Sunday, October 09, 2016

स्वच्छता अभियान के बाद



इतवार को विक्रम की छुट्टी होती है। वह आराम से खर्राटे लेते हुये सो रहा था कि उसके मोबाइल की घंटी बजी। फ़ोन बेताल का था। झुंझलाते हुये विक्रम ने फ़ोन उठाया। बेताल बोला –’तू अभी तक सो रहा है। मैं यहां कब से नगर निगम के दफ़्तर के पास तेरा इंतजार कर रहा हूं कि तू लादकर ले चलेगा।
सवाल-जबाब करने होंगे। जल्दी आ जा यार। ड्यूटी पूरी करके फ़िर ऐश करें।’


विक्रम ने अनमने मन से मुंह धोया और निकल लिया। बेताल को लादा और चल दिया। आज फ़िर उसको बेताल के बढे हुये वजन का अंदाज हुआ। उसने कहा-“ बेताल भाई, तुम्हारा वजन तो नेताओं के वेतन भत्ते की तरह बढ़ता जा रहा है। कुछ मेरे पर भी रहम कर भाई। वजन कम कर।“

बेताल ने पहले तो सोचा इस विक्रम को हड़का दें। लेकिन यह सोचकर कि इसके बाद किसकी पीठ पर फ़्री फ़ंड में लदेगा वह चुप रह गया। उसने विक्रम को ’सर्जिकल स्ट्राइक’ के किस्से सुनाये। सरकार और सेना की बहादुरी का बखान किया और फ़िर विक्रम को किसी को न बताने की कसम खिलाते हुये बताया कि सरकार ने ’पहली सर्जिकल स्ट्राइक’ कूड़े के खिलाफ़ की थी। उस अभियान का नाम रखा था ’स्वच्छता अभियान।’ मैं अपना आज का सवाल पूछने के पहले इस अभियान के बारे में बताता हूं।

विक्रम को हंसी आने को हुई। उसका मन किया कि वह बेताल को बता दे कि जिस बात को देश का बच्चा-बच्चा जानता है उसको यह बेताल किसी को न बताने की कसम दिला रहा है। पिछले दिनों स्वच्छता अभियान की फ़ाइलें इतनी दौड़ीं कि बाकी के लिये ट्रैफ़िक जाम हो गया था। जो भी गन्दगी हुई खर्च-वर्च में उस सबको ’स्वच्छता अभियान’ के नाम पर निपटा दिया गया। और भी तमाम बातें उसको पता थीं लेकिन वह चुप रहा। उसको पता था कि आजकल सच बोलना बड़ा बवाल का काम है। क्या पता कौन देशद्रोही, गद्दार बताकर गरियाने लगे।

बेताल ने कहा- आजकल सब जगह काम करने का तरीका बदला जा रहा है। जगहों के नाम बदले जा रहे हैं। कुछ हो भले ने लेकिन बदलाव का एहसास हो यह ध्यान रखा जा रहा है। इसलिये मैं भी आज से ही कहानी कम सुनाऊंगा लेकिन सवाल ज्यादा। सवाल भी ऐसे पूछुंगा जिनके बारे में कहानी में हमने बताया ही नहीं होगा। तुमको खुद अपने मन से जबाब देने होंगे।

विक्रम को पता था कि उसका कुछ बोलना बेकार है। दफ़्तरों के अडियल बास की तरह करेगा यह अपने ही मन की। इसलिये उसने झल्लाते हुये कहा –’अब यार तू शुरु कर। दूसरे की गर्दन पर लदे-लदे तुझे तो कुछ फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन मेरे हाल तो उस जनता की तरह हो रहे हैं जो नाकारा जनप्रतिनिधियों को लादे-लादे घूमती रहती है।

बेताल ने गला खखारकर अपनी बात शुरु की:

“आजकल स्वच्छता अभियान का हल्ला मचा हुआ है देश भर में। कूड़ा ठिकाने लगाया जा रहा है। कहीं-कहीं का कूड़ा हल्ला मचा रहा है। ऐसे कैसे भगा दोगे हमको? हम यहां के स्थायी रहवासी हैं। कहां जायेंगे अपना परिवार लेकर?

सफ़ाई अभियान वाले हाथ जोड़ रहे हैं कूड़े के! भाई साहब एक-दो दिन की बात है! कहीं इधर-उधर हो जाइये। हमको साफ़-सफ़ाई कर लेने दीजिये। फ़ोटो-सोटो हो जाने दीजिये। फ़िर आप रहियेगा ठाठ से। आपकी ही जगह है। कौन रोकने वाला है आपको!

कूड़ा शरीफ़ आदमियों की तरह इधर-उधर हो जाता है। कहीं दीवार के पीछे, कहीं किसी गढ्ढे में, कहीं किसी पुल की आड़ में। जहां कुछ आड़ नहीं मिली वहां फ़टा तिरपाल ओढ़ के सो गया। नदी, नहर, नाले में कूद गया। सफ़ाई की इज्जत के लिये गन्दगी कुर्बान हो गयी।

सबने सफ़ाई के करते हुये फोटो खिंचाये। सफ़ाई मुस्करा रही है। लोग खिलखिला रहे हैं। स्वच्छता अभियान पूरा हो गया है। छुट्टी बरबाद होने का दुख कम हो गया है।“

इतने के बाद बेताल ने कहा। नये पैटर्न के हिसाब से आज कहानी इतनी ही। अब नये पैटर्न के हिसाब से मैं आज तुमसे एक से ज्यादा सवाल पूछूंगा। तुम उनके जबाब दे दोगे तो ठीक वर्ना तुम जो मुझे ढोते हुये कहानी सुनते हो और सवाल के जबाब देते हो उस पर भी सर्विस टैक्स लगा दिया जायेगा जिसकी वसूली भी तुमसे ही होगी। इसके बाद बेताल ने ये सवाल पूछे:

1. सफ़ाई अभियान के लिये झाडू-पंजा मंहगी दरों पर खरीदने के लिये कौन जिम्मेदार है?
2. एक ही तरह की झाडू एक ही दिन अलग-अलग दामों पर क्यों खरीदी गयीं?
3. एक दिन के सफ़ाई अभियान के लिये झाड़ू-पंजा खरीदने के बजाय किराये पर लेने के विकल्प पर क्यों विचार नहीं किया गया?
4. जब एक आदमी को दो घंटे ही सफ़ाई करनी थी तो हर आदमी के लिये एक झाड़ू खरीदने की बजाय एक ही झाड़ू से चार लोगों से सफ़ाई कराने विकल्प पर क्यों विचार नहीं किया गया?
5. सारे लोग एक ही जगह सफ़ाई करते पाये गये इससे कम क्षेत्र की सफ़ाई हुई। अलग-अलग जगह सफ़ाई करने के विकल्प पर क्यों विचार नहीं किया गया?
6. साल भर सफ़ाई का ठेका चलने के बावजूद इतना कूड़ा इकट्ठा कैसे हुआ? क्या सफ़ाई के ठेके में धांधली हुई है?
सवालों से विक्रम को पता चल गया कि ये ससुरा बेताल किसी बाबू से पैसा लेकर उसकी आपत्तियों के जबाब बनाने में सहायता करने का ठेका लिया है। उसने बेताल को बड़ी तेज से हड़काया और कहा कि बेताल यह आदमियों की तरह की हरकतें तुमको शोभा नहीं देती। इस तरह दलाली करना शुरु मत करो। हम लोगों की कहानियां आम जनता अभी मन लगाकर सुनती है। लेकिन जब उसको पता लगेगा कि हम इस तरह पैसा लेकर बाबुओं की आपत्तियां निपटाने में सहायता करते हैं तो वह हमको भी उन नेताओं सरीखा ही समझेगी जो पैसा लेकर संसद में सवाल पूछते हैं।

बेताल ने शर्मिंदा होने का नाटक किया और कहा इस बार बता दो क्योंकि मैं एडवांस में पैसे ले चुका हूं। अब मना करूंगा तो दलाली से बाबू का विश्वास उठ जायेगा जो किसी नौकरशाही के लिये बहुत खराब चीज है। आइंदा ऐसा नहीं होगा।

विक्रम ने झल्लाते हुये बेताल से बाबू का नाम और दफ़्तर का पता पूछा। गूगल सर्च करके आडिटर का पता लगाया। स्कैनर लगाकर उसके दिमाग से सवाल के जबाब निकालकर बेताल को लिखवाये। सवालों के जबाब इस तरह थे:

1. सफ़ाई अभियान की जब घोषणा हुई तो मांग और आपूर्ति के नियम के तहत अचानक झाडू-पंजे के दाम बढ़ गये क्योंकि सभी को सफ़ाई करनी थी। बढ़े हुये दाम पर खरीद अपरिहार्य होने के चलते जायज है। और जहां तक जिम्मेदारी का सवाल है तो इसके लिये जनता जिम्मेदार है क्योंकि जो हुआ सब अंतत: आम जनता के लिये हुआ।

2. स्वच्छता अभियान में अलग-अलग पद के लोग शामिल थे। सबके ’ग्रेड पे’ अलग थे। जैसे एक ही दूरी और एक ही तरह की गाड़ी से आने वालों लोगों के लिये वाहन भत्ता ’ग्रेड पे’ के अनुसार मिलता है वैसे ही सबके ’ग्रेड पे’ के हिसाब से झाडू की व्यवस्था की गयी। इसलिये एक ही तरह की झाडू अलग-अलग दाम पर खरीदी। ऐसा न करते तो सीनियर लोग स्वच्छता अभियान में भाग न लेते। इसलिये एक जैसी सफ़ाई सामग्री अलग-अलग दामों पर खरीदना अपरिहार्य था।

3. किराये पर सफ़ाई सामग्री उपलब्ध ही नहीं थीं। अगर कहीं थी भी तो पर्याप्त नहीं थी। इसके अलावा विभाग में कभी किराये पर सामान खरीदने का काम किया नहीं गया इसलिये अनुमानित किराये की दरें उपलब्ध नहीं थीं इसलिये भी किराये पर लेने के प्रस्ताव पर विचार नहीं किया गया।

4. जो भी लोग स्वच्छता अभियान में शामिल थे उनको अभियान के बाद एक साथ कहीं न कहीं जाना था इसलिये सब लोग एकसाथ सफ़ाई के लिये बुलाये गये। स्वच्छता के बहाने सामूहिकता का भी प्रसार हो गया। इसके अलावा अगर दिन भर सफ़ाई करते लोग तो फ़ोटोग्राफ़ी, नाश्ते वगैरह का खर्च बढ जाता।

5.अलग-अलग जगह सफ़ाई करने से फ़िर लगता बहुत कम लोग सफ़ाई कर रहे हैं। एक जगह इकट्ठा सफ़ाई करने से यह लगा कि पूरा हुजूम जुट गया है सफ़ाई के लिये।जैसे अभी प्रधानमंत्री जी के अमेरिका दौरे में ’दवाई चौराहे’ पर लोग इकट्ठा हुये तो लगा न कि पूरा अमेरिका उमड़ पड़ा। अलग-अलग शहरों में रहते तो वो मजा नहीं आता न।

6. सफ़ाई व्यवस्था साल भर चकाचक चली लेकिन जब स्वच्छता अभियान चलाना था तो इधर-उधर से कूड़े का इंतजाम किया गया। अब सरकार के आदेश का अनुपालन तो जरूरी है न!

सवालों के जबाब नोट करते ही बेताल उड़ते हुये उस बाबू के पास पहुंचा। बाबू ने उससे कहा- ’तुमने आने में देर होते देखकर मैंने आडिटर से सीधे सेटिंग करने की सोच ही रहा था। अच्छा हुआ तुम आ गये। सस्ते में काम हो गया। यह कहकर उसने बेताल को बाकी के पैसे थमाये और आपत्तियों के जबाब टाइप करने लगा।

बेताल लटकने के लिये पेड़ की तरफ़ लौटते हुये सोच रहा था कि कूड़े वाली गंदगी तो साफ़ हो जायेगी लेकिन व्यवस्था की यह गंदगी कैसी साफ़ होगी जो दिखती भले नहीं हो लेकिन गंध सबसे ज्यादा मारती है। इसके लिये स्वच्छता अभियान कब चलेगा?

#व्यंग्य, #व्यंग्यकीजुगलबंदी, Nirmal Gupta, @ravishankar.shrivastava

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