Thursday, August 09, 2012

दफ़्तर में अंग्रेजी

http://web.archive.org/web/20140420082415/http://hindini.com/fursatiya/archives/3201

दफ़्तर में अंग्रेजी

अंग्रेजी
एक फ़ाइल देख रहे थे! देखा हमारें यहां से एक चिट्ठी लिखी है फ़र्म को। नाम-पता के बाद शहर का नाम लिखा है- Kanglore.
सोचा ये कौन सा शहर पैदा हो गया भाई! लिखने वाले को बुलाया, पूछा – ये कौन जगह है भाई!
वो भाई साहब मोनालिसा की तरह मुस्कराने के बाद शरमाने वाला पोज बना के खड़े हो गये। नजरें नीचे झुका लीं ताकि मुस्कराते हुये शर्मिंदगी का इजहार कर सकें।
पता चला कि बैंगलोर की जगह कैंगलोर टाइप हो गया था। चिट्ठी जा चुकी थी। मामला सामान्य पूछताछ का था सो K को घुमा के B बना दिया!
मौज-मौके का उपयोग करते हुये भाईसाहब का तात्कालिक नामकरण आमिरखान किया गया और मौज ली गयी। इसी बहाने अपन की चूक भी रेगुलराइज हो गयी कि दस्तखत करने के पहले काहे नहीं देखा।
यह तो रहा इस्पेलिंग का मामला। इसके अलावा रोजमर्रा की अंग्रेजी भी ओ मायगॉड टाइप दिखती है फ़ाइलों में। वाक्यों में मतभेद रहता है। एक ही वाक्य के हिस्सों में सास-बहू सा अलगाव दिखता है। किसी-किसी वाक्य की शु्रुआत तो टीन एजर उत्साह से होती है लेकिन फ़ुलस्टाप तक पहुंचते-पहुंचते बुढौती छा जाती है। वाक्य अगर लंबा हुआ तो उसका मतलब कश्मीर समस्या सा उलझ के रह जाता है।
रोजमर्रा चिट्ठी तो कुछ दिन में सेट हो जाती हैं। नाम-पता लिखा, तारीख डाली। मसौदा कट-पेस्ट किया। प्रिंट लेकर दस्तखतिया दिया और चिट्ठी भेज दी। एक कापी पोस्ट से, दूसरी फ़ैक्स से, तीसरी स्कैन करके मेल से। ज्यादा जरूरी हुआ तो दस्ती भी भेज दिया। फोन पर मसौदा पढ़कर तो खैर सुनाया ही जाता है।
कट-पेस्ट विधि के चलते मामला तो अक्सर गड़बडाता रहता है। दो दिन मुझे एक चिट्ठी मिली जिसमें हमारे छह अगस्त की चिट्ठी का जिक्र किया था लेकिन पत्र में तारीख मई की थी। कट-पेस्ट तकनीक के चलते चिट्ठियां तीन महीनों को अपने में समाये रहती हैं।
असल समस्या तब होती है जब कुछ अलग तरह की चिट्ठी लिखनी होती है। उसमें भी असल बवाल तब होता है कोई चिट्ठी कई लोग मिलकर लिखते हैं। हर व्यक्ति अपने हिसाब से अंग्रेजी का योगदान देता है। कोई वाक्य बेग टू स्टेट शुरु होता। अगला उसकी विनम्रता को छांटकर भाषा आदेशात्मक बना देता है। एक ही पैरा में दो तेवर आपस में यात्रा करते हैं। कभी-कभी एक ही वाक्य के दो एकदम अलग-अलग मतलब निकलते हैं। दोनों में 36 का आंकड़ा। ऐसे पत्रों का मतलब हमेशा आराम से देखा जायेगा वाले सूत्र से ही निकाला जाता है।
कई लोगों द्वारा लिखे पत्रों की भाषा चंदे की भाषा जैसी होती है। हर व्यक्ति अपनी-अपनी क्षमता के हिसाब से अंग्रेजी का चंदा करता है। बन-ठन निकली चिट्ठी को देखकर लगता है इसमें भारत देश की तरह विभिन्नता में एकता का सीन बनता दिख रहा है।
करीब बाइस-चौबीस साल हो गये अंग्रेजी में दफ़्तरिया चिट्ठी लिखते हुये। कुल जमा दो-ढाई हजार शब्दों को मिला-जुलाकर फ़ेंटते हुये इत्ते साल गुजार दिये। पहले तो इस्पेलिंग भूलने पर शरमा आती थी। आज गलती होने पर कहते हैं- अरे इसमें स्पेलचेकर नहीं है क्या?
पुराने जमाने के अंग्रेजी लिखने वाले पत्रों को दुलहन सा सजाते थे। साज-सिंगार करके विदा करते थे। आज के जमाने की अंग्रेजी ए्स एम एसिया गयी है। मतलब निकलना चाहिये। मेल जोल की भाषा है गड़बड़ सड़बड़ अंग्रेजी।
आज सुबह से शाम तक कई पन्नों की अंग्रेजी हो गयी। न जाने कित्ती जगह बैंगलोर का कैंगलोर हो गया होगा। लेकिन यह तो राज-काज है। मतलब समझ में आना चाहिये। कवि जी ने कहा भी है:
भाषा तो पुल है मन के दूरस्थ किनारों पर,
पुल को दीवार समझ लेना बेमानी है।
बहुत लफ़्फ़ाजी हो गयी आज। अब चला जाये कानपुर के लिये। चित्रकूट एक्सप्रेस पटरियों पर खड़ी हमारा इंतजार कर रही है।

22 responses to “दफ़्तर में अंग्रेजी”

  1. विवेक रस्तोगी
    यह ठीक नहीं है, हम तो बैंगलोर में ही रहते हैं, कैंगलोर में नहीं । :)
    वैसे चिट्ठी लिखना भी अपने आप में कला है, भले ही आजकल यह ईमेल हो गया है, गल्ती हो गई तो एक और ईमेल साट दो, सही करके कि पुरानी वाली इग्नोर कर दो, नहीं तो टायपो लिखकर सही शब्द लिखकर साट दो ।
    तो आप बबलपुर से नानपुर जा रहे हैं ;-)
    विवेक रस्तोगी की हालिया प्रविष्टी..काली चमड़ी के कारण आँखों और गर्दनों पर असर और वजन बढ़ना
  2. संतोष त्रिवेदी
    एक सामान्य सी चूक भी हमें हास्य का मौक़ा मुहैया करा देती है,यह क्या कम है ?
    …हम तो अब अक्सर स्पेलिंग भूल जाते हैं,सो बच्चों से कन्फर्म कर लेते हैं !
    संतोष त्रिवेदी की हालिया प्रविष्टी..संयुक्त-राष्ट्र चले जाओ जी !
  3. सतीश चंद्र सत्यार्थी
    अब भाषा में व्याकरण और गूढ़ शब्दों से हटकर अर्थ और सरल शब्दों के प्रयोग पर जोर दिया जा रहा है. और यह अच्छा भी है… अदालती भाषा ने देश का बड़ा बड़ा गर्क किया है.. खग ही जाने खग की भाषा टाइप से एक विभाग का पत्र दूसरों की समझ न आये ऐसी भाषा किस काम की..
    लेकिन भाषा का घासलेटीकरण भी नहीं होना चाहिए… :)
    सतीश चंद्र सत्यार्थी की हालिया प्रविष्टी..एक हाथ में लोटा दूसरे में मोबाइल
  4. देवांशु निगम
    ई तो गज़ब हो गया .. चिट्ठी भी कैंग्लोर का रास्ता कैसे ढूंढेंगी ???
    अपनी भी नौकरी कट-पेस्ट के भरोसे ही चलाती है अक्सर :)
    बाकी ई लाइन हमको बहुत मारू टाइप लगी
    ” किसी-किसी वाक्य की शु्रुआत तो टीन एजर उत्साह से होती है लेकिन फ़ुलस्टाप तक पहुंचते-पहुंचते बुढौती छा जाती है”
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..बारिश
  5. सतीश पंचम
    :-)
    सतीश पंचम की हालिया प्रविष्टी..गुछून परिणय सुशीला……. मन भतरा हो दहिजरा……
  6. प्रवीण पाण्डेय
    मंगलौर भी हो सकता था..
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..कामना-वह्नि की शिखा
  7. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    वाह, आप तो शब्दों की गेंद को विराट कोहली की तरह उछाल रहे हैं।
    बाँचने वाले इसे रैना की तरह लपक न लें तो क्या करें!
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..भ्रष्टाचार का भविष्य अच्छा है…।
  8. Alpana
    जरा से गलत वर्तनी से भी अर्थ का अनर्थ भी हो जाया करता है.
    और ‘एस एम् एसिया’ भाषा ने तो बहुत से शब्दों की स्पेल्लिंग ही बदल सी दी है .
    रोचक लेख.
    Alpana की हालिया प्रविष्टी..वो पहली मुलाकात!
  9. Alpana
    ज़रा सी ग़लत वर्तनी से भी अर्थ का अनर्थ हो जाया करता है!
    Alpana की हालिया प्रविष्टी..वो पहली मुलाकात!
  10. aradhana
    सरकारी पत्रों की भाषा ऐसी ही होती है. अब तो इंटरनेट हो गया है, नहीं तो उनकी चाल भी उनकी भाषा जैसी ही होती थी :)
    कानपुर जा रहे हैं. सही गाड़ी में बैठिएगा. कहीं भूली-भाली स्पेलिंग सही करते-करते स्टेशन के नाम ना इधर-उधर कर बैठिएगा :)
    aradhana की हालिया प्रविष्टी..स्मृति-कलश
  11. संजय अनेजा
    हमारे एक टंकक साथी ने एक पत्र में चीफ मैनेजर की जगह थीफ मैनेजर टांक दिया था और अधिकारी जी के हस्ताक्षर भी हो गए थे| भला हो डिस्पैच क्लर्क का जिसने समय रहते ‘टी’ को ‘सी’ बनवा दिया वरना ताजीराते हिंद दफा अलां फलां के तहत हो जाता दो जनों का हैप्पी बड्डे.
    संजय अनेजा की हालिया प्रविष्टी..युगपुरुष
  12. sanjay jha
    विकट मौज ली ……….. मजा आ गया ………
    “किसी-किसी वाक्य की शु्रुआत तो टीन एजर उत्साह से होती है लेकिन फ़ुलस्टाप तक पहुंचते-पहुंचते बुढौती छा जाती है। वाक्य अगर लंबा हुआ तो उसका मतलब कश्मीर समस्या सा उलझ के रह जाता है।”
    प्रणाम.
  13. देवेन्द्र पाण्डेय
    मजा तो तब आये जब इसी व्यंग्यात्मक शैली में एक चिठ्ठी बॉस को गलती से लिखी जाये।:)
  14. Kajal Kumar
    एक बात और है.. कि‍ कुछ महानुभावों को लगता है कि‍ जि‍स कि‍सी के पास चि‍ट्ठी पहुंचनी है वह वि‍श्‍व का प्रखरतम अंग्रेज़ी भाषावि‍द् है इसलि‍ए क्‍या मजाल कि‍ कोई कोताही हो जाए, सो हज़ार बार उस चि‍ट्ठी में कौमे, फुलस्‍टॉप तक बदले जाएंगे… अरे भई चि‍ट्ठी का मतलब बात पहुंचाना होता है, और फि‍र इस तरह के लोगों को तथाकथि‍त चि‍ट्ठि‍यों के ही कारण आउटस्‍टैंडिंग ACR पाते भी तो नहीं सुना /:-)
    :)
    Kajal Kumar की हालिया प्रविष्टी..कार्टून :- जन्‍माष्‍टमी का कार्टून
  15. pankaj
    सर
    बकत को इसी तरा गुजर जानेदे और लोगो को मेरी गतली पे नहीं, मेरी मेहनत पर मुस्कुरेने दे.
  16. चंदन कुमार मिश्र
    हा हा हा।
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..बुर्जुआ भाषा वालीं हिन्दी फ़िल्में
  17. Gyandutt Pandey
    इस देश में लोगों को हिन्दी तो नहीं आती, अंग्रेजी भी बिगाड़ते जा रहे हैं। चिन्ता का विषय है।
    Gyandutt Pandey की हालिया प्रविष्टी..टूण्डला – एतमादपुर – मितावली – टूण्डला
  18. pragya
    पूरा आलेख बहुत मजेदार है और वाकई में यह सब कुछ ऐसे ही होता है .. अब जब नक़ल है तो क्या होगा .. सब हिंदी में चलता जो तो इतनी मुसीबते क्यों आतीं भला !
  19. G C Agnihotri
    सत्यवचन, दफ्तरों में काम तो होता नहीं है, अंगरेजी लिख कर ही कुछ बिजी रह लेते है
  20. anil sakargaye bhopal se
    भाई हमें भी जगह दो दिल मैं भी और यहाँ भी
  21. मन्टू कुमार
    बहुत ही रोचक एवं सार्थक रचना..|
    सादर नमन |
    मन्टू कुमार की हालिया प्रविष्टी..बेहिसाब याद आती है,माँ..!
  22. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] दफ़्तर में अंग्रेजी [...]

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