Sunday, March 25, 2018

खड़खड़ों, खम्भे और पेड़ का गार्ड ऑफ ऑनर

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति
पंकज बाजपेई अपने साज-सामान के साथ


सुबह निकलते-निकलते नौ बज गये आज। जलेबी-दही लाने का आदेश हुआ। घर में कन्या खिलाई जानी थीं। लौटने की समय-सीमा तय नहीं की गयी थी। सो सोचा पंकज बाजपेई जी से भी मिलते आयेंगे।

जाते समय ’तिवारी स्वीट्स हाउस’ रुके। सोचा पहले जलेबी पक्की कर लें। बाहर एक 100 नंबर वाली गाड़ी भी किनारे खड़ी थी। नाली की तरफ़ मुंह किये। लेकिन टुन्न टाइप नहीं थी। चुस्त-चौकस खड़ी थी। 100 नम्बर की गाड़ी मतलब पुलिस की गाड़ी । मतलब कानून व्यवस्था का वाहन।
कानून की गाड़ी को देखकर लगा कि इस गाड़ी के आगे-पीछे भी कईयो गाड़ियां कसी गई होंगी। असेम्बली में कईयों के पुर्जे एक ही ट्रे में साथ-साथ, ऊपर-नीचे लुढकते-पुढकते आये होंगे। कोई पुर्जा लगते-लगते हाथ से छिटक गया होगा। कईयों पुर्जे एक ही भट्टी में गलकर बने होंगे। आगे-पीछे बनी गाड़ियां असेम्बली लाइन से निकलकर अलग-अलग हो गयीं होगी। अलग-अलग बिक गयी होंगी। यह 100 नम्बर में लगी है। क्या पता इसके आगे वाली किसी टैक्सी स्टैन्ड में लगी हो, पीछे वाली दहेज में गई हो, उसके पीछे वाली में तस्करी का माल आर-पार हो रहा हो। मतलब कुछ भी हो सकता है। एक ही स्कूल में पढे लड़के जैसे अलग-अलग फ़ितरत के साथ आगे बढते हैं वैसे ही गाड़ियों के भी हाल। मतलब गाड़ी और इंसान की एक सरीखी नियति।
'तिवारी स्वीट हाउस' वालों ने बताया कि जलेबी दोपहर तक मिलेगी। आराम से आयें। हम 100 ग्राम जलेबी पंकज बाजपेयी के लिये तौलवा के चल दिये। 34 रुपये की पड़ी। रास्ते में आगे एक मंदिर के सामने पूजा-पाठ फ़ुल जोर दारी से हो रहा था।
पंकज भाई अपने ठीहे से नदारद थे। लगा कि वापस चले गये होंगे। गाड़ी किनारे ठढिया के उनके बारे में पास की दुकान से दरियाफ़्त करने की सोच ही रहे थे कि सामने से हिलते-डुलते नमूदार हुये पंकज भाई। देखते ही बोले-’ तुम आ गये। बहुत दिन बाद आये।’ साथ में- ’चिन्ता मत करना। हम हैं न!’ कहते हुये फ़िर-फ़िर कहते रहे- ’तुम आ गये। बहुत दिन बाद आये।’
इसके साथ ही पैर छूने वाली मुद्रा में हाथ से जमीन की तरफ़ इशारा करते हुये 45 डिग्री का कोण बनाया।
हमने पूछा - ’ अच्छा हमारा नाम तो बताओ। पिछली बार याद कराया था। कह रहे थे अबकी याद रखेंगे। भूलेंगे नहीं।’
नाम की बात कई नाम कयास करते हुये बोले उन्होंने- सुधीर, संतोष आदि। सब नाम तीन अक्षर के। हमने कहा -’अ से है नाम। भूल गये।’
फ़िर कई नाम अनुमान लगाते हुये बोले- ’अशोक, अनिल, अमित .. और भी कई नाम।’
हमने फ़िर हिंट दी - ’अ’ के बाद ’न’ आता है।
बोले- ’अनुपम।’
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, वृक्ष, आकाश और बाहर
खड़खड़े, खंभे और इमली का पेड़ सब सूरज भाई को सलामी देते हुए
हमने बताया तो कई बार दोहराते हुये बोले- ’अनूप, अनूप., अनूप...’। साथ ही कहा-’ अब याद रखेंगे। भूलेंगे नहीं।’
हमने बताया -’ पिछली बार जो लाये थे खाने के लिये वही लाये हैं। याद है पिछली बार क्या लाये थे?’
बोले- ’जलेबी, दही।’
मतलब खाने की चीज याद थी। उनको निकालकर दी तो झोले में धर ली। बोले - ’घर में जाकर आराम से खायेंगे।’
हमने पूछा -’चाय पियोगे?’
बोले- ’चाय अभी पी है। बाद में पियेंगे। अभी समोसा खिलाओ।’
समोसे की दुकान से दो समोसे लिये गये। दो नहीं तीन। एक अपने लिये दो उनके लिये। 15 रुपये में। हमने तो वहीं खड़े होकर खाना शुरु कर दिया। उन्होंने समोसे भी धर लिये। बोले -’घर जाकर खायेंगे।’
आज की ड्रेस में उनके कोट नहीं था। हल्का अंगरखा टाइप या ज्यादा ठीक होगा सलूका टाइप परिधान धारण किये थे। बताया कि नहाकर आये हैं। पता नहीं किस बात पर बोले-’ भाभी बहुत सफ़ाई पसन्द हैं। उनको हमारा चरण स्पर्श कहना।’
हमने पूछा - कौन भाभी?’ तो उन्होंने मेरी पत्नी के बारे में बताया। हमने सोचा कि यह कैसे पता कि वो सफ़ाई पसन्द है? बोले-’ हमको पता है।’
हमने कहा-’ आज तुम्हारे घर चलें?’
बोले- ’आज नहीं फ़िर चलना। अभी मामी हैं नहीं घर पर।’
चलते हुये हमने फ़िर पूछा -’चलो चाय पीते हैं।’
बोले-’ अभी नहीं अब शाम को पियेंगे। तुम हमको पैसे दे देव। हम पी लेंगे।’
हमने पूछा-’ कित्ते पैसे ?’
बोले- ’10 रुपये।’
इसके बाद हम चलने को हुये। वो भी चल दिये। गाड़ी मोड़कर लाये तो वे फ़िर अपने डिवाइडर सिंहासन पर आरूढ हो गये थे। हमने पूछा -’गये नहीं अभी तक?’
बोले- ’जायेंगे। अभी थोड़ी देर में।’
हमने अपने को हड़काया कि 100 ग्राम जलेबी, समोसा और एक चाय पर किसी इंसान के उठने-बैठने पर सवाल करने का हक समझने लगे तुम? आदमी हो या किसी युनिवर्सिटी के वीसी जो बच्चों के रोजमर्रा के जीवन पर फ़तवा देना अपना हक समझता है।
बहरहाल हम वापस लौट लिये। एक जगह पेट्रोल भरवाया। पेट्रोल वाले को चाबी देते हुये सामने खड़े खड़खड़ों की फ़ोटो खैंचने लगे। खलखड़े तोप की सलामी मुद्रा में खड़े थे। उनकी देखादेखी एक खम्भा भी झुककर खड़खड़ों जितना ही झुक सा गया था। इसके बाद देखा तो बगल का इमली का पेड़ भी वैसा ही खड़ा दिखा। मतलब पूरी कायनात एक तरह सी झुकी खड़ी थी। ऐसा लग रहा था कि सब मिलकर सूरज भाई को गार्ड ऑफ ऑनर सरीखा दे रहे हों।
घोड़े इस सब से निर्लिप्त आपस में हिनहिनाते, टांगे हिलाते वार्मअप टाइप करते खड़े थे। एकाध ने खड़े-खड़े जमीन पर लीद भी कर दी। अब जमीन पर लीद न करें तो कहां करें? उनके लिये अभी कहीं सुलभ शौचालय बने हैं न कहीं 'घोड़ा शौचालय' मल्लब 'हॉर्स टॉयलेट'।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग पैदल चल रहे हैं और बाहर
सड़क की तारकोल कार्पेट पर क्रिकेट मैच
फोटो लेकर फुरसत हुए तब तक देखा 150 से ऊपर का पेट्रोल टँकी में घुस चुका था। हमने सोचा इत्ती जल्ली कैसे इत्त्ता पेट्रोल घुस गया। न तो हमारी टँकी कोई सरकारी पार्टी है और न ही पेट्रोल कोई राजनेता जिसको हमारी टँकी में घुसने की हड़बड़ी हो। पूछने पर पम्प वाले ने बताया -'आप फोटो खैंच रहे थे। हमने दाब दिया।' हमने सोचा ठीक ही किय्या।
आगे एक बन्द मिल की चिमनी और उसके पास आज समाचार पत्र का दफ़्तर दिखा। दोनों को एक साथ देखकर कैप्शन उभरा -
’मिल की चिमनी और शहर का अखबार,
कभी ये दोनों आग उगलते थे यार।’
कैप्शन के उभरने के बाद सोचा उनका फ़ोटो भी लिया जाये। कई कोशिश के बाद फ़ोटो आया। मिल तो आ जा रही थी लेकिन अखबार का नाम हर बार दांये-बायें हो जा रहा था। जिस तरह मीड़िया जरूरी खबरों को गैरजरूरी हल्ले की आड़ में छिपाकर उनसे अवाम का ध्यान बंटाता है ऐसे ही अखबार के पास का पेड़ अखबार का नाम छिपा रहा था।
लाटूस रोड के दोनों तरफ़ कई बच्चों की टोलियां सड़क पर अद्धे-गुम्मे के विकेट बनाये सड़किया क्रिकेट खेल रहे थे। टेनिस की गेंद के धुर्रे उड़े हुये थे। बूढी गेंद गेंदबाज के हाथ से सीधी निकलने के बावजूद सड़क पर टप्पे खाते हुये अपने आप वाइड हो जा रही थी। शॉट मारने के लिये उठे बल्ले को गच्चा देते हुये विकेट के पीछे चली जा रही थी। क्या पता बाद में कहती हो- ’ किस्मत अच्छी थी, बैट-बैट बची।’
आगे पुराना मकान देखा जिसमें छत पर हवाई जहाज बनाया हुआ है। जहाज के पंखे हिल रहे थे। हम बचपन में गांधीनगर से चौक अपनी बुआ के घर आते-जाते इस जहाज को कौतुक से देखते थे। सोचते थे कि यह जहाज कैसे छत पर उतरा होगा।
थोड़ा आगे चलकर अपन मूलगंज चौराहे पहुंच गये। वहां गाड़ी एक किनारे खड़ी करके चौराहे के नजारे लेने लगे।

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