Monday, December 07, 2015

'अरे बाबू तुम फिरि मिलि गेयेव!'

आज दोपहर दफ्तर से मेस की तरफ आते हुए देखा कि कोई बूढ़ा माता सर पर कबाड़ का बोरा लादे डगर-मगर चलती हुई आ रहीं थी। कबाड़ का बोरा उनकी आँख के आगे आ रहा था- घूँघट की तरह। रास्ता दिखाई नहीं दे रहा होगा उनको सो लड़खड़ाते हुए सड़क के किनारे-बीच होते हुए चली आ रही थीँ। सड़क-नदी पर हिचकोले खाते आगे बढ़ती नाव की तरह हिलती-डुलती।

मैं मेस के सामने खड़ा होकर बूढ़ा माता को अपनी तरफ आते देखता रहा। जब वो पास आयीं तो मैंने कहा कि ये आँख के आगे से ठीक कर लो बोरा। थोड़ा सुस्ता लेव।

बोरे का कूड़ा सड़क पर धरकर बूढा माता ने हमको देखा तो कहा-'अरे बाबू तुम फिरि मिलि गेयेव!' देखा तो वही बूढ़ा माता थीं- मुन्नी बाई जो कुछ दिन पहले फैक्ट्री जाते हुए मिलीं थी। https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10206822911544818

जब मिल ही गए तो हाल-चाल पूछे मैंने। बोली-'अरे बाबू तुम उई दिन मिले रहव तौ सब गेट नम्बर 3 पर पूछत रहै कि साहेब कित्ते पैसा दिहिन?' कोउ कहत रहै 500 दिहिन हुईहै कोऊ कहै 50 रुपया।

कब की निकली हौ घर से पूछने पर बोली-'सबेरे की चाय पीकर घर से चली हन। सर भन्ना रहा है भूख के मारे।' हमने कहा--'थोड़ी देर आराम कर लो फिर जाना।'

हम चलने लगे तो बोली बूढ़ा माता -'कुछु चाय पानी का खर्च न दैहौ?' हमारे जेब में पांच सौ रूपये थे। हम दुविधा में पड़ें तक तक मेस में काम करने वाले बच्चे उधर से गुजरे। हमने एक से 10 रूपये उधार मांगे। उसने बूढा माता को सीधे दे दिए।

चलते हुए हमने पूछा सबेरे की भूखी हौ कुछ खाओगी तो चलो मेस में खिलाएं। बूढ़ा माता असमंजस में जब तक कुछ जबाब दें तक मेस के बच्चे बोले-'रुको अभी यहीं ले आते हैं।' वो फौरन कुछ ही देर में प्लास्टिक की थाली में रोटी,दाल, सब्जी, चावल और एक बोतल में पानी लेकर आ गया। मुन्नी बाई वहीं पुलिया पर बैठकर खाने लगी।
मैंने लंच के लिए पहले ही मना कर दिया था। लेकिन बूढ़ा माता को लंच कराया गया तो मैंने कहा- ' यह लंच मेरे नाम लिख लेना। लंच ऑफ़ नहीं रहेगा। समझ लेना मैंने ही खाया।'

लेकिन मेस के सब बच्चों ने मेरी यह बात मानने से मना कर दिया और कहा - 'ये किसी के नाम नहीं लिखा जाएगा।' किसी के नाम न लिखा जाना मतलब सबके नाम लिखा जाना। शायद आपके नाम भी।

होंठ का एक हिस्सा सूजा हुआ था मुन्नी बाई का। बताया गिर गयीं थीं। खूब खून गिरा। दर्द हुआ। अभी भी दर्द है लेकिन कम है।

हमने पूछा-'इत्ता वजन लेकर लाल माटी तक कैसे जाओगी?' बोली-'ऐसे ही धीरे-धीरे चले जाएंगे।'

हमने-'हम आएंगे तुमसे मिलने। मिलोगी वहां? चाय-पानी करवाओगी?' इस पर वह बोली-'मिलेंगे कहे नहीं? लेकिन तुम पैदल कैसे आओगे वहां उत्ती दूर?'

हमने कहा-'जैसे तुम आ जाती हो।'

खाना खाकर प्लेट फेक दी बूढ़ा माता ने। प्लास्टिक की बोतल कूड़े में समेट कर सर पर बोझ लादकर चली गयीं।

हम अपने बुजुर्गवार बालकृष्ण शर्मा नवीन की ये पक्तियां याद कर रहे थे:
"लपक चाटते जूठे पत्ते, जिस दिन मैंने देखा नर को
उस दिन सोचा क्यों न लगा दूं, आज आग इस दुनिया भर को
यह भी सोचा क्यों न टेंटुआ, घोटा जाय स्वयं जगपति का
जिसने अपने ही स्वरूप को, रूप दिया इस घृणित विकृति का।"


जूठे पत्ते भले न चाट रही हो माताजी लेकिन यह कैसी विडम्बना है कि विकास के अनगिनत दावों के बीच अपनी आबादी का एक बड़ा हिस्सा दोपहर तक भोजन वंचित रहे। नवीन जी की पीढ़ी आशावान थी। उनमें विषमता के प्रति आक्रोश था। समय के साथ यह आक्रोश ठण्डा होता गया । अब ऐसी घटनाएं देखकर उदास होकर ही लगता है कि अपना काम पूरा हुआ।

है कि नहीं?

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