Friday, May 31, 2013

जबलपुर टु लखनऊ वाया चित्रकूट



शाम होते-होते रिजर्वेशन कन्फ़र्म होने की खबर मिली। खुश हो गये। लगा कि देश को अगर खुशहाल देखना है तो देश में सबका रिजर्वेशन कन्फ़र्म हो जाना चाहिये। जिसका रिजर्वेशन हो जाता है वह दूसरों के मुकाबले ज्यादा खुश हो जाता है। जिसका नहीं होता वह दुखी होता है। आंदोलन करता है। तोड़फ़ोड़ भी। हमारी बर्थ सीट नीचे की थी। पहुंचे तो एक परिवार वहां पहले से ही मुस्करा रहा था। हमें देखते ही उन्होंने और मुस्कराते हुये हमें अपनी बर्थ पर चले जाने को कहा। वह भी नीचे की ही थी। हम भी मुस्कराते हुये चले गये। पसर गये बर्थ पर जाते ही। कुछ देर बाद टी.टी. आया। उसने मुझे सूचित किया जहां मैं पसरा हूं वह सीट RAC है। आधी सीट एक बाबा जी की है। बाबा जी अपने भक्तों की फ़ौज के साथ यात्रा कर रहे थे। हम सहम कर सिमट गये। अपनी सीट पर जाकर परिवार से कहा कि जिस सीट पर आपने मुझे भेजा वह तो आधी ही है। उन्होंने इस बार और मुस्कराते हुये कहा- आप उनको यहां भेज दीजिये। मुस्कराहटों के चक्कर में हम कन्फ़र्म से RAC होकर रह गये। पूरे की जगह आधे। वो तो भला हो टी.टी. महाराज का कि जाते-जाते बाबाजी के लिये पूरी बर्थ का इंतजाम करते गये। हम यह सूचना सुनकर संतोष की एकाध सांस लेते कि तब तक टी.टी. ने जाते-जाते एक अनुरोध उछाल दिया- आप हमारी एक मदद कीजिये। अगर एतराज न हो तो हमारी भाभीजी बर्थ बदल लीजिये। आप ऊपर चले जाइये। हमें बड़ा खराब लगा। यही बात अगर खुद भाभीजी कहतीं तो कित्ता अच्छा लगता। वो कहतीं तो मुस्कराती भीं जरूर। कित्ता खूबसूरत लगता। और कहतीं तो पक्का ही। लेकिन टी.टी. में सौन्दर्य बोध का अभाव। वह इस बात को समझ ही न पाया। जल्दबाज कहीं का। बहरहाल हम ऊपर की बर्थ पर आ गये। इस बीच बाबा जी एक जवान भक्त के कन्धे का सहारा लेते हुये लंगड़ाते हुये इधर-उधर जाते दिखे। सुबह एक स्टेशन के पास भक्तों को दर्शन भी दिये। एकाध को हाथ से छूकर किरपा भी की। लोगों ने जो परसाद दिया उसे अपने स्पर्श से पवित्र करके वापस किया। भक्त चिल्लाते हुये बाबा की जय बोल रहे थे। बाबाजी मुस्करा रहे थे। हमको सुबह से चाय नसीब नहीं हुई थी। देखा तो बाबाजी के चारो तरफ़ मिष्ठान मेवा का ढेर लगा था। बाबा जी अपने कांपते हाथों से थोड़ा-थोड़ा परसाद निकाल कर भक्तों के लिये निकालते जा रहे थे। बाबाजी के जलवे देखकर हमारे साथ के लोग कह रहे थे। बाबाजी और नेताओं की ही तो मौज है। ट्रेन में उस दिन कोई नेताजी नहीं थे। नेताजी की प्रति लोगों के बयान पूर्वाग्रह से ग्रस्त होंगे। ट्रेन तीन घण्टे लेट थी। ऊपर लेटे हुये हम नीचे मुंह खोले लेटी एक महिला को देख रहे थे। महिला ट्रेन की रफ़्तार के साथ हौले-हौले हिल रही थी। पूरा का पूरा शरीर आगे-पीछे हिल रहा था। कभी धीरे। कभी तेज। बीच बीच में महिला दांये-बायें भी हिल रहीं थी। लग रहा था कि ट्रेन अपनी गोद उन महिला को मोहब्बत के साथ दुलराते हुये प्यार से सुला रही थी। ट्रेन का वात्सल्य देखकर बहुत अच्छा लग रहा था। इस बीच सुबह हो गयी। अखबार में छत्तीसगढ में तमाम लोगों के मारे जाने की खबर आई। दुख हुआ इतने लोगों के मारे जाने का। विद्याचरण शुक्ल गंभीर रूप से घायल पता लगे। लखनऊ पहुंचने तक दिन जवान हो गया था। हम उतरकर चल दिये। बाहर हमारा बड़ा बेटा हमारा इंतजार कर रहा था।

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3 comments:

  1. रोचक संस्मरण।।।

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  2. घर पहुँच कर सभी जवान हो जाते हैं और खुद को तरोताजा महसूस करते हैं

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