Sunday, March 25, 2018

भगवतीचरण वर्मा अपने आत्मकथात्मक उपन्यास 'धुप्पल' में


मेरी सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा यह है कि विश्व के अमर सहित्यकारों में मेरी गणना हो। तो अपने जीवन काल मे यह होता दिखाई नहीं देता। विश्व-साहित्य के संदर्भ में हिंदी-साहित्य नगण्य समझा जाता है। वैसे न तो वह नगण्य है न अन्य साहित्यों से नीचा है। लेकिन हम भारतवासी एक विकृति से बुरी तरह ग्रस्त हैं। हमें आत्महंता-योग प्राप्त हुआ है, यानी हम सब आत्मघाती हैं। अपने साहित्य और साहित्यकारों के हमीं सबसे बड़े दुश्मन हैं।
-भगवती चरण वर्मा अपने आतकथात्मक उपन्यास 'धुप्पल' में

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