Saturday, August 22, 2009

हरिशंकर परसाई के जन्मदिन के मौके पर

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30 responses to “हरिशंकर परसाई के जन्मदिन के मौके पर”

  1. mahendra mishra
    आज हरिशंकर जी परसाई जी के जन्मदिन के अवसर पर उम्दा स्मरणीय आलेख प्रस्तुति के लिए आभार.
    महेन्द्र मिश्र:शुक्रिया! :)
  2. mahendra mishra
    स्मरणीय आलेख प्रस्तुति के लिए आभार.

    महेन्द्र मिश्र: फ़िर से शुक्रिया।
    :)
  3. विवेक सिंह
    परसाई जी को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि ,
    वे अवश्य ही भोलाराम के जीव से स्वर्ग में मिल लिए होंगे,
    आपको गद्यकोश का लिंक देने का शुक्रिया,
    भगवान जाने आप अभी हमें कितनी अमूल्य जानकारियाँ देते रहेंगे,
    काव्यकोश का मालूम था पर गद्यकोश का पता आज ही चला !
    विवेक: जानकारियां अभी और मिलेंगी। चिन्ता न करो! :)
  4. Gaurav Srivastava
    bahut hi achha lekh
    गौरव: शुक्रिया।
  5. ताऊ रामपुरिया
    सबसे पहले तो परसाई जी को मेरी नमन. मैने परसाई जी को सिर्फ़ अखबारों के माध्यम से ही पढा और उनसे प्रभावित होकर बाद मे उनकी कुछ पुस्तके पढी. पर असल मे मैने परसाईजी को आपके माध्यम से ही जाना. और सच कहुं तो मुझको आपमे ही परसाईजी नजर आते हैं. आप बस ऐसे ही लिखते रहें. आपका यह प्रयास लोगों को सार्थक पढने को मजबूर करता है. जो अपने आप मे बहुत बडी बात है.
    रामराम.
    ताऊजी: आपको मुझमें परसाईजी को देखते हैं यह आपकी ब्लागनवाजी है। परसाईजी जैसे ग्लोबल और लोकल एक साथ् पकड़ वाले लेखक विरले ही होते हैं।
  6. अभिनव
    अति सुन्दर..
    अभिनव: अति शुक्रिया। :)
  7. विवेक सिंह
    नया फोटू अभी देखा !
    है तो अच्छा ,
    पर यह भी लेटेस्ट नहीं है, जाड़ों का है :)
    विवेक: हां भैया फोटो ठंडी का है लेकिन इसमें गर्माने की कौन बात है।
  8. Shiv Kumar Mishra
    शानदार पोस्ट है.
    परसाई जी का भीषण प्रशंसक हूँ. उनका लिखा हुआ पढ़ने के बाद ढेर सारे बदलाव आये हैं जीवन में. शायद कालजयी न लिखने का निर्णय ही उनसे कालजयी लिखवा गया है. त्यागी जी के अनुसार आजादी से पहले के भारत के बारे में जानने के लिए प्रेमचंद को पढिये और आजाद भारत को जानने के लिए परसाई जी को पढिये. मेरा मानना है कि त्यागी जी ने बिलकुल सही कहा था.
    उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धांजलि.
    शिवकुमार मिश्र: परसाईजी महान लेखक थे। उनके लेखन से प्रभावित होना और उनका भीषण प्रशंसक बनना सहज है।
  9. वन्दना अवस्थी दुबे
    परसाई जी को मेरा भी नमन. कितना अच्छा काम किया है आपने. परसाई जी को मैंने व्यक्तिगत रूप से तब जाना जब देशबन्धु समाचार पत्र में उपसम्पादक के पद पर रहते हुए रविवारीय पृष्ठों का सम्पादन मेरे हाथ आया. हालांकि परसाई जी उससे पहले से ’पूछिये परसाईं से’स्तम्भ लिख रहे थे. बाद में मेरी कई मुलाकातें उनसे हुईं, जो अविस्मरणीय हैं. परसाई जी मेरे भी पसंदीदा व्यंग्यकार हैं.आपको बहुत-बहुत बधाई.
    वन्दनाजी:शुक्रिया! आपसे निवेदन है कि आप परसाईजी से मुलाकातों के आधार पर अपने संस्मरण् लिखें।
  10. jyotisingh
    parsaai ji mujhe behad pasand hai unki kai rachana mere paas hai .kya vyang likhe hai unhone ,jawab nahi ,unhe shat shat naman .
    ज्योतिजी: परसाईजी के बारे में आपकी राय से सहमत हूं।
  11. काजल कुमार
    परसाई जी को अर्थपूर्ण तरीक़े से याद कर आपने दिल जीत लिया. असंख्य पाठकों की ही तरह परसाई जी मेरे भी प्रिय कालजयी लेखक हैं. आपका आभार.
  12. Anonymous
    sach kahun to Parsaai ji ko maine abhi aur aap ko pahale padhan shuru kiya..kuchh logo ko atishayoktibhi lag sakta hai magar, mujhe Parsai ji ap ki yaad dilate haiN
  13. समीर लाल
    शानदार पोस्ट. परसाई जी जन्म दिवस पर उनकी याद को नमन.
    आपकी पसंद में जबरदस्त कलेक्शन है, आभार प्रस्तुत करने का.
  14. kavita
  15. shobha
    मैं शाश्वत साहित्य रचने का संकल्प लेकर लिखने नहीं बैठता। जो अपने युग के प्रति ईमानदार नहीं रहता ,वह अनन्तकाल के प्रति कैसे हो लेता है,मेरी समझ से परे है।
    परसाई जी की ये पंक्ति मुझे भी बहुत पसन्द थी। उनकी सभी रचनाएँ प्रभावी रही। ऐसे सटीक व्यंग्य लिखने वाले लेखक को मेरा शत-शत नमन।
  16. अर्क्जेश
    खुशी हुई यह पोस्ट देखकर |
    मैं भी परसाई जी से ‘निन्दा रस’ से ही परिचित हुआ था | लेकिन तब माध्यमिक कक्शा के छोकरों को नहीं मालूम था की वे हिन्दी व्यंग के शिखर पुरूष को पढ़ रहे हैं | हाँ, हमें पढ़ने में मजा जरूर आया था | एक प्रश्न यह भी था की “निर्दोष मिथ्यावादी किसे कहते हैं” |
    “जब छल का ध्रितराष्ट्र आलिन्गन करे तो पुतला ही आगे करना चाहिए” अभी तक याद है |
    बाद में देशबंधु में ‘पूछिए परसाई से’ मैं जरूर पड़ता था | यह भी स्कूल के ही दिन थे | मुझे आर्श्चय होता था कि सारी दुनिया के राजनीति , इतिहास, साहित्य के प्रश्नों के उत्तर ये कहाँ से ढूंढ के दे देते हैं | लेकिन इसमें कोई शक नहीं की उनका अध्ययन बहुत विस्तृत था |
    उस कालम में किसी पाठक द्वारा किया गया एक प्रश्न याद आता है कि “यह क्यों कहा जाता है कि गुड गोबर हो गया, जबकि गोबर बहुत उपयोगी है ?”
    उत्तर था – “क्योंकि गुड में मिठास होती है, गोबर में नहीं|” :)
    “गद्य कोश” की जानकारी देने के लिए आभार |
    परसाई जी का व्यंग तिलमिलाने वाला तो है ही, उन्होंने किसी को नहीं बख्शा है | कबीर की तरह | मुझे सबसे अच्छी बात परसाई जी के लेखन में जो लगती है वह है उनकी भाषा-शैली कहीं भी ‘ओवर एक्टिंग’ की शिकार नहीं है | व्यंग में अतिरिक्त प्रभाव पैदा करने के लिए कहीं भी उन्होंने विचित्र शब्दों का प्रयोग नहीं किया, कहीं आलंकारिकता या क्लिष्टता नहीं| सहज भाषा | सीधी चोट करते थे |
    आपने अपने आलेख में लगभग सब कुछ समित ही दिया है |
    श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए |
  17. Saagar
    अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं.बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है
    क्या बात है.
    — वो हर साल हथियारों पर बजट बढ़ाने को ‘शांति में निवेश’ भी कहते है…
    परसाई जी को तो मैंने ज्यादा नहीं पढ़ा फुरसतिया जी, (कुछ एक बार विविध भारती पर हवामहल में सुना है) हाँ पर शरद जोशी को पढ़ा है, वो भी कमाल के लिखते है, कई बार तो जलील कर देते है, लेकिन बेशर्मी चाहिए उसको झेल जाने के लिए
    अपने कोर्स में मैंने व्यंग पर एक लेख पढ़ा था, कुछ बानगी
    १. लोकतंत्र जौंडिस के पेशाब का एक सैम्पल है,
    २. संसद एक दलदल है जहाँ पर कमल पर एक मेंढक बैठा है
    आपने बात हरिसंकर परसाई जी की तो उनके जन्मदिन पर उनको शत-शत नमन…
  18. Gyan Dutt Pandey
    शानदार।
    परसाई जी की ऑब्जर्वेशन पावर का एक परसेण्ट भी मिल जाये तो काम बन जाये!
    श्रद्धांजलि।
  19. घोस्ट बस्टर
    कितना कुछ पढ़ने के लिये बाकी है, कितना कम पढ़ पाये हैं अब तक. आपके यहाँ आकर अपनी हैसियत का पता चल जाता है.
    गद्यकोश के लिंक के लिये आभार.
  20. Dr.Arvind Mishra
    परसाई जी और शरद जोशी मेरे पसंदीदा व्यंगकारों में रहे हैं -परसाई जो को श्रद्धांजलि !
  21. venus kesari
    मेरे दिल की बात घोस्ट बस्टर जी ने कह दी
    अतः उनकी टिप्पडी को ही दोहरा रहा हूँ
    कितना कुछ पढ़ने के लिये बाकी है, कितना कम पढ़ पाये हैं अब तक. आपके यहाँ आकर अपनी हैसियत का पता चल जाता है
    कल तो रविवार है ओह सोरी, आज तो रविवार है :) कल ही जाते हैं पुस्तकालय और ले कर आते है “परसाई जी के व्यंग”
    वीनस केसरी
  22. sharad kokas
    भाई आपने बहुत मेहनत की है परसाई जी के यह वाक्य तो सूक्तियों की तरह इस्तेमाल किये जा सकते है . मै भी उनके रहते 5-6 बार उनके यहाँ हो आया हूँ और उनसे मिलकर सदा अपने ज्ञान को समृद्ध किया है । वे सच मुच चलते फिरते एंसाय्क्लोपीडिया थे 1000 वर्ष बाद भी उनकी रचनाओं का महत्व बरकरार रहेगा ।
  23. लावण्या
    विनम्र श्रद्धांजलि
  24. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह
    स्‍नातक स्‍तर में परासाई जी को पढ़ा था, आपके माध्‍यम से गाहे-बगाहे पढ़ने को मिल जाता है, लेखन कोई बहुत बड़ी कला नही है कोई भी लिख सकता है, सबसे बड़ी कला है पाठन क्‍योकि हर कोई पढ़ नही सकता है।
  25. परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 1)
    [...] हरिशंकर परसाई के जन्मदिन के मौके पर [...]
  26. दिनेशराय द्विवेदी
    यदि परसाई जी की रचना के साथ सभी उत्कृष्ट लेखकों की रचनाएँ मुझे दी जाएँ तो सब से पहले मैं परसाई जी को ही पढ़ूंगा। वे लाजवाब थे और रहेंगे। मैं ने तो आज तक ऐसा व्यंगकार दूसरा देखा ही नहीं, किसी भाषा में नहीं।
  27. हरिशंकर परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 2)
    [...] हरिशंकर परसाई के जन्मदिन के मौके पर [...]
  28. गौतम राजरिशी
    सुंदर!…अभी-अभी “नया ग्यानोदय” के प्रेम महाविशेषांक में उनका प्रेम पे एक अद्‍भुत व्यंग्य पढ़कर उठा हूँ और अब आपका ये आलेख..
    मेरी पसंद में संकलित परसाई जी के ये सब जुमले किसी सोने की खान से कम नहीं…!!!
  29. दीपशिखा वर्मा
    सच कहा, परसाई का दायरा बेहद विस्तृत था! सफ़ेदपोश, नक़ाबपोश…सबकी यूँ ही शब्दों मे धज्जियां उड़ा देना. ठोस व्यंग करते थे पोपला नहीं.
    दीपशिखा वर्मा की हालिया प्रविष्टी..वो
  30. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] हरिशंकर परसाई के जन्मदिन के मौके पर [...]

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