Monday, December 07, 2015

धूप की सरकार बन गयी

सूरज भाई आज सुबह होते ही ड्यूटी पर जम गए। पेड़ों, झाड़ियों के आसपास छिपे अंधेरे और कोहरे की धरपकड़ करते हुए उनका संहार करने लगे। सूरज भाई का जलवा देखते हुए बाकी का बचा अँधेरा अपने आप ही सर पर पैर रखकर फ़ूट लिया।

सर पर पैर रखकर फूटना शायद इस तरह बना होगा जैसे रेलें चुम्बकीय पटरियों पर चलने लगें तो स्पीड बढ़ जाती है उनकी ऐसे ही आदमी जब अपने दिमाग की पटरियों पर चलना शुरू कर देता होगा तो सरपट दौड़ने लगता होगा।

किरणें खिलखिलाती हुई बाग़-बगीचे, फूल-पत्ती, छत-छज्जे पर पसर गयीं। एक किरण ने... दूसरी के कंधे पर धौल जमाते हुए कहा-' क्या बात है आज घास पर ही पसरी रहेगी या किसी फूल पर बैठना है।' इस पर दूसरी किरण ने कहा -"यार फूल पर बैठने का तो तब मजा है जब ओस की बूंद की कुर्सी मिले बैठने को। ऐसे क्या मजा फूल पर बैठने को। फूल भी दिन भर सेंसेक्स की तरह दांये-बाएं होता रहता है।हमेशा डर लगा रहता है कि कहीं सरककर नीचे न गिर जाएँ। मन करता है ओस की बूँद पर बैठकर झूला झूलूँ। पता नहीं कब ओस की बूँद पर बैठने को मिलेगा।"

किरणों की बातचीत सुनते हुए चिड़ियाँ चहचहाती हुई आपस में बतिया रहीं थीं। एक तेज से बोलती चिड़िया की तरफ इशारा करते हुए दूसरी चिड़िया ने कहा-" इत्ता जोर से चिल्लाती है यह बगीचा लगता है संसद बन गया है। इसकी आवाज से मेरे तो कान एकदम क़ानून व्यवस्था की तरह बहरे हो गए। अपने यहां भी कोई केजरीवाल जैसा कोई नियम लागू करने वाला होता तो कानून लागू कर देता चिड़ियाँ भी एक छोड़कर चिचियाया करेंगी।"
अरे तू भी कैसी बात करती है यार। केजरीवाल आएगा तो फिर लोकपाल भी आएगा। फिर राज्यपाल भी। अच्छा-भला बगीचा दिल्ली बनकर रह जाएगा। अपन ऐसे ही भले। ये चिंचियाती ही तो है। यह तो नहीं कहती भाषणवीर नेताओं की तरह कि हम यह करेंगे। वह करेंगे। इसको भगा देंगे। उसको फुटा देंगे। क्या पता उसकी आवाज ऊँची न हुई हो हमारे कान में ही कोई लोचा हुआ हो कि हमको अपने अलावा हर किसी की आवाज बेसुरी लगने लगी हो। क्या पता आदमियों के साथ रहने का असर हुआ हो हम पर भी और हमें भी किसी भी अलग के मुंह से निकली आवाज से एलर्जी हो गयी हो।

'सही कह रही हो यार'- कहते हुए दोनों चिड़ियाँ उड़कर दूसरे पेड़ की फुनगी पर चली गयीं। अब उस चिल्लाती चिड़िया की आवाज उनको भली और प्यारी लगने लगी। वे भी उसके संग कोरस में गाने लगीं। पेड़ की पत्तियां भी हिलते हुए ताली सी बजाती हुई कोरस में शामिल हो गयीं।

सामने सड़क पर एक ऑटो भड़भड़ाते हुए निकला। बुजुर्ग ऑटो लगता है जाड़े में सुबह-सुबह सड़क पर दौड़ाये जाने के चलते भन्नाया हुआ था। इसीलिये लगता है तेज आवाज में बड़बड़ाता हुआ सड़क पर चला जा रहा था। डीजल और इंजन के अनुशासन में बंधा बेचारा सड़क पर चला तो जा रहा था पर गुस्से का इजहार भी धुंआ उगलते हुए करता जा रहा था।

खुले हुए कमरे से उजाला अंदर घुस आया। गुड मॉर्निंग करते हुए बोला-'अंकल क्या आज ऑफिस नहीं जाना है?'
हमने कहा जाना है बच्चा। जाते हैं। जरा चाय पी लें।

चाय पीते हुए सामने सूरज भाई का जलवा देख रहे हैं। सब जगह धूप की सरकार बन गयी है। सूरज भाई आसमान से मुस्कराते हुए शायद कह रहे हैं -सुबह हो गयी।

Post Comment

Post Comment

No comments:

Post a Comment

Google Analytics Alternative