Tuesday, August 05, 2008

ईमानदारी गर्व का विषय नहीं है

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34 responses to “ईमानदारी गर्व का विषय नहीं है”

  1. ई-स्वामी
    “हम जित्ता रख पाये रख रहे हैं बाकी आपके लिये छोड़ दिया।”
    आपने जित्ता रख दिया है उत्ता ही उठ जाए बहुत है .. चूंकी बात में वजन है!
  2. alok puranik
    सही कहा है जी
    ईमानदारी गर्व का नहीं, शर्म का विषय है।
    ईमानदार बंदे की बीबी कलक्टरगंज में शापिंग कर पाती है
    बेईमान की सिंगापुर जाती है.
    बताइए बीबी के सामने कौन शर्मिंदा होता है।
  3. कुश
    ईमानदारी गर्व का विषय नहीं है।
    कितनी सही बात है.. और ये भी सही की आज के समय में ईमानदारी “मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी हो गयी”
    धन्यवाद इस लेख के लिए
  4. vivek
    पर यह भी तो गौ़र करने लायक बात है की सिस्टम में बेईमानी इस तरह पकड़ बना चुकी होती है की सारा तंत्र भ्रष्टाचार पर आधारित हो जाता है. यानि भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार बन जाता है. अब ऐसे में एकदम ही अप्रत्याशित रूप से सीन में ‘ईमानदार अधिकारी की एंट्री’ होती है. साथी कर्मचारियों, आधीनस्थों एवं उच्चाधिकारियों को ईमानदार लोगों से निपटने के कुछ गुर आते ही हैं, पर फजीहत उस अन्तिम व्यक्ति की होती है जो दफ्तर में अपना काम करवाने भटक रहा है. कोई खूसट ईमानदार अचानक आता है और ‘चलन के अनुसार’ रिश्वत के लिए मोलभाव (जो की यहाँ की अब तक सामान्य बात थी) करने वाले का काम रुकवा देता है, या कभी कभी अन्दर भी करा देता है. अपमान हमेशा कमज़ोर का ही होता है, फ़िर चाहे गलती उसकी हो या न हो, ताक़तवर पर शायद ही कोई अपनी ईमानदारी दिखाता है.
    पर ऐसे मामलों में उस इन्सान की गलती कहाँ है जो ‘नॉर्म’ के अनुसार ही चल रहा है, ईमानदार अफसर ने अपनी ईमानदारी की कुंठा उसपर निकाल दी, जबकि गलती उसके साथ और उससे पूर्व पदस्थ अधिकारीयों की थी.
    यह दफ्तर कोई शिक्षण संस्थान, न्यायलय, सरकारी विभाग, मंत्रालय या फ़िर कुछ और भी हो सकता है. ऐसी ईमानदारी से भगवन बचाए!
  5. Gyan Dutt Pandey
    ईमानदारी तो व्यक्ति के मूलभूत गुणों का प्रश्न है। पर ईमानदारी का सटल प्ले ऑफ कार्ड (subltle play of card) को मैं मैटर ऑफ टैक्टिक्स (matter of tactics) मानता हूं। उसी तरह जिस तरह जैसे टाटा स्टील कहता है कि हम स्टील भी बनाते हैं!
    लिखा अच्छा!
  6. अशोक पाण्‍डेय
    स्थिति यह है कि ईमानदार बनो और चोकर खाओ। अब जब सभी लोग लजीज पकवान खा रहे हों, गाय-भैंस की तरह चोकर खाने में शर्म तो आनी ही है। :)
  7. Dr .Anurag
    आज सुबह आते आते चैनल बदल रहा था रिमोट से तो पेज -३ मूवी के आख़िर के कुछ सीन आ रहे थे उसमे एक पत्रकार कहता है की सिस्टम को बदलने के लिये तुम्हे इस सिस्टम में रहना होगा ….आपने पिछले लेख में लिखा था .इमानदारी को मेनेज करने के बारे में…..वही बात है आप कितनी इमानदारी मेनेज कर पाते है ?कुछ तो मेनेज कीजेये …या आप झूठ को सामाजिक स्वीक्रति दिलवाना चाहते है……ताकि आत्मा पर कोई गिल्ट न रहे …. इमानदारी सिर्फ़ पैसे से नही टोली जाती ..आपमें कितनी इन्सनायित है,रिश्तो में ,दोस्ती में ,पड़ोसी के प्रति ,समाज के प्रति ,अनजान पशु के लिये ,अनजान इंसान के लिये …..कही तो मेनेज करना होगा ना?
  8. anitakumar
    ईमानदार बने रहने के लिये जरूरी है कि आपको लोग ईमानदार व्यक्ति के रूप में जानने से पहले एक सक्षम , कार्यकुशल और ऐसे व्यक्ति के रूप में जाने जिसके जैसे लोग कम हैं। तार्किकता, व्यवहार कुशलता, अभिव्यक्ति क्षमता, दुविधा रहित विचार ऐसी चीजें हैं जो जितनी मात्रा में होंगी वह आपकी ’कोर ईमानदार’ की रक्षा करेंगी।
    एकदम सटीक बात कही, और चिन्ताइए मत, आप ने अपनी बात बहुत अच्छे से कही, पूरे दमखम के साथ स्टीली बात है जी, आप कह सकते हैं हम मौज ले सकते हैं, कविताई हो सकते है, गंभीर बातें भी कर सकते हैं और हां हम ब्लोग भी लिखते हैं।
    हम तुंरत आप की बात से सहमत हो जायेगें।
    बहुत अच्छा लिखा है और एक्दम विचारणीय बात है
  9. राज भाटिया
    ईमान दार बनने के लिये पहले हमे अच्छा इन्सान बनना होगा , फ़िर ईमान्दार को ( ईमानदारी गर्व का विषय नहीं है) इन सब बातो से कोई मतलब नही, क्योकि उसे इन सब बाते के लिये समय ही नही होता,क्यो कि बो ईमान दारी दिखाबे के लिये या दुसरो को खुश करने के लिये, या अपने झण्डे गाडने के लिये नही करता, उसे तो आदत हे, एक नशा हे, एक पुजा हे बस उसे उसी मे मजा आता हे,उसे कोई बेईमान भी कह दे उस की ईमानदारी मे कोई फ़र्क नही पडता,
    धन्यवाद
  10. bhuvnesh
    बहुत सही विश्‍लेषण
    ईमानदारी अपने-आप में कोई ऐसी चीज नहीं है जिसकी प्रशंसा हो….बाकी चीजें उसे पूर्ण बनाती हैं…ये तो बस पूरक है आपके गुणों की
    बहुत कुछ लिखने का मन हो रहा है….हालांकि मेरा अनुभव कुछ ज्‍यादा तो नहीं है पर कोशिश करूंगा इसे एक पोस्‍ट का रूप देने की
  11. Dr. Chandra Kumar Jain
    सही…सटीक…विचारणीय
    और मननीय…प्रेरक भी.
    ====================
    डा.चन्द्रकुमार जैन
  12. समीर लाल 'उड़न तश्तरी वाले'
    आज के जमाने की चाल को देखते हुए ईमानदारी जैसे एक कठिन विषय पर अति सधा हुआ आलेख देख कर बहुत प्रसन्नता हुई. वाकई ईमानदारी की विषय में इतनी ईमानदारी से लिखना एक ईमानदार व्यक्ति के लिए ही संभव है. आपको साधुवाद इस प्रेरक आलेख के लिए. आगे भी ऐसे ही जागृतिपूर्ण आलेखों की आशा है.
  13. प्रियंकर
    गम्भीर और ज़रूरी विषय पर बहुत सरल-सहज किंतु वैचारिक खुराक से भरा-पूरा लिखा है .
  14. दिनेशराय द्विवेदी
    लोग ईमानदारी भी सापेक्ष चाहते हैं। जैसे मेरे मुवक्किल मुझ से चाहते हैं कि मैं उन के प्रति ईमानदार रहूँ। लेकिन यह भी चाहते हैं कि उन का काम कराने के लिए बेईमानी करनी पड़े तो अवश्य करूँ। ईमानदार समझे जाने के कारण बहुत से लोग हमें अपना वकील चुनना ही पसंद नहीं करते। लेकिन ईमानदारी के अपने लाभ भी बहुत हैं. अनेक बार आप के मुंह से निकली बात को ही सबूत मान कर जज निर्णय कर देते हैं जानते हैं कि आप ईमानदार हैं और गलत नहीं कहेंगे। आदि आदि।
    आप ने इस विषय को छू कर फिर से चर्चा का विषय बना दिया है। हो सकता है इस विषय पर अनेक आलेख पढने को मिलें वैसे आप को भी यह विषय प्रेमचन्द जयन्ती पर नमक का दरोगा कहानी से स्मरण हो आया है। मुंशी प्रेमचन्द जी के साहित्य की यही तो खूबी है।
  15. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    @vivek
    “अप्रत्याशित रूप से सीन में ‘ईमानदार अधिकारी की एंट्री’ होती है. साथी कर्मचारियों, आधीनस्थों एवं उच्चाधिकारियों को ईमानदार लोगों से निपटने के कुछ गुर आते ही हैं, पर फजीहत उस अन्तिम व्यक्ति की होती है जो दफ्तर में अपना काम करवाने भटक रहा है. कोई खूसट ईमानदार अचानक आता है और ‘चलन के अनुसार’ रिश्वत के लिए मोलभाव (जो की यहाँ की अब तक सामान्य बात थी) करने वाले का काम रुकवा देता है, या कभी कभी अन्दर भी करा देता है. अपमान हमेशा कमज़ोर का ही होता है, फ़िर चाहे गलती उसकी हो या न हो, ताक़तवर पर शायद ही कोई अपनी ईमानदारी दिखाता है.”
    यहाँ जिस ‘ईमानदार अधिकारी’ की चर्चा विवेक जी ने की उसी की कथित ईमानदारी की निरर्थकता की ओर अनूप जी ने इशारा किया है। जो ईमानदारी deliver न करे, अच्छे परिणाम न दे, दूसरों को राहत न दे, अपनी संस्था और समाज के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक न हो, वह ईमानदारी किस बात का गर्व करेगी?
    अनूप जी, हम आपकी विचार-श्रृंखला के मुरीद होते जा रहे हैं।
  16. डा.अमर कुमार
    ईमानदारी से कहूँ तो इस आलेख में ऎसा कुछ भी नहीं है,
    कि किसी टीका-टिप्पणी की आवश्यकता हो, जाट के मित्र
    यानि डाक्टर अनुराग की लेखनी ने इसकी पुष्टि कर दी है ।

    ईमानदारी तो केवल इतना ही चाहती है कि हर व्यक्ति
    अपनी अपनी जगह पर अपने हैसियत के अनुरूप ही सही
    अपने कार्य व पद के प्रति निष्ठावान रहे, तो भी ईमानदारी
    को आक्सीज़न पर रखे जाने की ज़रूरत ख़त्म हो जाती है ।
    एक बड़ेबाबू, जो एक पैसे के भी गुनाहगार नहीं रहे हैं, वह
    दफ़्तर में प्राक्सी लगा कर, उससे इतर व्यक्तिगत कार्य करते
    हुये बरामद होते हैं, तो निश्चय ही वह ईमानदार तो नहीं कहे
    जा सकते हैं, कोई असहमति ? भला होनी भी नहीं चाहिये !
    ईमानदारी तो किंन्ही भी विज्ञजन से यह तक पूछ सकती
    है कि क्या आप अपने दफ़्तर के ब्राडबैंड के जरिये टिप्पणी
    तो नहीं प्रेषित कर रहे हैं ? बड़ा व्यापक है यह सब, छोड़िये भी..
    ईमानदारी तो मुझसे यह भी करवा चुकी है, कि ‘ यहाँ मेडिकल
    सर्टीफ़िकेट नहीं बेचे जाते हैं ‘ का डिस्प्लेबोर्ड लगाओ..और तुम
    खिसके हुये का ख़िताब पाकर भी मस्त रहो । चलता है..
    ईमानदारी तो मुझसे यह भी कह रही है कि, यह भी लिखो कि
    यहाँ तुम मूड़ हिलाने तो नहीं आये हो, या फ़ुरसतिया गुरु के
    भौकाल में हाज़िरी दर्ज़ करा रहे हो ? सुकुल तो जब कोई चेला
    शक्कर बनने बनने को होता है, तभी तो वह ज्ञान से आलिंगन
    करने को मचल उठते हैं ! तो मेरे पीछे पंक्तिबद्ध टिप्पणीकारों..
    ईमानदारी कहाँ पायी जाती है, मैं स्वयं ही अब तक इतने गली
    कूचों में ढूँढ़ चुका हूँ कि ईमानदारी के अते-पते की गुहार आपसे
    कर रहा हूँ , न कि किसी धवलवस्त्र धारी मठाधीष से ? राम राम ।
    पुनःश्च- अब तो राम का नाम लेना भी शक पैदा करता है, क्या करें ?
  17. ghughutibasuti
    बहुत अच्छा लेख! ईमानदारी कुछ बताने लायक उपलब्धि नहीं है, होनी ही चाहिए मानकर चलना होगा।
    घुघूती बासूती
  18. Smart Indian
    बहुत ही अच्छा लेख है. एक सामान्य गुन का एक बिल्कुल ही निराला पक्ष सामने रखा है आपने. एक सफल ईमानदार और एक पिटे हुए ईमानदार का अन्तर काफी हद तक यही है.
    आशा है सारे ईमानदार लोग आपके लेख से सबक लेकर और अधिक शक्तिशाली ईमानदार में परिवर्तित हो सकेंगे.
  19. Abhishek Ojha
    बात तो सही है… लेकिन गर्व करना समझ के भी अगर कोई इस जमाने में इमानदार है तो… बड़ी बात है :-)
  20. Tarun
    Imandaari waqai me garv ka vishay nahi hai, pehle hua karta hoga aajkal to katai nahi hai.
    Ab mayavati ko hi dekh lijye, kitni imandaari se ghus aur bemaani se mili kamai ko donation ki bata karoron ka tax sarkar ko de diya lekin phir bhi media peeche para hua hai.
  21. manish
    ई मान गए [:-)]
  22. Dr.Arvind Mishra
    मैंने यह बहुत ही सुविचारित लेख पढा और कुछ अंशों से तत्काल सहमति बनते ही असे कोट करने के लिए कट कर आगे बढ़ा तो क्या देखता हूँ कि अनिता कुमार ने ठीक उसी अंश को पहले ही कोट कर रखा है -अर्थात युग धर्म की सोच कई दिमांगो में एक साथ आ सकती है -अर्थात आपकी ,अनिता जी और मेरी सोच इस मुद्दे पर समान है -प्रकारांतर से यह सोच का विचारों की कसौटी पर सही उतरना है .
    “किसी भी सिस्टम में ईमानदार बने रहने के लिये जरूरी है कि लोग आपकी कार्यकुशलता, क्षमता, निर्णय की गुणता, दूरदर्शिता और और अन्य तमाम गुणों की बात यह कहते हुये कहें -और वो ईमानदार भी है।”
    यह भी जोड़ दूँ अब इमानदारी एक कुशल प्रबंधन का ही प्रगटीकरण है -कभी यह सच था कि यह प्रदर्शन की वास्तु नहीं है -पर अब का युग सत्य यह है कि यह प्रदर्शित होनी चाहिए .अब इमानदारी एक अपवाद ही है -तंत्र ऐसा हो चला है कि आपको अपने तई नहीं तो दूसरों के लिए बेईमानी पर उतरना पड़ रहा है .अस्तित्व का एक दूसरे तरह से सामाजिक व्यवस्था में हावी हो रहा है .तथापि आनेस्टी इस द बेस्ट पालिसी …..
  23. izmir evden eve
    thank you…
  24. विवेक सिंह
    मेरे विचार से तो लत ईमानदारी की भी बुरी . ईमानदार की इमेज में कैद होना भी बुरा . ईमानदारी को अन्य कीमती वस्तुओं की ही भाँति दूसरों की नजर से बचाकर रखें .
  25. masijeevi
    ईमानदारी की छवि जब कैद हो जाए तब तो गड़बड़ ही है।
    अच्‍छा लिखा… एकदम खांटी ईमानदारी की परिभाषा मतलब पैसे की ईमानदारी के मामले में तो हमारे काम की नहीं…(मास्‍टर का मतलब ही है ईमानदार कयोंकि उसके पास बेईमानी के अवसरे ही नीं होते) लेकिन बहत्‍तर संदर्भ में ‘हम ईमानदार हैं… हमसे और कोई अपेक्षा न रखें’ सिंड्राम सबसे ज्‍यादा स्‍टाफरूम में ही दिखता है।
  26. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] ईमानदारी गर्व का विषय नहीं है [...]
  27. : सुबह जल्दी उठने के बवाल
    [...] तो लगता है कि आपने कहीं और नौकरी की है।ईमानदारी कोई गर्व का विषय नहीं है। यह तो अपरिहार्य स्थिति है। ईमानदार [...]
  28. sushma
    आपका लेख रोचक है, लेकिन इमानदारी का दम अकुशल व्यक्ति जिसे अपने काम की ठीक से जानकारी न हो और सही गलत का नैतिक चुनाव करने की क्षमता न हो, नहीं भर सकता. और अगर आपके मूल्यों के बीच बहुत से लोगों के लगातार अपने इंटरेस्ट हर्ट होते रहे, उनका आर्थिक /सामाजिक नुक्सान हो तो आप निसंदेह असामाजिक और खडूस हो जायेंगे, आपका स्वभाव कितना भी मीठा हो, नीयत कितनी भी भलमनसी की क्यूँ न हो, आप पोपुलर और इमानदार एकसाथ नहीं हो सकते, कम से कम हमारे जुगाणु सामाजिक संरचना में. और अब तो अप्रासंगिक भी क्यूँ की अब सपने में भी इमानदारी सामाजिक वैल्यू नहीं रही, सब जुगत भिड़त का संसार का ही सपना बचा है. उन्होंने ठीक ही कहा इमानदारी किसी भी प्रकार गर्व का विषय इस समाज में नहीं है.
    sushma की हालिया प्रविष्टी..कथा सिर्फ कहवैया की गुनने की सीमा हैं
  29. MrigankAgrawal
    Bahut kroon.
  30. sanjay jha
    बाते गड्डम गड्ड हो गया………
    टाप्चिक
    प्रणाम,.
  31. राजेन्द्र अवस्थी
    आदरणिय, ये सत्य है कि आपकी लेखनी विषय कोई भी हो सम भाव के साथ त्वरित निचोड़ प्रस्तुत करती है…आपका प्रत्येक लेख मेरा मार्ग प्रशस्त करता है।
  32. वीरेन्द्र कुमार भटनागर
    “ईमानदारी की आड़ में तमाम लोग अपने तमाम दूसरे नकारात्मक गुण……………………………………………………………. घंटों ईमानदारी पर प्रवचन देते हैं।”
    “ईमानदार बने रहने के लिये जरूरी है कि…………………………………………………………………….. वह आपकी’कोर ईमानदार’ की रक्षा करेंगी।”
    आपका लेख, विशेषकर उपरोक्त लाइनें, पढ़कर मुझे सिर्फ एक ही विचार आया, काश ऐसा कोई लेख मैंने पहले पढ़ा होता या श्री द्विवेदी जैसे ईमानदार और निर्भीक व्यक्ति से मिलने का अवसर मुझे भी मिला होता ।
  33. Rekha Srivastava
    ईमानदारी को हम किस रूप में परिभाषित कर रहे हैं . हमारी ईमानदारी क्या सिर्फ एक क्षेत्र से जुडी हुई होती है नहीं इसके लिए बहुत सारे पक्ष है , ईमानदारी जीवन के रिश्तों के साथ , ईमानदारी परिवार के प्रति दायित्वों के साथ , ईमानदारी अपने कार्यक्षेत्र में कार्य और अपने जिम्मेदारियों के साथ . इसको बखानने की जरूरत अपने आप नहीं होती है . अगर आप ईमानदार है तो वह खुद ही दूसरे के मुंह से निकल कर सामने आ जाता है . जैसे हीरे की चमक ही उसकी कीमत बताती है वैसे ही ईमानदार होना अपने आप में एक अलग मायने रखता है और सबको समझ आता है और कोई कहे न कहे लेकिन उसके प्रति जो सम्मान होता है वह स्वयम ही प्रकट होता है .
    Rekha Srivastava की हालिया प्रविष्टी..डाक तार सेवायें !
  34. Prakash Govind
    बेहतरीन पोस्ट है
    ईमानदारी भी अब विलक्षण वस्तु बन चुकी है, सम्भवतः आगे चलकर ‘ईमानदारी दिवस’ मनाने की परंपरा भी शुरू हो जायेगी !
    -
    -
    एक बात और
    सभी भ्रष्टाचारियों, लुटेरों और अत्याचारियों ने मिलकर एक और भ्रामक सवाल उत्पन्न कर दिया है कि “हिंदुस्तान में लोग तभी तक ईमानदार हैं, जब तक उनको बिकने का मौका नहीं मिलता”…..
    अक्सर लोग इसके भ्रमजाल में फंस भी जाते हैं……ऐसा कहने भर से ही समाज को कितना नुकसान पहुँचता है, उन्हें नहीं मालूम …. ऐसा कहने से समाज को कोई फायदा नहीं होता, उल्टे ईमानदार आदमी का मनोबल गिरता है, वह तो हतोतसाहित (Demoralized) होता ही है ,,,साथ ही बेईमान आदमी की हौंसला आफजाई होती है !
    Prakash Govind की हालिया प्रविष्टी..एक दिलचस्प और सच्चा किस्सा

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2 comments:

  1. बहुत अच्छा लेख।ईमानदार अफसर/कर्मचारी को शेरदिल होना पड़ेगा।बिना सन्देह का निर्णय/बिना लॉग लपेट,दूरदर्शिता चाहिए।या यूँ कहे,चीते की रफ्तार और बाज की नज़र चाहिए।कुल मिलाकर ईमानदारी कमजोर लोगो का शगल नहीं।

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