Sunday, December 11, 2016

सर्दी का मौसम



दिसम्बर का महीना शुरु होते ही कायनात ने मौसम बदलने की घोषणा कर दी। सर्दी का मौसम आ गया। कोहरे की चादर ओढे  पेड़-पौधे सूरज की तरफ़ मुंह करके खड़े हो गये। एटीएम के बाहर नोट-निकासी के लिये खड़ी जनता की तरह वे सूरज से गर्मी की सप्लाई का इंतजार करने लगे।  किरणों के काम के घंटे कम हो गये। उनके दर्शन दुर्लभ हो गये।  ठण्डक की सप्लाई बढ़ा दी गयी।  सर्दी के  कपड़े निकलने लगे। लोग पहन-ओढकर निकलने लगे। जगह-जगह कूड़े के ढेर के अलाव जलने लगे। लावारिश मौतें ठंड के खाते में जुड़ने लगी।


क्या पता सूरज भाई के यहां भी कोई ’रोशनी घोटाला’ हुआ हो। सूरज के केन्द्र से चली करोंडों-अरबों डिग्री की गर्मी सतह तक आते-आते 6000 डिग्री ही बचती है। किसी ने सोचा यह उजाले का भ्रष्टाचार रुकना चाहिये। अरबों-खरबों के फ़ोटान जहां दबे हैं वे सब निकलने चाहिये। वहां भी नोटबंदी की तर्ज पर ’किरणबंदी’ हो गयी हो। ज्यादा फ़ोटान वाली किरणों की सप्लाई बन्द हो गयी हो। डिकिरणाईजेशन लागू हो गया हो सूरज भाई के यहां भी। इसीलिये सुबह-शाम रोशनी की किरणों की सप्लाई में कमी हो गयी हो। 

ट्रेनों ने  देरी से चलना शुरु कर दिया है। जहाजों की उड़ाने निरस्त होने लगी हैं। मंहगी गाड़ियां रफ़्तार में साइकिलों से मुकाबला करने में जुटी हुई हैं। लोग मुंह की भाप से खुद को गरम करके काम चलाने लगे हैं। मूंगफ़ली टूंगते हुये देश की समस्याओं के हल खोजने के काम में तेजी आ गयी है। चाय की खपत में पूरे देश में इजाफ़ा हो गया है। चाय वालों की पूछ और नखरे बढ़ गये हैं। 

गलियों में कोहरा पसरा हुआ है। लेकिन सड़क के  कोहरे को गाड़ियों ने कुचलकर चिंदी-चिंदी कर दिया है। जो कोहरा कुचले जाने से बचा है उसको गाड़ियों के धुंये ने सुलगाकर खतम कर दिया है। बचा हुआ कोहरा जानबचाकर पेड़ों की टहनियों, पत्तों में जाकर छिप गया है। जान जाने के डर से थर-थर कांप रहा है बेचारा। पेड़ उसके थरथराने से हिलडुल रहे हैं। ऊपर से आती किरणों की सवारी देखकर कोहरे बेचारी की सिट्टी और पिट्टी दोनों गुम हो गयी है।

भीख मांगने वाली का बच्चा कनटोपा पहने अपनी मां से चिपका है। महिला चुपचाप हथेली फ़ैलाये बैठी है। लोग आते-जाते उसको देखते निकल रहे हैं। जेब से हाथ निकालना कठिन होता जा रहा है। पैसा निकालना  तो और भी कठिन। नोटबंदी के समय में कैसलेस भीखकी व्यवस्था का इंतजाम किया ही नहीं है महिला ने। कैसे मिलती भीख? भीख मांगने के लिये भिखारियों को भी वोट मांगने वाले लोगों की तरह आधुनिक होना पड़ेगा।

यह बात हम बचपन से जानते हैं कि सर्दी में चीजें सिकुड़ जाती हैं। लोग अपनी ऊर्जा को बचाकर रखने के लिये कपड़े लादने लगते हैं। दिन में चार बार नहाने वाले , चार दिन में एक बार पानी गिराने लगते हैं। लोग घर से निकलना कम कर देते हैं। 

लेकिन इस बार की सर्दी में नजारे अलग तरह के हैं। लोग एटीएम की लाइनों में पैसे निकालने के लिये खड़े हैं।  सर्दी से मुकाबले के लिये जगह-जगह अलाव की जगह इस बार भाषणों से आग उगलने की व्यवस्था की गयी है। लोग भाषण सुनकर गरम हो रहे हैं। उबल रहे हैं। ठंड से मुकाबले की यह नयी तकनीक विकसित हुई है। आगे चलकर इसका उपयोग पेट की आग बुझाने के लिये भी किया जायेगा। शुरुआती दौर में कुछ समस्यायें आ रही हैं लेकिन लोग लगे हुये हैं इस तकनीक में महारत हासिल करने में। कुछ दिन बाद देश की हर समस्या का इलाज भाषणों से ही होना संभव हो जायेगा। तब शायद हम दुनिया में पहले देश होंगे जहां भाषणों के माध्यम से समस्याओं के हल निकाले गये। अपना देश एक बार फ़िर दुनिया का सिरमौर बन जायेगा। 

लेकिन यह जब होगा तब होगा। फ़िलहाल तो सर्दी का मौसम है। खुद को बचाकर रहिये। पहन-ओढकर घर से निकलिये। मफ़लर कसकर रखिये। कपड़े न हों तो कोई बात नहीं, सिकुड़कर रहिये। जितना सिकुड़ेंगे, आपके जिन्दा रहने की संभावनायें बढती जायेंगी। 

क्या सोच रहे हैं भाई ! सिकुड़िये जल्दी से । आपके सिकुड़ने से जो जगह निकलनी है उस पर कब्जा करने के लिये अकड़े हुये लोग इंतजार कर रहे हैं। देरी करेंगे तो जनहित/देशहित में वे आपको  रगड़ देंगे।

जिन्दा रहने के लिये सिकुड़कर रहना सीखना आना चाहिये।


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