Sunday, October 30, 2016

दीपावली मतलब अंधेरे के खिलाफ़ उजाले की सर्जिकल स्ट्राइक



दीपावली को रोशनी का त्योहार माना जाता है। त्योहार के आते ही अंधेरे को निपटाने की बातें शुरु हो जाती हैं। गोया अंधेरा न हुआ जानी दुश्मन हो गया। पाकिस्तान टाइप। निपटा दो फ़ौरन उजाले की बमबारी करते हुये। एक तरह से दीपावाली अंधेरे के खिलाफ़ उजाले की ’सर्जिकल स्ट्राइक’ है।
ये सर्जिकल स्ट्राइक वाली बात पौराणिक संदर्भ में भी लागू होती है। राम ने लंका में घुसकर रावण को मारा। अपनी पसंद का राजा बना आये वहां। सीता जी को ले आये। जब वापस आये तो देश की जनता ने हर्षित होकर हल्ला-गुल्ला मचाया। पटाखेबाजी करी। शायद नारे भी लगाये हों- ’हमारा राजा कैसा हो, रामचन्द्र जी जैसा हो’। कुल मिलाकर कुछ-कुछ ऐसा ही सीन रहा होगा जैसा अभी अपनी सेना की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद हुआ।
लेकिन अंधेरे के खिलाफ़ ये उजाले की हल्ला बोल की प्रवृत्ति के पीछे बाजार की ताकत काम करती है। अंधकार पर रोशनी की विजय के नाम पर तमाम रोशनी के एजेंट अपनी दुकान लगाकर बैठ जाते हैं। इतना उजाला फ़ैला देते हैं कि आंख मारे रोशनी के चौंधिया जाती है। दिखना बंद हो जाता है। अंधेरे के ’अंधेरे’ से उजाले के ’अंधेरे’ में लाकर खड़ा कर देते हैं रोशनी के ठेकेदार। जब तक आपको कुछ समझ में आता है तब तक आपको लूटकर फ़ूट लेते हैं। आपको जब तक होश आता है तब तक आप लुट चुके होते हैं। जो लोग लुटने की शराफ़त नहीं दिखा पाते वे पिट भी जाते हैं।
पर हम तो प्रकृति के उत्पाद हैं। अपने लिये तो अंधेरा और उजाला प्रकृति के दो सहज पक्ष हैं। दिन और रात की तरह। प्रकृति ने हमें इसी तरह बनाया है कि जब धरती सूरज के सामने रहे तब हमें दिखता रहे। बाकी समय अंधेरा रहे। दिखना बंद हो जाये। यह वास्तव में धरती ने हमारे लिये आराम का इंतजाम किया है। जितने भी जीव जंतु हैं धरती पर सबके लिये इसी तरह का इंतजाम है। सब जीव जंतु इसे सहज भाव से लेते हैं। कोई हल्ला नहीं मचाता। लेकिन इंसान खुराफ़ाती है। जबसे उसने कृत्तिम रोशनी की खोज की होगी तबसे वह अंधेरे के खिलाफ़ हल्ला मचाता रहता है।
इंसान को अंधेरे में दिखता नहीं। अंधेरे में डरता है वह। अपनी औकात कम लगती हैं अंधेरे में उसे इसलिये वह अंधेरे को अपना दुश्मन मानकर उसके खिलाफ़ साजिश करता है। जहां देखो तहां अंधेरे का कत्ल करता रहता है। कहीं-कहीं तो इतनी ज्यादा रोशनी करती है कि अंधेरे से भी ज्यादा अंधेरा फ़ैल जाता है। अंधेरा कभी उजाले के खिलाफ़ साजिश नहीं करता। वह लड़ाई भिड़ाई भी नहीं करता उजाले से। जब उजाला अंधेरे पर हमला करता है तो चुपचाप किनारे हो जाता है। नेपथ्य में चला जाता है। जब उजाले की सांस फ़ूल जाती है अंधेरे से कुश्ती लडते हुये तब अंधेरा फ़िर से अपनी जगह वापस आ जाता है।
अंधेरे का बड़प्पन ही है कि वह उजाले घराने के किसी भी सदस्य को चोट नहीं पहुंचाता। वो एक शेर है न:
जरा सा जुगनू भी चमकने लगता है अंधेरे में,
ये अंधेरे का बड़प्पन नहीं तो और क्या है जी!
अंधेरा जरा से जुगनू को भी चमकने का मौका देता है। उजाले में यह उदारता नहीं होती। वह जहां रहता है वहां किसी अंधेरे को उजाले को पनपने का मौका नहीं देता। डरता है उजाला कि जरा सा मौका मिला अंधेरे को तो वह उजाले को भगा देगा।
अंधेरे पर उजाले की जीत की आड़ में तमाम घपले होते हैं। बिजली बनाने के नाम पर जंगल काट दिये जाते हैं। बांध बनाने के लिये आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया जाता है। शहर में बिजली का झटका गांवों में लगता है। कहीं 24 घंटे बिजली पहुंचाने के लिये दूसरी जगह 48 घंटे अंधेरे में डुबा दिये जाते हैं। एक जगह रोशनी की चकाचौंध होती है तो दूसरी जगह घुप्प अंधेरा। मतलब हाल ये होता है कि:
कल उजालों के गीत बहुत गाये गये!
इसी बहाने गरीब अंधेरे निपटाये गये।
अंधेरे पर उजाले का जयघोष करने वाले कामना करते हैं कि दुनिया में सदैव उजाला बना रहे। अंधेर-उजाले के लोकतंत्र की जगह रोशनी की तानाशाही सरकार बनी रहे। यह कामना ही प्रकृति विरुद्ध है। यह तभी हो सकता है जब धरती सूरज का चक्कर लगाना बन्द कर दे। जैसे ही ऐसा कुछ हुआ, ग्रहों का सन्तुलन बिगड़ जायेगा। सौरमण्डल की सरकार गिर जायेगी। धरती पर प्रलय जैसा कुछ आयेगा। अंधेरे पर उजाले की विजय का हल्ला मचाने वाला इंसान अपने टीन टप्पर, अस्थि-पंजर समेत ब्रह्मांड के किसी कोने में कचरे सरीखा पड़ा रहेगा न जाने किसी आकाशीय पिंड का चक्कर लगाते हुये।
मान लीजिये धरती नष्ट भी न हुई और आज से ही दुनिया से अंधेरा विदा हो गया। सब तरफ़ उजाला ही उजाला हो गया तो सोचिये क्या होगा। दुनिया के सारे अंधेरे में किये जाने वाले कार्य व्यापार ठप्प बन्द हो जायेंगे। जनरेटर बनाने/बेंचने वाली कम्पनियां बन्द हो जायेंगी। किराये पर गैस बत्ती देने वाले कटोरा लिये नजर आयेंगे। अंधेरे में देखने वाले उपकरण बनाने वाली कम्पनियां दीवालिया हो जायेंगी। अंधेरे-उजाले में रहने के अभ्यस्त लोग बिना हवाई यात्रा के ही जेट लैग के शिकार होने लगेंगे।
अगर कभी ऐसा हुआ तो पक्का फ़िर अंधेरे के भाव बढेंगे। कृत्तिम उजाले की जगह कृत्तिम अंधेरे का व्यापास शुरु होगा। अंधेरा पैदा करने वाले उपकरण बनेंगे। अंधेरा पैदा करने वाले बल्ब बनेंगे। अंधेरा उगाने वाली मोमबत्तियां बंद बनेंगी। लोग आंख के डाक्टर के पास जाकर दुखड़ा रोयेंगे – ’डा.साहब इस आंख से दिखता ज्यादा है। कोई कम दिखने वाली दवा दीजिये। रोशनी से बहुत तकलीफ़ होती है।’ उजाले की तानाशाही होगी तब मुहावरे भी बदलेंगे। लोग ’आंख के सामने अंधेरा छा जाने’ की जगह ’ आंख के सामने उजाला छा गया’ कहने लगेंगे। कवि गण अंधेरे के सम्मान में गीत लिखेंगे। दीपावली के बदले क्या पता कोई ऐसा त्योहार मनाया जाने लगे जिसमें अंधकार ही अंधकार पैदा किया जाये। नीरज की तर्ज पर कोई कवि कहे-
बुझाओ दिये पर रहे ध्यान इतना,
उजाला धरा पर कहीं रह न जाये।
आपको भी लग होगा कि कहां की अल्लम-गल्लम हांकने लगे। लेकिन कहने का मतलब मेरा इतना ही है कि धूप-छांह की तरह ही अंधेरे-उजाले का रिश्ता है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं है। खुशी मनायें लेकिन उसके लिये अंधेरे को गरियाये नहीं। उसकी भी इज्जत बनाये रखें। अंधेरा वास्तव में मिट गया तो रोशनी में आपस में समाजवादी कुनबे की तरह कटाजुज्झ होने लगेगी क्योंकि:
असल में अंधेरे की अपनी कोई औकात नहीं होती,
इसकी पैदाइश तो उजालों में जूतालात से होती है।

आपको दीपावली की मंगलकामनायें।

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