऋचायें ठीक नहीं हैं।
जिसका आमुख ही क्षेपक की पैदाइश हो
वह किताब भी क्या कोई अच्छी किताब है।
वैसे, जो सबके उसूल, मेरे उसूल हैं
लेकिन ऐसे नहीं कि जो बिल्कुल फिजूल हैं
तय है ऐसी हालत में, कुछ घाटे होंगे-
लेकिन ऐसे सब घाटे मुझको कबूल हैं।
मैं ऐसे लोगों का साथ न दे पाऊँगा
जिनके खाते अलग, अलग जिनका हिसाब है।
मेरी कुछ आदत खराब है।
-मुकुट बिहारी सरोज

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

5 responses to “कान से होकर कलेजे से उतर जायेंगे”

  1. संजय बेंगाणी
    दीवारें बोलीं,
    आऒ उधर चलें,
    कोने में मिलें।
    क्या बात हैं. वाह..
  2. Laxmi N. Gupta
    बहुत सुन्दर है, आपकी पसन्द:
    “मैं ऐसे लोगों का साथ न दे पाऊँगा
    जिनके खाते अलग, अलग जिनका हिसाब है।”
    सदैव की तरह बहुत अच्छा लिखा है। समीर जी से बफ़्लो में मुलाकात हुई:
    बड़े भाग्यशाली हैं वो जिनके आप आदी हैं।
    लक्ष्मीनारायण
  3. समीर लाल
    वाह अनूप भाई, यह तो मौज ली जा रही थी और छप भी गई. :)
    “आओ बैठे कुछ देर पास में,
    कुछ कह लें,सुन लें बात-बात में” बहुत सुंदर पंक्तियां हैं.
    मुकुट बिहारी सरोज जी की कविता गजब की है..
    “मैं तो खूब खुलासा रहने का आदी हूँ
    उनकी बात अलग, जिनके मुँह पर नकाब है।”
    वाह…
  4. राकेश खंडेलवाल
    आओ बैठो कुछ देर पास में
    और सुनें कुछ बात बात में
    अब भी तो बाकी है ढेरों
    थोड़ा ही था पढ़ा रात में :-)

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