Monday, October 23, 2006

इसे अपने तक रखना

http://web.archive.org/web/20110926113005/http://hindini.com/fursatiya/archives/202

इसे अपने तक रखना

हमारे दोस्त हमारे कान से सटे थे। फिर फुसफुसाने लगे। आवाज पारसी थियेटरों सी कि पूरा हाल सुन ले लेकिन उनको यह भ्रम पालने का पूरा अधिकार है कि उनकी बात केवल मैं ही सुन रहा हूं। बहुत सामान्य सी जानकारी हमारे कान में उड़ेलने के बाद उन्होंने अपना मुंह हटा लिया। हमारे कान मुक्त हुये। उनकी आवाज फिर कान में घुसी- यार, इसे अपने तक रखना किसी को बताना मत!

हम एक बार फिर सोचने लगे। जो शख्स खुद किसी बात को अपने तक नहीं रख पाया और सब काम छोड़कर मुझे बता रहा वह कैसे आशा करता है कि आगे किसी को नहीं बतायी जायेगी।

लेकिन हमें ज्यादा परेशान नहीं होना पड़ता। जो बात हमें अपने तक सीमित रखने को कही गयी थी वह अगले दिन सबको पता थी। लगता है हमारे मित्र ने और भी कुछ लोगों से बात अपने तक सीमित रखने को कही होगी। और उनका अपनापा थोड़ा फैला टाइप का होगा इसीलिये बात फैल गयी होगी।

ऐसा अक्सर होता है आपको कुछ बातें बताई जाती होंगी, साथ में अपने तक रखने का ‘टैग’ लगाकर। आपके मन में वैसे ही बहुत सारी अपने तक सीमित बातें ठुंसी पड़ी हैं आपको समझ में नहीं आता कि इस अपने तक सीमित बात को कहां रखें? आप उसी ढेर के ऊपर पटक देत हैं इसे भी।

गोया आपका मन स्विस बैंक का अकाउंट हो गया जहां लोग अपने मन की बातें जमा कर जायें। एक बार जमा कर दिया तो किसी को पता नहीं चलेगा सिवाय बैंक और खातेदार के।

अपने तक कही जाने वाली बातों में हमेशा समझौता एकतरफा होता है। सुनने वालो को आगे बताने का अधिकार नहीं होता लेकिन बताने वाला इस बंधन से मुक्त रहता है। वह दूसरों को भी उसी बंधन में बांधता हुआ बात बता सकता है। बात का ‘सोर्स कोड’ उसके पास जो है।

लेकिन मुक्ति की आकांक्षा का प्रदूषण भयानक होता है। अब किसी भी बात को अपने तक के बंधन में नहीं बांधना बड़ा मुश्किल हो गया है। पता चला जिस बात को आप अपने मन में जकड़ के बैठे हैं वही बात दूसरे के मुंह से छुट्टा सांड़ की तरह निकल रही है।

और ऐसा हो भी क्यों न! दुनिया सब कुछ खोल-खाल के नंगा करने के प्रयास में जुटी पड़ी है। ब्रिटेन में बच्चा पैदा करने का ‘लाइव टेलीकास्ट’ हो रहा है। लोगों के शरीरों से कपड़े उतरते जा रहे हैं। कुछ के फैशन में,बहुतों के मजबूरी में। कुछ के मस्ती में, बहुतों के पस्ती में।

पिछ्ले शुक्रवार को लाफ्टर चैलेंज में राजू श्रीवास्तव ने एक जींस की पीड़ा बखानते हुये कहा-

हम पहले कमर के ऊपर तक रहते थे। अब लगातार नीचे खिसकाये जा रहे हैं। पहनने वाली को डर नहीं है लेकिन हम घबड़ा रहे हैं। हम लगातार नीचे जा रहे हैं और ऊपर वाला कपड़ा लगातार ऊपर जा रहा है। हमारी कभी मुलाकात ही नहीं होती। एक दिन तो हम मैडम से बोले भी- मैडम या तो हमें पहन ही लो या उतार ही दो।

देखिये बात, बात से शुरू हुयी और कपड़े तक पहुंच गयी। इसी को कहते हैं कि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। बातें आवारगी की शौकीन होती हैं। निकलती हैं तो दूर तक चली जातीं हैं। ईरान से तूरान तक।

अपने तक रखने की बात का फलसफा बड़ा महीन टाइप का होता है। मन में रखे हुये भेद खदबदाते रहते हैं। अजीब सा तनाव रहता है मन में। दूसरे से कहने से यह तनाव कम होता है। जैसे अपना कूड़ा पड़ोसी के यहां डाल देने से घर साफ दिखता है।

लेकिन साथ-साथ दूसरा तनाव शुरू हो जाता है कि मैंने दूसरे को गुप्त बात बता दी। यह आसमान से गिरकर खजूर में अटकने की होती है। इसीलिये जिम्मेदार लोग दूसरों से गुप्त बातें बताते हुये बात के शुरू में ही कह देते हैं – आपको बता रहा हूं,इसे अपने तक ही रखना।

दुनिया में समझदारों की संख्या बढ़ रही है। सुनने वाला भी अगले से कहता है- आपको बता रहा हूं,इसे अपने तक ही रखना।

मुझे तो यह लगता है कि अगर आपने अपनी बात किसी भी दूसरे को बता दी तो आप समझिये कि वो बात आपने दुनिया भर को बता दी। आप जो बात खुद अपने तक नहीं रख पाये उसे दूसरे से कैसे आशा करते हैं कि वह अपने तक रखेगा। आप अगर खुद अपने को नहीं ढो पा रहे हैं तो आपको कोई दूसरा कैसे ढोयेगा ?

इस लिये मैं यही सोचता हूं कि जो बात मैं सबको नहीं बता सकता उसे किसी एक को बताकर उसका बोझ काहे बढ़ाऊं यह कहकर -इसे अपने तक रखना।

वैसे भी गोपनीय बातें दुनिया को पहले पता चलती हैं। मुंह से न निकले लेकिन हाव-भाव हरकतें सारी चुगली कर देती हैं। रहीमदास ने कहा है-


रहिमन अंसुवा नयन ढरि,जिय दुख प्रकट करेहि,
जाहि निकारो गेह से, क्यों न भेद कहि देइ। आंख से निकलकर आंसू मन का भेद कह देता है। जिसको (आंसू को)घर से(आंख से) निकाल दिया वह कैसे घर का भेद नहीं कहेगा!

यह मैंने आपसे तो कह दिया लेकिन आपसे अनुरोध है कि इसे अपने तक रखना।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

8 responses to “इसे अपने तक रखना”

  1. अनुराग श्रीवास्तव
    हम तो भैया यही सोच रहे हैं कि एक खामोश टिप्पणी कैसे करें जो सिर्फ़ आप तक ही पंहुच पाये।
    पेट में बात हजम करना आसान काम नहीं है, ऐसा करने की चेष्टा करने से लोग-बाग अकसर ही वात् रोग से ग्रसित हो जाते हैं। लक्कड़ हजम – पत्थर हजम वाले चूरन तो सदियों से सड़क के किनारे बेंचे जा रहे हैं लेकिन बात हजम करने वाला चूरन तो आज तक नहीं मिला।
    बात हजम होने के खतनाक साइड इफ़ेक्टस हो सकते हैं, अगर सारी बातें हजम हो गयीं तो भैया, यहां बैठ पर ब्लाग पर काहे की अभिcयक्ति करी जायेगी।
    हमारी तो यही कामना है कि ईश्वर सभी ब्लगोड़ों को ‘बात’ की बदहजमी का रोग दे जिससे ब्लाग जगत पर हरियाली छाई रहे।
    क्या आपने भी सुनी आकाशवाणी – “तथासु!”
  2. समीर लाल
    अनूप भाई, एक बात बताता हूँ, सिर्फ़ अपने तक रखना..”लेख बहुत शानदार और गहरा दर्शन लिये है.इसे कहीं छपवाते क्यों नहीं?”
    वैसे आपकी एक लाईन टीप ली गई है और डायरी में रख ली गई है..शायद भविष्य में कहीं इस्तेमाल करता नजर आऊँ:
    “बातें आवारगी की शौकीन होती हैं। “
    बहुत खुब…
  3. राकेश खंडेलवाल
    दीदए तर से निकल अश्क किधर जाता है
    घर से निकला हुआ आवारा कहा जाता है
  4. Laxmi N. Gupta
    वाह, वाह शुकुल जी, क्या लिखा है।
    बात ही बात में क्या बात हो गई।
    हम जिस से डर रहे थे वही बात हो गई।
    “कहना नहीं किसी से” हमने कहा था उनसे,
    सरे आम आज वही बात हो गई।
    लक्ष्मीनारायण
  5. bhuvnesh
    अनूपजी बहुत अच्छा लेख है वैसे आप चिंता न करिए इसे अपने तक ही सीमित रखूंगा।
    आपके परसाईजी पर लिखे हुए काफ़ी लेख पढे़ और उनकी पुस्तकें भी खरीदीं वाकई व्यंग्य में उनका कोई सानी नहीं वैसे आपका लेखन भी बहुत कमाल का है मैने परसाईजी का केवल नाम सुना था आपके लेख पढ़कर उन्हें पढ़ने की तीव्र उत्कंठा पैदा हुई और लीजिये वे मेरे भी प्रिय लेखक बन चुके हैं।
    एक गुजारिश है आपसे कि उनके उपन्यास ‘रानी नागफ़नी की कहानी’ के बारे में भी अपनी किसी पोस्ट में लिखिये।
  6. Nitin Vyas
    मैनें सिर्फ अपने तक ही रखी है यह कहते हुए कि गुरू जी
    आप सदा की तरह फिर बाजी मार गये! चिठ्ठाजगत आपको पा कार धन्य है।
  7. kali
    Guruji Paano do, dho dho peene hai. Hamesha ki tarah consistent Sarvotaam writer aap hi hain.
  8. फुरसतिया » फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1. कान से होकर कलेजे से उतर जायेंगे 2.विकिपीडिया – साथी हाथ बढ़ाना… 3.गलत हिंदी लिखने के कुछ सरल उपाय 4.चिट्ठाचर्चा,नारद और ब्लाग समीक्षा 5.मूंदहु आंख कतहुं कछु नाहीं 6.अपनी रचनायें भेजें 7.लिखिये तो छपाइये भी न! 8.जेहि पर जाकर सत्य सनेहू 9. इसे अपने तक रखना 10.सुबह की सैर के बहाने पालीथीन से मुलाकात 11.प्रत्यक्षा- जन्मदिन के बहाने बातचीत 12.हिंदी में कुछ वाक्य प्रयोग [...]

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