Sunday, December 04, 2016

देशभक्ति का मौसम


मौसम तीन तरह के होते हैं- जाड़ा, गर्मी, बरसात। जाड़े में सर्दी पड़ती है। गर्मी में गरम हवा चलती है। बरसात में पानी बरसता है। लेकिन यह तो शुद्ध मौसम की बात है। आजकल मिलावट का जमाना है। हर तरफ़ मिलावट हो रही है। ईमानदारी में बेईमानी, राजनीति में धूर्तता , देशभक्ति में गद्दारी, सफ़ेदधन में कालेधन की इतनी महीन मिलावट होने लगी है कि पहचानना मुश्किल होता है। इसी तरह मौसम में भी मिलावट होने लगी है। कब जाड़े में पानी बरसने लगे कहना मुश्किल। जाड़े में कब पंखे चलने लगें यह भविष्यफ़ल बताने वाले भी नहीं बता पाते।

प्रकृति के बनाये मौसमों के अलावा इंसान ने भी कई मौसम अपने हिसाब से बनाये हैं। इनमें देशभक्ति का मौसम सबसे प्रमुख होता है। हर देश में यह अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। जैसे जापान में मजदूर लोग नाराज होते हैं तब उत्पादन बढा देते हैं। लेकिन अपने यहां नाराजगी का इजहार काम बन्द करके और कहीं-कहीं बना हुआ सामान जलाकर करते हैं।

अपने देश में देशभक्ति का मौसम कई तरह से मनाया जाता है। अलग-अलग तबके के लोगों के अपने-अपने अंदाज हैं।
टाप क्लास की देशभक्ति ऊपर के 1% तबके की होती है। इनके कब्जे में देश के 90%  संसाधन होते हैं। वे लोग जो कुछ भी करते हैं वही देशभक्ति होती है। उनकी हर लीला देशभक्ति है। उनके द्वारा की गई हर लूटपाट, गड़बड़ी, गद्दारी को देशभक्ति के खाते में जोड़ा जाता है। इनकी देशभक्ति के हाथ कानून के हाथ से भी लम्बे होते हैं।  देशभक्ति के काम में सहयोग के लिये वे सरकारों को काम पर रख लेते हैं। सरकारें  उनकी देशभक्ति में  सहायता करती हैं। जो सरकार उनकी देशभक्ति में अड़चन डालती है उसको वे  बदलवा देते है। इनकी देशभक्ति का डंका हर तरफ़ बजता रहता है। इनके लिये हर मौसम ’देशभक्ति का मौसम’ होता है। इसकी ’देशभक्ति का मौसम’ रंगीन, खुशनुमा, जायकेदार और आनन्ददायक होता है।

दूसरी तरह की देशभक्ति वह तबका मनाता है जो आबादी में 30-35% होगा। देशभक्ति का सबसे ज्यादा हल्ला यही तबका मचाता है। देशभक्ति के काम में आसानी के लिये सरकार को देश समझ लेता है। हल्ले में इजाफ़े के लिहाज से यह तबका खुद को दो भागों में बांट लेता है। एक सरकार समर्थक हो जाता है। दूसरा सरकार विरोधी। दोनों मिलकर देशभक्ति का हल्ला इत्ती जोर से मचाते हैं कि देश सुने तो बहरा हो जाये।  समर्थक तबका सरकार के हर कदम का समर्थन करता है। सरकार उनकी गर्दन काटने के लिये अध्यादेश लाये तो वे भारत माता की जय कहते हुये उनका समर्थन करते हैं। नोटबन्दी का मसला हो या सर्जिकल स्ट्राइक का किसी भी सवाल उठाने वाले को  देशद्रोही मानता है।


समर्थक लोग दिल लगाकर समर्थन करते हैं। नोटबंदी का समर्थन करने वाला दलाल कमीशन पर पुराने नोट बदलते हुये भारतमाता की जय का नारा लगाता है। ड्राइंगरूम में वन्देमातरम चिल्लाता है तो बीबी समझ जाती है 500 रुपये की गड्डी बदली। इंकलाब जिन्दाबाद सुनती है तो कहती है- ’आज 1000 के नोट बदलने वाले बहुत आ रहे हैं।’

बीच के तबके के लिये ’देशभक्ति का मौसम’ सरकार की हरकत निर्भर करता है। सरकार कोई कल्याणकारी काम करती है तो सरकार विरोधी तबका उसकी खिलाफ़त करते हुये ’देशभक्ति मनाने’ लगता है। सैनिकों के भले के लिये कोई स्कीम आती है तो जी भरकर सरकार की लानत-मनालत करता है। सीमा पर गोली खाने वाले सैनिक की तरफ़ खड़ा होकर सरकार के खिलाफ़ बयान देता है और नींद की गोली खाकर सो जाता है।

यह बीच का वर्ग  ’देशभक्ति का मौसम’ इतने बहुरंगी तरीके से मनाता है कि सच्ची में लगता है कि भारत विभिन्नता में एकता का देश है। एक ही मुद्दे पर अलग-अलग विचार वाले लोग अलग तरह से राय रखते हैं। कोई बहस करता है। कोई तर्क-कुतर्क का सहारा लेता है। आमने-सामने होने पर जिन्दाबाद-मुर्दाबाद भी होता है। उत्साह में आने पर मारपीट भी हो जाती है। गाली-गलौज का मुजाहिरा करते हुये अपनी सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़े रहते हैं लोग। गाली-गलौज में मां-बहन करते हुये बताते रहते हैं कि देश नारियों के सम्मान के लिये कितना हलकान रहता है।

इन दोनों तबको के अलावा तीसरा तबका है। आबादी में सबसे बड़ा। औकात के लिहाज से सबसे गरीब। ऊपर के दोनों के तबके इस तबके की भलाई के नाम पर इसकी ऐसी-तैसी करते रहते हैं। सरकारें इसकी भलाई के लिये काम इस तरह काम करती रहती हैं, इसको पता ही नहीं चलता। देश इसके भले के लिये बहस करता रहता है, इसको सुनाई ही नहीं देता। देश इसको मुख्यधारा में लाने का हल्ला मचाता रहता है। हर हल्ले के साथ यह तबका देश की मुख्यधारा से और दूर धकिया दिया जाता है। इस तबके के लिये  ’देशभक्ति के मौसम’  का कोई मतलब नहीं होता। इसके लिये हर मौसम बदरंग और  बेईमान है। हर मौसम में भकुआया रहता है यह तबका। जब कभी वह लोगों को देशभक्ति की बात करता सुनता है तो इसका मतलब समझ नहीं पाता। ’देशभक्ति का मौसम’ कैसा होता है उसको पता ही नहीं है। 

जिसके लिये जिन्दा रहना ही चुनौती हो उसके लिये ’देशभक्ति का मौसम’ कोई मायने नहीं रखता।

जाड़े के मौसम में बिस्तर पर कम्बल ओढकर  यह लिखते हुये देख रहे हैं कि विद्याबालन अपनी पिक्चर का प्रमोशन कर रही हैं। प्रधानमंत्री जी देश के लिये लाइन में लगे रहने वालों की तारीफ़ कर रहे हैं। घरैतिन थोड़ा ना नुकर के बाद एक बार से चाय पिलाने की बात पर सैद्धान्तिक रूप से सहमत हो गयी हैं।  कुल मिलाकर इधर मौसम में जाड़े, सौन्दर्य, देश और घर की  ’कातिलाना मिलावट’ है।  ’कातिलाना मिलावट’ बोले तो ’डेडली कम्बीनेशन’।

आपके उधर मौसम कैसा है?



  

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1 comment:

  1. हमारे यहाँ का मौसम कुछ इस तरह है -
    http://raviratlami.blogspot.in/2016/12/blog-post.html

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