Wednesday, January 25, 2012

जबलपुर में एक हफ़्ता

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जबलपुर में एक हफ़्ता


जबलपुर में आये हफ़्ता हो गया। एक हफ़्ता यहां बिता के आज कानपुर लौट रहे हैं। जब यह सूचना आशीष राय को दिये तो उन्होंने फ़रमाइश की कि घर से बाहर जाता आदमी के तर्ज पर एक कविता घर लौटते आदमी को भी लिखनी चाहिये। मन तो हमारा भी किया कि निकाल दी जाये एक ठो फ़रमाइशी कविता लेकिन फ़िर सोचा कि दोस्त और घर वाले सोचेंगे कि यह आदमी तो घर से निकलते ही कवि हो गया। सब कुछ सोचकर कविता लिखने का विचार मटिया दिया।
जबलपुर में सर्दी कानपुर के मुकाबले कम है और मौसम ज्यादा सुहावना। कानपुर का जो भी दोस्त मिला यहां उसने यहां के मौसम को अच्छा-अच्छा बताया।
एक दिन जबलपुर पैदल भ्रमण के लिये निकले। फ़ैक्ट्री से चार-पांच किमी की दूरी पर स्थित रांझी मार्केट गये और पैदल ही वापस आये। पूरा दो घंटा टहलते रहे। रांझी बाजार पहुंचते ही सामने एक बड़ा बोर्ड चमकता दिखाई दिया। हमें लगा कि कोई सिनेमा का पोस्टर लगा है। देखा तो पता चला कि बियर की दुकान है। उसके सामने इत्ता भीमकाय विज्ञापन लगा है।
बाजार वीएफ़जे से निकलते ही दोनों तरफ़ एक-एक किमी तक फ़ैला है। तमाम एस.टी.एम. मौजूद। इत्ता पैसा निकालकर लोग खर्च कर देते हैं। सड़क एक आम मध्यमवर्गीय शहर की तरह कुछ खुदी कुछ बनी। मन किया कि किसी चाय की दुकान पर बैठकर चुस्कियाते हुये कुछ समय बिताया जाये। लेकिन हर बार और अच्छी जगह की तलाश ही करते रहे। सड़क पर ही दो जगह देखा कि मोची लगभग अंधेरे में अपना काम कर रहे हैं।
सड़क किनारे ही गोल वाले सीवर पाइप पड़े हुये दिखे। लगा कि अब लगता है कि यहां भी सड़क की खुदाई होने वाली है। सीवर लाइनें पड़ेंगी। सोच ही रहे थे कि आगे खुदी सड़क पर एक जगह जमें पानी पर पैर पड़ा और जूता भीग गया। जूता भीगा तो मोजा भी कहां पीछे रह सकता था भला। वह भी भीग गया। मुसीबत में उसने जूते का साथ नहीं छोड़ा। अपने ने अपने लिये सूत्र वाक्य बताया कि सड़क पर चलते समय दूर भले एक बार न देखा जाये लेकिन आस-पास जरूर देखते रहना चाहिये।
लौटते हुये सोचा कि शैम्पू का पाउच ले लिया जाये। कई दुकाने दिखीं। कुछ चमकदार और कुछ कम चमकदार। हम छोटी दुकान से पाउच लेने की सोचे। आखिर में एक सबसे छोटी दुकान दिखी। वह घर के बाहर थी शायद किसी के। घर के बाहर दुकान। हमने तीन दिन के हिसाब से तीन पाउच देने के लिये। दुकानदार महिला ने बिना किसी हिचक के मुझे चार पाउच पकड़ा दिय यह कहते हुये कि चार का पैकेट है इसे लीजिये। आत्मविश्वास से। हमने बिना कुछ कहे उसकी इच्छा का पालन किया। बाद में सोचा कि दुनिया भर के मैनेजमेंट स्कूल सामान बेचने के जो तरीके सिखाते हैं उनको सीखकर भी लोगों के अन्दर इससे कुछ बहुत ज्यादा आत्मविश्वास तो नहीं आता होगा।
अखबार यहां हिन्दी का दैनिक भाष्कर बांचा। जबलपुर की खबरों में प्रतिदिन हमारी चार फ़ैक्ट्रियों में से किसी न किसी की खबरें जरूर छपती हैं। अपन यहां का तकिया कलाम है। अपन जायेंगे। अपन ऐसा करेंगे। अपन वैसा करेंगे। अमुक से अपन ने ऐसा कह दिया। अपनापे की बात! :)
नागपुर यहां से चार-पांच घंटे की दूरी पर है। भाषा में मराठी का असर दिखने लगा जबलपुर में। वी को यहां व्ही लिखा देखा अखबारों में।
कुछ दोस्तों ने जबलपुर को संस्कारधानी बताते हुये कहा कि हमारा भी यहां संस्कार हो जायेगा। :)
एक दोस्त को फोन नम्बर दिया तो उसने सवाल किया कि कानपुर में कुछ गड़बड़ की होगी इसीलिये वहां से भगाया गया होगा तू।
एक हफ़्ते में तमाम पुराने दोस्तों से मुलाकात हुई। बीस साल पहले कभी साथ रहे दोस्त मिले। बहुत अच्छा लगा। अब अपन कानपुर लौट रहे हैं आज। लौटकर जबलपुर के किस्से लिखेंगे आगे। :)
यहां लगाई फ़ोटो मेरी नातिन की हैं। मेरी भतीजी स्वाती की बिटिया आजकल अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में रोटी बना सीख रही है। मुझसे जब भी बात करती है तो कहती है- नानी से बात कराइये। मुझसे बात करना उसको भी पसन्द नहीं। :)

21 responses to “जबलपुर में एक हफ़्ता”

  1. देवेन्द्र पाण्डेय
    बड़ी उखड़ी-उखड़ी पोस्ट है। दुःखी परदेशी की व्यथा टाइप। आप एकाध मजेदार लाइन लिखकर, हंसने वाला मुखड़ा लगाकर हंसाने वाली बात लिखे हैं मगर पढ़ते वक्त हम खुद को ही वहां खड़ा पाते है और दुःखी हो जाते हैं। बाजार में इधर उधर भटकना और शैंपू खरीदना !
    पोस्ट में रोटी बेलती सुंदर बिटिया का चित्र बहुत अच्छा है मगर इसको देखकर यह एहसास भी होता है कि पोस्ट करते वक्त भी जेहन में, अपने घर परिवार के सदस्यों की यादें ही छाई रहीं। घर लौटकर चहकते हुए मूड में लिखी पोस्ट का इतंजार रहेगा।
  2. Shikha Varshney
    कुछ मौराल्स ऑफ द पोस्ट समझ में आये-
    * अनूप शुक्ल बीयर के बड़े बोर्ड के सामने खड़े होकर भी चाय की छोटी दुकान ढूंढते हैं.
    *उनके जूतों और मोंजों में बहुत दोस्ती है.हमेशा एक दुसरे का साथ देते हैं.
    * जबलपुर जाकर भी उनके सर पर बाल बचे हुए हैं.शेम्पू खरीदने पड़े.
    *और लास्ट बात नोट द लीस्ट- उनसे बात करना बच्चों को कतई पसंद नहीं :):) :P
    मस्त मस्त पोस्ट है आगे के किस्सों का इंतज़ार रहेगा :).
    Shikha Varshney की हालिया प्रविष्टी..रंगीनियों का शहर "पेरिस"
  3. Gyandutt Pandey
    नातिन का फोटो देख यकीन हो गया कि यह ब्लॉग अब खाना-खजाना में तब्दील होने वाला है जबलपुर डेटलाइन में।
    रोटी तो सुघड़ बना रही है नातिन!
  4. Kajal Kumar
    हम्म्म तो अब आपके लेखन में भी नए नए शब्द देखने को मिलेंगे :)
  5. amit srivastava
    मोजा आप जूते के अन्दर पहनते हैं | वैसे फैक्ट्री के लोग तो मोज़े के अन्दर जूता पहनते हैं | वो मोज़े ऐसा होता है ,चढ़ा लेते हैं पूरा ऊपर तक | शायद ‘गम बूट’ कहते हैं | कंप्यूटर की भाषा में कहे तो अर्थ हुआ , कि गम बूट पहनने के बाद वो गम को बूट कर देता होगा , अगर अन्दर ही अन्दर काट ले तो….|
    amit srivastava की हालिया प्रविष्टी.." आंसू हम पीते रहे, वो खिलखिलाते रहे…."
  6. दीपक बाबा
    @मन किया कि किसी चाय की दुकान पर बैठकर चुस्कियाते हुये कुछ समय बिताया जाये।
    बेकार की बात, बीअर का विज्ञापन देख कर चाय की दूकान …. ये मात्र फुरसतिया ही कर सकता है. लीजिए चुस्किय…
    बाकि बच्ची की रोटी बनाते फोटू अच्छी लग रही है याद आ रहा है कि कोई नौसिखिया ब्लोग्गर भी ऐसे ही पोस्ट लिखता होगा…
    दीपक बाबा की हालिया प्रविष्टी..दबंग गुणा विधायक गुणा व्यापारी गुणा नौकरशाह = गुणातंत्र
  7. संतोष त्रिवेदी
    ….पहले बहुत कुछ टीपा था वह न जाने कैसे गायब हो गया ,अब जबलपुर वापस आकर लिखोगे तो फिर टीपूंगा.
    संतोष त्रिवेदी की हालिया प्रविष्टी..किसका है गणतंत्र ?
  8. विवेक रस्तोगी
    जो सामने मिल रहा था उसी की चुस्कियाँ मार लेनी थी :)
    और ब्लॉगरों से मिले कि नहीं ? किस्सों का इंतजार है, ठंड तो वैसे जबलपुर में भी अच्छी खासी पड़ती है।
    विवेक रस्तोगी की हालिया प्रविष्टी..देखा पापा टीवी पर विज्ञापन देखकर IDBI Life Childsurance Plan लेने का नतीजा, “लास्ट मूमेंट पर डेफ़िनेटली पैसा कम पड़ेगा”।
  9. मनोज कुमार
    शुभकामनाएं आपको! ऐसे ही घूमते बतियाते रहें।
    मनोज कुमार की हालिया प्रविष्टी..मैं गया था अपने गांव
  10. arvind mishra
    रांझी बाज़ार ? कुछ कुछ हीर रांझा का झमेला सा लगता है ….है की नहीं?
    बाकी जबलपुर में संस्कारीकरण वाली बात सच लगती है ,संभल के रहिएगा और लिखियेगा ! :)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..राष्ट्रीय मतदाता दिवस की बधाई!
  11. भारतीय नागरिक
    होनहार विरबान के होत चीकने पात. अब इसका मतलब आपसे बात न करने का मत लगाइएगा :)
  12. MRIGANK AGRAWAL
    जबलपुर तुम प्यार से गए हो ,या जबर -अन ?
  13. देवांशु निगम
    अपन को अच्छी लगी पोस्ट…रोटी बनाने का अपना मजा है …
    गणतंत्र दिवस कि शुभकामनायें!!!!
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..अथ श्री "कार" महात्म्य!!!
  14. सलिल वर्मा
    ओशो नगरी हमारे लिए और उड़न तश्तरी का नगर ब्लॉग जगत की तरफ से… मुनिया की रोटी और गालों में लगा आटा.. मिहनत नज़र आ रही है.. बाकी तो बियर, चाय, शैम्पू और मैनेजमेंट का ज्ञान, सो ग्रहण किया!! यह पदस्थापना (अस्थायी) है या स्थानांतरण (स्थायी)?? शुभकामनाएँ!
    सलिल वर्मा की हालिया प्रविष्टी..एक अकेला उस शहर में!
  15. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    जबलपुर में अभी परदेशी टाइप लग रहा होगा। धीरे-धीरे अपन टाइप लोग वहाँ मिल जाएंगे।
    नातिन की जो तस्वीर लगायी है वह बेशक बहुत प्यारी है लेकिन गनीमत है कि वह नार्वे में नहीं है। इसपर वहाँकी सरकार बहुत कड़ा एक्शन ले सकती थी। कहती- इत्ते छोटे बच्चे से किचेन का काम कराया जा रहा है। माँ-बाप से हटाकर इसे ‘फोस्टर पैरेन्ट्स’ को दिया जा सकता था। अभी अनुरूप और सागरिका के साथ ऐसा ही हुआ है।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..जाओ जी, अच्छा है…
  16. ashish
    आदमी लौट आया , फिर फ़रमाया . कनपुरिया संस्कार को कैसे बदल सकती है संस्कारधानी , ये देखने की बात होगी . अपन की नजर रहेगी इस पर .
    ashish की हालिया प्रविष्टी..शिखा वार्ष्णेय रचित "स्मृतियों में रूस" और मेरी विहंगम दृष्टि
  17. राहुल सिंह
    हां-ना में हमने भी बिताया था एक साल जबलपुर में, याद आई.
    राहुल सिंह की हालिया प्रविष्टी..मल्हार
  18. प्रवीण पाण्डेय
    जबलपुर रास आयेगा, आपके पास आयेगा..
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..कुछ अध्याय मेरे जीवन के
  19. Abhishek
    कानपुर में क्या गड़बड़ किये थे ये तो बताइये ? :)
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..पाँच लीटर दूध और आधा किलो चीनी (पटना १०)
  20. sanjay jha
    हम रहे दिन गिन
    बीत गए तीन दिन
    मौज गया हमसे छिन
    इब तो एक पोस्ट दीन
    प्रणाम.
  21. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] जबलपुर में एक हफ़्ता [...]

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