Sunday, December 25, 2016

दिसंबर में देश

दिसम्बर के महीने में कम्बल में बैठे-बैठे देश के हाल बयान करना ऐसा ही है जैसा दिल्ली में खड़े-खड़े कन्याकुमारी के सूर्योदय की रनिंग कमेंट्री करना। लेकिन जब बयाना लिया है तो बयान तो करना ही पड़ेगा न!
दिसम्बर का महीना आ गया। साल बीतने को आया। सर्दी भी पड़ने लगी। जगह-जगह मूंगफ़ली के ठेले लग गये। कहीं-कहीं फ़ुटपाथ पर मूंगफ़ली के पिरामिड बने दिख रहे हैं। उन पिरामिडों के पीछे आलथी-पालथी मारे बैठा दुकानदार ग्राहक के इंतजार में पलक पांवड़े बिछाये बैठा है। बोहनी का इंतजार है उसको। अभी तक कैशमशीन नहीं लगवाई है अगले ने।
घरों में चाय की खपत बढ गयी है। बाहर से घर के अन्दर घुसता हुआ हर शख्स रजाई की तरफ़ लपकता हुआ ’जन्नत अगर है कहीं तो यहीं है, यहीं है, यहीं है’ का चलता फ़िरता इश्तहार लगता है।
कोहरे का जलवा बढ रहा है। पहाड़ पर तापमान शून्य के नीचे गुलाटियां खा रहा है। कानपुर में उतरने वाला हवाई जहाज लखनऊ में उतरता है। ऐसे जैसे कि अफ़गानिस्तान में अमेरिकी के ड्रोन भटककर निशाने से मीलों दूर गिरते थे । अंधेरे में दिखा नहीं होगा। भौत तेज स्पीड से उतरा होगा। कानपुर में रुकते-रुकते राजधानी पहुंच गया। “भैंस बियानी में गढ़ महुबे में पड़वा गिरा कनौजे जाय” की तरह ।
कोहरे के कारण ही शायद रिजर्व बैंक से निकले नोट भटककर एटीएम की जगह लोगों की तिजोरियों , तहखानों में पहुंच गये। दोष बेचारे बैंकरों और बिचौलियों को दिया जा रहा है।
ट्रेनें एक दिन बाद स्टेशन पहुंच रही हैं। पहिये को पटरी सूझती नहीं होगी। टटोल-टटोलकर आगे बढती होगी रेल पटरी पर। सड़कों पर गाड़ियां कोहरे के झांसे में आकर गले मिल रही हैं।
वैसे तो दिसम्बर हर साल आता है लेकिन इस बार कुछ अलग ही तरह आया है। नोटबंदी ने आम आदमी का ’नोटों से ब्रेकअप’ के कराकर बवालों से ’हुकअप’ करा दिया है। हर समस्या की गाड़ी नोटबंदी की पार्किंग में जाकर खड़ी हो जाती है। नोटबंदी की आफ़त के चलते ही सर्दी भी शायद अभी तक अपने साथ केवल कोहरे को साथ लेकर आई है। ठिठुरन, गलन, मरन, शीतलहरी आदि को छोड़ आई आई है। पता नहीं क्या बवाल हो जाये बिना नोटों के।
कोहरे की आड़ में नकली नोट असली नोटों के गले में हाथ डालकर रिजर्व बैंक में जमा हो गये हैं। काला धन और काला होकर नोटों के बीच मुंड़ी घुसाकर छिप गया है। नकली नोट असली नोटों के साथ इस कदर गड्ड-मड्ड हो गये हैं जैसे ईमानदारी के साथ काहिली और गैरजिम्मेदारी। दोनों को अलग करना मुश्किल हो गया है।
सांता बेचारे के बुरे हाल हैं सर्दी में। नोटबंदी के चलते लोगों को बांटने के लिये उपहार खरीदने में समस्या हो रही है उसको । उसके पास रखे सारे पुराने नोट कागज के टुकड़े में बदल गये। दुनिया भर के लोगों को दो हजार रुपये में कित्ते उपहार बांटेगा भाई कोई।
लेकिन सुबह होते ही सूरज भाई ने कोहरे का सर्जिकल करके उसको तिड़ी-बिड़ी कर दिया है। सूरज की किरणें चप्पे-चप्पे पर पसर गयीं हैं। मौसम किसी नोट भरे एटीएम सा सुहाना हो गया है। साल का आखिरी इतवार इस दुविधा में आधा बीत गया है कि पहले साल की यादों का हिसाब करें कि नये साल के संकल्प का चुनाव किया जाये। दोनों एक-दूसरे पहले आप, पहले आप कहते हुये समय को मूंगफ़ली की तरह टूंगते हुये बिता रहे हैं।
हम दिसम्बर में देश के हाल देखने के लिये सड़क पर आते हैं। एक आदमी बीच सड़क लम्बवत लेटा हुआ है। धूप-छांह की सीमा रेखा पर लेटा हुआ आदमी नशे में है। उसको उठाने की जो भी कोशिश करता है उसको वो गरियाने लगता है। दरबानों को गरियाते , मां-बहन की गालियां देते हुये हड़काता है- ’तमीज से बात करो, तुम पब्लिक सर्वेंट हो।’ गालियों में वजन लाने के लिये देश के प्रधानमंत्री को भी शामिल कर लेता है। दरबान हंसते हुये उसके नशे के उतरने का इंतजार करते हैं। कहते हैं -’इसका तो रोज का यही धंधा है।’
हर समस्या की एक सेल्फ़ लाइफ़ होती है। उसके बाद समस्या अपने-आप खत्म हो जाती है। नयी समस्या को जगह देने के लिये दुकान बढाकर चल देती। देश की हर बड़ी समस्या का इलाज इसी अचूक मंत्र से संभव है !
वहीं मैदान पर दूर तमाम पेड़ कोहरे की चादर ओढे खड़े हुये हैं। झाड़ियों-झंकाड़ के बीच बाकी बचे मैदान में पसरी हुई धूप में टेंट हाउस के रंग-बिरंगे शामियाने सूख रहे हैं। अनगिनत रंग बिखरे हैं कायनात में। इन जैसे ही रंगों को मिलाकर देश का रंग बन रहा है। अपन के इधर तो ’दिसम्बर में देश’ ऐसा ही बहुरंगी धज में दिख रहा है।
आपके उधर कैसा दिख रहा है 'दिसम्बर में देश'?

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