Sunday, December 01, 2013

विदा होना एक दुर्लभ व्यक्तित्व का

परसों देर रात लंदन से उपाध्याय का फोन आया। यही समय है उनके फोन करने का। हाल-चाल लेते हैं। शिकायत करते हैं- हमारा ख्याल नहीं रखते और फ़िर ठीक। 28 साल हुये निकले हुये कालेज से। अब तो बच्चे भी कालेज से निकलकर काम से लगने लगे। लेकिन हमारी बात जब होती है तो समय को घसीट के वहीं 81-85 के आसपास ले जाते हैं। शायद वही सबसे मुफ़ीद समय लगता है।

और दिन के मुकाबले उपाध्याय कुछ सीरियस थे। हम पूछते तब तक उन्होंने बताया – अवस्थी के फ़ादर नहीं रहे।

अवस्थी मतलब इंद्रकुमार अवस्थी मतलब ठेलुहा। हम लोगों के पहली मुलाकात हुई सन 1982 में। जब अवस्थी अपने साथी बिनोद के साथ इलाहाबाद पढ़ने आये। हम एक साल पहले से थे वहां। बिनोद तिलक हॉस्टल में हमारे बगल के कमरे में थे। अमित हमारी विंग के सबसे पहले कमरे (46) में हम 57 में और विनोद 58 में थे। उसके बगल में विनय 59 में रहते थे जिनके साथ हम साइकिल से भारत यात्रा करने गये।

साइकिल यात्रा के दौरान हम तीन दिन कलकत्ता रुके। अवस्थी के घर। 52 स्ट्रैंड रोड कलकत्ता। बिनोद 36 ब्रजोदुलाल स्ट्रीट में। यह हमारा पहला पारिवारिक परिचय था। उस समय अवस्थी के पिताजी शायद कलकत्ता में थे नहीं। सो मुलाकात नहीं हुई।

मुलाकात भले न हुई हो लेकिन उनसे जुड़े हुये तमाम किस्से हम सुनते रहते थे। इधर-उधर से। कलकत्ते में उनके तमाम प्रशंसक हैं। लम्बी फ़ैन फ़ालोविंग। कविता, लेखन और मस्तमौला स्वभाव के किस्से घूम-फ़िरकर सुनते रहते थे। अपने घर परिवार के किंवदंती पुरुष सरीखे थे हमारे लिये अवस्थी के पिताजी।

आर्मापुर में डॉ.लक्ष्मी शंकर त्रिपाठी हमारे ही विभाग में डॉक्टर थे ( जो कि कल ही रिटायर हुये)। वे इंद्र अवस्थी के मामा हैं। अवस्थी के मामा मतलब हमारे भी मामा मतलब जगत मामा। उनसे अक्सर मिलना जुलना होता था। सब्जी बाजार हमारे घर के पास ही था सो अक्सर सब्जी लेते हुये वे जब लौटते तो रास्ते में हमारे हाल-चाल लेते हुये जाते। फ़ीस में, अगर समय हो तो, केवल चाय-पान करते।
2005 को एक दिन शाम को फ़ोन किया डॉ.त्रिपाठी ने -अनूप, जीजाजी आये हैं। आ जाओ मिलना होय तो।
शाम को उनसे मिलने पहुंचे तो उन्होंने अनगिनत संस्मरण सुनाये। ठेलुहई के बारे में बात करते हुये उन्होंने पिताजी जी के तमाम किस्से सुनाये। निस्संग भाव से। देखिये :
पुत्तन के बाबा पंडित जगदीश शरण अवस्थी उर्फ गुरुजी अपने जमाने के नामी ठेलुहा थे.एक बार पोरबंदर,गुजरात के नामी विद्वान महंतजी मौरावां आये थे.वो कहीं दो-चार दिन से ज्यादा रुकते नहीं थे ,लेकिन जब मौरावां आये तो छह महीने रहे थे ।जब उनका विदाई समारोह हुआ तो उसकी अध्यक्षता गुरुजी ने की थी.हम लोग भी थे वहां. तो महंतजी ने कहा-जिस व्यक्ति ने सारा संसार देख घूम लिया लेकिन अगर भारतवर्ष नहीं आया तो उसने कुछ नहीं घूमा और जिसने पूरा भारतवर्ष घूम लिया लेकिन अगर उत्तरप्रदेश नहीं आया तो उसने कुछ नहीं घूमा और पूरा उत्तरप्रदेश घूमने के बाद अगर वह उन्नाव जिला नहीं आया तो उसने कुछ नहीं घूमा और जिसने पूरा उन्नाव घूम लिया लेकिन अगर मौरावां नहीं आया तो उसने कुछ नहीं घूमा और मौरावां आकर जो गुरुजी से नहीं मिला तो समझ लो उसने कुछ नहीं देखा.यद्यपि पुत्तन और गुरुजी में ठेलुहई के गुण तो मिलते हैं लेकिन पुत्तन में बौद्धिकता थोड़ा ज्यादा है।
ठेलुहई के किस्सों के अलावा उन्होंने मौरावां के रावण के बारे में बताया जो कि कभी नहीं मरता।मौरावां की लाइब्रेरी के बारे में भी जानकारी दी।

सेंट्रल बैंक से अवकाश प्राप्ति के बाद शहर में रहने की बजाय अपने गांव मौरावां में रहना पसन्द किया। शैक्षणिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। लड़कियों के लिये डिग्री कॉलेज खोला। स्थानीय स्तर पर चुनाव लड़ा। चुनाव के दौरान स्थानीय लोगों ने दबंगई दिखाने की कोशिश की। इसी बीच एक दिन तत्कालीन राज्यपाल आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री (जिनका लिखने-पढने के चलते उनसे पारिारिक सम्बंध था) मौरावां उनके घर मिलने आये। लोगों की दबंगई हवा हुई।

वे मस्तमौला थे। अनगिनत प्रशंसक थे उनके। अनगिनत चेले। सहज विश्वासी। सही-गलत, सच्चे-झूठे की परख के पचड़े में पड़ने में समय बरबाद करना पसंद नहीं था उनको। इसके चलते अक्सर उनके चेले उनको चूना लगा जाते। उसके भी किस्से वे अपने से मौज लेते हुये सुनाते- देखो वो हमको चूना लगा गया।

कलकत्ते के किसी भी साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन में उनकी उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती थी। तमाम पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेख-कविता-संस्मरण छपते रहते हैं। कविता संग्रह रावीतट,क्रांति का देवता ,महाराणा का पत्र,असुवन जल सींचि-सींचि,राम-श्याम शतक तथा उपन्यास सिन्धु शार्दूल दाहिरसेनसबसे ऊपर कौन प्रकाशित प्रकाशित।अवध प्रांत की स्थितियों के बारे में भी खूब लिखा। ”कनौजिया दामाद” बहुत चर्चित रचना है। इसमें कनौजिया दामादों के नखरों का चित्रण है। इसके अलावा एक लखनऊ पर रचना बहुत प्रसिद्ध है उनकी।

हाल के दिनों में बीमारी के चलते बेमन से मौरावां छोड़कर कलकत्ता जाना पड़ा उनको। डायबिटीज और किडनी की समस्यायें थीं। वहीं दो दिन पहले उनका निधन हुआ।

अपने पिताजी के बारे में बताते हुये डॉ.अरुण प्रकाश अवस्थी जी ने कहा था:
ठेलुहई की यह परंपरा आगे की पीढ़ियों को भी हस्तान्तरित होती रही.जब देहावसान हुआ गुरुबाबा का तो उनके पोते का स्वत: स्फूर्त बयान था:-”आज पंद्रह अगस्त है.आज के ही दिन देश आजाद हुआ था.आज ही गुरुबाबा भी आजाद हो गये”.
अनगिनत यादें हैं गुरुजी से जुड़ी.वे ठेलुहई के चलते-फिरते स्कूल थे.अब ऐसे अद्भुत लोग कम होते जा रहे हैं.
हमारी उनकी मुलाकात गिनती की ही रहीं लेकिन उनके किस्से इतने सुन रखे हैं कि लगता रहा न जाने कित्ते दिनों की जान पहचान है।
अवस्थी के पिताजी का जाना हमारे बीच से एक अद्भुत व्यक्तित्व का जाना है। हमारे लिये हमारे घर परिवार के वे ऐसे किंवदंती पुरुष थे जिनका जिक्र आने पर अनगिनत यादें खुलती।

स्व.रमानाथ अवस्थी की कविता फ़िर याद आ रही है:
आज इस वक्त आप हैं लेकिन,
कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।


उनकी स्मृति को नमन।
http://hindini.com/fursatiya/archives/5194

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