Monday, July 13, 2009

अथ बारात कथा

http://web.archive.org/web/20140419214638/http://hindini.com/fursatiya/archives/568

43 responses to “अथ बारात कथा”

  1. लावण्या
    बारातोत्सुक।
    आज दूसरे भाग से पढना शुरु किया और हम भी बाराती से बन गए जी :)
    बहुत प्रवाह लिये लिखा है
    और ऐसे शब्द बस ..आप “पेटन्ट ” करवा लो !
    सच !
    -लावण्या
  2. Prashant (PD)
    बहुत चांई-चुई किये आप मगर ई नहीं बताये कि बरात में गए और नाचे काहे नहीं?
    सेंत ख़राब होने का डर था क्या?
    कहीं किसी को इम्प्रेस करने का इरादा तो नहीं बना रहे थे?
    इसे पढ़कर डिलीट कर दीजियेगा, कहीं आपकी मैडम ने यह पढ़ लिया तो इन सवालों से ही आपका सर फोड़ देंगी.. :D
  3. गौतम राजरिशी
    ऊपर दुल्हे के विस्तृत वर्णन ने ये सुबह-सुबह आफिस में बड़ा मनोरम मूड बना दिया है.फुरसत में बैठे हैं आज हम{हम यानि कि तीन और फौजी साथ बैठे आपकी इस कथा-शैली का लुत्फ़ उठा रहे हैं}
    ….
  4. seema gupta
    “समीरलालजी गुलाबी पगडी मे छा गये जी , वर वधु की मनमोहक चित्र ने मंत्रमुग्ध किया और बारात के सजीव चित्रण ने जैसे हमे भी भावनात्मक रूप से वहां उपस्तिथ कर दिया. बाकी तो आप फुरसतिया हैं ही लिखने मे आपका जवाब नही ….. इस आलेख के लिए १०१ नम्बर हा हा हाहा हा ”
    Regards
  5. विवेक सिंह
    सुन्दर वर्णन ! वाह !
  6. Ghost Buster
    भले मेजबान की ऐसी खिंचाई कोई ठीक बात है? लेकिन समीर जी तो अनुभवी हैं. बचपन से ही लोग उनके गाल खींचते आ रहे हैं. फ़ुरसतिया जी खाल पर आ गये हैं.
    हमेशा की तरह कमाल का लेखन. पर पिछली पोस्ट पर हमारा कमेन्ट काहे नहीं दिख रहा है? भई, तारीफ़ ही करे थे.
  7. mamta
    कल वाली post तो नही पढी पर बारात मे शामिल होकर अच्छा लगा और इसे पढ़ते हुए हमने भी खूब मजे लूटे बारातियों की तरह । :)
  8. irshad
    क्या बात है अनूप जी तो कमाल हुए जा रहें है। जितना खर्चा इस बारात में आया होगा उतना ही खर्चे वाली ये बारात पोस्ट है। तिवारी जी के प्रति आपकी सवेंदनाए भावूक है। लेकिन स्टाइल अपनी जगह है।
    मंदी के दौर से गुजरते अमेरिका के लिये यही मुफ़ीद है कि वो तिवारी टी स्टाल में चाय पिये और पैसे बचाये।
    तिवारी जी साल भर पहले चले गये दुनिया से। फ़ोटो लगा था दुकान में। नीचे तारीखें लिखीं थीं आने-जाने की।
    एक बात बिल्कुल साफ है कि समीरजी के राज खोलने में सभी ब्लॉगरों को मजा आता है। मैं तो ये मजा (2008
    समीर लाल (उड़नतशतरी) ब्लॉग जगत के डेविड धवन है
    ) पहले ही उठा चुका हूं। वैसे आपने बारात की आंखों देखा हाल सुना दिया। और को आर्थिक मंदी से बचने के कारगर उपाय भी। बेहतरीन लेखन के लिए फिर से बधाई।
  9. kanchan
    अब आया मजा बारात का…बावाल जी और सीमा गुप्ता जी को नये सिरे से जानने का मौका भी मिला…धन्यवाद
  10. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    हम बारात में गये होते तो भी इतना सतरंगी ऑब्जर्वेशन न कर पाते।
    प्रियंकर जी से कलम मांग रहा था मैं लेखन के लिये, पर आपसे झटकना हो तो यह ऑब्जर्वेशन की दृष्टि झटकनी होगी!
    कमाल का लेखन!
  11. डा. अमर कुमार

    अभी तो फ़ेरे-वेरे तक पोस्ट के पहुँचने में विलम्ब है..
    मैं ज़रा पूछ कर आता हूँ कि, एन०आर०आई० दूल्हे की बारात में..
    ‘ यह देश है वीर ज़वानों का…’ बजता है, तो समधी जी क्या महसूस करते होंगे ?
    और, एक एतराज़ भी आपकी पंचायत में दर्ज़ की जाये..
    यहाँ चित्र तो कट-पेस्टीय तकनीक से टाँचें गयें हैं..
    ओरिज़िनलवा कहाँ छोड़ आये हाय मेरे गुईंयाँ ?
    पूरा का पूरा बयान भी ओरिज़िनल नहीं है, यह तो ठहरा..
    बयान-ए- अभिनव की शादी में फ़ुरसतिया दीवाना :)
    शादी किसी की.. बयान आपका.. ओरिज़िनल ?


  12. Dr.anurag
    सावधान ……विश्राम ….
    वाकई फोटो में यही मुद्रा है.चलिए हम बारात में नही गए तो क्या हुआ आँखों देखा हाल तो सुन लिया …वैसे कार्ड से लाईट जालने वाले होटल तो बहुतेरे है…ये चाभी वाले होटल कौन से है ??? आपने अपनी फोटो नही दिखाई…..हम सुनिश्चित करना चाहते है की आपने वो लाल स्वेटर तो नही पहना….हमने समीर जी को खास हिदायत दी थी की आपके लाल स्वेटर की….जरा फोटो तो दिख्वाये .
  13. Abhishek
    क्या वर्णन है मजा आ गया !
    ‘ये देश है वीर जवानों का’ हर शादी में क्यों बजता है?
  14. Shiv Kumar Mishra
    शानदार!
  15. नितिन
    जबलईपुरिया किस्सों की बात ही कछु और!
    मजा आ गया।
  16. ranjana
    वाह ! आपके सजीव विवरण ने तो वह रस दिया जैसे लगा हम भी उस बारात में शरीक हों.और आपकी व्यंग्य की धार…..क्या कहूँ ! आनंद आ गया ! लाजवाब !
  17. समीर लाल
    विवरण पढ़कर तो हम भी झूम गये
    . वैसे आप कोई रुपया नहीं बचा पाये. अब होटल की चाय २५ रुपये की हो या ५० की. आपको तो फ्री ही मिलती, फिर काहे ३ रुपये का खून किये. :)
    अगर बारात में आप भी नाच देते तो जबलपुरिये तो ठिठक ही जाते कनपुरिया नाच देख कर
    . ठीक ही किये कि नहीं नाचे. बवाल हमारा सत्य का पुजारी है, जो सच है वही बोलता है. हम तो शुरु से आजमाये हैं उसे, जब वह छात्र था.
    कव्वाली जो आप समझे वो गलत
    . ये वाली तो नवम्बर में बम धमाको पर लिखी गई थी. प्रोग्राम में नहीं गाई गई अतः आप होते तो भी हूट न कर पाते बल्कि हमारे साथ ठुमका लगाते नजर आते. :)
    जो गज़ल बवाल ने गाई
    ( अन्य अनेक गज़लों के साथ) वो थी:
    कब से उधार बाकी है, इक तेरी नजर का
    अब तक खुमार बाकी है, इक तेरी नजर का.
    जिंदा हूँ अब तलक मेरी सांसे भी चल रहीं,
    उन्हें इन्तजार बाकी है, इक तेरी नजर का.
    उम्दा कलाम मेरा सब शेर सज चुके हैं
    केवल शुमार बाकी है, इक तेरी नजर का.
    महफिल सजाऊँ किस तरह, अबकी बहार में,
    पल खुशगवार बाकी है, इक तेरी नजर का.
    दम अटका है जिगर का, कमबख्त नहीं निकले
    तिरछा सा वार बाकी है, इक तेरी नजर का.
    बिछड़े हैं हम सफर में, कुछ दूर साथ चल ले
    दिल तलबगार बाकी है, इक तेरी नजर का.
    अब के समीर कह गया बिन गाये ही गज़ल
    साजों पे वार बाकी है, इक तेरी नजर का.
    -समीर लाल ‘समीर’
    बाकी सब चकाचक
    . आप थे तो बहार थी. क्रमशः का इन्तजार है.
  18. amit
    वाह, आनंदम आनंदम! पढ़ते हुए मुस्कान जाने का नाम ही नहीं ले रही थी, एक-एक पंक्ति हास्य रस में डूबी! :D शुरु में जो दूल्हे का वर्णन लिखे हैं कि दूल्हा कैसा लगे है, पढ़कर हंसी के मारे लोट-पोट, स्टीक लिखे हैं! :D
    ठहरने का इंतजाम समीरलाल जी ने धांसू च फ़ांसू किया था। मार्डन टाइप होटल। कमरे की बत्ती जलाने के लिये चाबी घुसानी पड़ती। पहली बार देखे ई जलवा।
    आजकल मॉडर्न होटलों में ऐसा ही होता है, चाबी की जगह कार्ड होता है जिसको द्वार में लगाओ तो ताला खुलता है और फिर कमरे की दीवार में एक खाँचा होता है जिसमें उस कार्ड को डालो तो कमरे में बिजली प्रवाह आरंभ होता है! एकदम विलायती ईश्टाईल! :)
  19. ranju
    बढ़िया शानदार .हम भी शादी में शरीक हो लिए आपके माध्यम से
  20. dhirusingh
    अरे जबलपुर शादी मे तो हम भी शामिल थे पढ़ कर लगा . कानपुरिया जादू चल गया क्या लिखते तो हो आप अब आप पर भी नज़र रखनी पड़ेगी .
  21. प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर
    सच्ची में !!
    ओवेरनाईट नहीं काफीनाईट फ़ुरसतिया
    बड़ा ही चकाचक सीधा प्रसारण!!
    दुई थो ठुमका लगा देतेव महाराज तो का बेगार जात?
  22. ताऊ रामपुरिया
    भाई फ़ुरसतिया जी, आपने तो ऐसा लाजवाब सीन लिखा है कि वहां रुबरु होकर भी ऐसा आनन्द ना आता. और अब पछता रहे हैं कि हम काहे को मना किये? हमको भी शामिल हो ही जाना था. खैर
    अब आप वहां थे तो यह “किस्सा-ए-जबलपुर” पढकर भी वो कमी पूरी हो जायेगी. आप तो फ़ुरसतिया दृष्टि ने जो देखा वो लिखते रहिये फ़िर किसी को मलाल नही रहेगा.
    आज ताऊ-एक्सप्रेस जरा लेट चल रही है सो सबसे आखिर मे भागते दौडते पहुंच पाये हैं. :)
    रामराम.
  23. Arvind Mishra
    मजा आ गया आँखों देखा विवरण पढ़ कर ! गम नही गर पहुँच बही सका -वृत्तांत से दृश्य साकार हो रहे हैं !
  24. दिनेशराय द्विवेदी
    सुबह पढ़ नहीं पाए थे बारात का हाल, शाम को अदालत से लौटते ही बिना कोट उतारे बैठ गए पढ़ने। पढ़ पढ़ा कर साढ़े तीन मीटर लम्बी टिपिया भी ली कि बिजली ने ऐसी झपकी मारी कि कम्प्यूटर वहीं से रीस्टार्ट। सारी मेहनत अकारथ गई। मजा काफूर हो गया।
    अच्छा ही हुआ इस बीच समीर जी का संशोधन आ गया। बारात वैसी ही रही जैसी आम तौर पर रहा करती है। फर्क था तो ये कि और बारातों में फुरसतिया नहीं होते, इस में वह भी थे।
    अच्छा ये किये कि समीर लाल जी की आप ने भी तारीफ कर दी। वरना बाकी बातें कहने के लिए आप ने बबाल भाई का चुनाव बिलकुल गलत कर लिया था। वाकई बबाल खड़क जाता तो बरात का क्या होता?
    टिपियाना अगली किस्त में बाकी रहा, दुबारा मेहनत नहीं हो रही है।
  25. neeraj
    भाई जी सच कहते हैं आनंद आ गया…इत्ता बढ़िया वर्णन किया है की क्या कहें…ये आप के ही बस की बात है…अभी तक जे न बताया की खाया क्या…हमने कल भी पूछा था आपने बताया ही नहीं…भाई आज फ़िर मुहं में लार भरे बैठे हैं…आप बताएं और हम टपकायें…
    नीरज
  26. बवाल
    जनाब फ़ुर्सतिया जी,
    वैसे तो मेरी पुरज़ोर पैरवी, मेरे आदरणीय समीरलाल जी और गुरुजी द्विवेदी जी ने कर ही दी है तो अब कुछ कहने सुनने की क्रमश: के अलावा बनती नहीं । मगर एक वक़ील होने के नाते मुझे अपनी थोड़ी पैरवी तो करनी ही चाहिए ना । और वो ये के सबसे पहले मुझे इतनी बड़ी तवज्जो देने के लिए आपको सादर धन्यवाद और साधुवाद । मैं जो लगातार समीर भाई के साथ बना रहा वो भी इतने सुन्दर ढ़ंग से शायद जबलपुर की कथा बयाँ न कर पाता, जो आपने की । रही बात “मन तो किया कि बबालजी को सब खुलासा करके बता दें कि समीरलालजी की असलियत क्या है और वे उत्ते भले हैं नहीं जित्ते दिखते हैं (कम हैं या ज्यादा है क्या हैं ये हमही जानते हैं)” की, तो बड्डे यहाँ भी पिंटू के ज़माने के टुन्नू हैं, अत: ख़ुलासे वुलासे का शौक़ न फ़रमाना ही बजा है आपके लिए । और बात सीमाजी की, तो उनके इस regards का पासवर्ड, लगता है आप भी नहीं तोड़ सके हैं, और आपकी बात से ही ऐसा लग रहा है के आप भी शुरुआती दौर में रघुनाथ हो चुके हैं उनसे. सड़कें तो लगभग बिरहाना रोड जैसी ही हैं सब यहाँ भी, हाँ ये अलहदा बात हुई के “तेरे गाँव की गंगा और मेरे गाँव नरब..दा की, बोल भैया बोल, तुलना होगी क्या कहीं ?”
    कहाँ सेहरा और कहाँ मर्सिया पढ़ना है, ये इल्म न होता तो बवाल क़व्वाल न होता महज़ वबाल होता ।
    आपने इतना वक्त निकाल कर इतना बेहतरीन भेड़ाघाट और शादी दर्शन कराया, फ़ुरसतिया साहब आपका बहुत बहुत आभार और सादर चरण स्पर्श ।
    आज से आपका भी शागिर्द-ओ-मुरीद ।
    —बवाल
  27. बोधिसत्व
    आप की कलम ने हमें भी बाराती बना दिया……समीर जी के समधी और समधन का विवरण नहीं आया…
  28. शादी में जाना भी एक आफ़त!! - दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!
    [...] अनूप जी बारात कांड बाँचे तो इधर एक प्रश्न पुनः मुँह उठा [...]
  29. deepak
    post aour badi hona thi
  30. SHUAIB
    पहले तो लगा बिनबुलाया मेहमान हूं फिर पूरा पढकर लगा बाकाईदा हमे भी बारात मे बुलाया है। बहुत दिनों बाद लम्बासा लेख पढकर मज़ा आया। शुक्रिया हमे भी बाराती बनाने का :)
  31. Dr Prabhat Tandon
    बारात का सजीव वर्णन और आपके चटपटॆ अन्दाज , दूल्हे की सही व्याख्या , इसी को कहेगें ” भई वाह जनाब !! ” :)
  32. शशि सिंह
    द्फ्तर में तनिक फुरसत पा बारात में आपके क्या हो लिये… हमारी बेकाबू हंसी से बगल वाले सहकर्मी सकपका गये कि कोई दौरा-औरा तो ना पड़ गया हमें। अपनी तबीयत ठीक है यह साबित करने के चक्कर में आपका आगा-पीछा बताते हुये आपके लक्षणों का खुलासा करना पड़ा। पर उन्हें यकीन तो तभी आया जब हमने अपने कम्प्यूटर का स्क्रीन उनके हवाले कर दिया। कहने की जरूरत नहीं कि तब मेरे सहकर्मी की हालत भी मेरी जैसी ही हो गई।
  33. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    बारात का विवरण तो उम्मीद के मुताबिक मजेदार है ही। मैं यहाँ बड़ी मेहनत से कट-पेस्ट करके यह बताता हूँ कि कोई ओवरनाइट फुरसतिया क्यों नहीं बन सकता। एक ही पोस्ट में इतनी ‘धाँसू च फाँसू’ लाइनें भला दूसरा कौन लिख सकता है…? देखिए न-
    …जब मैं किसी दूल्हे को देखता हूं तो लगता है कि आठ-दस शताब्दियां सिमटकर समा गयीं हों दूल्हे में।
    …गोद में कंगारूनुमा बच्चा (सहबोला) दबाये दूल्हे की छवि देखकर लगता है कि कोई सजीव बांगड़ू कोलाज चला आ रहा है।]
    …इससे हमारे इस सिद्धांत की पुष्टि हुई कि चीजे चाहे जितनी मार्डन हो जायें लेकिन ठीक ठोकने-पीटने पर ही होती हैं। फ़िर वो चाहे किसी आधुनिक होटल का आटोलाक हो या तेल कंपनियों की हड़ताल।
    …पगडियों ने गंजो और बाल वालों के बीच का भेद भाव मिटाकर सबके चेहरे पर लड़के वालों का भाव बिखेर दिया था।
    …लोग दूल्हे को आसन्न जिंदगी के ह्सीनतम संकट से मुकाबला करने के लिये आशीष दे रहे थे।
    …हम लोग बारात बनकर खड़े हो गये।
    …थोड़ी देर में आज मेरे यार की शादी ने अपना कार्यभार यह देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का को थमा दिया
    …डांस करने में निकला पसीना सारी सुगन्ध की सरकार गिरा देता है।
    …आसमान सर्दी के बम गिरा रहा था। मुकाबले के लिये हमारे पास अंगीठी की तोपें और कोट-स्वेटरों के बख्तरबंद थे।
    …दूल्हा-दुल्हन की खूबसूरत जुगल-जोड़ी देखने में इत्ता मशगूल हो गये कि हम ध्यान ही नहीं दिये कि बहारों फ़ूल बरसाओ मेरा महबूब आया है गाना बजा कि नहीं।
    …हमने भी शरमाते हुये बताया हम फ़ुरसतिया हैं इसीलिये कानपुर से आये हैं शादी में।
    …युनुस की आवाज को अपने घर-शहर ने तवज्जो न दी तो अब मुंबई में छा गये।
    …अब भला बताओ कि किराया खर्चा करके हम वहां समीरलालजी की तारीफ़ सुनने गये थे क्या?
    …समीरलालजी की असलियत क्या है और वे उत्ते भले हैं नहीं जित्ते दिखते हैं (कम हैं या ज्यादा है क्या हैं ये हमही जानते हैं) ।
    …सीमाजी की शायरी में पीड़ा इत्ती है कि अगर ३२००० का सेंसेक्स उसे सुन ले तो बेचारा ३२०० और आकर खड़ा हो जाये।
    …बबालजी ने जो गजल गाई थी वो समीरलाल ने लिखी थी लेकिन इसके आगे का पता नहीं चल पाया कि समीरलाल को कहां से मिली थी।
    जय हो फुरसतिया महराज की। अगली किश्त जल्दी जारी हो… :)D
  34. जबलपुर के कुछ और किस्से
    [...] ने पिछली पोस्ट में टिपियाया कि गजल ऊ वाली नहीं पढ़ी [...]
  35. ghughutibasuti
    यह बारात श्रृखंला मुझसे न जाने कैसे छूट गई थी। सो आज पीछे और पीछे जाते हुए पढ़ रही हूँ। इतना आनंद तो कभी किसी विवाह या बारात में जाकर भी नहीं आया। गजब का लेखन है।
    घुघूती बासूती
  36. कुश
    चीजे चाहे जितनी मार्डन हो जायें लेकिन ठीक ठोकने-पीटने पर ही होती हैं।
    सुना है आपकी तबीयत बिगड़ गयी थी.. कहे तो इसी सिद्धांत को आजमाया जाए..
  37. अतुल शर्मा
    दूल्हे का ऐसा अद्भुत कोलाज :-) गजब कर दिया आपने!
    बारात के दोनों तरफ़ बिजली के हंडो की डांससीमा खिंची हुई थी।
    कमाल है ऐसा तो कभी सोचा ही नहीं था!!
    बहुत आनंद आया पढ़कर।
  38. mahendra mishra
    बहुत बढ़िया . भाई अनूप जी बारात के बाद आपको समीर जी ने हम लोगो के हवाले किया यदि पहले हवाले कर दिया होता तो जबलपुरिया ब्लॉगर भाई आपको पप्पू कांट डांस जरुर करवा देते फ़िर आप भी फोटो के साथ ब्लॉग जगत में खास चर्चित हो जाते.
  39. जबलपुर , कानपुर और जन्मदिन
    [...] अथ बारात कथा [...]
  40. प्रियंकर
    वाह वा !
    हम भी सूट-टाई पहन कर पढ रहे हैं ई पोस्टवा को . अरे भाई ! हम आपको पढ-पढ कर हियां बैठे-बैठे बराती होने का लुत्फ़ ले रहे हैं . धांसू ऑब्जर्वेशन और झकास विवरण .
    देश का वीर जवान होकर नाचे काहे नहीं ? तब आपके नम्बर कट . बिना नाचे कौनो भकुआ आदर्श बाराती नहीं हो सकता .
  41. anitakumar
    :) मजेदार, बहुत पैनी दृष्टी है।
  42. puja upadhyay
    वाह जी, क्या वर्णन किया है बारात का…पर सवाल ये है कि आप बरात में नाचे क्यों नहीं, और अगर नाचने से इतना डर था तो गए क्यों…बारात में जाने का मतलब तो सिर्फ़ और सिर्फ़ डांस होता है…और जो ऐसा नहीं कर रहे हैं निश्चित तौर से कहीं इम्प्रेस्शन बनने के लिए…और देखिये डरने कि कोई बात नहीं है, डांस में एक ही दो स्टेप होता है…एक तो हाथ ऊपर कर के उछल उछल के बोलो तारा रार रा कि स्टाइल में, या कमर पर हाथ रख कर ठुमका…अगली बारात में try कीजियेगा…ज्यादा मज़ा आएगा :D
  43. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] अथ बारात कथा [...]

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