Thursday, May 16, 2013

चलो एक कप चाय हो जाये

http://web.archive.org/web/20140420081707/http://hindini.com/fursatiya/archives/4313

चलो एक कप चाय हो जाये

आज सुबह जरा और जल्दी उठ गये। अलार्म तो बहुत पहले बजा था पर उसको हम उत्ती ही तवज्जो देते हैं जित्ती सरकारें अदालतों की तल्ख टिप्पणियों को देती हैं। सुनकर मटिया देते हैं। बहुत किया तो फ़ौरन कुछ देर आगे का लगा देते हैं।

लेकिन अलार्म के बाद फ़िर फ़ोन भी बजा। हमारे पुराने सीनियर सोढीजी हमको दिल्ली से जगा रहे थे। बोले -शुक्ला जी कौवे भी टहलने निकल लिये। अब तो निकलो टहलने। उनको हमने तीन दिन पहले फ़ोन किया था। वे मिस्ड काल का आज जबाब दे रहे थे। कानपुर में जित्ते दिन साथ रहे कहते रहे- टहला/भागा करो। वजन कम करो। 

हमारा जबाब हमेशा एक्कै रहा- पहले वजन कायदे से बढ़ा तो लें तब कम करना शुरु करें।


आज दूसरी तरफ़ टहलने गये। एक महिला अपनी बच्ची के साथ टहल रही थी। उसकी नाक के एरियल से गुस्से के सिग्नल निकल रहे थे। लग रहा था वो बिटिया से खफ़ा होने का संकेत दे रही थी।

सड़क के किनारे एक नाले पर कुछ लोग उकड़ू बैठे निपट रहे थे। बगल की बिल्डिंग की आड़ से कुछ महिलायें खाली डिब्बे/प्लास्टिक की बोतलें लहराती निकल रहीं थीं। उनके चेहरे पर दिव्य निपटान की संतुष्टि पसरी थी।
एक सुअर सड़क पर निपटता चला रहा था। उसके निपटान बिंदुओं को मिलाकर बनायी रेखा सड़क पर बनी तिर्यक रेखा सरीखी दिखती। वह आराम से निश्चिंत निपटता चला जा रहा था। हर दिन उजागर होते घपलों -घोटालों की तरह।

सड़क पर मुर्गे बांग दे रहे थे। एक मुर्गा बांग देता फ़िर दूसरा। कोई लगातार देता। कोई बांग देते हुये कामर्शियल ब्रेक सरीखा लेता। कोई चुप ही चुगता रहता। किसी दफ़्तर में काम करते स्टाफ़ सरीखे। वहां भी कुछ लोग काम में जुटे रहते हैं। कुछ खाली चुगते रहते हैं। कुछ काम और आराम दोनों नियम से करते रहते हैं। अनुशासित नुमा लोग।

एक आदमी अपने कन्धे पर एक पिल्ला लादे हुये था। उसको लगता है सांस की बीमारी थी। हांफ़ते हुये चल रहा था।

चाय की दुकान पर भीड़ जुटने लगी थी। उसके सामने बस स्टैंड पर बैठे कुछ लोग आत्मविश्वास के साथ सब्सिडी चर्चा कर रहे थे। एक ने कहा- अभी देंगे खाते में फ़िर धीरे से बंद कर देंगे। जनता का सरकार के प्रति सहज अविश्वास।

मन किया कि पुलिया पर बैठकर अपन भी सब्सिडी चर्चा करते हुये चाय लड़ायें। लेकिन भ्रमण खण्डित होने की सोचकर मन को वरज दिया।

लौटकर कमरे के सामने सड़क पर देखा एक महिला वीरांगना सी टहलती जा रही थी। आराम-आराम से। जैसे स्लो मोशन में सलामी देने जाती कोई फ़ौजी। मृ्दु मंद मंद मंथर मंथर टहलन।


टीवी पर मुन्ना भाई के जेल जाने से हलकान लोगों के बयान आ रहे थे। लोगों का कहना था कि बहुत हुआ अब छोड़ देना संजय दत्त को। क्रिया-प्रतिक्रिया नियम के चलते उनको और कड़ी सजा देने की मांग करते नारा लगाते लोग भी दिखे।

संजय दत्त की मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस. और लगे रहो मुन्ना भाई से उनको जबरदस्त लोकप्रियता मिली। समय-समय पर उनके भला मानस होने के किस्से भी आते रहे। लेकिन ऐसे भले मानस हमारे-आपके जीवन में तमाम लोग होते हैं। जिनकी चर्चा मीडिया में होना संभव नहीं है क्योंकि वे संजय दत्त जैसे सेलेब्रिटी नहीं हैं।
लेकिन मीडिया जिस तरह उनके जेल जाने की मिनट दर मिनट कमेंट्री कर रहा है उससे लग रहा है मीडिया उनको मामू बनाकर अपनी टी.आर.पी. बटोर रहा है। उनके प्रति मीडिया की सहानुभूति के साबुन-पानी से भीगी चर्चा सुनकर यह धारणा बनने का खतरा बनता है कि अदालत ने उनके साथ अन्याय किया है।

टेलीविजन पर खबर आ रही है कि एक नामी हीरोइन ने स्तन कैंसर की आशंका के चलते अपने दोनों स्तन निकलवा दिये। खबर सुनकर कल ही पढ़ी एक कविता याद आ गई जिसमें कवियत्री लिखती हैं- मैं नारी हूं या महज स्तनों का एक जोड़ा..! लगे स्मृति वह लेख भी याद कर लिया जिसमें शालिनी माथुर जी ने कविता के नाम पर कुछ भी अल्लम-गल्लम लिखने वालों को बेचैन कर दिया था। घणी बयान बाजी हुयी उन कविताओं के समर्थन/विरोध में।

चलिये अब बहुत हुआ। तैयार होना है दफ़्तर जाने के लिये। आप मजे कीजिये। हम फ़िर मिलेंगे।
सूचना: ऊपर का फोटो हमारे साथी अधिकारी हितेश और उनकी श्रीमती डॉ. नमिता का है। अमरकंटक जाते समय ढिढौरी की एक चाय की दुकान पर खींचे गये इस फोटो को खींचते समय कैमरा हमारे हाथ में था।

मेरी तुकबंदी

चलो एक कप चाय हो जाये,
तब फिर सैर के हाल सुनायें।

आज सुबह हम जल्दी जागे,
मुंह धोये और सैर को भागे।

एक मेहरिया बिटिया संग थी,
गुस्सा, नाक चढाई सी थी ।

सुअर टहलता सड़क पर देखा,
ऐंठा , अकडा भ्रष्टाचार सरीखा।

सड़क पर निपटता चला जा रहा,
घपले करता, जननेता सा लगा।

चौराहे पर सब्सिडी चर्चा थी,
लोग कह रहे सब झांसा है जी ।

अभी देगें , फ़िर झट बंद करेंगे ,
इनका नहीं हम भरोसा करेंगे ।

मुर्गे चिल्लाते गुड मार्निंग जी ,
चिड़िया कूडे पर दाना चुगें जी ।

चाय दुकान पर चहल-पहल थी,
खेल के मैदान पर भागदौड़ भी।

साइकिल पर जाती महिला देखी,
नये जमाने की नायिका सरीखी।

चलौ उठौ अब आपौ भईया,
सूरज भईया धमक परे जी।
-कट्टा कानपुरी

6 responses to “चलो एक कप चाय हो जाये”

  1. प्रवीण पाण्डेय
    भरी भरी सुबह,
    हरी हरी शाम,
    जोर से बोलो,
    जय हनुमान।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..दुआ सबकी मिल गयी, अच्छा हुआ
  2. aradhana
    दिव्य निपटान :) आप भी छोटी-छोटी घटनाओं का इतना सूक्ष्म वर्णन करते हैं कि मन करता है कि आपको किसी न्यूज़ चैनल का एंकर बना दिया जाय :)
    और, घर से डाँट पड़ी है क्या टहलने के लिए. अब टहलने से आपकी तोंद का कुछ नहीं होने वाला. जिम जाइए. संजू बाबा को देखिये. आपसे कित्ते बड़े हैं और उनकी तोंद बिल्कुल नहीं है :)
    aradhana की हालिया प्रविष्टी..बैसवारा और आल्हा-सम्राट लल्लू बाजपेयी
  3. varsha
    achha hai
  4. Dr. Monica Sharrma
    बड़ा जीवंत चित्रण है :)
    वज़न घटना भी ना, क्या क्या नहीं दिखाता
    Dr. Monica Sharrma की हालिया प्रविष्टी..शब्दों का साथ खोजते विचार
  5. ajit gupta
    सुबह की ताजा रपट।
    ajit gupta की हालिया प्रविष्टी..नानी का घर या सैर-सपाटा
  6. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] चलो एक कप चाय हो जाये [...]

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